Author: Manisha Rana

मोदी सरकार की घोटालों की लिस्ट बाहर, गोदी मीडिया में पसरा सन्नाटा…

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देश की मुख्यधारा की मीडिया ने मोदी सरकार के इन 10 सालों में जो भूमिका निभाई, वो कहीं न कहीं बदली हुई नजर आती  है, जिस तरह से मीडिया ने UPA के दौर में गलत फैसलों और घोटालों को लेकर मनमोहन सरकार  की खूब आलोचना की थी , फिर चाहे वो अखबारों के पन्ने से रंगे घोटालों की आवाज़ हों या फिर टीवी डिबेटों से कटघरे में खड़ा करते पत्रकार हों. मनमोहन सरकार को कटघरे में खड़ा करने का एक भी मौका मीडिया ने चूका नहीं, लेकिन अब मोदी सरकार में इसी मेन स्ट्रीम  मीडिया ने अपना पुराना रुख बदल दिया है, अब मोदी सरकार के गलत कार्यों की आलोचना करने के बजाय ये मीडिया समूह कई बार सरकार का बचाव करते दिखाई देते हैं, यही कारण है कि मोदी सरकार में मीडिया की भूमिका पर सबसे ज्यादा सवाल उठते हैं और कई लोग अब इसी मीडिया को गोदी मीडिया भी कहते हैं। उस मीडिया को .जिसको कभी खोजी मीडिया का नाम देश की जनता जनार्दन दिया करती थी।

जब मनमोहन सिंह की सरकार थी-


UPA  की सरकार के दौरान  आयी C. A.G यानी कैग की रिपोर्ट के आधार पर उस समय की मनमोहन सरकार पर कई बड़े-बड़े घोटालों के आरोप लगे,कोयला घोटाला, 2G घोटाला और साथ ही कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला जैसे बड़े घोटाले सामने आने के बाद मनमोहन सरकार की पुरे देश में में खूब आलोचना हुई, उस समय विपक्ष में बैठी भाजपा ने  सरकार को हर जगह घेरना शुरू कर दिया था,कैग की रिपोर्ट का ही असर था कि ये घोटाले सामने आये और इसका एक बड़ा असर देश में ये पड़ा कि 2014 में UPA सरकार की विदाई हो गयी और प्रचंड बहुमत से भाजपा की नरेंद्र मोदी की सरकार सत्ता में आ गई। 


क्या है 
CAG रिपोर्ट-

वक्त बदला ,हालात बदले और एक बार फिर  कैग की रिपोर्ट  सामने आई है. मगर अब UPA नहीं बल्कि NDA की मोदी सरकार का युग है. और मोदी सरकार के घिरने पर भी हर तरफ निल बटा सन्नाटा है. कैग की रिपोर्ट में दो बड़ी गड़बड़ियां सामने आयी हैं,, दिल्ली में बनाए जा रहे द्वारका एक्सप्रेसवे पर CAG की रिपोर्ट ने कई अहम सवाल उठाए हैं. CAG रिपोर्ट में कहा गया है कि इस सड़क की लागत कई गुना ज्यादा है. रिपोर्ट के मुताबिक, जो लागत प्रति किलोमीटर 18 करोड़ रुपये होनी थी, वहीं पर 250 करोड़ रुपये तक खर्च हुए हैं. सीएजी की ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया है कि कैबिनेट ने इस सड़क के लिए प्रति किलोमीटर का बजट 18.20 करोड़ रुपये प्रस्तावित किया था लेकिन इसके लिए प्रति किलोमीटर 251 करोड़ रुपये का बजट पास किया गया. अब इस लागत में इतना ज्यादा अंतर आने पर सवाल खड़े हो रहे है। 

 

दिल्ली-वडोदरा एक्सप्रेसवे पर भी सवाल खड़े-

भारतमाला परियोजना-1 के तहत बनाया जा रहा यह द्वारका-एक्सप्रेसवे दिल्ली और गुरुग्राम में आता है. दिल्ली को गुरुग्राम से जोड़ने वाली ये सड़क 29 किलोमीटर लंबी है. यह सड़क दिल्ली के महिपालपुर में शिव मूर्ति के पास से शुरू होती है और गुरुग्राम में खेरकी टोल प्लाजा तक जाती है . यह एक्सप्रेसवे 14 लेन का बनाया जा रहा है. अब इसकी लागत को लेकर हंगामा खड़ा हो गया है और विपक्षी नेताओं ने भी इस पर सवाल पूछने शुरू कर दिए हैं। 

CAG ने द्वारका एक्सप्रेसवे के इस प्रोजेक्ट की 2017 से 2021 तक की रिपोर्ट का ऑडिट किया है. द्वारका एक्सप्रेसवे  के साथ-साथ दिल्ली-वडोदरा एक्सप्रेसवे पर भी सवाल खड़े हुए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, यह पूरा प्रोजेक्ट CCEA की ओर से अप्रूव्ड प्रोजेक्ट की लिस्ट में ही.. नहीं था  और  और उस  पर भी NHAI ने अपने स्तर पर 33 हजार करोड़ रुपये खर्च कर लिए. CAG की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतमाला परियोजना-1 के तहत लगभग 76,999 किलोमीटर की सड़कें बनाई जा रही है. इसमें से 70,950 किलोमीटर सड़क NHAI बना रहा है. NHAI के कई फैसलों पर अब सवाल उठ रहे हैं. ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक, NHAI ने CCEA की ओर से तय की गई नियमावली का भी सही से पालन नहीं किया. 50 में से 35 प्रोजेक्ट ऐसे हैं जहां टेंडर से जुड़ी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया है।

CAG रिपोर्ट में एक और बड़ा खुलासा-


कैग की रिपोर्ट में एक और बड़ा और हैरान करने वाला खुलासा हुआ है,आयुष्मान भारत योजना  को लेकर..
भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) की एक और चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है. जिसमें बताया गया है कि आयुष्मान भारत योजना के तहत 6.9 करोड़ रूपये उन लोगों के इलाज पर खर्च किये गए जो इस दुनिया में ही नहीं हैं,मतलब पहले ही मर चुके लोगों के नाम पर ये खर्च किया गया, आयुष्मान भारत- प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना  को साल 2018 में शुरू किया गया था. इसका मकसद गरीबों को मुफ्त इलाज देना था, जिसे ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में शुरू किया गया. इस रिपोर्ट के मुताबिक कुल 3,446 ऐसे मरीजों के इलाज पर कुल 6.97 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया, जो पहले ही मर चुके थे. डेटाबेस में इन सभी मरीजों को मृत दिखाया गया है. ये पहला मौका नहीं है जब आयुष्मान भारत योजना को लेकर ऐसी रिपोर्ट सामने आई हो, इससे पहले भी सीएजी की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि करीब 7.5 लाख से ज्यादा लोगों को एक ही मोबाइल नंबर पर रजिस्टर कर दिया गया और जिस पर रजिस्ट्रेशन हुआ वो नंबर भी अमान्य था। 

 
 
क्या कहती है इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट- 


इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक केरल में ऐसे मरीजों की संख्या सबसे ज्यादा थी. यहां कुल 966 ऐसे मरीज पाए गए, जिन्हें मृत घोषित करने के बावजूद उनका इलाज जारी था. इनके इलाज पर  करोडों रुपये का भुगतान अस्पतालों को किया गया. इसके बाद मध्य प्रदेश में 403 और छत्तीसगढ़ में 365 ऐसे मरीज मिले. जिनके इलाज पर लाखों रुपये खर्च हुए. फिलहाल योजना के तहत जो गाइडलाइन बनाई गई हैं, उनके मुताबिक अगर किसी मरीज की अस्पताल में भर्ती होने और डिस्चार्ज होने के बीच मौत हो जाती है तो ऑडिट के बाद अस्पताल को इसका भुगतान किया जाता है।

 
स्वदेश दर्शन योजना पर भी उठे सवाल- 

अयोध्या विकास को लेकर बनाए जा रहे स्वदेश दर्शन योजना पर भी कैग ने सवाल उठाया है. कैग के मुताबिक इस परियोजना में ठेकेदारों को 19.73 करोड़ रुपये का अनुचित लाभ दिया गया है. इस मामले का खुलासा होने के बाद से सियासी गलियारों में हंगामा मचा है. इस बीच दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा है कि मोदी सरकार ने भ्रष्टाचार के 75 वर्ष के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए।वरिष्ट नेता  जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री से पूरे मामले में चुप्पी तोड़ने के लिए कहा है. यह पहली बार नहीं है, जब कैग की रिपोर्ट ने सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. पूर्व में कैग रिपोर्ट की वजह से मुख्यमंत्री और मंत्रियों की कुर्सी तक जा चुकी है. इतना ही नहीं, कैग की रिपोर्ट से बने भ्रष्टाचार के माहौल में UPA की पूरी मनमोहन सरकार ही चली गई थी

CAG रिपोर्ट में कई और खुलासे-


आपको बताते चलें कि संविधान में सरकारी खर्च की पड़ताल के लिए एक सरकारी एजेंसी बनाने का प्रावधान है. अनुच्छेद 148 के मुताबिक इस एजेंसी के प्रमुख की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, इसके  प्रमुख को उसी तरह से हटाया  जा सकता है, जिस तरह सुप्रीम कोर्ट के एक जज को संविधान के अनुच्छेद 149, 150 और 151 में कैग के कामकाज और शक्तियों के बारे में जिक्र किया गया है जिसको चाहें तो विस्तार से वहां पर भी पढ़ा जा सकता  है. कैग का काम सभी सरकारी संस्थाओं का ऑडिट करना और उसकी रिपोर्ट संसद या विधानसभा के पटल पर रखना होता है. वर्तमान में कैग 2 तरह से ऑडिट करता है. पहला-रेग्युलेरिटी ऑडिट और दूसरा -परफॉर्मेंस ऑडिट.रेग्युलेरिटी ऑडिट को कम्पलायंस ऑडिट भी कहते हैं. इसमें सभी सरकारी दफ्तरों के वित्तीय ब्यौरे का विश्लेषण किया जाता है. विश्लेषण में मुख्यत: यह देखा जाता है कि सभी नियम-कानून का पालन किया गया है या नहीं? 2जी स्पैक्ट्रम की नीलामी का मामला रेग्युलेरिटी ऑडिट की वजह से ही उठा था. इसी तरह परफॉर्मेंस ऑडिट में कैग के द्वारा यह पता लगाया जाता है कि क्या सरकारी योजना शुरू करने का जो मकसद था, उसे कम खर्च पर सही तरीके से किया गया है या नहीं? इस दौरान योजनाओं का बिंदुवार विश्लेषण किया जाता है।

कैग रिपोर्ट से देश में क्या पड़ा-

सितंबर 2001 में कैग ने गुजरात को लेकर एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी. रिपोर्ट में कहा गया कि गुजरात के तत्कालीन  मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल बिना वजह 2 बार विदेश यात्रा पर गए. इस दौरान वो अपने 2 करीबी अधिकारियों को भी साथ ले गए, जो वहां मनोरंजन के नाम पर लाखों खर्च कर आए. कैग ने मुख्यमंत्री के 2 करीबी अधिकारियों को सरकारी मद से खर्च रुपयों का भुगतान करने के लिए भी कहा.
रिपोर्ट आने के बाद गुजरात की सरकार हरकत में आ गई. केशुभाई पटेल की मीडिया टीम ने कैग के खिलाफ ही एक विज्ञापन निकलवा दिया. इसमें कहा गया कि मुख्यमंत्री निवेश लाने गए थे मगर कैग ने लोगों को गुमराह किया है। 


इस बीच कैग और सरकार की लड़ाई में विपक्ष भी कूद गया. केंद्र में अटल बिहारी वाजपेई की सरकार थी. राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री रहे छविदास मेहता ने प्रधानमंत्री को पत्र लिख पूरे मामले में एक्शन लेने के लिए कहा. गुजरात में इस प्रकरण के एक साल बाद ही विधानसभा का चुनाव प्रस्तावित था. चिंतित बीजेपी ने आनन-फानन में गुजरात के नेताओं की बैठक बुलाई. इसी बैठक में केशुभाई पटेल के हटाने पर सबके बीच सहमति बनी। 


6 अक्टूबर 2001 को केशुभाई पटेल को अपना इस्तीफा देना पड़ा था  और फिर पटेल की जगह पर नरेंद्र मोदी को विधायक दल का नेता चुना गया. यानी गुजरात प्रदेश का मुख्यमंत्री


