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मोदी सरकार में बढ़ रही सीनियर नेताओं की नारजगी,अब ये नेता भी खुल कर बोली…

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मोदी सरकार में नाराजगी- 

मोदी सरकार में 2024 से पहले बगावत के सुर उभरने लगे हैं,कई वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी खुल कर सामने आने लगी है,पहले नितिन गडकरी का एक मंच पर प्रधानमंत्री मोदी के नमस्कार का जवाब न देना और अब भाजपा की बड़ी और फायरब्रांड नेता उमा भारती का खुल कर सामने आना कहीं न कहीं ये साफ़ संकेत देता है कि मोदी की भाजपा में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा और कई दिग्गज नेताओं की पार्टी में अनदेखी के चलते शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ नाराजगी बढ़ रही है,जो कि एकजुट विपक्ष के साथ -साथ अपनों की नारजगी  मोदी सरकार  के लिए नई मुसीबत खड़ी कर सकती है

 

उमा भारती को मनाना आसान नहीं- 

उमा भारती,,, भाजपा का वो बड़ा चेहरा और वो नाम जो राम मंदिर आंदोलन के दौरान पुरे देश ने देखा,,और इसी आंदोलन ने उमा भारती को भाजपा और भारतीय राजनीती में उस मुकाम तक पहुंचाया जहां से आज उनकी अनदेखी भाजपा इतनी आसानी से नहीं कर सकती,,, उमा भारती 27 साल की उम्र में पहली बार चुनाव लड़ी. 6 बार सांसद, 2 बार विधायक बनी. 11 साल केंद्र में मंत्री रहीं और मध्य प्रदेश मुख्यमंत्री भी रहीं. जहां से बेहद नाटकीय ढंग से उनको हटाया गया,उस दौरान भी उमा भारती का अड़ियल रुख भाजपा हाईकमान से लेकर सबने देखा था,इससे ये तो साफ़ है अगर उमा भारती किसी चीज को लेकर अड़ गयी तो मोदी के लिए भी उनको मनाना आसान नहीं है

 

उमा के तीखे तेवर,अनदेखी से नाराज-

एक बार फिर उमा भारती के कड़े तेवर दिखने शुरू हो गए हैं,,उमा भारती साफ़ कर चुकी हैं कि , मैंने 2019 में ही कहा था कि 2019 में चुनाव नहीं लड़ूंगी. मुझे 5 साल का ब्रेक दे दो, गंगा का काम करूंगी. यात्रा करूंगी. लेकिन मैं 2024 का चुनाव जरूर लड़ूंगी. मुझे कोई किनारे नहीं कर सकता’,,,, उमा भारती का ऐसा कहना यूँ अचानक नहीं हुआ,जिस तरह से पार्टी में कई पुराने नेता मार्गदर्शक मंडल में दाल दिए गए,कई और सीनियर नेता हाशिये पर डाल  दिए गए उससे संकेत मिल रहे हैं कि कई नेताओं को 24 चुनाव में छुट्टी हो सकती है,लेकिन 24 के आम चुनाव से पहले जिस तरह उमा भारती को किनारे लगाया जा रहा है उससे उमा बेहद खपा हैं और वो भी उस राज्य से जहां की वो मुख़्यमंत्री रही हों सांसद रही हों

क्यों नाराज है उमा भारती ?

मोदी सरकार में मंत्री रह चुकी उमा भारती ने मध्य प्रदेश में पार्टी द्वारा शुरू की गई जन आशीर्वाद यात्रा में शामिल होने के लिए निमंत्रण नहीं दिए जाने पर विधानसभा चुनाव से जुड़ी इस महत्वपूर्ण यात्रा का बहिष्कार करने की घोषणा कर दी है। उमा भारती पार्टी से इस हद तक नाराज हैं कि उन्होंने जन आशीर्वाद यात्रा के 25 सितंबर को होने वाले समापन समारोह में भी नहीं जाने की घोषणा कर दी है। समापन समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भी शामिल होने की संभावना है।आपको बता दें कि मध्य प्रदेश में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों के मद्देनजर भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने रविवार को राज्य के सतना जिले से पार्टी के राज्यव्यापी कार्यक्रम के तहत पहली जन आशीर्वाद यात्रा का शुभारंभ किया था। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह सोमवार को राज्य के नीमच से दूसरी जन आशीर्वाद यात्रा का शुभारंभ करने जा रहे हैं।लेकिन इन सभी कार्यक्रमों से भाजपा ने उमा भर्ती से दुरी बनाये रखी हुई है,जिससे उमा बेहद नाराज दिखाई दे रही हैं

