तेलंगाना विधानसभा चुनावों के लिए हर किसी ने जोर-शोर से प्रचार किया। इसी क्रम में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी पार्टी के लिए वोट जुटाने के लिए पूरी ताकत लगा दी। हालांकि, चुनावी अभियानों के दौरान आने वाली चुनौतियों को लेकर उन्होंने एक मजाकिया वाक्य साझा किया। केरल में एक कार्यक्रम के दौरान राहुल ने बताया कि कैसे एक रैली के दौरान उनके एक भाषण के अनुवादक को कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ा।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी यहां एक पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में पहुंचे थे, जहां आईयूएमएल सांसद अब्दुस्समद समदानी उनके भाषण का अनुवाद करने के लिए मौजूद थे। इस दौरान वायनाड के सांसद ने समदानी से मजाकिया लहजे में कहा कि उनका अनुवादक होना एक खतरनाक काम हो सकता है।
शब्दों को भी गिनना शुरू किया-
उन्होंने बताया कि किस तरह तेलंगाना में एक चुनावी रैली के दौरान अनुवादक बहुत परेशानी में पड़ गया। राहुल ने कहा, ‘मैं कुछ कह रहा था और वह (अनुवादक) कुछ और बोल रहे थे। फिर कुछ समय बाद, मैंने अपने शब्दों को गिनना शुरू कर दिया। जैसा आप जानते हैं कि वह तेलुगु में बोल रहे थे। इसलिए, मैंने सोचा कि अगर मैं हिंदी में पांच शब्द कहूंगा तो तेलुगु में पांच या सात शब्द लगेंगे। लेकिन वह 20, 25, 30 शब्द बोल रहे थे।’
उन्होंने कहा, ‘जब मैं कुछ उदास भरी बात कहता तो भीड़ उत्साहित हो जाती थी। फिर मैं कुछ दिलचस्प बात कहता तो भीड़ चुप हो जाती। मुझे समझ आ गया था कि जो मैं बोल रहा हूं, वो नहीं बताया जा रहा है, लेकिन मैं गुस्सा नहीं कर सकता था। इसलिए मुझे मुस्कराते रहना पड़ा।’
कांग्रेस नेता ने कहा, ‘हालांकि मुझे यकीन है कि मेरे सहयोगी समदानी को पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में मेरे भाषण का अनुवाद करते समय ऐसी कोई समस्या नहीं होगी।’
गौरतलब है, तेलंगाना विधानसभा चुनाव के लिए हाई-वोल्टेज प्रचार मंगलवार को समाप्त हो गया। चुनाव 30 नवंबर को होंगे।
राजस्थान विधानसभा चुनाव के लिए वोटिंग हो चुकी है। 74 फीसदी की बंपर वोटिंग भी यह संकेत दे रहे हैं कि राजस्थान में पांच साल बाद सरकार बदलने की परंपरा कायम रह सकती है। मतलब बीजेपी की राह आसान हो सकती है,,,चुनाव से पूर्व के सर्वेक्षणों में बीजेपी ने कांग्रेस पर बढ़त ली थी। सट्टा बाजार भी बीजेपी को 120 से ज्यादा सीटें देकर सरकार बदलने की संभावना को प्रबल बना रहा है। बीजेपी ने मिजाज भांपते हुए पहले ही कई नेताओं को विधानसभा चुनाव मैदान में उतारकर संकेत दिए हैं,, कि राजस्थान को दस साल बाद नया नेतृत्व मिल सकता है। सीएम की रेस में राज्यवर्धन सिंह राठौर, दीया और गजेंद्र सिंह शेखावत का नाम आगे है। सूत्र बताते हैं कि बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व लोकसभा चुनावों से पहले नया चेहरे पर दांव लगाने के मूड में है। चुनाव से पहले राजकुमारी दीया कुमारी को नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान तवज्जो देकर बता दिया था कि राजस्थान में पार्टी ने वसुंधरा राजे की काट ढूंढ ली है।
क्या नए चेहरों को मौका देकर वसुंधरा को साफ़ -साफ़ संदेश देने की कोशिश की गयी है ?
तो आपको बता दें कि 2002 में भैरों सिंह शेखावत के उपराष्ट्रपति बनने के बाद राजस्थान की कमान वसुंधरा राजे को सौंपी गई। तब बीजेपी के पुराने नेताओं को यह बदलाव रास नहीं आया। पार्टी के बड़े नेता गुलाबचंद कटारिया ने राजे का विरोध किया। हालांकि तत्कालीन केंद्रीय नेतृत्व के आशीर्वाद से वसुंधरा राजे 2003 में मुख्यमंत्री बनीं। अपने कार्यकाल में वसुंधरा महिलाओं में काफी लोकप्रिय रहीं, मगर गुटबाजी बनी रही। 2013 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने बड़ी जीत हासिल की। मोदी लहर का आगाज हो चुका था। पार्टी को 163 सीटें मिलीं और कांग्रेस सिर्फ 21 विधानसभा सीटों पर सिमट गईं। वसुंधरा दोबारा मुख्यमंत्री बनी। इसके बाद से ही वसुंधरा के नेतृत्व पर सवाल उठने शुरु हो गए। 2023 विधानसभा चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी ने राजस्थान में गुटबाजी खत्म करने के लिए बड़ी कवायद की। गुलाबचंद कटारिया को असम का राज्यपाल बना दिया गया और राजस्थान में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चुनाव लड़ने का फैसला किया गया। जनता को नए चेहरे का संदेश देने के लिए ही सांसद राज्यवर्धन राठौड़, बाबा बालक नाथ, किरोड़ी लाल मीना, भागीरथ चौधरी और देवजी पटेल को पार्टी ने विधानसभा चुनाव में उतार दिया।
वसुंधरा राजे से नरेंद्र मोदी क्यों नाराज चल रहे हैं ?