जब रामविलास पासवान पहली बार केंद्रीय मंत्री बनाए गए-


1989 में वीपी सिंह की सरकार में रामविलास पासवान पहली बार केंद्रीय मंत्री बनाए गए. मंत्री के रूप में उन्हें 12 जनपथ का बंगला दिया गया. 1991 में कैग की रिपोर्ट ने राम विलास पासवान के बंगले को लेकर एक रिपोर्ट जारी कर दी. रिपोर्ट के मुताबिक पासवान ने घर सजवाने के लिए तय रकम से ज्यादा रुपए खर्च कर दिए. रिपोर्ट में कहा गया कि पासवान को जब बंगला मिला तो EPFO ने अपने मद से साज-सज्जा के लिए लाखों रुपए खर्च कर दिए. EPFO की ओर से डबल बेड के लिए 10,945 रुपए, रंगीन टीवी के लिए 13,500 रुपए, पर्दे के लिए 52,300 रुपए दिए गए, जो गलत निर्णय था. कैग रिपोर्ट पर हंगामा मच गया और विपक्ष ने ईमानदार राजनीति की बात करने वाले पूर्व पीएम वीपी सिंह को निशाने पर ले लिया. जानकारों का कहना है कि रामविलास पासवान के मामले में सिंह बैकफुट पर आ गए, क्योंकि पासवान उनके काफी करीबी थे. 1991 में वीपी सिंह की पार्टी को चुनाव में करारी हार मिली. सिंह ने इसके बाद 10 साल तक कोई भी पद नहीं लेने का अघोषित वादा कर लिया।

2014 के चुनाव में क्यों हारी थी मनमोहन सरकार-


2010 में कैग ने एक रिपोर्ट जारी की, जिसने तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी. कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि 2G स्पैक्ट्रम के आवंटन में धांधली की गई है. यह आवंटन साल 2008 में किया गया था.  कैग के मुताबिक 2G आवंटन में धांधली की वजह से सरकार को 1.76 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ.  उस वक्त दूरसंचार विभाग डीएमके के सांसद ए. राजा के पास था. कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि ए. राजा ने स्पैक्ट्रम आवंटन में प्रधानमंत्री कार्यालय, वित्त मंत्री कार्यालय की सलाहों को नजरअंदाज कर दिया था . मामला सामने आने के बाद बीजेपी ने संसद में मनमोहन सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. आनन-फानन में मनमोहन सिंह ने सीबीआई से जांच कराने की बात कही. सीबीआई ने शुरुआती जांच के बाद ए.राजा को गिरफ्तार कर लिया, जिसके बाद उन्हें कैबिनेट से भी हटा दिया गया. हालांकि, बाद में सीबीआई मामले को साबित नहीं कर पाई और कोर्ट से ए.राजा को क्लीन चिट मिल गई.2-जी स्पैक्ट्रम के बाद कैग ने कोल आवंटन पर भी सवाल उठा दिया. लगातार घपले-घोटाले सामने आने के बाद सरकार बैकफुट पर चली गई.  इसी बीच अन्ना हजारे के नेतृत्व में लोकपाल बनाने की मांग शुरू हो गई . इसने भी कांग्रेस सरकार को काफी डेमेज किया, दूसरी तरफ सीएजी रिपोर्ट के बाद बीजेपी अटैकिंग मोड में और कांग्रेस डिफेंसिव मोड में चली गई, जिसका असर 2014 के चुनाव पर हुआ और मनमोहन सरकार बुरी तरह हार गई। 


अब मोदी सरकार भी कटघरे में-

ये तमाम चीजें हैं जो मनमोहन सरकार की तरह मोदी सरकार को भी कटघरे में खड़ा करती हैं, लेकिन मेन स्ट्रीम मीडिया ने इस पर एक हल्की सी रिपोर्ट दिखाकर और चार लाइनों की खबर लिख कर इस मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया,यही कारण है कि मीडिया की भूमिका को लेकर सवाल खड़े होते हैं, सरकार का पक्ष लेने और सरकार से सवाल न पूछने के कारण अब ऐसे मीडिया समूह को कई जगहों पर बायकॉट किया  जाता है, और उसके उलट सोशल मीडिया और यू ट्यूब के जरिये कई स्वतंत्र पत्रकार लगातार सरकार से सवाल कर रहे हैं जिससे उनकी एक अलग पहचान भी बन रही है। 

 

मणिपुर में बीते कई दिनों की शांति के बाद एक बार फिर भड़की हिंसा, गोलीबारी में 3 लोगों की मौत…

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मणिपुर में पिछले तीन महीनो से जारी हिंसा रुकने का नाम नहीं ले रही है. आए दिन वहां पर हिंसा की घटनाएं सामने आती रहती हैं.  कुछ दिनों की शांति के बाद एक बार फिर तनावग्रस्त मणिपुर में शुक्रवार सुबह फिर से हिंसा भड़क गई। सूत्रों के मुताबिक, सुबह करीब 5.30 बजे उखरुल जिले के लिटन पुलिस स्टेशन के अंतर्गत थवई कुकी गांव में संदिग्ध मैतेई सशस्त्र बदमाशों और कुकी स्वयंसेवकों के बीच गोलीबारी हुई। जिसमे सूत्रों के मुताबिक तीन कुकी लोगों के मारे जाने की खबर है। इस घटना के बाद सुरक्षाबलों ने पूरे इलाके को घेर कर तलाशी अभियान शुरू कर दिया है। क्षेत्र में स्थिति तनावपूर्ण बताई गई है।

 

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो कुछ अराजकतत्वों ने सबसे पहले गांव के ड्यूटी पोस्ट पर हमला किया, जहां कई स्वयंसेवक गांव की सुरक्षा के लिए ड्यूटी कर रहे थे। इस गोलीबारी में कुकी स्वयंसेवकों के तीन लोगों के मारे जाने की खबर सामने आयी है। मारे गए लोगों की पहचान जामखोगिन हाओकिप, थांग खोकाई हाओकिप और होलेनसोन बाइते के रूप में हुई है।इस घटना के बाद एक बार फिर से तनाव की स्थिति बन गयी है।

उल्लेखनीय है कि ये गांव मैतेई आबादी क्षेत्र से काफी दूर स्थित है। निकटतम मेइतेइ निवास यिंगांगपोकपी में है जो घटना स्थल से 10 किलोमीटर से अधिक दूर है। बताया जा रहा है कि घटनास्थल से 37 बीएन बीएसएफ करीब 5 से 6 किलोमीटर दूर है। घटना के बाद बीएसएफ सहित अन्य सुरक्षा बल मौके पर पहुंच गए हैं। सुरक्षाबलों ने पूरे क्षेत्र को घेरकर तलाशी अभियान शुरू कर दिया है। 
 
 
आखिर क्या मांग कर रहा है मैतई समुदाय-


आपको बता दें कि मणिपुर में बहुसंख्यक मैतई समुदाय जनजातीय आरक्षण देने की मांग कर रहा है। इसकी वजह ये है कि मैतई समुदाय की आबादी करीब 53 प्रतिशत है लेकिन ये लोग राज्य के सिर्फ 10 प्रतिशत मैदानी इलाके में रहते हैं। वहीं कुकी और नगा समुदाय राज्य के पहाड़ी इलाकों में रहते हैं जो की राज्य का करीब 90 फीसदी है। जमीन सुधार कानून के तहत मैतई समुदाय के लोग पहाड़ों पर जमीन नहीं खरीद सकते, जबकि कुकी और नगा समुदाय पर ऐसी कोई पाबंदी नहीं है। यही वजह है, जिसकी वजह से हिंसा शुरू हुई और अब तक इस हिंसा में 100 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है।  

 

सीबीआई कर रही है मणिपुर हिंसा की जांच-


केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई ने मणिपुर हिंसा की जांच शुरू कर दी है। इसके लिए 53 अफसरों की टीम बनाई गई है, जिसमें 29 महिला अफसरों को शामिल किया गया है। सीबीआई की टीम में तीन डीआईजी लवली कटियार, निर्मला देवी और मोहित गुप्ता और सुपरीटेंडेंट ऑफ पुलिस राजवीर सिंह भी शामिल हैं। ये अधिकारी सीबीआई के जॉइंट डायरेक्टर घनश्याम उपाध्याय को अपनी रिपोर्ट देंगे। बता दें कि यह पहली बार है कि इतनी बड़ी संख्या में महिला जांच अधिकारियों को जांच टीम में शामिल किया गया है।  

नरेंद्र मोदी का गिरता और योगी आदित्यनाथ का बढ़ता ग्राफ…

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भारतीय जनता पार्टी को साल 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बहुमत मिला. करीब 15 साल बाद बीजेपी ने सत्ता में वापसी की थी.. सरकार का मुखिया कौन होगा यानी मुख्यमंत्री कौन बनेगा,, इस सवाल के जवाब में कई नाम सामने थे. लेकिन, फ़ाइनल मुहर लगी योगी आदित्यनाथ के नाम पर.. बहुत से लोगों के लिए ये फैसला एक ‘सरप्राइज़’ था. योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री पद की रेस कैसे जीती,, ये सवाल आज तक पूछा जाता है,,,  तब बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे अमित शाह ने भी कुछ साल पहले इसका ज़िक्र किया था, अमित शाह ने तब कहा था कि “जब योगी जी को मुख्यमंत्री बनाया तो किसी ने कल्पना नहीं की थी कि योगी जी मुख्यमंत्री बनेंगे. कई सारे लोगों के फोन आए कि योगी जी ने कभी म्युनिसिपलिटी भी नहीं चलाई. वास्तविकता भी यही थी. कि नहीं चलाई थी. योगी जी कभी किसी सरकार में मंत्री तक नहीं रहे.” अमित शाह के मुताबिक उस वक्त उनसे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कुछ अलग सलाह दी गई थी, “योगी जी संन्यासी हैं, पीठाधीश हैं और इतने बड़े प्रदेश का आप उनको मुख्यमंत्री बना रहे हो.

क्या कहती हैं राधिका रामाशेषन- 

7 साल बाद स्थिति पूरी तरह बदल गई है. अब योगी आदित्यनाथ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उत्तराधिकारी तलाशने वालों की संख्या बढ़ती नज़र आ रही है,, ऐसे लोगों में सिर्फ़ योगी आदित्यनाथ के उत्साही समर्थक नहीं हैं. बीजेपी के कई कार्यकर्ता और राजनीतिक विश्लेषक भी दावा करते हैं कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का कद पार्टी में अपने समकालीन नेताओं से काफी ऊंचा हो गया है… भारतीय जनता पार्टी की राजनीति पर वर्षों से करीबी नज़र रखने वाली वरिष्ठ पत्रकार राधिका रामा शेषन कहती हैं, “दिल्ली में अक्सर हमें दोनों का पोस्टर देखने को मिलता है, मोदी और योगी. योगी जी का स्टेटस  पार्टी में दूसरे नंबर का हो गया है. उन्होंने सबको पीछे छोड़ दिया है.

सवाल ये भी-


ऐसे में ये भी सवाल उठता है कि क्या योगी आदित्यनाथ को अब नरेंद्र मोदी की ज़रूरत नहीं है? इस सवाल का जवाब कई बातों से भी मिलता दिखाई देता है, योगी आदित्यनाथ का  असर ज़मीन पर भी दिखता है. मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के पहले योगी आदित्यनाथ पांच बार लोकसभा के सांसद चुने जा चुके थे लेकिन कई विश्लेषक ये भी मानते हैं कि तब उनका प्रभाव क्षेत्र सीमित था… मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ के कामकाज ने जिस यूपी मॉडल को खड़ा किया, उसकी चर्चा अब उसी तरह होती है जैसे साल 2014 के पहले बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्री और पार्टी के कार्यकर्ता नरेंद्र मोदी के गुजरात मॉडल का ज़िक्र करते थे.. योगी आदित्यनाथ ने अपना काफी प्रभाव छोड़ा है. मध्य प्रदेश और कर्नाटक में जब बीजेपी की सरकार थी तब वहां के नेता भी यूपी मॉडल का काफी ज़िक्र करते रहते थे.”

