उक्रांद के उठान और ढलान का फील्ड मार्शल,अनछुए संस्मरण

उक्रांद के उठान और ढलान का फील्ड मार्शल,अनछुए संस्मरण

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श्रद्धांजलि- उक्रांद के उठान और ढलान का फील्ड मार्शल

राज्य आंदोलनकारी डॉ एसपी सती ने साझा किए अनछुए संस्मरण

दिवाकर भट्ट नहीं रहे। दिवाकर भट्ट से मेरी पहली मुलाकात शायद सितंबर 1994 में हरिद्वार में हुई थी। हरिद्वार में साथी मधुसूदन थपलियाल (अब अध्यापक एवं प्रसिद्ध लोक कवि), सुशील बहुगुणा (अब एनडीटीवी के सुविख्यात पत्रकार) आदि साथियों ने राज्य आंदोलन की एक रैली रखी थी जिसमें स्व. अनिल काला, प्रभाकर बाबुलकर, स्व. रणजीत भण्डारी और मुझे बतौर वक्ता बुलाया गया था। रैली हुई भी और नहीं भी हुई क्योंकि इस जनसभा में अपेक्षा से कहीं कम लोग पहुंचे थे। हमारे आयोजक साथियों का आरोप था कि इस रैली को फ्लॉप करने के लिए दिवाकर भट्ट जी ने साजिश की।

उन दिनों उक्रांद और उत्तराखंड संयुक्त छात्र संघर्ष समिति के बीच इस तरह का अविश्वास कायम था। रैली के समाप्त होते ही हम साथियों ने निर्णय लिया कि दिवाकर भट्ट जी से मिला जाए।

इत्तेफाक से वह उस दिन हरिद्वार में ही थे। हम लोग जैसे ही उनके घर पहुंचे, उन्होंने गर्मजोशी से हमारा स्वागत किया। और ज़िद की कि खाना खाकर जाएंगे। भाभी ने स्वादिष्ट खाना बनाया। उस दिन एक तरह से हमारे संबंधों की आइस ब्रेकिंग हुई। जानते हमको वह भी थे और हम भी उनके नाम से खासे परिचित थे, परंतु मुलाकात की कोशिश न उधर से कभी हुई और न हमारी तरफ से ही।

खैर उस दिन के बाद दिवाकर भट्ट जी से आंदोलन के सिलसिले में मुलाकातें होती रहीं। उन दिनों उक्रान्द में गहरे मतभेद चल रहे थे जिसके चलते कुछ दिनों बाद दिवाकर भट्ट जी को पार्टी से निष्काषित किया गया।

लिहाजा बीच आंदोलन में उक्रांद दो फाड़ हो गई। एक बन गया काशी सिंह ऐरी गुट और दूसरा पूरन सिंह डंगवाल गुट। दिवाकर भट्ट जी डंगवाल गुट के हो गए। अब आंदोलन के बड़े कार्यक्रम देने की बारी थी। दिवाकर भट्ट जी ने इसके लिए श्रीयंत्र टापू को चुना।

सितंबर 1995 में दो आंदोलनकारी दौलतराम पोखरियाल और विशन सिंह पँवार को अलकनंदा नदी के बीच ऐतिहासिक श्रीयंत्र टापू में उनकी इच्छा से भूख हड़ताल पर बिठाया गया। उनका साथ देने के लिए हम भी तन मन से उस आंदोलन में श्रीयंत्र टापू में जुट गए। वहाँ हमारी दिवाकर जी से अत्यंत प्रगाढ़ता हो गई थी, जो राज्य गठन के बाद 2007 में भाजपा सरकार में उनके मंत्री बनने तक जारी रही।

यहाँ यह बताना जरूरी है कि 2002 के चुनाव में दिवाकर जी हार गए। राज्य आंदोलन में सर्वस्व न्योछावर करने के बावजूद उनके हार जाने से दुखी होकर उनकी पत्नी और हमारी भाभी ने आत्महत्या कर दी। जब हम संवेदना व्यक्त करने गए तो यह आदमी तब भी राज्य के बारे में ही बात कर रहा था।

उनसे संपर्क तब टूटा जब वह 2007 के चुनाव में जीत कर भुवंचन्द्र खन्डूरी मंत्रिमंडल में मंत्री बन गए। यह अलग मुद्दा है, जिसकी समीक्षा फिर कभी।

दिवाकर भट्ट राज्य आंदोलन के एक बड़े कालखंड के सबसे चमकते सितारे तो थे ही, उससे पहले अंशकालिक शिक्षकों के आंदोलन से लेकर कई आंदोलनों को धार देने में उनका योगदान अद्वितीय था।
यह भी सच है कि उत्तराखंड क्रांति दल राज्य की आकांक्षा का अकेला संगठन बन पाया तो उसमें दिवाकर का योगदान किसी भी नेता से अधिक प्रभावशाली रहा। वहीं दूसरी तरफ यह संगठन अगर एक कामयाब राजनैतिक दल के रूप में स्थापित न हो सका तो इसका भी सबसे अधिक श्रेय दिवाकर के कई निर्णयों को जाना चाहिए। यद्यपि इस पर बात करने का आज न तो मौका है और न ही इस संक्षिप्त लेख का उद्देश्य।

एक बात जो कल उनको अस्पताल से डिस्चार्ज करते हुए अखरी कि उक्रांद का कोई भी बड़ा नेता वहाँ मौजूद नहीं था, न ही कोई बड़ा आंदोलनकारी। इसी से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि उक्रांद क्यों एक राजनैतिक दल नहीं बन सका। सब कुछ तो उनके पक्ष में है, मुद्दे, माहौल, मानसिकता, बस सोने की बिल्ली म्याऊं ही नहीं कर रही।

तुम्हें मेरी बेहद खुद वाली श्रद्धांजलि हे ! पुरोधा।
प्रणाम प्रणाम प्रणाम

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