दरअसल वसुंधरा राजे और नरेंद्र मोदी के बीच दूरियां 2013 के विधानसभा चुनाव के दौरान ही बढ़ने लगी थी। 2013 के विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत के बाद जीत का सेहरा समर्थकों ने वसुंधरा को पहना दिया, जबकि उस चुनाव में नरेंद्र मोदी के जादू चला था। मध्यप्रदेश समेत अन्य राज्यों के नेता जीत का श्रेय नरेंद्र मोदी को दे रहे थे। 2014 में वसुंधरा राजे ने फिर चूक कर दी। लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने राजस्थान की सभी 25 लोकसभा सीटें जीत लीं। मोदी लहर में बड़ी जीत के मायने निकाले गए, तब वसुंधरा राजे ने इसका श्रेय सामूहिक नेतृत्व को दिया। उन्होंने नरेंद्र मोदी को जीत का श्रेय देने से परहेज किया। बताया जाता है कि 2014 में नरेंद्र मोदी जब मंत्रिमंडल का गठन कर रहे थे, तब वसुंधरा राजे ने उन्हें अपने समर्थकों के नाम भेजे। तब उन्होंने नरेंद्र मोदी पर अपने समर्थकों को केंद्र में मंत्री बनाने का दबाव बनाया। बात तब बिगड़ गई जब वसुंधरा शपथ ग्रहण समारोह में नहीं पहुंची और दिल्ली के बीकानेर हाउस में बैठी रहीं। इसके बाद से दोनों नेताओं में अनबन शुरू हो गई। इसके बावजूद अड़ो और लड़ो पर कायम रहने वाली वसुंधरा अपने जनाधार के कारण राजस्थान में प्रासंगिक बनी रहीं।
बीजेपी राजस्थान में नया नेतृत्व क्यों चाह रही है ?
इस पर एक रणनीति बीजेपी की तरफ से दिखाई देती है,,,, पार्टी न सिर्फ राजस्थान में बल्कि पूरे देश के कई राज्यों में एक नये नेतृत्व को खड़ा करना चाहती है, जो अगले 25 साल तक लीड कर सकें। 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी को राज्यों में ताकतवर नेतृत्व की जरूरत होगी, इसलिए युवा नेताओं में संभावना टटोली जा रही हैं। भैरों सिंह शेखावत भी 76 साल की उम्र में राजस्थान की जिम्मेदारी युवा नेताओं को सौंप दी थी। जब वसुंधरा राजे ने कमान संभाली थी, तब वह करीब 51 साल की थी। अब वह 71 वर्ष की हैं और राजस्थान में युवा नेतृत्व को कमान सौंपने की बारी फिर आ गई है। दीया कुमारी और राज्यवर्धन सिंह राठौड़ युवा चेहरे हैं, जिनमें भविष्य की संभावनाएं दिख रही हैं। बताया जा रहा है कि आरएसएस भी बीजेपी में युवा चेहरों को आगे लाने के पक्ष में है। सवाल यह है कि अगर 3 दिसंबर के बाद राजस्थान में सरकार बदलती है तो वसुंधरा राजे को क्या रोल मिलेगा ? सबसे बड़ा सवाल कि पूर्व मुख्यमंत्री रह चुकीं वसुंधरा के सहयोग के बिना राजस्थान में सरकार कैसे चलेगी? क्योकि राजस्थान बीजेपी में वसुंधरा समर्थकों की संख्या काफी है,,,जो किसी भी तरह का विवाद होने की स्तिथि में बीजेपी हाईकमान को असहज कर सकते हैं,,, चर्चा ये भी है कि वसुंधरा को संगठन में बड़ी जिम्मेदारी देकर संतुष्ट किया जाएगा और 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद उनकी केंद्र की राजनीति में एंट्री हो सकती है।लेकिन सबसे अहम सवाल क्या वसुंधरा इस सब के लिए तैयार होगी,,क्योकि वो पहले भी साफ़ कह चुकी है कि वो राजस्थान से कहीं नहीं जा रही,,,मतलब साफ़ है कि बीजेपी हाईकमान के लिए वसुंधरा को राजस्थान से अलग करना काफी मुश्किल और चुनौती पूर्ण भी हो सकता है,,,मतलब राजस्थान में बीजेपी की जीत की स्तिथि के बाद वसुंधरा का सबसे बड़ा इम्तेहान होना लगभग तय है,,,,,अब जल्द ही वक्त बताएगा कि वसुंधरा राजस्थान में राज करेंगी या फिर दिल्ली का रास्ता पकड़ेंगी ?
आज ये खबर निश्चित ही आपको सोचने पर मजबूर कर देगी कि इस देश में लोकतंत्र कितना मजबूत है और भारत को विश्व गुरु बनाने के मोदी जी के सपने के पीछे एक और हकीकत है जिससे देश शर्मसार हो रहा है और इस देश के लोकतंत्र में भागीदार बनने वाले लोगों को इसकी क्या कीमत चुकानी पड़ रही है.
मध्य प्रदेश में वोटिंग हो चुकी है,चुनाव कौन जीतेगा इसका फैसला अब मतगणना के बाद ही हो पायेगा,,लेकिन वोटिंग के बाद भाजपा का असली चेहरा अब देश के सामने आ रहा है, जी हाँ मध्य प्रदेश में उन ग्रामीणों को पानी नहीं मिल रहा है जिन्होंने भाजपा को वोट नहीं दिया इसके लिए बाकायदा उनसे कसमें खिलाई जा रही है कि ‘बताइए आपने वोट किसको दिया’ और अगर कोई कहता है कि उसने बीजेपी के अलावा किसी और पार्टी को वोट दिया है तो उसको पानी नहीं भरने दिया जा रहा है. तो ये है भाजपा का लोकतंत्र प्रेम, ये हैं रामराज्य, क्या ये हैं अमृतकाल ?
मतदान के दो दिन बाद चंदेरी तहसील के मुंगावली विधानसभा के नयाखेड़ा गांव से जो तस्वीर सामने आई है वो सच में हैरान करने वाली है. जिले में भले ही प्रशासनिक अधिकारियों ने मतदान शांति पूर्ण तरीके से सम्पन्न करा लिया हो. लेकिन मतदान के दो दिन बाद मध्य प्रदेश के नयाखेड़ा गांव से जो तस्वीर सामने आई है वह सच में भाजपा का कुंठित चेहरा सामने लाने के लिए काफी है. चंदेरी तहसील मुख्यालय से मात्र 12 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम नयाखेड़ा जो मुंगावली विधानसभा के अंतर्गत आता है. और ये मंत्री बृजेंद्र सिंह यादव का क्षेत्र है. मतदान के बाद यहां के ग्रामीण बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं उनसे मतदान करने का बदला लिया जा रहा है.