क्या कहते हैं ये राजनीतिक विश्लेषक-

राजनीतिक विश्लेषकों की राय है कि उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी को चुनाव दर चुनाव मिलने वाली कामयाबी की वजह से हर तरफ योगी आदित्यनाथ के ‘यूपी मॉडल’ की बात हो रही है… उत्तर प्रदेश की राजनीति पर करीबी नजर रखने वाले कहते हैं कि योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में प्रदेश में बीजेपी को मिले चुनाव नतीजों के जरिए उनका मूल्यांकन हो रहा है,, किसी भी व्यक्ति का मूल्यांकन रिजल्ट से होता है. योगी आदित्यनाथ के साथ भी यही बात है. वो 2017 में सत्ता में आए. साल 2019 के लोकसभा चुनाव में अच्छा रिजल्ट दिया. तब सपा, बसपा और आरएलडी का गठबंधन था… उस गठबंधन के मुक़ाबले 64 सीट जीतना  बड़ी उपलब्धि थी.. जबकि तब लोगों को लग रहा था कि बीजेपी का सफाया हो जाएगा. उसके बाद आया 2022 का विधानसभा चुनाव… दूसरी बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाना निश्चित तौर पर एक बड़ी बात थी… फिर अभी निकाय चुनाव हुए,, बीजेपी ने सारे बड़े शहरों में क्लीन स्वीप किया. ये रिपोर्ट कार्ड है योगी आदित्यनाथ का, जिसने उनको राष्ट्रीय नेताओं की कतार में मोदी के समकक्ष खड़ा कर दिया।
काबिले तारीफ़ हैं योगी-


‘योगी आदित्यनाथ. रिलीजन, राजनीतिक और पावर, द अनटोल्ड स्टोरी ‘ किताब के लेखक और उत्तर प्रदेश की राजनीति को कई दशक से कवर कर रहे वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान दावा करते हैं कि आज की तारीख में प्रदेश में योगी आदित्यनाथ दूसरे सभी नेताओं से आगे हैं.. वो कहते हैं, “जहां तक यूपी का सवाल है यहां नरेंद्र मोदी से भी ज्यादा योगी आदित्यनाथ का असर है. नरेंद्र मोदी 2024 में जहां फिर से पहुंचना चाहते हैं, उसके लिए यूपी ज़रूरी है और योगी भी. इसमें कोई शक नहीं है कि योगी आदित्यनाथ ने अपने आपको जिस तरह से आगे बढ़ाया है, वो काबिले तारीफ है.”

गुजरात मॉडल  की तर्ज पर है यूपी मॉडल-


योगी आदित्यनाथ और यूपी मॉडल एक दूसरे के पर्याय बन चुके हैं.. लेकिन ‘यूपी मॉडल’ है क्या ? योगी जी का यूपी मॉडल है कानून व्यवस्था और विकास.. साथ में हिंदुत्व का तड़का. यानी हिंदुत्व के तड़के के साथ विकास और कानून व्यवस्था पर फोकस करना… नरेंद्र मोदी के ‘गुजरात मॉडल’ की ही तरह योगी आदित्यनाथ के ‘यूपी मॉडल’ में भी सबसे मुख्य बात हिंदुत्व है… जैसे गुजरात मॉडल का मेन फ़ीचर विकास, इन्फ्रा स्ट्रक्चर और आर्थिक उन्नति थी, तो यहां यूपी मॉडल में कानून व्यवस्था मुख्य स्तंभ है… विकास की बात उसके बाद आती है.. कानून  व्यवस्था के मामले में योगी  ने काफी प्रभाव छोड़ा है. मध्य प्रदेश और कर्नाटक भी यूपी मॉडल का काफी ज़िक्र कर रहे थे… वो कह रहे थे कि कोई क़ानून हाथ में ले या उल्लंघन करे तो एक ही उपाय है, ‘बुलडोजर चलना’…  बुलडोज़र योगी आदित्यनाथ की सरकार का एक सिंबल बन गया है. हालांकि, योगी आदित्यनाथ के इस ‘यूपी मॉडल’ को लेकर आलोचक लगातार सवाल उठाते रहे हैं.. योगी आदित्यनाथ की अभी मेन USP  क्या है, जिसे दूसरे लोग भी कॉपी कर रहे हैं, खासकर बीजेपी शासित राज्य चाहे मध्य प्रदेश हो या असम वाले मुख्यमंत्री,, किसी ने कुछ गड़बड़ की, भले ही वो प्रूफ नहीं हुआ हो, केस चल रहा हो, ये कहते हैं कि उसे बुलडोज़ कर दो. बकायदा ऐसी भाषा बोलते हैं. ये क़ानून के मुताबिक नहीं है.. अगर आप देश के कानून को ताक पर रखकर अपना क़ानून चलाएंगे तो कुछ दिन तो अच्छा लगेगा लेकिन जब गाज आम आदमी पर गिरने लगेगी तो फिर लोग इस पर भी सवाल उठाने शुरू करेंगे। योगी आदित्यनाथ ने अपना एक प्रोफ़ाइल बना लिया है कि भई ये है सॉलिड आदमी, ये तुरंत तय करता है,  योगी आदित्यनाथ ने प्रचार के जरिए तरक्की की है. मोदी का मॉडल फोलो किया है,

अपने तौर पर ही करेंगे काम- योगी 


वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र सिंह कहते हैं कि आलोचक भले ही कुछ भी कहें. योगी आदित्यनाथ का मॉडल एक ख़ास तरह से ही काम करता है.. राधिका रामाशेषन कहती हैं कि योगी आदित्यनाथ के यूपी मॉडल में एक और ख़ास बात है जो बीजेपी शासित किसी और राज्य में दिखाई नहीं देती… और वो है कि योगी आदित्यनाथ अन्य बीजेपी नेताओं की तरह केंद्र  की हर बात आंख मूंदकर नहीं मानते.. 2017 में मुख्यमंत्री पद के लिए मोदी जी की पहली पसंद मनोज सिन्हा माने जाते  थे. केशव प्रसाद मौर्य जैसे कुछ और नाम चल रहे थे.. लेकिन अंत में योगी सबसे बड़े नेता के रूप में उभरे.. नोट करने वाली बात है कि पहले दिन से उन्होंने ये सिग्नल भेजा कि वो दिल्ली से निर्देश और आदेश नहीं लेने वाले हैं.. वो खुद अपने तौर पर ही राज चलाएंगे.. भले ही ये दिल्ली को पसंद न आया हो.. कई ऐसे उदाहरण हैं जब दिल्ली और लखनऊ के बीच में टेंशन हुई है.. ” उसका नजारा इस बात से दिखाई देता है, जब  “अरविंद शर्मा गुजरात में मोदी जी के पसंदीदा अधिकारी थे. उन्होंने इस्तीफा दिया और उन्हें MLC बनाया गया.. बहुत प्रयास हुआ कि 2022 विधानसभा चुनाव के पहले उन्हें मंत्री बनाया जाए.. ख़बर यहाँ तक आयी  कि उनके लिए एक बंग्ला भी कालिदास मार्ग पर देखा गया था, लेकिन योगी जी अड़े रहे और उन्हें अपने मंत्रिमंडल में नहीं लिया. अभी वो मंत्री हैं लेकिन उनकी ज़्यादा चर्चा नहीं है. केशव प्रसाद मौर्या भी समानांतर खड़ा करने का प्रयास हुआ लेकिन वो भी सफल नहीं हो पाए हैं. “

 

एक बड़ा वर्ग बीजेपी के साथ जुड़ा है-

 

वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान दावा करते हैं कि योगी आदित्यनाथ ने आज “ऐसी पोजिशनिंग कर ली है कि वो अपनी ही पार्टी में कई लोगों की आंख का कांटा बन गए हैं.. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि योगी आदित्यनाथ के मॉडल में एक और बात है जो उन्हें मौजूदा दौर के दूसरे नेताओं से अलग करती है…योगी आदित्यनाथ के आलोचक उन्हें एक ख़ास जाति का समर्थक बताते हैं लेकिन ये आरोप का उनके राजनीतिक ग्राफ पर असर होता नहीं दिखता.. इसकी वजह है,, उनका भगवा परिधान.. वो गोरक्षनाथ पीठ के पीठाधीश्वर हैं. वो भले ही सवर्ण हैं लेकिन उस पीठ की Following पिछड़ों में काफी है. दूसरे भगवा वेश की वजह से पिछड़े नेतृत्व की बात डाइल्यूट हो जाती है.. फिर यूपी में अब मुलायम सिंह यादव और कल्याण सिंह के कद का कोई पिछड़ा नेता भी नहीं है. मायावती का दलितों में आधार घट रहा है.”यूपी में राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान से ही ओबीसी और पिछड़ों का एक बड़ा वर्ग बीजेपी के साथ जुड़ा हुआ है. बीजेपी उन्हें पद भी देती है, जैसे केशव मौर्या उपमुख्यमंत्री हैं. वो योगी आदित्यनाथ के भी साथ है.

योगी की अगली परीक्षा 2024 चुनाव में-


उत्तर प्रदेश के निकाय चुनाव में विपक्ष को हाशिए पर धकेलने वाले योगी आदित्यनाथ की अगली परीक्षा साल 2024 में लोकसभा के आम चुनाव के दौरान होगी.. तब नरेंद्र मोदी और बीजेपी के साथ विपक्षी दलों के लिए बहुत कुछ दांव पर होगा.. उस वक्त योगी आदित्यनाथ और उनका मॉडल बीजेपी के लिए कितना अहम होगा? इस सवाल पर पत्रकार शरत प्रधान कहते हैं, “कि योगी आदित्यनाथ ने  support base सॉलिड बना लिया है. विपक्ष बिल्कुल कमज़ोर है.. अखिलेश यादव सॉफ्ट हिंदुत्व प्ले करने लगे हैं. ये भी योगी के हक में जाता है, जब आप दूसरे की पिच पर खेलेंगे तो कैसे जीतेंगे.”

योगी का सबसे बड़ा एडवांटेज

 

वहीं, राजेंद्र सिंह कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में आगे भी बीजेपी मौजूदा रास्ते पर ही चलेगी… यूपी में कोई बड़ी चुनौती बीजेपी के सामने नहीं है..  2019 का आपको ध्यान है, तब सपा बसपा और आरएलडी का गठबंधन था लेकिन बीजेपी बहुत आगे रही.” राजेंद्र सिंह कहते हैं, “सरकार बनी तो मोदी पीएम होंगे. योगी आदित्यनाथ भी उनका गुणगान करते हैं. जब कभी मोदी हटेंगे तब सवाल भले उठ सकता है..
यूपी के अंदर विधानसभा में योगी नंबर वन हैं, लेकिन लोकसभा के लिहाज से अभी भी शायद मोदी नंबर वन हैं.. 2024 में अगर बीजेपी को पहले से ज्यादा सीटें मिली तो मोदी ही प्रधानमंत्री होंगे, थोड़ा कम भी हो तो भी मोदी होंगे. योगी आदित्यनाथ अगर अपना दावा पेश भी करते हैं तो किन परिस्थितियों में करेंगे,, ये देखना होगा,, योगी आदित्यनाथ अभी सिर्फ़ 51 साल के हैं और ये उनका एडवांटेज है.

 

प्रधानमंत्री मोदी ने सुप्रीम कोर्ट के लिए आखिर ऐसा क्या कहा की मुख्य न्यायाधीश ने दिया ऐसा रिएक्शन…

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भारत आज 77 वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को लाल किले की प्राचीर से दसवां स्वतंत्रता दिवस पर भाषण दिया। आज सभी न्यूज़ चैनल से लेकर सभी स्वतंत्र पत्रकार और मीडिया प्रधानमंत्री के भाषण की व्याख्या की किसी ने प्रधानमंत्री के भाषण को अच्छा और किसी ने निराशाजनक बताया। लेकिन आज हम इस भाषण को न ही सही और न ही गलत बता रहे हैं ,बल्कि हम आज आपको प्रधानमंत्री के भाषण की मुख्य बातों को बताएंगे, आपको इस खबर में ये बताएँगे कि प्रधानमंत्री के भाषण में किस चीज को कितनी बार दोहराया गया.
 
