राज्य के 25 साल – विकास की रफ्तार या व्यवस्था की विकृति
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लेखक- स्वतंत्र पत्रकार हरीश खखरियाल की कलम से…..
“9 नवम्बर 2000…जब उत्तराखंड ने अलग राज्य बनने का सपना देखा था,तो उस सपने में शामिल था – विकास, पारदर्शिता, रोजगार और ईमानदारी। आज, जब राज्य अपनी रजत जयंती मना रहा है,सवाल उठता है —इन 25 सालों में उत्तराखंड ने क्या पाया, और क्या खो दिया ?”
सपना और सच्चाई का अंतर
“राज्य आंदोलन के दौरान नारा था —‘अपना राज, अपने लोग, अपनी पहचान।उम्मीद थी कि शासन गावों तक पहुंचेगा और भ्रष्टाचार से मुक्त व्यवस्था बनेगी, लेकिन दो दशक बाद हकीकत कुछ और ही बयान कर रही है।बेरोज़गारी, पलायन और भ्रष्टाचार की जडें अब हर विभाग में फैल चुकी हैं।



बढ़ता भ्रष्टाचार – सिस्टम में सडांध
राज्य गठन के साथ उम्मीद थी कि ‘छोटा राज्य, पारदर्शी शासन’ का सपना साकार होगा,मगर 25 साल बाद भ्रष्टाचार की जडें इतनी गहरी हैं कि अब न्यायालयों को बार-बार दखल देना पड रहा है।
विभागीय भ्रष्टाचार हो या भर्तियों में धांधली —हाईकोर्ट तक को कई बार CBI जााँच के आदेश देने पडे। बागवानी विभाग को किसानों की आत्मा कहा जाता है,वहां तक भ्र्ष्टाचार की गंध पहुंच चुकी है,किसानों के लिए बनी योजनाएं , सब्सिडी और ग्रांट्स फाइलों में अटककर अफसरशाही की भेंट चढ़ गईं।हालात इतने बिगड़े कि हाईकोर्ट को खुद बागवानी विभाग के भ्रष्टाचार की जााँच CBI से कराने के आदेश देने पडे।
और यह कहानी सिर्फ एक विभाग की नहीं —सडक निर्माण से लेकर खनन, शिक्षा और भर्ती परीक्षाओं तक,हर जगह ‘सिस्टम सवालों के घेरे में है।
पेपर लीक और बेरोज़गारों की हताशा
पेपर लीक कांड ने युवाओं के भरोसे को तोड़ दिया है। जिस युवा शक्ति को राज्य की रीड बनना था,,वही आज आज सडकों पर है,अपने हक़ और मेहनत की कीमत मांगते हुए हर कुछ महीनों में भर्ती परीक्षाओं की जााँच, रद्दीकरण,और आंदोलनों की आवाज बनकर सुनाई देती है।

पलायन रुकने के बजाय और बढ़ा है —आज पहाडों से हर रोज़ सैकडों युवा रोज़गार की तलाश में मैदान की ओर उतर रहे हैं।
अपराध और असुरक्षा – बदलता उत्तराखंड
कभी शांत प्रदेश कहा जाने वाला उत्तराखंड अब अपराध की खबरों से भी अछूता नहीं रहा। हत्या, लूट और दुष्कर्म जैसी वारदातें अब यहां की सुर्ख़ियों में शामिल हैं,सवाल उठता है — क्या हम वाकई उस उत्तराखंड में हैं,जिसका सपना 2000 में देखा गया था?”
विकास की रफ्तार – उप्लभ्धियाँ भी कम नहीं
इन सबके बीच, उत्तराखंड ने विकास की राह पर भी कई कदम बढ़ाए हैं। चारधाम यात्रा के तलए ऑल वेदर रोड प्रोजेक्ट,हवाई सेवाओं का विस्तार,और शिक्षा स्वास्थ्य के नए संस्थान — ये उप्लभ्धियाँ राज्य की प्रगति की तस्वीर दिखाती हैं। पर्यटन , योग, और जैविक खेती के क्षेत्र में भी उत्तराखंड ने नई पहचान बनाई है। आज राज्य का GDP 3 लाख करोड के करीब पहुंच रहा है,और प्रति व्यक्ति आय में भी बढ़ोतरी हुई है।लेकिन सवाल वही —क्या विकास का लाभ हर पहाडी गावं तक पहुंचा ?जनता का सवाल – जवाबदेहि कहां है?
जब हर कुछ सालों में एक नया घोटाला सामने आता है,जब हर भर्ती पर संदेह हो,जब युवाओं की आाँखों में विश्वास की जगह निराशा हो —तब रजत जयंती के जश्न पर ताली बजाना मुश्किल हो जाता है। सवाल है — क्या ये 25 साल जनता के लिए बदलाव लाए या सिर्फ कुर्सियों के लिए ?
निष्कर्ष – उम्मीद अब भी बाकी है
उत्तराखंड की कहानी संघर्ष से शुरू हुई थी,और उम्मीदों पर अटकी हुई है।ये राज्य युवाओं की मेहनत और पहाडों की ईमानदारी से बना है।अगर राराजनीतिक इइच्छाशक्ति ईमानदार हो,तो अगला अध्याय भरोसे और पारदर्शिता का लिखा जा सकता है। राज्य का सवाल अब भी वही है —‘क्या खोया, क्या पाया?’ जवाब आने वाले सालों में तय करेगा कि पहाड़ों का सपना अधूरा रहेगा या पूरा होगा।”
“25 साल बाद भी सवाल वही — भ्रष्टाचार बनाम विकास | उत्तराखंड @ 25”
ये लेखक के अपने स्वतंत्र विचार हैं…