पानी की किल्लत से जूझ रही ग्रामीण महिलाओं का कहना है कि जिस दिन से चुनाव हुए हैं उसके बाद ही लोग हमें पानी नहीं भरने दे रहे हैं जब भी पानी भरने जाते हैं तो वह कसम खिलवाकर पूछते हैं कि तुमने वोट किसको दिया? उसके बाद ही हम पानी भरने देंगे तो सोचिये एक और प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए सभी लोग अपने मत का प्रयोग जरूर करें तो दूसरी तरफ मतदान करने वालों को प्यासा मारा जा रहा है. उनको बूंद-बूंद के लिए तरसाया जा रहा है. क्या ये है लोकतंत्र ? पहले ही क्षेत्र में पानी की किल्लत है उसको पूरा करने के बजाय जब ग्रामीण मीलों पैदल जाकर पानी के तालाब तक पानी भरने पहुंच रहे हैं तो उनको ये कहकर पानी नहीं भरने दिया जा रहा कि आपने दूसरी पार्टी को वोट दिया है, बाकायदा उनको कसम खिलाकर पूछा जा रहा है कि आपने किसको वोट दिया,, अगर कोई कह रहा है कि भाजपा को वोट नहीं दिया तो उसको पानी नहीं भरने दिया जा रहा.
जब ग्रामीणों से पूछा गया कि किस पार्टी के लोग इस तरह की बात कर रहे हैं? तो उन्होंने बताया कि लोग कहते हैं कि आपने फूल पर वोट नहीं दिया..इसलिए हम आपको पानी नहीं भरने देंगे. मतलब अगर देश में जो भाजपा का वोटर नहीं होगा उसको पानी पीने का भी अधिकार नहीं है, ग्रामीणों का आरोप है कि सबसे ज्यादा एक समुदाय विशेष के लोगों को इस तरह से परेशान किया जा रहा है. उनको सार्वजनिक स्थानों से पानी नहीं भरने दिया जा रहा है, जिससे ग्रामीणों में काफी आक्रोश पनप रहा है. ये है भाजपा का ‘सबका साथ-सबका विकास’
इस खबर ने मध्य प्रदेश के खोखले विकास के दावों की पोल भी खोल दी है क्योंकि पिछले कई सालों से यहां भाजपा की सरकार है शिवराज सिंह मुख्यमंत्री हैं,और खुद इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले सरकार में मंत्री, तब जाकर यहां ये हाल हैं,कि पीने के पानी के लिए कई किलोमीटर दूर तक जाना पड़ रहा हो तो ऐसे में कहां गई सरकार की हर घर नल,, हर घर जल की योजना,, जिसका प्रधानमंत्री मोदी और पूरी भाजपा हर मंच से बखान करती है कि मोदी सरकार ने हर घर में जल पहुंचा दिया है. क्योकि सच्चाई तो सामने है , ये है डबल इंजन का विकास कि मंत्री जी के क्षेत्र में ही इस योजना ने दम तोड़ दिया है. सोचिये जहां पर दूसरी पार्टी विधायक होगा वहां कैसा विकास होगा। अब जब भाजपा की हालत खराब दिखाई दे रही है तो अब वोटर को ही परेशान किया जा रहा है.
तेलंगाना विधानसभा चुनाव-2023 के लिए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का घोषणा पत्र जारी हो गया है। बड़ा ऐलान करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि अगर बीजेपी तेलंगाना में सत्ता में आई तो समान नागरिक संहिता लागू करेगी। चुनावी घोषणा पत्र में भाजपा ने लोकलुभावन वादे भी किए हैं।
क्षिण भारतीय प्रदेश तेलंगाना में पैर जमाने की जद्दोजहद में जुटी भाजपा ने विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा ने कहा, बीजेपी को बहुमत मिलने के बाद तेलंगाना में उज्वला लाभार्थियों को प्रति वर्ष चार मुफ्त एलपीजी सिलेंडर दिए जाएंगे। लाभार्थियों के लिए कई और वादों के साथ भाजपा ने सत्तारूढ़ भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) को भी कटघरे में खड़ा किया है।
भाजपा के घोषणापत्र में कहा गया है कि बीआरएस सरकार के कथित भ्रष्टाचार की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में समिति नियुक्त करेगी। बता दें कि चुनावी रैलियों में मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव (केसीआर) और उनकी पार्टी पर जमकर निशाना साधने वाली भाजपा ने बड़े पैमाने पर आर्थिक घोटालों के आरोप लगाए हैं। हालांकि, केसीआर ने भाजपा के आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उन्होंने कहा है कि तेलंगाना में भाजपा का कोई जनाधार नहीं है। सीएम केसीआर के बेटे केटी रामा राव ने भी कहा है कि भाजपा बेबुनियाद आरोप लगा रही है।
Loksabha Election 2024: लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा के लिए पश्चिम बंगाल खास होता जा रहा है। केंद्रीय मंत्रियों का दौरा लगातार हो रहा है। इस बीच जानकारी मिली है कि इसी महीने 29 तारीख को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह बंगाल के दौरे पर आ सकते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी 24 दिसंबर को कोलकाता में आ रहे हैं। इसे लेकर आगामी दिनों में एक बार फिर से काफी हलचल देखने को मिल सकती है।
सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक प्रदेश अध्यक्ष सुकांत मजूमदार दिल्ली में हैं और उनकी बातचीत केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से हुई है। सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो 29 को भाजपा की धर्मतल्ला के ब्रिगेड परेड मैदान में होने वाली जनसभा में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह आएंगे।
इस बीच जानकारी मिली है कि कोलकाता में 24 दिसंबर को गीता जयंती के मौके पर एक लाख लोग गीता का पाठ करेंगे। इसके लिए मुख्य अतिथि के रूप में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आमंत्रित किया गया है और प्रधानमंत्री ने इसके लिए स्वीकृति भी प्रदान कर दी है।
पांच चुनावी राज्यों में एक राजस्थान में जंग बेहद दिलचस्प मोड़ की तरफ बढ़ रही है यहां भाजपा और कांग्रेस दोनों की बेचैनी बढ़ गयी है क्योंकि राजस्थान की सियासत में दलितों और पिछड़ों की सबसे बड़ी पार्टी माने जाने वाली बहुजन समाज पार्टी यानी BSP की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती की एंट्री होने जा रही है. राजस्थान का इतिहास गवाह है कि जब भी मायावती यहां किसी सीट पर प्रचार के लिए गयी हैं उनमे अधिकतर सीट बसपा जीती है, ऐसे में भाजपा और कांग्रेस के खेमे में सेंध लगने की उम्मीद है, इसका सबसे बड़ा नुकसान कांग्रेस को हो सकता है क्योंकि दलित वोटर राजस्थान में कांग्रेस का मुख्य वोटर भी माना जाता है ऐसे में जिनके दम पर कांग्रेस को सत्ता में वापसी की उम्मीद है,वो वोटर उनसे छिटक सकता है.