प्रधानमंत्री मोदी ने की सुप्रीम कोर्ट की सराहना- 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज लाल किले की प्राचीर से देश की जनता को 10 वीं बार सम्बोधित किया,  इस दौरान उन्होंने मणिपुर से लेकर परिवारवाद तक का अपने भाषण में जिक्र किया। वहीं पीएम ने अदालती फैसलों को क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध कराने को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सराहना की। स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम में भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ भी मौजूद थे, उन्होंने प्रधानमंत्री की टिप्पणी को हाथ जोड़कर स्वीकार किया और अभिवादन किया। पीएम मोदी ने कहा कि मैं सुप्रीम कोर्ट को भी धन्यवाद देता हूं। सीजेआई चंद्रचूड़ ने अक्सर अदालतों द्वारा क्षेत्रीय भाषाओं में फैसले देने की आवश्यकता पर जोर दिया है। गणतंत्र दिवस और अपने स्थापना दिवस को और यादगार बनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 26 जनवरी को एक हजार से ज्यादा फैसलों का दस भाषाओं में अनुवाद जारी कर इसकी शुरुआत की थी,
 
 
PM ने कई बार किया इन विषयों का जिक्र- 
 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से देश को 10वीं बार संबोधित किया. 90 मिनट के अपने संबोधन में पीएम मोदी  ने 48 बार परिवारजन, 43 बार सामर्थ्य का इस्तेमाल किया. वहीं, महिलाएं/नारी शब्द का इस्तेमाल 35 बार किया.. इसके अलावा पीएम मोदी ने अपने संबोधन में 19 बार संकल्प शब्द बोला,,जबकि आजादी 16 बार,, पीएम मोदी के भाषण में युवाओं का 12 बार जिक्र आया.. जबकि 5 बार उन्होंने सामाजिक न्याय की बात कही.  90 मिनट के अपने संबोधन में पीएम मोदी ने 12 बार परिवारवाद, 11 बार भ्रष्टाचार और 8 बार तुष्टिकरण का जिक्र किया. पीएम ने मणिपुर मुद्दे का जिक्र करते हुए कहा कि पूरा देश मणिपुर के साथ खड़ा है. पिछले कुछ दिनों से जो शांति बनाकर रखी है, मणिपुर के लोग उसे आगे बढ़ाएं। ‘अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने कहा कि इस बार प्राकृतिक आपदा ने देश के अनेक हिस्सों में अकल्पनीय संकट पैदा किए है। जिन्होंने इसे सहा, उनके प्रति मैं गहरी संवेदना प्रकट करता हूं। 
 
 
क्या कहा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने-
 
प्रधानमंत्री ने कहा कि ‘इस कालखंड में हम जो करेंगे, जो कदम उठाएंगे, त्याग करेंगे, तपस्या करेंगे, आने वाले एक हजार साल का देश का स्वर्णिम इतिहास उससे अंकुरित होने वाला है। पीएम मोदी ने आगे कहा कि अगली बार 15 अगस्त को इसी लाल किले से मैं आपके सामने देश की उपलब्धियां, आपके सामर्थ्य, उसमें हुई प्रगति और सफलता के गौरव गान को इससे भी अधिक आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत करूंगा। उन्होंने कहा कि अगली बार इसी लाल किले पर और अधिक आत्मविश्वास के साथ आऊंगा। उन्होंने कहा कि मैं साल 2014 में परिवर्तन का वादा लेकर आया था। देश के 140 करोड़ लोगों ने मुझ पर भरोसा किया। रिफॉर्म, परफॉर्म, ट्रांसफर का वादा विश्वास में बदल गया। मैंने इस वादे को विश्वास में बदल दिया है। 
 
 
विपक्ष ने किया पलटवार-
 
इस मौके पर पक्ष-विपक्ष के नेता और सांसद लाल किले पर पहुंचे थे, वहीं एक कुर्सी भी खाली दिखाई दी। ये कुर्सी कांग्रेस के एक बड़े नेता की थी। ये सीट राज्यसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की थी। वो पीएम मोदी का भाषण सुनने नहीं पहुंचे, जिससे राजनीतिक गलियारों में चर्चा शुरू हो गई। हालांकि, कांग्रेस ने इस पर सफाई भी दी। उन्होंने कहा कि खरगे को ठीक महसूस नहीं हो रहा था, इसलिए वो लाल किले पर नहीं पहुंचे। 90 मिनट के अपने संबोधन में पीएम मोदी ने ऐलान किया कि वे 2024 में भी लाल किले पर तिरंगा फहराएंगे. पीएम मोदी के इस बयान पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राजद चीफ लालू यादव ने पलटवार किया है. खड़गे ने कहा कि मोदी झंडा तो फहराएंगे, लेकिन अपने घर पर. लालू ने कहा कि ये आखिरी बार है. 
 पीएम मोदी ने अगले 5 साल की दी गारंटी-
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर बार स्वतंत्रता दिवस पर अपने परिधान और वेशभूषा को लेकर चर्चा में रहते हैं। इसके अलावा उनके साफा बांधने का अंदाज सबसे ज्यादा आकर्षक होता है। हर ध्वजारोहण में प्रधानमंत्री अलग-अलग रंगों की पगड़ी पहन कर ध्वजारोहण कर चुके हैं,, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लालकिले की प्राचीर से देश के सामने अपनी सरकार के नौ साल का बही खाता रखा। 2024′ से पहले ही मोदी ने अगले पांच साल की गारंटी भी दे दी। उन्होंने कहा, हम आज जो शिलान्यास कर रहे हैं, उनका उद्घाटन भी मेरे नसीब में है। बतौर मोदी, अगले स्वतंत्रता दिवस पर मैं आपके सामने अपनी सरकार की सफलता का रिपोर्ट कार्ड पेश करूंगा।
 प्रधानमंत्री मोदी ने 10वीं बार किया सम्बोधित- 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब तक कुल 10 बार लाल किले से देश को संबोधित कर चुके हैं। केवल एक बार उन्होंने देश को एक घंटे से कम समय के लिए संबोधित किया। 2017 के स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री का भाषण केवल 56 मिनट का रहा था। ये उनका अब तक का सबसे छोटा भाषण है। प्रधानमंत्री ने जब साल 2014 में देश को पहली बार लाल किले से संबोधित किया तो उन्होंने कुल 65 मिनट तक भाषण दिया। इसके बाद, साल 2015 में उन्होंने 86 मिनट तक देश को संबोधित किया। देश जब आजादी की 70वीं वर्षगांठ मना रहा था, उस दौरान पीएम मोदी ने देश को लाल किले से 94 मिनट तक संबोधित किया। यह उनके प्रधानमंत्री के रूप में रहने के दौरान लाल किले से दिया गया सबसे लंबा भाषण है। पीएम मोदी ने 2017 के स्वतंत्रता दिवस के मौके पर 57 मिनट, 2018 में 82 मिनट और 2019 में 92 मिनट तक देश को संबोधित किया।  इसके बाद 2020 में 86 मिनट, 2021 में 88 मिनट, 2022 में 83 मिनट और 2023 में 90 मिनट तक पीएम मोदी ने लाल किले से भाषण दिया।
 
सबसे ज्यादा बार किस ने फहराया तिरंगा-
 
जवाहरलाल नेहरू आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री थे। लाल किले की प्राचीर से सबसे ज्यादा बार तिरंगा झंडा लहराने का अवसर उन्हें ही मिला था। नेहरू 1947 से लेकर 1964 तक भारत के प्रधानमंत्री रहे। इस दौरान उन्होंने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले पर रिकॉर्ड 17 बार झंडा फहराया। इस मामले में दूसरे नंबर पर भारत की एकमात्र महिला प्रधानमंत्री और जवाहरलाल नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी हैं। उन्होंने लाल किले पर 16 बार राष्ट्रीय ध्वज फहराया है। 

 

अब कैसे भारतीय बने ये अभिनेता, अक्षय कुमार के पास अभी तक क्यों थी किसी और देश की नागरिकता… जाने पूरा मामला

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अभिनेता अक्षय कुमार ने आज सोशल मीडिया पोस्ट साझा कर उन्होंने ये जानकारी दी कि उन्हें भारत की नागरिकता मिल गई है। अब तक अक्षय के पास कनाडा की नागरिकता थी।अभिनेता अक्षय कुमार को नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 5(1)(जी) के तहत भारतीय नागरिकता दी गई है।

स्वतंत्रता दिवस के खास मौके पर अभिनेता अक्षय कुमार ने अपने प्रशंसकों को एक खुशखबरी दी। दरअसल, अक्षय कुमार को भारतीय नागरिकता मिल गई है। उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट साझा कर खुद ये जानकारी साझा की है। चलिए आपको बताते हैं की अक्षय को नागरिकता किस नियम के तहत मिली?

बेहद खुश हूँ-


अभिनेता अक्षय कुमार ने मंगलवार को सोशल मीडिया पोस्ट साझा कर ये जानकारी सांझा की उन्होंने कहा कि उन्हें भारत की नागरिकता मिल गई है। अब तक अक्षय कुमार के पास कनाडा की ही नागरिकता थी। अब वो वापस भारत की नागरिकता पाकर बेहद खुश हैं। एक्टर ने नागरिकता दस्तावेज की एक फोटो भी साझा की है। इसके साथ उन्होंने लिखा है, ‘दिल और सिटीजनशिप दोनों हिंदुस्तानी। स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं। जय हिंद।’

अक्षय कुमार को भारत सरकार के अधीन गृह मंत्रालय द्वारा पंजीकरण प्रमाण पत्र दिया गया है। दस्तावेज के मुताबिक, अभिनेता को नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 5(1)(जी) के तहत भारतीय नागरिकता दी गई है।

 
नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 5(1)(जी) क्या है- 


नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 5(1)(जी) उन व्यक्तियों की नागरिकता का उल्लेख करती है जो की 5 साल से भारत के विदेशी नागरिक (ओवरसीज इंडियन सिटीजन) के रूप में पंजीकृत है। इसके साथ ही वो व्यक्ति भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन करने से ठीक पहले एक साल तक भारत में रहा हो और एक साल की इस अवधि से ठीक पहले के आठ वर्षों के दौरान कम से कम छह साल तक भारत में रहा हो।

क्या-क्या दस्तावेज हैं जरुरी- 


ओवरसीज इंडियन को नागरिकता पाने के लिए कुछ अहम दस्तावेजों को अपलोड करना होता है। ये कागजात हैं वैध विदेशी पासपोर्ट की एक प्रति और धारा 7ए के तहत भारत के विदेशी नागरिक के रूप में पंजीकरण प्रमाण पत्र की एक प्रति।

कौन होते हैं ओवरसीज इंडियन?


देश की संसद ने साल 2003 में नागरिकता संशोधन विधेयक पारित कर विदेशों में बसे भारतीय मूल के लोगों को भारत की नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान किया है। इसे ओवरसीज सिटीजनशिप ऑफ इंडिया के नाम दिया गया है। इसके अनुसार, भारतीय मूल का कोई भी व्यक्ति जो संविधान लागू होने के बाद भारत या उसके किसी राज्य क्षेत्र का नागरिक रहा हो और जिसने पाकिस्तान और बांग्लादेश के अलावा किसी अन्य देश की नागरिकता ग्रहण कर ली है, नागरिकता अधिनियम 1955 के अधीन पंजीकरण करा सकता है। यदि उसके देश में दोहरी नागरिकता का प्रावधान है।

पंजीकरण के बाद अगर व्यक्ति पांच साल में से एक साल भारत में रहता है तो उसे भारत की नागरिकता मिल सकती है। वर्तमान में अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया सहित 16 देशों में बसे भारतीय मूल के लोगों को दोहरी नागरिकता प्रदान की जा सकती है। क्योंकि, इन देशों के नागरिक दोहरी नागरिकता ले सकते हैं।

इन अभिनेता ने क्यों ली थी कनाडा की नागरिकता-


अक्षय कुमार ने वर्ष 2019 में कनाडा का पासपोर्ट रद्द करवाने और भारतीय पासपोर्ट फिर से हासिल करने की प्रक्रिया शुरू की थी।एक इंटरव्यू के दौरान अपनी नागरिकता पर बात करते हुए अक्षय कुमार ने कहा था कि मेरे लिए भारत सब कुछ है। मैंने जो कुछ भी हासिल किया है वो यही से किया है। मैं सौभाग्यशाली हूं कि मुझे देश के लिए कुछ करने का मौका मिला। अक्षय ने इस दौरान बताया था कि एक समय पर उनकी 15 से ज्यादा फिल्में फ्लॉप हो गई थीं, यही वो वजह थी जिसने उन्हें कनाडा की नागरिकता लेने के लिए प्रेरित किया था।

क्या कहा अभिनेता अक्षय कुमार ने-


अक्षय ने कहा था, ‘मैंने सोचा कि मेरी फिल्में नहीं चल रही हैं। मैं वहां काम के लिए गया था। मेरा दोस्त कनाडा में था और उसने कहा कि यहां आओ। जिसके बाद मैंने आवेदन कर दिया और मुझे नागरिकता मिल गई। मेरी बस दो फिल्में रिलीज होनी बाकी थी। किस्मत से दोनों ही सुपरहिट हो गईं। मेरे दोस्त ने कहा कि वापस जाओ और फिर से काम करना शुरू करो। इसके बाद मुझे काम मिलता चला गया। मैं भूल गया कि मेरे पास कनाडा का पासपोर्ट है। इस पासपोर्ट को बदलवाने का विचार कभी नहीं आया, लेकिन अब मैंने अपना पासपोर्ट बदलवाने के लिए आवेदन कर दिया है।’