ऐसा पहले भी कई बार हुआ है,,ऐसे में जब मुकाबला कांटे का दिखाई दे रहा है तो एक एक सीट दोनों पार्टियों के लिए बड़ा महत्व रखती है,,,पिछली बार के चुनाव में भी बसपा 6 सीटें जीती थी,जबकि एक दर्जन सीटों पर उसके प्रत्याशी दूसरे नंबर पर रहे थे,,राजस्थान में 39 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं ऐसे में मायावती का फोकस इन सीटों पर है ऊपर से जिन नेताओं को टिकट नहीं मिल रहे वो बसपा में शामिल हो रहे हैं. इनमें सबसे अधिक कांग्रेस के विधायक हैं मायावती और अशोक गहलोत के बीच की अदावत जग जाहिर है,,सियासी जानकार मानते हैं कि मायावती गहलोत से बहुत नाराज है क्योकि उन्होंने दो बार उनके जीते विधायकों को कांग्रेस में शामिल कराया,ऐसे में इस बार मायावती ने खुद मोर्चा संभाला है.
40 सीटों पर खुद प्रचार करेंगी मायावती –
मायावती इस बार 40 सीटों पर खुद प्रचार करेंगी,,,इनमें पूर्वी राजस्थान में बसपा का सबसे बड़ा असर है,,यहां बसपा के टिकट पर लड़ने वाला कोई भी उम्मीदवार आसानी से 10 से 15 हजार वोट हासिल कर लेता है, सियासी जानकार ये भी मानते हैं कि बसपा सबसे अधिक डैमेज कांग्रेस को पहुंचाती है,,कुल मिलाकर ये भी कहा जा सकता है कि मायावती अशोक गहलोत की सत्ता वापसी के सपने को तोड़ भी सकती हैं मायावती 5 साल बाद भरतपुर शहर के नदबई कस्बे में आ रही हैं और उनका मकसद 7 विधानसभा सीटों पर 4 लाख एससी वोटो को साधना है. मायावती ने 2018 के विधानसभा चुनावों में नदबई कस्बे में बसपा प्रत्याशी जोगिंदर सिंह अवाना के समर्थन में जनसभा को संबोधित किया था और जोगिंदर सिंह अवाना विजय हुए थे. बसपा पार्टी से विजय होने के बाद जोगिंदर सिंह अवाना कांग्रेस में शामिल हो गए. इस बार 2023 के चुनाव में नदबई विधानसभा से खेमकरण तौली को उम्मीदवार बनाया है. इस जनसभा में जिले की सात विधानसभा क्षेत्रों से बहुजन समाज के कार्यकर्ता व समर्थक बड़ी संख्या में शामिल हुए .
राष्ट्रीय अध्यक्ष सुप्रीमो मायावती की भरतपुर जिले में प्रत्येक विधानसभा चुनाव में जनसभा आयोजित करवाई जाती है, क्योंकि यहां बीएसपी पार्टी को काफी फायदा मिलता है और सात विधानसभा क्षेत्र में से दो या तीन सीटों पर इन्हें विजय हासिल होती है. 2018 के चुनाव में नगर और नदबई विधानसभा क्षेत्र से बसपा को विजय हासिल हुई थी.भरतपुर की सातों विधानसभा सीटों पर एससी वोट बड़ी संख्या में हैं. यही वजह है कि सुप्रीमो मायावती भरतपुर में जनसभा को संबोधित करने जा रही हैं. जनसभा आयोजित होने से जिले की कई विधानसभा सीटों का गणित बदलेगा.
क्या राजस्थान में किंग मेकर की भूमिका में आ सकती हैं मायावती-
बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती 17 से 20 नवंबर तक राजस्थान के दौरे पर रहेंगी, जहां वे बसपा प्रत्याशियों के समर्थन में आम सभाएं और रैलियां करेंगी. मायावती अपने चार दिवसीय राजस्थान दौरे के दौरान 20 नवंबर को लाडनूं आएंगी. वे यहां बसपा प्रत्याशी नियाज मोहम्मद खान के समर्थन में जनसभा को संबोधित करेंगी. बहुजन समाज पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष भगवान सिंह बाबा के अनुसार, राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती राज्य में 17 से 20 नवम्बर तक बसपा प्रत्याशियों के समर्थन में 8 जनसभाओं को सम्बोधित करेंगी.
यूपी के आगरा से राजस्थान के भरतपुर व धौलपुर के 50 से अधिक गांवों की सीमाएं जुड़ीं हैं. इसलिए आगरा के कई बसपा नेता राजस्थान चुनाव में विधानसभा क्षेत्रों के चुनाव प्रबंधन में शामिल हैं. इसका भी फायदा उनको मिल सकता है, बता दें कि राजस्थान में 25 नवंबर को 200 सीटों के लिए मतदान होगा, ऐसे में जब बसपा पहले ही ऐलान कर चुकी है कि इस बार वो सरकार में शामिल होगी तो मतलब साफ़ है अगर बसपा राजस्थान में कुछ सीट जीत जाती है और किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है तो ऐसे में मायावती किंग मेकर की भूमिका में आ सकती हैं और अगर ऐसा हुआ तो निश्चित तौर पर 2024 चुनाव में भी मायावती अहम भूमिका में आ सकती हैं क्योंकि उन्होंने अभी तक अपने पत्ते साफ़ नहीं किये हैं कि 2024 में उनका रुख किस ओर होगा। बहरहाल आने वाला समय साफ़ कर देगा कि मायावती राजस्थान में किसको डेंट मारने जा रही है.
मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव में ताल ठोक रही सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव् इन दिनों अपने एक वीडियो को लेकर चर्चाओं में है वीडियो भी कुछ ऐसा है कि जमकर वायरल हो रहा है और इस पर तरह तरह की प्रतिक्रियाएं आ रही है. आएं भी क्यों नहीं क्योंकि वीडियो है ही कुछ ऐसा,, दरअसल सपा प्रमुख अखिलेश यादव मध्य प्रदेश में पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे, इस दौरान उनसे एक पत्रकार ने एक अजीब सा सवाल पूछ दिया. सवाल सुनकर अखिलेश यादव तमतमा गए.
उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है जिसमें वह एक सवाल पूछे जाने पर बुरी तरह भड़कते दिखाई दे रहे हैं। इतना ही नहीं, सवाल सुनकर अखिलेश यादव इतने भड़क गए कि उन्होंने भाषा की मर्यादा का भी ख्याल नहीं रखा. चुनावी सभा को संबोधित करने मध्य प्रदेश के पन्ना पहुंचे अखिलेश यादव से एक पत्रकार ने ये सवाल पूछ लिया कि ‘योगी आदित्यनाथ ने कहा कि आप टोंटी चोर हैं। बस फिर क्या था अखिलेश का पारा चढ़ गया और अखिलेश यादव ने इस पर जवाब देते हुए कहा, ‘तुम पत्रकार नहीं हो,, तुम ये महंगा चश्मा लगाए बीजेपी के एजेंट हो बेटा ‘ अखिलेश यादव ने पत्रकार का नाम पूछा तो उसने बताया कि ‘मेरा नाम नूर काजी है।’ अखिलेश ने इस पर अपने सहयोगियों से पत्रकार की तस्वीर खींचने के लिए कहा। अखिलेश ने कहा, ‘मुस्लिम हो आप, ऐसी भाषा होती है मुसलमानों की क्या? तुम तो बिके हुए हो.. पता नहीं तुम पत्रकार हो भी या नहीं.. जब मैंने सीएम आवास छोड़ा था तो बीजेपी ने इसे धुलवाया था।’ इतना ही नहीं, समाजवादी पार्टी के ट्विटर हैंडल से पत्रकार की तस्वीर को शेयर कर मध्य प्रदेश पुलिस से कार्रवाई की मांग की गई है ।
पत्रकार का कहना है कि वह पत्रकारिता कर रहे हैं,, साथ ही कहा कि मेरा शौक है पत्रकारिता और मैं कोई भी चश्मा पहन सकता हूं। अब सोशल मीडिया पर अखिलेश यादव का वीडियो खूब वायरल हो रहा है, जिस पर लोगों की खूब प्रतिक्रियाएं भी सामने आ रही हैं, कोई कह रहा है कि ‘अखिलेश यादव कितने बड़े जातिवादी नेता हो सकते हैं इसका पता चलता है पत्रकार का पूरा नाम जानने की इच्छा से.. कुछ लोग कह रहे हैं कि अखिलेश यादव को लगा कि सवाल पूछने वाला ये पत्रकार ब्राह्मण होगा लेकिन इस बार दांव उल्टा पड़ गया, ये पत्रकार मुस्लिम निकला, साथ ही कुछ लोग तर्क दे रहे हैं कि युवा पत्रकार ने अतिउत्साह में यूपी के सीएम की टिप्पणी बताओ जो सवाल किया, वो आरोप योगी आदित्यनाथ ने कभी लगाया ही नहीं। सवाल से पहले पत्रकार को तथ्य जांचना चाहिए था. अधूरी जानकारी वाले सवाल से पूर्व CM अखिलेश यादव भड़के जो स्वाभाविक था, इससे पूरी पत्रकार बिरादरी असहज हुई!”
हालांकि मध्य प्रदेश चुनाव में अखिलेश यादव द्वारा पत्रकार के साथ किए गए इस बर्ताव की खूब चर्चा हो रही है। कुछ लोग अखिलेश यादव के व्यवहार की निंदा कर रहे हैं तो कुछ कह रहे हैं कि उल्टा-सीधा सवाल पूछे जाने पर इस तरह की प्रतिक्रिया स्वाभाविक है.
क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बढ़ती हुई उम्र उनके और उनकी कुर्सी के बीच में आ रही है क्या बढ़ती उम्र में रिटायरमेंट लेकर घर बैठने का पीएम मोदी का दिया फार्मूला अब उन्हीं के गले की फांस बन गया है. और इसलिए क्या मोदी आगे के लिए अपना रास्ता साफ कर रहे हैं, यह सवाल उठने शुरू हुए मध्य प्रदेश चुनाव में बीजेपी प्रत्याशियों की सूची सामने आने के बाद क्योंकि इस सूची में करीब 15 ऐसे लोगों को टिकट दिया गया है जिनकी उम्र 70 साल से ज्यादा है बल्कि ये भी कहा जा सकता है कि थोड़ी बहुत नहीं बहुत ज्यादा है, क्योंकि ये सूची बता रही है कि भाजपा अपने ही संकल्प से पीछे हट रही है इसलिए ही सूची कई सवाल खड़े कर रही है और सबसे ज्यादा सवाल उठ रहे हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर, लोग कह रहे हैं कि कहीं इस बदलाव की बढ़ती वजह पीएम मोदी की बढ़ती हुई उम्र तो नहीं,, वो 73 के हो चुके हैं और जब अगला लोकसभा चुनाव लड़ेंगे तब तक 74 के हो जाएंगे मतलब उन्हीं के जन्म प्रमाण पत्र के हिसाब से मोदी अगर 2024 में जीते भी 5 साल के शासन के अंत में 80 साल के हो चुके होंगे,, इस उम्र का आदमी भारत जैसे बड़े देश को चलाने के लिए शारीरिक और मानसिक तौर पर कितना फिट होता है यह सवाल संघ, भाजपा और देश की जनता के सामने है. क्योंकि ये तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही बता चुके थे कि इतनी ज्यादा उम्र राजनीति के लिए सही नहीं होती.
इस सवाल के बाद दो और सवाल खड़े होते हैं,, की क्या ये बदलाव मोदी के लिए खुशी से किया जा रहा है,, सहमति से किया जा रहा है,, या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यह बदलाव खुद करवा रहे हैं यानी कि दबाव में करवाया जा रहा है.. अब पहले यह जान लेते हैं की सूची पर सवाल क्यों खड़े हो रहे हैं,, मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं और भाजपा राज्य में जीतने के लिए सभी तरीके अपना रही है लेकिन पार्टी के प्रत्याशियों की सूची शुरुआत से ही वादों में घिरी हुई है पहले तो सूची सामने आने के बाद बीजेपी की अंतर्कलह खुलकर सामने आ गई खुद अमित शाह को नाराज नेताओं को मनाने के लिए मध्य प्रदेश में आना पड़ा,, ऐसे में अब पार्टी अपने प्रत्याशियों की उम्र को लेकर सवालों में घिर गई है.