सन्नी पाजी की ‘गदर 2’ ने मचाया गदर, लोगों में ऐसा क्रेज आज तक नहीं देखा होगा…

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सिनेमाघरों में पिछले कुछ सालों से मंदी का दौर चल रहा था। दर्शकों की संख्या कम थी। लेकिन गदर 2 ने आते की गदर मचा दिया। पहले शो के लिए सुबह आठ बजे से सिनेमाघरों में दर्शकों की लाइन लगने लगी है। हिंदुस्तान जिंदाबाद था, जिंदाबाद है और जिंदाबाद रहेगा। सनी देओल के इस डायलॉग को लोग 22 साल बाद भी नहीं भूले हैं। 22 साल बाद फिर से बड़े पर्दे पर गदर मचाने आए सनी देओल ने अपने दर्शकों को निराश नहीं किया है। गदर में हैंडपंप उखाड़ने वाले सनी देओल गदर 2 में भी पाकिस्तान जाकर कुछ उखाड़ते हैं, जो फिल्म देखने पर ही पता चलेगा। दर्शक टिकट बुक कराने के लिए बेताब थे। सिनेमाघर मालिक दर्शकों के उत्साह से काफी खुश थे। लंबे समय बाद किसी फिल्म के लिए इतनी बेसब्री दर्शकों ने दिखाई है। गदर में तारा सिंह अपनी सकीना को बचाने पाकिस्तान गए थे तो इस फिल्म में वो अपने बेटे जीते को लेने जाएंगे। फिल्म में नाना पाटेकर की आवाज में पहली फिल्म की कहानी भी सुनाई देती है। बेटे के रूप में उत्कर्ष शर्मा के काम को पसंद किया जा रहा है।

 छोटे-छोटे थिएटर भी फुल- 

 

 सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद वॉलीवुड इंड्रस्ट्री पर ऐसा असर पड़ा कि उसका देश के एक बड़े तबके ने विरोध करना शुरू कर दिया, धीरे-धीरे इसका असर ये हुआ कि कई फिल्मों का भी बायकाट तक देश में ट्रेंड करने लगा  जिसका असर सीधे तौर पर पूरी फिल्म इंड्रस्ट्री पर पड़ा था, कई फ़िल्में जो अच्छी कमाई कर सकती थी, उनका कलेक्शन उम्मीद से काफी कम रहा, जिसका असर पूरे  वालीवुड पर देखने को मिल रहा था ,ऐसा नहीं है इस बीच फ़िल्में नहीं चली पठान और आदिपुरुष जैसी फ़िल्में विवादों के बाद भी अच्छी कमाई करने में कामयाब रही. लेकिन जो गदर इस बार सनी देओल की गदर 2 ने मचाया है. उसने पुरे वालीवुड इंडस्ट्री में एक नई जान फूक दी है, कुछ सालों से बड़े बड़े मल्टीप्लेक्स में ही फिल्मों का क्रेज देखा जा रहा था, छोटे थियेटर मानों बंद होने के कगार पर आ गए थे, लेकिन गदर टू ने एक बार फिर लोगों में वो क्रेज बनाया है कि अब सुने पड़े छोटे-छोटे थियटरों में भी लम्बी-लम्बी लाइने लगी है।

सारे रिकॉर्ड तोड़ रही है फिल्म- 

 

इसकी सक्सेस को फिर भुनाता दिखाई दे रहा है.’गदर 2′ का क्रेज ऐसा है कि लोग इसे देखने ट्रैक्टर पर चढ़कर पहुंच रहे हैं. हिंदुस्तान जिंदाबाद के नारे सिनेमाघरों के अंदर लग रहे हैं,लोग इस फिल्म के गानों पर सिनेमा हाल के अंदर ही नाचते नजर आ रहे हैं, बड़े बड़े मल्टीफ्लेक्स के अलावा छोटे -छोटे सिनेमाघरों में उमड़ी भीड़ इस फिल्म को लेकर लोगों के क्रेज को दर्शा रही है,कई सालों बाद ऐसा क्रेज देखने को मिला है,ये फिल्म हो सकता है कमाई के मामले में आज शाहरुख़ की पठान को पीछे छोड़ दे लेकिन इसका क्रेज बता रहा है कि सनी देओल को लेकर लोगों में कितना क्रेज है खासकर उनके एंग्री और एक्शन रोल को लेकर।

पहले ही दिन 40 करोड़ की कमाई- 

 

हर दिन फिल्म की कमाई में भी इजाफा हो रहा है. जहां पहले दिन इस फिल्म ने 40 करोड़ का बिजनेस किया था. वहीं दूसरे दिन इस फिल्म ने 43 करोड़ की दमदार कमाई की. गदर 2 को लेकर फैंस का क्रेज इतना जबरदस्त है कि ‘गदर 2’ ने रिलीज के पहले तीन दिन में ही 135.18 करोड़ रुपये की शानदार कमाई करते हुए न सिर्फ सनी देओल का करियर पटरी पर ला दिया है. बल्कि इस फ्रेंचाइजी की तीसरी फिल्म ‘गदर 3’ का रास्ता भी मजबूत कर दिया है। फिल्म का कलेक्शन स्वतंत्रता दिवस यानी 15 अगस्त की छुट्टी के दिन नई ऊंचाइयां छूने की पूरी उम्मीद है।

OMG-2 को कड़ी टक्कर-

 

दिलचस्प बात ये है कि यदि ये प्रीडिक्शन सही साबित होता है तो ‘गदर 2’ शाहरुख खान स्टारर इस साल की सबसे बड़ी बॉलीवुड फिल्म ‘पठान’ को भी तीसरे दिन के कलेक्शन में पीछे छोड़ सकती है. आपको बता दें, पठान ने रिलीज के तीसरे दिन 39.25 करोड़ रुपए की कमाई की थी. तारा सिंह बनकर लौटे सनी देओल अक्षय कुमार स्टारर फिल्म ओएमजी 2 को कड़ी टक्कर दे रहे हैं. जहां गदर 2 का बॉक्स ऑफिस ग्राफ बढ़ता ही जा रहा है. वहीं ये फिल्म बॉक्स ऑफिस आंकड़ों में ओएमजी 2 को लगातार पछाड़ती नजर आ रही है। 

फिल्म जगत में एक नई उम्मीद- 

 

बॉक्स ऑफिस पर फिल्म का सूखा खत्म हो रहा है. कोरोना के बाद यानी 2022 में दर्शकों ने एक तरह से सिनेमाघरों  और बॉलीवुड फिल्म से मुंह मोड़ लिया था, लेकिन 2023 बॉलीवुड के लिए अच्छा साबित हो रहा है. उत्तराखंड के भी बड़े से लेकर छोटे सिनेमाघरों में इस फिल्म को देखने भारी भीड़ उमड़ रही है,,सड़कों में जाम लग रहा है,,रुड़की में हरिद्वार हाईवे किनारे स्थित सिनेमाघर  में बड़ी संख्या में लोग ‘गदर-2’ को देखने के लिए सिनेमा हाल का रुख कर रहे हैं। सिनेमा हाल पर टिकट के लिए मारामारी मची है। पहले से ही लोगों ने आनलाइन टिकट बुकिंग कर रखी है, जिसके चलते खिड़की पर टिकट नहीं मिल रहे हैं। यही हाल देहरादून के सिनेमाघरों में हैं,जहां बड़े- बड़े मल्टीफ्लेक्स से लेकर छोटे-छोटे सिनेमाघरों में भी भारी भीड़ देखने को मिल रही  है. अब देखना होगा कि आने वाले दिनों में ये फिल्म और कौन से रिकार्ड तोड़ती है, बहरहाल इस फिल्म ने एक बार फिर सिनेमाघरों का सूखा तोडा है साथ ही फिल्म जगत में  एक नई उम्मीद पैदा की है। 

विकास की भेंट चढ़ा उत्तराखंड, केंद्र सरकार की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा…

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जल, जंगल और जमीन उत्तराखंड की यही पहचान मानी जाती है, इन्ही तीनों चीजों से बचने के लिए एक पृथक राज्य की मांग की गयी थी, जल,जंगल और जमीन पर उत्तराखंड के लोगों का हक हो और इन संसाधनों से प्रदेश तरक्की की तरफ बढ़े, इसको लेकर अनेकों लोगों ने बलिदान भी दिए और काफी समय तक उत्तराखंड बनने को लेकर जबरदस्त आंदोलन भी किए. आखिरकार उत्तराखंड का निर्माण हुआ और विकास का जन्म भी हुआ, ऐसा ना केवल तमाम मुख्यमंत्रियों के भाषणों में भी आया और एसी कमरों में बैठकर विकास को बड़ा करने की बड़ी-बड़ी बातें भी उन उत्तराखंडियों के सामने की जो स्वभाव से सरल और सौम्या की मिसाल के तौर पर पूरे देश में पहचान रखते हैं. मगर इसका मतलब ये नहीं की वो झूटे वादों की हकीकत से रुबरु नहीं है,,, बाकी रही-सही कसर भारत के लोकतंत्र के मंदिर लोकसभा में खुलकर सामने आ गयी. जब उत्तराखंडियों को उत्तराखंड की हकीकत सामने दिखाई देने लगी।

 

हिल चुकी है पहाड़ों की नींव- 

संसद में रखी एक रिपोर्ट के मुताबिक हिमालयी राज्यों में सबसे अधिक उत्तराखंड के जंगल विकास की भेंट चढ़ गए हैं, यही कारण है कि जिस प्रदेश को देवभूमि कहा जाता है, अब उसे आपदा प्रदेश के रूप में भी जाना जाता है, जिसमें गर्मी में धधकती आग जंगल जला देती है, सर्दी में बर्फीली चोटियां नदियों के आवेग को अचानक बड़ा देती है, और तेज बारिश, फटते बादल जिंदगियों को तबाह कर देती हैं. ये तीनों ही मुश्किल हालात विकास की सीमा को पार कर भोले-भाले मासूम लोगों की जिंदगी को असमय लील लेती हैं.. और काल के गाल में समाते लोग इन मुश्किल हालातों में कुछ नहीं कर पाते हैं.. घर तबाह, खेत तबाह, जिंदगी तबाह। उत्तराखंड में जिस तरह विकास के नाम पर जंगलों से लेकर जल विधुत परियोजनाओं और सड़कों के निर्माण में भूमि का कटान हो रहा है उससे इस प्रदेश के मजबूत पहाड़ों की नीवं इस कदर हिल चुकी हैं कि जरा सा झटका भी यहां के पहाड़ झेल नहीं पाते हैं और भरभरा कर जमीदोज हो जाते हैं. जगह-जगह भूस्खलन से लोगों की जान जा रही है. पूरे प्रदेश में जो सबसे बड़ा उदाहरण है वो इस समय जोशीमठ और उत्तरकाशी है. जहां भूस्ख्लन की वजह से सालों साल से रह रहे लोग अब घर छोड़ने को मजबूर हैं।

 

सरकारों से ये कुछ सवाल- 

सवाल ये उठता है कि क्या उत्तराखंड की स्थापना का उद्देश्य पूरा हो गया है ?

क्या हमारे शहीदों ने इसी विकास के लिए राज्य मांगा था ?

हमारी सरकारें इस प्रदेश को किस दिशा की तरफ ले जा रही है ?

हमारी सरकारों और यहां के नेताओं में कोई भी एक नेता ऐसा नहीं दिखाई देता जिसके पास इस प्रदेश के विकास के लिए यहां के अनुकूल कोई विजन हो, जिससे इस प्रदेश के यहां की परिस्थितियों के हिसाब से विकास हो सके. आखिर कैसे सिर्फ एक अंधी विकास की दौड़ में इस प्रदेश को जो क्षती पहुंच रही है उससे प्रदेश को बचाया जा सके. उत्तराखंड को विकास की दरकार है लेकिन जिस तरह से अनियोजित तरिके से ये काम चल रहे हैं उससे आने वाले भविष्य में इस प्रदेश के लोगों को इस विकास की बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी और शायद कीमत वो चुका भी रहे हैं. बड़ी-बड़ी जल विधुत परियोजनाओं के लिए पहाड़ों को अंदर से खोखला किया जा रहा है, नदियों के प्रवाह  को पूरी तरह से रोका जा रहा है, आल वेदर रोड हो या फिर रेल प्रोजेक्ट जिस तरह से पहाड़ों में अंधाधुंध कटान हो रहा है वो कहीं न कहीं इन पहाड़ों की नीव को कमजोर कर  रहा है।

 

क्या कहते हैं भूपेंद्र यादव- 

केंद्रीय पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने लोकसभा में एक प्रश्न के जवाब में जो आंकड़े रखे वो कही न कहीं इस प्रदेश की उस जनता को रास नहीं आएंगे,जो इस मुद्दे पर गंभीरता से सोचते हैं,,,संसद में रखें इन आंकड़ों के मुताबिक पिछले डेढ़ दशक के दौरान हिमालयी राज्यों में सबसे अधिक जंगल उत्तराखंड राज्य में गैर वानिकी उपयोग यानी विकास की भेंट चढ़े हैं। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में 15 वर्षों में 14 हजार 141 हेक्टेयर वन भूमि अन्य उपयोग के लिए ट्रांसफर की गई।

 

उत्तराखंड देश के 10 राज्यों में शामिल- 

आंकड़ों के मुताबिक, वन भूमि डायवर्सन मामले में उत्तराखंड देश के प्रमुख 10 राज्यों में शामिल है। राज्य में औसतन प्रत्येक वर्ष 943 हेक्टेयर भूमि दी जा रही है। वर्ष 2008 से लेकर 2009…वर्ष 2022 से लेकर 2023 के दौरान सभी राज्यों में 30 लाख 5 हजार 945.38 हेक्टेयर भूमि वन संरक्षण अधिनियम 1980 के तहत गैर वानिकी उपयोग के लिए लाई गई। अरुणाचल प्रदेश को छोड़कर बाकी कोई हिमालयी राज्य उत्तराखंड के आसपास नहीं है। पड़ोसी राज्य हिमाचल में 6 हजार 696 हेक्टेयर वन भूमि दूसरे उपयोग के लिए इस्तेमाल हुई। जो उत्तराखंड के मुकाबले आधी से भी कम है,, ये सभी भूमि सड़क.. रेलवे..पुनर्वास.. शिक्षा.. उद्योग.. सिंचाई.. ऑप्टिकल फाइबर.. नहर.. पेयजल.. पाइपलाइन.. उत्खनन..जल.. ऊर्जा.. सौर ऊर्जा जैसे कार्यों के लिए दी गयी है, हालाकि प्रदेश के विकास के लिए ये सभी चीजें जरूरी भी हैं, लेकिन इसके कुछ मानक तय नहीं किए गए हैं,,, मसलन इन सबके लिए बेहिसाब तरिके से पहाड़ों का दोहन किया जाता है,,, पर्यावरण विद कई बार सरकार को इस पर चेता चुके हैं कि इस प्रदेश में बड़ी जल विधुत परियोजनाओं को मंजूरी नहीं मिलनी चाहिए बल्कि छोटी-छोटी परियोजनाओं को बनाया जाना चाहिए लेकिन सरकारें इन पर गौर करने को शायद तैयार ही नहीं है. जिसका नतीजा ये हैं कि प्रदेश में बड़ी-बड़ी जल विधुत परियोजनाओं को ह्री हरी झंडी मिलती रही है।

 

पहले भी दी जा चुकी है चेतावनी- 

जोशीमठ भू धसाव के बाद स्थानीय लोगों ने जिस तरह वहां बन रही जल विधुत परियोजना को भू-धसाव का कारण माना वो अनायास ही नहीं बल्कि उसके पीछे ये परियोजना भी एक बड़ा कारण बनी है ऐसा पर्यावरण विद मानकर चलते हैं. इसके नतीजे अब देखने को भी मिल रहे हैं. चमोली जिले में सबसे ज्यादा पहाड़ हिल रहे हैं, भूस्खलन हो रहा है. हालात आज के दौर के ये हो चले हैं कि अपराध को रोकने के लिए बनी पुलिस खासकर चमोली पुलिस मानसून सीजन में सभी काम छोड़ कर सिर्फ यही बताने में लगी रहती है कि यहां रास्ता बंद है और यहां खुला है. जब से आल वेदर सड़क का काम शुरू हुआ है तब से नए नए भूस्खलन जोन बन चुके हैं, जिससे लगातार कटाव बढ़ रहे हैं. जिसकी चेतावनी भी  पहले दी जा चुकी है. याद कीजिए जब सुप्रीम कोर्ट की एक हाइ पावर कमेटी ने सिफारिश की थी कि ये प्रोजेक्ट पहाड़ के लिए बेहद खतरनाक है, लेकिन इस कमेटी की भी सलाह को नजरअंदाज कर दिया गया।

 

इस कारण बेमौत मर रहे हैं लोग- 

2018 में  इस प्रोजेक्ट को एक NGO ने सुप्रीम कोर्ट में चेलेंज किया था, इस याचिका में कहा गया कि सड़क के लिए पहाड़ो को जरूरत से अधिक काटना पहाड़ के ईको सिस्टम को तबाह कर रहा है… और इससे आपदाएं भी लगातार बढ़ रही हैं… कोर्ट ने इस पर फैसला देते हुए सड़क की चौड़ाई साढ़े पांच मीटर तक रखने का आदेश दिया था, लेकिन केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में ही चेलेंज कर दिया…. सरकार ने चीन सीमा,,, सैनिकों को सुविधाएं पहुंचाने जैसे अनेक तथ्य रखे, जिसके बाद कोर्ट ने केंद्र की सलाह को माना और सड़क को 10 मीटर तक चौड़ा करने का फैसला दे दिया,,, अब पहाड़ पर हो रहे इस अंधाधुंध कटाव और सड़क चौड़ीकरण के लिए कट रहे पेड़ों का ही नतीजा है कि पूरे यात्रा मार्ग में नए-नए भूस्खलन जोन लगातार बनते चले जा रहे हैं। जिसका खामीयाजा आखिरकार भुगतना तो पड़ेगा ही.. और मासूम लोग भुगत भी रहे हैं…हालांकि सुप्रीम कोर्ट के दिए किसी भी फैसले पर टिप्पणी करना हमारे अधिकार क्षेत्र से बाहर है मगर शायद बेमौत मर रहे लोग, तबाह होते घर हमें जुबान देने को मजबूर कर देते हैं।

 

क्या कहते हैं सामाजिक कार्यकर्ता- 

सामाजिक कार्यकर्ता और उत्तराखंड की सटीक जानकारी रखने वाले अनूप नौटियाल मानते हैं कि उत्तराखंड राज्य की संवेदनशीलता को देखते हुए ये आंकड़े चिंता में डालने वाले हैं। हर साल राज्य आपदाओं और जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणामों का सामना कर रहा है। नीति नियंताओं को गंभीरता से पर्यावरण संतुलन के बारे में सोचना होगा। ऐसा ना हो की देर हो जाए…ऐसा नहीं है कि प्रदेश की जनता ये सब नहीं समझ रही है बल्कि अब वो अपने जल,जंगल और जमीन को बचाने के लिए आंदोलन भी कर रही है,यही कारण है कि प्रदेश में अब एक शसक्त भू कानून की मांग को लेकर भी एक बड़ा आंदोलन पनप रहा है,सशक्त भू-कानून  लागू करने की मांग को लेकर राज्य आंदोलनकारियों, संगठनों और दलों ने मुख्यमंत्री आवास कूच किया।आंदोलनकारियों ने  मुख्यमंत्री को ज्ञापन भेजा और मांगों पर कार्रवाई न होने पर बड़े से बड़े आंदोलन की चेतावनी दी।

 

एक दिन बड़ी त्रासदी झेल सकता है प्रदेश- 

कुल मिलाकर अपने प्रदेश के जल जंगल और जमीन बचाने के लिए अब प्रदेश की जनता भी आवाज उठा रही है. ऐसा नहीं है कि प्रदेश में विकास नहीं हुआ. लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या जिस तरह के उत्तराखंड की कल्पना  की गई थी हम उसी ओर बढ़ रहे हैं. क्या इस तरह के विकास से हम इस हिमालयी राज्य का संतुलन बिगाड़ रहे हैं. ये एक बड़ा सवाल है. जिसका जवाब मिलना बाकी है? अगर जल्दी ही इस विषय पर इस प्रदेश की प्रबुद्ध जनता और राजनेताओं ने नहीं सोचा तो एक दिन ये प्रदेश एक बड़ी त्रासदी झेलने को मजबूर हो जाएगा। याद रहे 2013 की वो 16 और 17 जून की याद जो अभी तक भी हमे झकझोर कर रख देती है. यकीन है की उस काली रात की कल्पना एक बार फिर से ना तो उत्तराखंड की सरकार करेगी और ना ही केंद्र में बैठी मोदी सरकार करेगी।

 

मणिपुर की आग से 24 तबाह, दक्षिण में ढहता भाजपा का किला…   

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मणिपुर हिंसा का भाजपा की दक्षिण की राजनीति पर असर दिखना शुरू हो गया है, वो लोग, जिन्हें उनके समुदाय के नेताओं के ये कहने से कोई आपत्ति नहीं थी कि बीजेपी से अल्पसंख्यकों को कोई दिक्कत नहीं है, उनके  सुर भी अब पूरी तरह से बदलते हुए दिखाई देते हैं,  पिछले कुछ हफ्तों से इस समुदाय के लोग मणिपुर में हो रहे हमलों, हत्याओं और चर्चों को जलाए जाने के खिलाफ धरना प्रदर्शन कर रहे हैं जिनमें से कुछ प्रदर्शन ऐसे हैं जिनकी अगुवाई खुद वहां के पादरियों ने की है और लगातार कर भी रहे हैं. राज्य में चर्चों का प्रशासन देखने वाली संस्था केरल कैथोलिक बिशप काउंसिल (केसीबीसी) ने तो यहां तक कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इतने समय तक क्यों चुप्पी साधे रखी,, कुल मिलाकर केरल में जो समुदाय भाजपा के साथ दिखाई देता था अब वो उनसे दूरी बनाने लगा है। केरल ही नहीं, अब के हालात में मणिपुर में रहने वाले अधिकतर नागरिक जो या तो कुकी समुदाय से हैं या फिर मैतई से, कहीं न कहीं ये दूरी उनके मन में भी होगी, ऐसा वहां के हालात को देखकर महसूस किया जा सकता है

 

मणिपुर मामले जब फिर कुछ नहीं बोले PM-  
 
100 दिन से अधिक समय तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार 36 सेकंड और दूसरी बार तकरीबन 3 मिनट से कम समय ही निकाला है मणिपुर के मुद्दे पर बोलने के लिए, ये माना जा रहा था की संसद में अविश्वास प्रस्ताव के दौरान जब  प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी बोलेंगे तो न केवल मणिपुर के लिए ज्यादा से ज्यादा केंद्रित होकर अपना भाषण देंगे बल्कि उम्मीद ये भी की जा रही थी कि तुरंत कोई बड़ा कदम उठाकर मणिपुर की जनता के जख्मों पर मरहम भी रखेंगे, पर न तो वहां हुई मौत के आंकड़ों पर और न ही नग्न अवस्था में परेड करवाई गयी महिलाओं के प्रति कोई गंभीर संवेदना दिखाई दी. अपने भाषण के दौरान उन्होंने ये जरुर कहा की अमित भाई यानी देश के गृहमंत्री अमित शाह इस मुद्दे पर सब कुछ पहले ही बोल चुके हैं
 2024 चुनाव में डाल सकता है असर- 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लगभग पूरा भाषण हंसी-ठट्टे, कांग्रेस को कोसने, विपक्षी दलों की असफलता, इंडिया को घमंडिया कहने में ही गुजर गया. सत्ता पक्ष का ये रवैया 2024 के लोकसभा चुनाव में खासा असर डाल सकता है. खासकर पूर्वोत्तर राज्यों में जहां पर अल्पसंख्यकों की यानी ईसाइयों की संख्या थोड़ी ज्यादा है.  गौरतलब है की इन अल्पसंख्यकों के वोट बैंक पर बहुत पहले से भाजपा की नजर रही है, और इस वोट बैंक को हासिल करने में पूर्व में भाजपा कामयाब भी हुई है, मगर हालात अब थोड़े जुदा हैं. याद कीजिए जब एक वक्त ऐसा भी था की प्रधानमंत्री ने पूर्वोत्तर के तीन राज्यों पर जीत के बाद अपनी सरकार बनाने के बाद कहा था, पूर्वोत्तर न दिल्ली से दूर है ना मेरे दिल से… पर 100 दिन से भी अधिक समय तक मणिपुर से दूरी बनाना ये संकेत जरुर देता है की दिल और दिल्ली दोनो से कम से कम मणिपुर से तो दूर ही है ।   