दरअसल पार्टी ने तीन केंद्रीय मंत्रियों और एक महासचिव समेत 7 सांसदों को मैदान में उतारा है,, बीजेपी ने इस बार 70 से ज्यादा उम्र के 14 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है जिनमें सबसे उम्र दराज 80 साल है,, इसके बाद से हर तरफ से इसी सूची की चर्चाएं हैं. सवाल उठ रहे हैं कि आखिर भाजपा अपने ही संकल्प से पीछे क्यों हट रही है,, क्या यह पार्टी की मजबूरी है या उसकी जरूरत,, सवाल उठने की सबसे बड़ी वजह पार्टी का अपना ही संकल्प है. दरअसल पार्टी ने तय किया था कि 70 से ज्यादा उम्र के होने पर नेता सक्रिय राजनीति से हटकर नई पीढ़ी को आगे बढ़ाएंगे, इस से युवाओं को मौका मिलेगा जिससे नई सोच, नए विचारों के साथ पार्टी आगे बढ़ेगी लेकिन अब जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव नजदीक आ रहा है पार्टी तो उलटी गंगा बहा रही है. देखने को मिल रहा है कि पार्टी उन्ही पुराने चेहरों पर दाव लगा रही है.
इसको लेकर तमाम तरह के कयास लग रहे हैं लेकिन ज्यादातर लोगों का मानना है कि यह सब मोदी की वजह से हो रहा है इसे ऐसे समझिए कि पार्टी ने कह तो दिया था कि 70 से ऊपर के लोगों को टिकट नहीं दिया जाएगा लेकिन मोदी की ही उम्र अब 73 हो चुकी है उस हिसाब से अब 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्हें टिकट नहीं मिलना चाहिए, लेकिन मोदी तो तीसरे टर्म का सपना सजा रहे हैं बाकायदा लाल किले से उन्होंने इसका ऐलान किया था ऐसे में अगर बढ़ती उम्र की वजह से उन्हें टिकट ही नहीं मिलेगा तो उनका सपना कैसे पूरा होगा. यही वजह है कि पार्टी अभी से मोदी का रास्ता क्लियर करने में लग गई है या ये भी कह सकते हैं कि पीएम मोदी खुद ही ऐसा करवा रहे हैं,, हालांकि इसके कयास तभी से लगने लगे थे जब कर्नाटक चुनाव में येदियुरप्पा को भाजपा ने अपना पोस्टर बॉय बनाया था जबकि उनकी उम्र 80 साल थी मजाक की बात तो यह है कि उन्हें सीएम की कुर्सी से हटाया गया था बढ़ती उम्र का हवाला देकर. लेकिन जैसे ही चुनाव आए और कर्नाटक में बिना येदुरप्पा के नाव डूबती दिखाई दी तो भाजपा ने उन्हें माथे पर बैठा लिया हालांकि तब तक बहुत देर हो चुकी थी और कांग्रेस ने भाजपा के छक्के छुड़ा दिए लेकिन अब तो बीजेपी 70 पार को आउट करने के खुद मोदी के ही संकल्प से पीछे हटती हुई नजर आ रही है.
इस पर राजनीति के जानकारों के कान खड़े हो गए हैं क्योंकि भाजपा ने केवल कुछ विधायकों की जीत के लिए मोदी का बनाया हुआ संकल्प नहीं तोड़ा है खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बढ़ती हुई उम्र के उठने वाले सवालों को किनारे करने के लिए तोड़ा है क्योंकि यदुरप्पा से पहले भी ऐसे कई नाम है जिन्हे पार्टी ने उम्र का हवाला देकर भाजपा की सक्रिय राजनीति से आउट कर दिया था. लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. 2014 के बाद पार्टी बार-बार यह संदेश देती रही कि वो किसी विरासत,, परंपरागत राजनीति और तौर तरीकों को ढोने की बजाय लगातार बदलाव,, युवाओं और नए चेहरों को वरीयता देने में विश्वास रखती है, और इसी के तहत पार्टी ने पहले अपने राष्ट्र कार्यकारिणी से अपने मुखर राज्यसभा सदस्य सुब्रमण्यम स्वामी और सख्त तेवर वाली नेता मेनका गांधी और राम मंदिर आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वाले विनय कटिहार को बाहर कर दिया, इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल में उम्र का ख्याल रखा गया पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी और डॉक्टर मुरली मनोहर जोशी को मार्गदर्शक मंडल में बैठा दिया उनके मंत्रिमंडल के कई चेहरों को 75 साल के होने की वजह से अपना पद खोना पड़ा, कलराज मिश्रा के अलावा कई मंत्रियों को इस्तीफा देना पड़ा.
दूसरा बड़ा उदाहरण 2019 में टिकट बंटवारे का था, वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी और डॉ मुरली मनोहर जोशी को भी टिकट नहीं मिला.. पार्टी ने वजह बताई थी कि जब पुराने लोग अपनी सीट छोड़ेंगे नहीं तो युवाओं को कैसे मौका मिलेगा लेकिन मध्य प्रदेश के लिए प्रत्याशियों की लिस्ट आने के बाद लोग तंज कस रहे हैं कि मोदी है तो मुमकिन है. पीएम मोदी के लिए अपने ही बनाए नियमों और संकल्पों का कोई मतलब नहीं है.
2024 आने से पहले ही फिल्डिंग शुरू हो गयी है, जिससे जब 2024 में मोदी को टिकट मिले तो कोई बीजेपी नेता और विपक्ष के नेता उंगली ना उठा सके. हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि कर्नाटक चुनाव में हार के बाद से पार्टी ने थोड़ा सबक लिया है कर्नाटक में उसने पूर्व मुख्यमंत्री जगदीश शेट्टार जिनकी उम्र 67 और पूर्व उपमुख्यमंत्री केसी सुरप्पा जिनकी उम्र 74 थी उन जैसे दिग्गज और पुराने नेताओं के बजाय युवा उम्मीदवारों को प्राथमिकता दी थी इससे पार्टी को नुकसान हुआ,, इसलिए पुराने चेहरों पर दाव लगाना पार्टी की मजबूरी भी है लेकिन कुछ लोगों का कहना है कि क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी कुर्सी,, अपनी जगह छोड़ना नहीं चाहते इसलिए अभी से माहौल बनना शुरू हो गया है. खैर जो भी हो पार्टी को इससे फायदा होगा या नहीं ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा लेकिन इस लिस्ट ने बीजेपी की चारों तरफ फजीहत जरुर करवा दी है की ये पार्टी सिर्फ बड़ी-बड़ी बातें और दावे करना जानती हैं उस पर टिकना नहीं जानती.