क्या कहती है BBC की रिपोर्ट- 

बीबीसी की एक  रिपोर्ट के अनुसार केरल के लोगों का कहना है कि “मणिपुर के लोग इसी भारत के सम्मानित नागरिक हैं. उनके घर जला दिए गए हैं और अब दिखाने के लिए उनके पास कोई रिकॉर्ड भी नहीं बचा है हालात ये हैं कि वो भारतीय हैं. ये साबित करना भी अब उनके लिए मुश्किल हो सकता है, आखिर वो अपनी पहचान कैसे साबित करेंगे बिना कागजों के, अपनी ही ज़मीन पर बाहरी होते ये लोग दोनो तरफ से हैं चाहे फिर वो कुकी समुदाय हो या फिर मैतई… ”राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ईसाई समुदाय में कांग्रेस नीत यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट  के मजबूत आधार में सेंध लगाने के लिए बीजेपी के मेलजोल कार्यक्रम को केरल में ‘तगड़ा झटका’ लगा है.आपको बता दें कि राज्य में अल्पसंख्यकों की आबादी लगभग 46% है, जिसमें 26.56% मुसलमान और 18.38% ईसाई हैं

एक ऐसा भी समय रहा है, जब सीपीएम नीत लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ़) इन दोनों समुदायों से वोट हासिल करने में सफल रहा. लेकिन आम तौर पर अल्पसंख्यकों का वोट यूडीएफ के साथ ही रहा है. बीजेपी इसी में सेंध लगाने की कोशिश में थी, जिसमे वो काफी हद तक कामयाब होती भी दिखाई दे रही थी,लेकिन मणिपुर की हिंसा ने इन कोशिशों पर मानो पानी फेर दिया है।


क्या कहते हैं राजनीतिक विश्लेषक- 

राजनीतिक विश्लेषक एमजी राधाकृष्णन के अनुसार, “मणिपुर निश्चित रूप से बीजेपी के लिए एक झटका है, जो कि ईसाई वोटरों को रिझाने की कोशिश करती रही है. पिछले कुछ समय से वे इस ओर अच्छी खासी सफलता भी हासिल करती दिखाई दे रही थी. ”एमजी राधाकृष्णन कहते हैं, “अभी पिछले ईस्टर में ही कार्डिनल जॉर्ज एलेनचेरी ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि बीजेपी बहुत अच्छी है और अल्पसंख्यकों को इस पार्टी से कोई दिक्कत नहीं है. इससे पहले एक और बिशप ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि अगर केंद्र सरकार रबर की सही कीमत दिलाए तो केरल से एक बीजेपी सांसद भेजा जा सकता है


2024 चुनाव में बीजेपी को लग सकता है झटका-

पूर्वोत्तर राज्यों में अल्पसंख्यक वोट कितने महत्वपूर्ण हैं उसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ईसाई समुदाय को अपनी तरफ लाने के अभियान की बागडोर खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने हाथ में ले रखी थी. चाहे वो पोप फ़्रांसिस को भारत आमंत्रित करना हो या मलंकारा चर्च में 400 साल पुराने विवाद को हल करने की कोशिश हो या इसी साल अप्रैल में केरल में आठ प्रमुख चर्चों के प्रमुखों के साथ डिनर हो.  इसी डिनर में भारत के सबसे बड़े सायरो मालाबार चर्च के प्रमुख कार्डिनल एलेनचेरी ने प्रधानमंत्री की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी. इसके बाद ही एक के बाद एक बिशप ने विवादास्पद बयान दिए थे. एक बिशप ने ईसाइयों को ‘नार्को टेररिज़्म’ के भ्रम में फंसने को लेकर चेताया था जबकि दूसरे ने लव जिहाद को लेकर सावधानी बरतने की बात कही थी.लेकिन लगता है मणिपुर हिंसा ने इन सब कोशिशों पर एक झटके में पानी फेर दिया है।


मणिपुर की घटना से बीजेपी को झटका- 

एमजी राधाकृष्णन ने कहा कि समुदाय में बीजेपी समर्थक रवैया दिखाई देता रहा है. समुदाय के ख़ासकर संपन्न लोगों में सोशल मीडिया पर इस्लामोफोबिया अभियान चल रहा है और समाज में बीजेपी के प्रति नरम रुख साफ़ दिखता है.. वो कहते हैं, “कुल मिलाकर बीजेपी बहुत आरामदायक स्थिति में थी. लेकिन अब मणिपुर की घटना ने उन्हें झटका दिया है, चर्च सत्तारूढ़ पार्टी के ख़िलाफ़ खुलकर सामने आ गए हैं.और अब  इस रिश्ते में अब बड़ी बाधा खड़ी हो गई है.”  राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि “इस हालात में ईसाई समुदाय में बीजेपी का प्रचार ठप पड़ सकता है क्योंकि ईसाई नेतृत्व सार्वजनिक रूप से बीजेपी का समर्थन करने का बहाना नहीं ढूंढ पाएंगे.”“मणिपुर की घटनाओं से अब एक जटिल स्थिति पैदा हो गई है. एक छोटा समूह था जो बीजेपी की ओर झुकाव रख रखा था. अब उन्हें फिर से अपना मन बनाना पड़ेगा कि वो बीजेपी के साथ हैं या नहीं

क्या कहते हैं लेखक राधाकृष्णन-

लेखक और एकेडमिक केएस राधाकृष्णन कहते हैं कि “ईसाई समुदाय के पास किसी भी संगठन या विचारधारा के साथ स्थायी राजनीतिक वफादारी नहीं है. वे अपने हित देखते हैं. अगर वे सोचते हैं कि बीजेपी उनका शुभचिंतक है तो वे उसका समर्थन कर देंगे. अगर ये उनके लिए फायदेमंद होगा तो वो बीजेपी के साथ चले जाएंगे.” उनके मुताबिक, “ईसाई समुदाय कांग्रेस और एलडीएफ दोनों का समर्थन कर चुका है. इन सबके बीच कांग्रेस परिस्थितियों पर बारीक नज़र बनाए हुए है. एर्नाकुलम से कांग्रेस के सांसद हिबी इडेन ने कहा, “मणिपुर के बाद, बीजेपी का समर्थन करने वाले कुछ ईसाई नेता समझ गए कि उस पार्टी का अल्पसंख्यकों के प्रति यही बुनियादी बर्ताव है.”

एमजी राधाकृष्णन का कहना है कि ईसाई समुदाय में बीजेपी समर्थक कूटनीतिक रूप से कम मुखर रहेंगे. जब मणिपुर मुद्दा खत्म हो जाएगा, वे बीजेपी के साथ जाने का कोई और बहाना ढूंढ लेंगे. लेकिन 2024 के लिए तो ये मुश्किल होगा क्योंकि अब बहुत समय बचा नहीं है. इसलिए सार्वजनिक रूप से वो कोई पक्ष नहीं लेंगे.  फ़ादर जैकब पालाकाप्पिल्ली कहते हैं, “मणिपुर के हालात के बारे में हम बहुत दुखी और सदमे में हैं. प्रधानमंत्री ने पीड़ितों को ढांढस तक नहीं बंधाया. शांति के लिए हम किस से कहेंगे


पूरे देश में मणिपुर हिंसा का असर- 

ये वो तमाम घटनाक्रम और बयान है जो बताते हैं कि मणिपुर में हिंसा का असर अब राजनीतिक रूप से भी दिखना शुरू हो गया है,  और साथ ही  2024 में बीजेपी को यहां झटका लग सकता है। भाजपा दक्षिणी राज्यों में अपना आधार पहले ही खोती दिखाई दे रही है. और मणिपुर की घटना से पूर्वोत्तर में भी वोट बैंक पर असर पड़ना तय माना जा रहा है.सिर्फ दक्षिण ही नहीं बल्कि देश के कई ऐसे राज्य जहां पर अल्पसंख्यक बहुतायत में हैं याद रहे ये अल्पसंख्यक कहने से मतलब सिर्फ मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र ही नहीं बल्कि अन्य अल्पसंख्यक समुदाय पर भी असर पड़ना तय माना जा रहा है.. क्योकिं मणिपुर हिंसा से सरकार की छवि न केवल आसपास के राज्यों में खराब हुई है बल्कि पूरे देश मे इसका असर पड़ा है, जैसे केरल में ये असर देखने को मिल रहा रहा है. मोदी सरकार से पहले ही किसान, बेरोजगार, महंगाई से त्रस्त लोग नाराज हैं

 

2024 लोकसभा चुनाव के दौरान मोदी सरकार को परेशानी में डाल सकते हैं ये सभी मुद्दे…

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बहुत हुई महंगाई की मार, अबकी बार मोदी सरकार. ‘हम मोदी जी को लाने वाले हैं, अच्छे दिन आने वाले हैं..  2014 के लोकसभा चुनाव में जब ऐसे नारे सामने आए तो कांग्रेस सरकार से नाखुश जनता को एक उम्मीद दिखी. उम्मीद कि मोदी सरकार आने के बाद वाकई उनके ‘अच्छे दिन’ आ जाएंगे. इसी उम्मीद से 17 करोड़ से ज्यादा लोगों ने बीजेपी को वोट दे दिया. बीजेपी ने 282 सीटें जीतीं. ये पहली बार था जब किसी गैर-कांग्रेसी पार्टी ने बहुमत हासिल किया था. 26 मई 2014 को नरेंद्र मोदी ने पहली बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली.  2019 में दूसरी बार 23 करोड़ से ज्यादा लोगों ने बीजेपी को वोट दिया और  बीजेपी ने 303 सीटें जीतीं. नरेंद्र मोदी दूसरी बार प्रधानमंत्री बने.   प्रधानमंत्री मोदी ने 2025 तक भारत की GDP 5 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचाने का टारगेट रखा है. हालांकि, अभी के हालात को देखते हुए ये टारगेट 2025  तक तो पूरा होना बहुत मुश्किल लगता है ।   

 
मोदी सरकार की नीतियों पर कई सवाल- 

मोदी सरकार कुछ समय बाद फिर देश के आम चुनाव में उतरने वाली है तो तीसरी बार सत्ता तक पहुंचने से पहले उनको जनता के कई सवालों के जवाब भी देने होंगे ? मोदी सरकार के इन 9 सालों के कार्यकाल पर नजर डालें तो कई ऐसे तथ्य  सामने आते  है, जो मोदी सरकार की नीतियों पर कई सवाल करती हैं,,, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 के चुनावों में  डॉलर की गिरती कीमत को लेकर कांग्रेस सरकार को खूब घेरा था, कि आखिर भारत का रुपया डॉलर के मुकाबले को लेकर इतना क्यों गिर रहा है, लेकिन 2014 में 72 पर चल रहा डालर मोदी सरकार में आज 82 पर पहुंच गया है।

 
अर्थव्यवस्था का क्या हुआ ? 

मोदी सरकार इन 9 सालों में कई मोर्चों पर विफल नजर आती है, मोदी सरकार में विदेशी कर्ज भी देश पर खूब  बढ़ा है. इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक हर साल औसतन 25 अरब डॉलर का विदेशी कर्ज भारत पर बढ़ा है. मोदी सरकार से पहले देश पर करीब 409 अरब डॉलर का विदेशी कर्ज था, जो अब बढ़कर डेढ़ गुना यानी करीब 613 अरब डॉलर पहुंच गया है ।   

 
मोदी सरकार में बेरोजगारी का आंकड़ा- 

मोदी सरकार में सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा रोजगार को लेकर सामने आता है, मोदी सरकार में बेरोजगारी दर जमकर बढ़ी है. इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक  बेरोजगारी के आंकड़ों पर नजर रखने वाली निजी संस्था सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी यानी CMIE के मुताबिक, अभी देश में करीब 41 करोड़ लोगों के पास रोजगार है. जबकि  मोदी सरकार के आने से पहले 43 करोड़ लोगों के पास रोजगार था. यानी हर साल 2 करोड़ रोजगार देने का वादा करने वाली मोदी सरकार में रोजगार मिलने के बजाय उल्टा २ करोड़ रोजगार कम हो गए।

 
नौकरियों का क्या हुआ ? 