केंद्र सरकार ने अपने सेवारत कर्मचारियों और अधिकारियों के अलावा रिटायर्ड कर्मियों को भी एनपीएस छोड़कर पुरानी पेंशन स्कीम में शामिल होने का अवसर दिया है। पहले यह विकल्प मार्च में केंद्रीय कर्मियों को प्रदान किया गया था। उसके बाद जुलाई में अखिल भारतीय सेवाओं (एआईएस) के चुनिंदा अधिकारियों को भी यह विकल्प दे दिया गया। उसके बाद रिटायर्ड कर्मियों की तरफ से यह पूछा गया कि क्या वे भी इस विकल्प का फायदा उठा सकते हैं। केंद्र सरकार ने उन्हें भी एनपीएस से ओपीएस में जाने का विकल्प प्रदान कर दिया। इनके लिए अलग-अलग कट ऑफ डेट रखी गई थी। भारत सरकार के कार्मिक, लोक शिकायत तथा पेंशन मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले ‘पेंशन एवं पेंशनभोगी कल्याण विभाग द्वारा सात नवंबर को जारी कार्यालय ज्ञापन में कहा गया है कि इस विकल्प का इस्तेमाल करने वाले केंद्रीय कर्मियों के लिए प्राधिकृत अथॉरिटी द्वारा अब 30 नवंबर तक फाइनल आदेश जारी कर सकती है। पहले इस संबंध में आवश्यक आदेश 31 अक्टूबर, 2023 तक जारी किया जाना था।
कट ऑफ डेट क्यों बढ़ाई गयी –
‘पेंशन एवं पेंशनभोगी कल्याण विभाग के पास संबंधित अथॉरिटी या नियुक्ति अथॉरिटी द्वारा इस संबंध में तय अंतिम तिथि को बढ़ाने का आग्रह किया गया था। विभिन्न विभागों की तरफ से मिले आग्रह पत्रों पर विचार करने के बाद ‘पेंशन एवं पेंशनभोगी कल्याण विभाग’ द्वारा अब इस संबंध में फाइनल निर्णय लेने की कट ऑफ डेट को बढ़ाकर 30 नवंबर कर दिया गया है। केंद्र सरकार ने केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1972 (अब 2021) के तहत ऐसे कर्मचारियों को एनपीएस से ओपीएस में आने का विकल्प प्रदान किया था, जो 22 दिसंबर, 2003 से पहले विज्ञापित या अधिसूचित पदों के लिए केंद्र सरकार की सेवाओं में शामिल हुए थे। ऐसे कर्मियों को 31 अगस्त तक किसी एक विकल्प का चयन करने की मोहलत दी गई थी। ये आदेश मार्च 2023 में जारी किए गए थे। कुछ कर्मचारी ऐसे भी थे जो उक्त आदेश से पहले रिटायर हो गए। पिछले दिनों उन्होंने पूछा था कि क्या उन्हें भी अपनी सेवानिवृत्ति के पश्चात एनपीएस से ओपीएस में शामिल होने का विकल्प मिलेगा। सरकार ने कहा, वे भी ओपीएस में आ सकते हैं। बशर्ते उन्हें कुछ शर्तें पूरी करनी होंगी।
2003 से पहले पूरी हुई थी भर्ती प्रक्रिया-
केंद्र सरकार के उन कर्मियों को, जो एक जनवरी 2004 को या उसके बाद सरकारी सेवा में आए थे, लेकिन उनकी भर्ती प्रक्रिया उक्त तिथि से पहले ही पूरी हो चुकी थी। इसमें पदों के विज्ञापन से लेकर भर्ती की सभी औपचारिकताएं शामिल थी। किन्हीं कारणों से ऐसे कर्मचारी, जनवरी 2004 के बाद सेवा में आए थे। 22 दिसंबर 2003 को एनपीएस लागू होने से पहले उन कर्मियों का फाइनल रिजल्ट आ चुका था, लेकिन उन्हें ज्वाइनिंग पहली जनवरी 2004 के बाद मिली थी। ऐसे में उन्हें पुरानी पेंशन का लाभ नहीं मिल सका। उन्हें एनपीएस में शामिल कर दिया गया। केंद्रीय कर्मचारियों से बड़ी संख्या में, केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1972 (अब 2021) के तहत पेंशन योजना के लाभ का विस्तार करने के अनुरोध प्राप्त हुए। कर्मियों ने उच्च न्यायालयों और केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरणों की शरण ली। वहां से जब उनके पक्ष में फैसले हुए तो केंद्र सरकार ने 3 मार्च 2023 को उन सभी कर्मियों को ओपीएस में शामिल होने का विकल्प प्रदान किया था। इसके लिए कर्मचारियों को 31 अगस्त तक अपना विकल्प देना था।
एआईएस को भी प्रदान किया गया ये विकल्प-
केंद्र सरकार ने एनपीएस में शामिल चुनिंदा अखिल भारतीय सेवाओं (एआईएस) के अधिकारियों को भी पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) में शामिल होने का विकल्प प्रदान किया था। सरकार ने 13 जुलाई, 2023 को अपने एक आदेश में कहा था, ऐसे एआईएस अधिकारी, जिन्हें 22 दिसंबर, 2003 को एनपीएस की अधिसूचना से पहले विज्ञापित/अधिसूचित रिक्तियों के खिलाफ नियुक्त किया गया था। उन्हें एनपीएस में शामिल कर दिया गया। पहली जनवरी, 2004 को या उसके बाद सेवा में आए अधिकारियों को एआईएस (डीसीआरबी) नियम, 1958 के तहत पुरानी पेंशन योजना के प्रावधानों के तहत कवर करने का एकमुश्त विकल्प दिया जा सकता है। उक्त शर्त पूरी करने वाले एआईएस अधिकारी एनपीएस से ओपीएस में स्विच करने के लिए 30 नवंबर, 2023 तक अपना विकल्प दे सकते हैं। सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह विकल्प अंतिम मौका होगा।
कर्मियों को दिया गया एक बारगी विकल्प-