CMIE ने पिछले साल एक रिपोर्ट जारी की थी. इसमें दावा किया गया था कि भारत में अभी 90 करोड़ लोग नौकरी के लिए योग्य हैं. इनमें से 45 करोड़ लोगों ने तो अब  नौकरी की तलाश करना ही छोड़ दिया है. यानी कि इस देश के 45 करोड़ युवा इतने निराश हैं कि वो मान चुके हैं कि अब उनको नौकरी नहीं मिल पायेगी,, ये आंकड़ा निश्चित रूप से इस देश के भविष्य उन युवाओं की हताशा को दर्शाता है,,, 2019 के चुनाव के बाद सरकार के ही एक सर्वे में सामने आया था कि देश में बेरोजगारी दर 6.1% है. ये आंकड़ा 45 साल में सबसे ज्यादा था. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, मोदी सरकार के आने से पहले देश में बेरोजगारी दर 3.4% थी, जो इस समय बढ़कर 8.1% हो गई है. ये आंकड़े बताते हैं कि मोदी सरकार किस तरह रोजगार के मुद्दे पर पूरी तरह विफल साबित हुई और आने वाले चुनावों में देश के युवा सरकार से इस पर जवाब मांगेंगे जो की सरकार की परेशानियां जरुर बढ़ाएगी।

शिक्षा पर मोदी सरकार के आंकड़े-

किसी भी देश के विकास के लिए अच्छी शिक्षा बहुत जरूरी है. मोदी सरकार में शिक्षा का बजट बढ़ा है,  9 साल में शिक्षा पर खर्च का बजट 30 हजार करोड़ रुपये  बढ़ा है. लेकिन देश में स्कूल भी कम हो गए हैं, शिक्षक भी बढ़े हैं लेकिन छात्र नहीं . मोदी सरकार के आने से पहले देश में 15.18 लाख स्कूल थे, जो अब घटकर 14.89 लाख हो गए हैं. नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 के मुताबिक, देश में अभी भी करीब 30 फीसदी महिलाएं और 15 फीसदी पुरुष अनपढ़ हैं. 10 में से 6 लड़कियां 10वीं से ज्यादा नहीं पढ़ पा रही हैं. वहीं, 10 में से 5 पुरुष ऐसे हैं जो 10वीं के बाद पढ़ाई छोड़ रहे हैं।

 
मोदी सरकार में बेतहाशा बढ़ती महंगाई-

अब बात आती है देश के सबसे बड़े मुद्दे की,,जिस मुद्दे ने मोदी  को सत्ता के सबसे ऊँचे मुकाम पर पहुंचाया और भारतीय जनता पार्टी को अब तक का सबसे प्रचंड जनादेश दिलवाया,,, जी हाँ  ‘बहुत हुई महंगाई की मार, अबकी बार मोदी सरकार’ 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी का ये नारा था. जिसे पूरी भाजपा ने खूब जोर शोर से देश की जनता को सुनाया था लेकिन इसी मुद्दे पर सरकार सबसे ज्यादा मात खा रही है,,,  मोदी सरकार में महंगाई बेतहाशा बढ़ी है, पेट्रोल-डीजल की कीमतों में तो आग लग गई है. 9 साल में पेट्रोल की कीमत 24 रुपये और डीजल की कीमत 34 रुपये प्रति लीटर से ज्यादा बढ़ी है. पेट्रोल-डीजल के अलावा गैस सिलेंडर की कीमत भी तेजी से बढ़ी है. मोदी सरकार से पहले सब्सिडी वाला सिलेंडर 414 रुपये में मिलता था. लेकिन अब सिलेंडर पर नाममात्र की सब्सिडी मिलती है. अभी रसोई गैस सिलेंडर की कीमत 11 सौ रुपये तक पहुंच गई है. इतना ही नहीं, 9 साल में एक किलो आटे की कीमत 52%, एक किलो चावल की कीमत 43%, एक लीटर दूध की कीमत 56% और एक किलो नमक की कीमत 53% तक बढ़ गई है ।   

सभी चीजों पर बढ़ती महंगाई के आंकड़े- 

कुछ समय  पहले टमाटर के साथ सब्जियों के बढ़े दाम ने परेशानी बढ़ाई तो उसके बाद मसालों में आई तेजी ने खाने का स्वाद बिगाड़ दिया। वहीं अब दालों में भी महंगाई ने किचन का पूरा बजट ही गड़बड़ा दिया है। दालों के दाम में 10 से 15 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। बीते तीन महीने में दाल-चावल और आटे के दामों में काफी वृद्धि हुई है। इससे लोग खासे परेशान हैं। किराना स्टोर से मिले दामों को अगर मिलाया जाए तो बीते तीन महीने में दाल-चावल और आटे के दामों में काफी वृद्धि हुई है। तीन माह पूर्व 140 से 150 रुपये में बिकने वाली अरहर की दाल  180 रुपये तक पहुंच गई है। चना दाल भी 150 से 190 रुपये किलो के भाव पर बिक रही है। दालों के साथ-साथ आटा और चावल का रेट भी तीन महीने में करीब 10 से 20 प्रतिशत बढ़ा है। पांच किलो आटे के बैग की कीमत 225 रुपये है।  कुछ ऐसी स्थिति मसालों की भी है। मसालों में जीरे के दाम में सबसे ज्यादा 40 फीसदी वृद्धि हुई है। तीन महीने पहले 100 ग्राम जीरा जहां 45 रुपये का था। वहीं अब ये 360 रुपये प्रति किलो  तक पहुंच गया है।  गैस सिलेंडर पहले से महंगा है। वहीं, तेल, सब्जियों, मसालों के बाद अब दाल भी और महंगी हो गयी है। ऐसे में घर चलाने के लिए हर चीज में बजट कटौती नहीं की जा सकती। जिसका असर मसालों व दालों में भी देखने को मिल रहा है। आटा चावल में भी वृद्धि हुई है। टमाटर, अदरक समेत अन्य हरी सब्जियां महंगी थीं तो लोग दाल व मसालों से काम चला लेते थे, लेकिन अब ये भी महंगे हो गए हैं। ऐसे में आम और गरीब लोगों पर सबसे अधिक असर पड रहा है।

 

हत्या, बलात्कार, सजा और फिर रिहाई, अब कोर्ट में फिर सुनवाई…

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पिछले  साल स्वतंत्रता दिवस के भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत के लोगों से महिलाओं के प्रति अपना रवैया बदलने की गुज़ारिश की. उन्होंने कहा था कि महिला सशक्तिकरण के लिए महिलाओं को इज्जत देना बहुत ज़रूरी है. उन्होंने कहा था कि , “नारी का गौरव राष्ट्र के सपने पूरे करने में बहुत बड़ी पूंजी बनने वाला है. पीएम मोदी के इस बयान की बहुत तारीफ की गई और महिला अधिकारों के लिए इसे एक ठोस बयान बताया गया. लेकिन इस बयान के कुछ ही देर बाद, उसी दिन बिलकिस बानो गैंगरेप मामले के 11 दोषियों को गुजरात सरकार की एक कमेटी ने गोधरा जेल से रिहा कर दिया. साल 2002 में गोधरा ट्रेन जलाए जाने के बाद ये केस काफ़ी चर्चा में था.

 

क्या था बिलकिस बानो केस-

2002 के गुजरात  दंगों के दौरान बिलकिस बानो के साथ गैंगरेप करने और उनके परिवार के सात सदस्यों की हत्या करने के लिए 11 दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी. लेकिन गुजरात सरकार ने बीते साल 15 अगस्त को उन्हें रिहा कर दिया था. 27 फरवरी 2002 को भीड़ ने बिलकिस बानो और उनके परिवार पर तब हमला किया था जब वो भाग रहे थे. उन्होंने बिलकिस का गैंगरेप किया और उनकी तीन साल की बेटी समेत परिवार के 14 लोगों की हत्या कर दी थी ,, उस वक्त राज्य में बीजेपी की सरकार थी, अभी भी बीजेपी सत्ता में है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तब गुजरात के मुख्यमंत्री थे. विपक्षी पार्टियों ने दोषियों की रिहाई को लेकर सरकार की काफ़ी आलोचना की थी, लेकिन बीजेपी ने इस पर  कुछ नहीं कहा, न गुजरात में और न ही केंद्र में।

 

11 दोषियों को किया गया था रिहा-

उम्रकैद की सजा काट रहे 11 दोषियों को छोड़ने के गुजरात सरकार के फैसले की देशभर में आलोचना हुई थी .सज़ायाफ्ता दोषियों के जेल से बाहर आने के बाद माला और मिठाइयों से उनके स्वागत के वीडियो वायरल हुए थे , जिसके बाद कानूनी, सामाजिक और राजनीतिक दृष्टिकोण से भी इस फैसले की व्यापक रूप से निंदा आज भी की जा रही है. सालों तक न्याय के लिए संघर्ष करने वाली बिलकिस गुजरात दंगों में अल्पसंख्यकों और महिलाओं के साथ होने वाले अत्याचारों का चेहरा बन गई थीं। 

 

दोषियों को रिहा कर दिया गया था- 

जब आनंदीबेन पटेल 2014 में गुजरात की मुख्यमंत्री थीं तो उन्होंने महिलाओं से जुड़े किसी भी अपराध में रियायत नहीं देने का फ़ैसला किया था. उसके बाद ऐसे अपराधों में दोषी पाए गए वो लोग जो 20 साल से अधिक जेल में बिता चुके थे, उन्हें नहीं छोड़ा गया. लेकिन बिलकिस बानो मामले में, 1992 और 2014 दोनों के सर्कुलर को नजरअंदाज करते हुए दोषियों को रिहा कर दिया गया. गुजरात की जेलों में आज महिला संबंधित अपराधों में लगभग 450 दोषी बंद हैं. उन सभी को रिहा किया जा सकता था. लेकिन ऐसा नहीं हुआ, सिर्फ़ इन 11 लोगों को छोड़ा गया। 

सुप्रीम कोर्ट की पीठ कर रही है मामले की सुनवाई-

बिलकिस बानो ने सीपीआई नेता सुभाषिनी अली, तृणमूल सांसद महुआ मोइत्रा के साथ मिल कर इस फ़ैसले को चुनौती दी थी, जिस पर सुप्रीम कोर्ट की पीठ अब सुनवाई कर रही है.. बिलकिस बानो ने कोर्ट को बताया कि इन दोषियों ने उनका कई बार बलात्कार किया और उनके पूरे परिवार की हत्या कर दी थी, इसलिए सज़ा से पहले रिहाई के गुजरात सरकार के फैसले को पलटा जाए.  बिलकिस बानो की वकील शोभा गुप्ता ने कहा, “घटना इतनी दर्दनाक थी कि बिलकिस आज भी पुरुषों का सामना करने से डरती हैं. भीड़ में या अजनबियों के आसपास नहीं रह सकतीं. वो अब तक उस ट्रॉमा से उबर नहीं पाए हैं. हमें लगा था कि न्याय मिल गया है, लेकिन फिर ये हो गया। 

सभी को कोर्ट के फैसले का इंतजार- 

बिलकिस की वकील ने कोर्ट से कहा, “अपराध की प्रकृति इतनी भयावह और क्रूर थी, गर्भवती होने पर बिलकिस के साथ गैंगरेप किया गया. बिलकिस की पहली बेटी को चट्टान पर पटक-पटक कर मार डाला गया. बिलकिस की माँ के साथ गैंगरेप किया गया और उनकी हत्या कर दी गई. चचेरी बहन के साथ भी गैंगरेप किया गया. याचिकाकर्ता के चार नाबालिग भाई-बहनों की हत्या कर दी गई थी.. ”शोभा गुप्ता ने कहा कि CRPC  की धारा 432 के तहत सीबीआई ने ट्रायल कोर्ट के जज से इस रिहाई पर उनकी राय पूछी थी. जज ने एक विस्तृत राय देते हुए कहा कि दोषी किसी भी उदारता या रिहाई के हकदार नहीं हैं. यहां तक कि सीबीआई ने ये भी कहा कि वे किसी भी तरह की नरमी के हकदार नहीं हैं. इसके बावजूद उन्हें रिहा किया गया.

अभी कोर्ट में इस मामले की सुनवाई चल रही है देखना होगा की कोर्ट इस पर क्या फैसला देती है ? लेकिन कुल मिलाकर इस मामले में एक बार फिर नया मोड़ आ गया है,, अगर कोर्ट दोबारा बिलकिस के पक्ष में फैसला सुनाती है तो गुजरात सरकार के उनके रिहाई देने के फैसले पर फिर कई सवाल उठने शुरू हो जायेंगे और कहीं न कहीं विपक्ष को एक बार फिर सरकार को घेरने का मुद्दा मिल जायेगा।