सरकार के आदेशों में कहा गया था कि इस संबंध में विभिन्न अभ्यावेदनों/संदर्भों और अदालतों के फैसलों के प्रकाश में वित्तीय सेवा विभाग, कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग, व्यय विभाग और कानूनी मामलों के विभाग के परामर्श से मामले की जांच की गई है। इसके बाद अब यह निर्णय लिया गया है कि उन सभी मामलों में, जहां केंद्र सरकार के सिविल कर्मचारी को किसी रिक्त पद के खिलाफ नियुक्त किया गया है। उसकी भर्ती प्रक्रिया, राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली ‘एनपीएस’ के लिए जारी अधिसूचना की तारीख यानी 22 दिसंबर, 2003 से पहले पूरी हो चुकी थी, मगर ज्वाइनिंग एक जनवरी, 2004 को या उसके बाद हुई है, उन सभी कर्मियों को केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1972 (अब 2021) के तहत कवर होने के लिए एक बारगी विकल्प दिया गया है। कर्मचारी, निर्धारित तिथि तक अगर इस विकल्प का प्रयोग नहीं कर पाते हैं, तो उन्हें राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली द्वारा कवर किया जाना जारी रहेगा। यदि सरकारी कर्मचारी केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1972 (अब 2021) के तहत कवरेज की शर्तों को पूरा करता है, तो इस संबंध में आवश्यक आदेश 31 अक्टूबर, 2023 तक जारी किया जाएगा। हालांकि अब इस तिथि को बढ़ाकर 30 नवंबर कर दिया गया है।
अब रिटायर्ड लोगों को मिलेगी ये सुविधा …
‘पेंशन एवं पेंशनभोगी कल्याण विभाग द्वारा इस संबंध में 20 अक्टूबर को कार्यालय ज्ञापन जारी किया गया है। इसमें कहा गया है, कुछ ऐसे केंद्रीय कर्मी, जो अब रिटायर हो चुके हैं, उन्होंने पूछा है कि क्या वे भी ओपीएस में शामिल हो सकते हैं। क्या उक्त आदेश, उन लोगों पर भी लागू होगा, जो यह आदेश आने से पहले से ही रिटायर हो गए थे। यानी उनकी रिटायरमेंट 3 मार्च 2023 से पहले हो चुकी थी। इस बाबत पेंशन एवं पेंशनभोगी कल्याण विभाग का कहना है, हां वे भी उक्त विकल्प का इस्तेमाल कर सकते हैं। यहां पर ऐसे कर्मियों को कुछ शर्तों का पालन करना होगा। जैसे यदि उन्होंने रिटायरमेंट पर एनपीएस का सारा लाभ ले लिया है, तो वह वापस करना होगा। रिटायरमेंट पर एनपीएस से मिला पैसा वापस करेंगे तो ही वे ओपीएस का लाभ तभी ले सकते हैं।
Nitish Kumar Viral Statement-बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मंगलवार को विधानसभा में जाति आधारित गणना की रिपोर्ट पेश की। जब जाति आधारित गणना पर चर्चा चल रही थी तो सीएम नीतीश कुमार ने ऐसा बयान दे दिया, जिसे सुन हर कोई हैरान है। इस दौरान उन्होंने प्रजनन दर पर भी चर्चा की। चर्चा के दौरान सीएम नीतीश कुमार ने पति-पत्नी के बीच बनने वाले शारीरिक संबंधों पर टिप्पणी की। उनके बयान सुन पूरे सदन का माहौल एकाएक बदल गया। पुरुष विधायक हंसने लगे तो महिलाएं झेंप गईं।
सदन में बोलते हुए नीतीश कुमार ने कहा कि सब लोग ठीक से समझ लीजिए। यहां जो पत्रकार लोग बैठे हैं, वो लोग भी समझ लें। दरअसल, नीतीश कुमार ने प्रजनन दर पर चर्चा करते हुए हाथों से कुछ इशारे किए और कहा, “हम चाहते हैं लड़की पढ़ाई करे। जब शादी होगा लड़का-लड़की में, तो जो पुरुष है वो तो रोज रात में करता है ना… तो उसी में और (बच्चा) पैदा हो जाता है। और लड़की पढ़ लेती है तो उसको मालूम रहेगा कि ऊ (पति) करेगा ठीक है, लेकिन अंतिम में भीतर मत घुसाओ, उसको बाहर कर दो। उसी वजह से संख्या घट रही है।
पूरे सदन में इस बयान के दौरान अजीब स्थिति देखने को मिली. नीतीश कुमार जब जनसंख्या नियंत्रण पर ज्ञान दे रहे थे, उस वक्त उनके पीछे बैठे मंत्री और विधायक मुस्कुरा रहे थे। हालांकि जब उन्हें लगा कि नीतीश कुमार कंट्रोल खो दिए हैं, तो वो झेंप गए। जिस वक्त नीतीश कुमार सदन में बोल रहे थे, उस वक्त महिला विधायक भी मौजूद थीं।
अपने संबोधन में नीतीश ने कहा कि 2011 की जनगणना की तुलना में साक्षरता दर 61 फीसदी से बढ़कर 79 फीसदी से ऊपर हो गई है.महिला शिक्षा की स्थिति में बहुत सुधार हुआ है. मैट्रिक पास संख्या 24 लाख से बढ़कर 55 लाख से ऊपर है. इंटर पास महिलाओं की संख्या पहले 12 लाख 55 हजार थी. अब 42 लाख से ऊपर है. ग्रैजुएट महिलाओं की संख्या 4 लाख 35 हजार से बढ़कर 34 लाख के पार हो गई है.
बीजेपी विधायकों ने सीएम को घेरा
नीतीश के बयान पर विधायकों की प्रतिक्रियाएं भी आ रही हैं. पूरे सदन में इस बयान के दौरान अजीब स्थिति देखने को मिली. महिला विधायक इसपर नाराज दिखीं. वहीं कुछ अन्य विधायक हंस रहे थे. नीतीश के बयान पर विधायकों की प्रतिक्रियाएं भी आ रही हैं. बीजेपी नेता तारकिशोर प्रसाद ने कहा कि इस बात को सीएम और अच्छे तरीके से कह सकते थे. वहीं बीजेपी विधायक निक्की हेम्ब्रम ने कहा कि इस बात को सीएम मर्यादित तरीके से कह सकते थे. महिलाओं के प्रति उनके मन में सम्मान नजर नहीं आया.