पार्टी द्वारा चुनावी रणनीति के लिहाज से शुरू की गई इन महत्वपूर्ण यात्राओं के लिए निमंत्रण नहीं मिलने पर नाराजगी जताते हुए उमा भारती ने कहा, ”आज बीजेपी की यात्राएं निकल रही। इनमें मुझे कहीं नहीं बुलाया। इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। उनको ये ध्यान तो रखना था। मुझे नहीं जाना था। वो घबराते है कि मैं पहुंच जाऊंगी तो सारा ध्यान मेरी तरफ चला जाएगा। मुझे नहीं जाना था। कम से कम निमंत्रण देने की औपचारिकता पूरी करनी चाहिए थी।

” उमा भारती ने सोमवार सुबह ट्वीट (एक्स) कर कहा, “मुझे जन आशीर्वाद यात्रा के शुभारंभ में निमंत्रण नहीं मिला, यह सच्चाई है कि ऐसा मैंने कहा है, लेकिन निमंत्रण मिलने या ना मिलने से मैं कम ज्यादा नहीं हो जाती। हां अब यदि मुझे निमंत्रण दिया गया तो मैं कहीं नहीं जाऊंगी। ना शुभारंभ में ना 25 सितंबर के समापन समारोह में।” हालांकि इसके बाद अपने अगले ट्वीट में उमा भारती ने यह भी कहा, “मेरे मन में शिवराज के प्रति सम्मान एवं उनके मन में मेरे प्रति स्नेह की डोर अटूट और मज़बूत है। शिवराज जब और जहां मुझे चुनाव प्रचार करने के लिए कहेंगे मैं उनका मान रखते हुए उनकी बात मानकर चुनाव प्रचार कर सकती हूं।” भाजपा नेताओं के फाइव स्टार होटलों में रुकने पर फिर से सवाल उठाते हुए उमा भारती ने अगले ट्वीट में कहा, “शादियों की फ़िज़ूल खर्ची और हमारे नेताओं का 5 स्टार होटलों में रुकना इसको मैं शुरू से ही ग़लत मानती हूं।

 

उमा की चेतावनी-

उन्होंने एक चैनल  से बातचीत में कहा कि अगर आप यानी बीजेपी उन नेताओं के वजूद को पीछे धकेल देंगे, जिनके दम पर पार्टी का वजूद खड़ा है, तो आप एक दिन खुद खत्म हो जायेंगे,उमा भारती से पूछा गया कि वे बैठकों में नजर नहीं आ रही हैं, रणनीतियों से दूर रह रही हैं क्या उमा भारती को दरकिनार किया गया, या खुद दूरी बनाए हुए हैं? इस पर चेतावनी वाले लहजे में उमा भर्ती ने जवाब दिया कि   मैं 2024 का चुनाव जरूर लड़ूंगी. इसलिए मैंने खुद को किनारे नहीं लगाया. और न कोई मुझे किनारे लगा सकता है

गडकरी की नारजगी भी दिखाई दे रही- 

 

ऐसा नहीं है कि सिर्फ उमा भारती ही नाराज हैं,गडकरी की नाराजगी भी अब खुल कर सामने दिखाई दे रही है,एक मंच पर प्रधानमंत्री मोदी जब सबको अभिवादन कर रहे थे और मंच पर खड़े सभी नेता भी प्रधानमंत्री का स्वागत कर रहे थे तो उसी मंच पर मौजूद गडकरी ने न तो पीएम मोदी को अभिवादन किया और न मोदी की तरफ देखा,इससे ये तो साफ़ है कि कहीं न कहीं पार्टी के भीतर ही विरोध बढ़ रहा है,,ऐसा नहीं है कि सिर्फ बड़े स्तर पर ही नाराजगी दिखाई दे रही है बल्कि छोटे स्तर पर भी नेता अब अपनी आवाज खुल कर उठाने लगे हैं

 

कई अन्य नेता भी चल रहे नाराज- 

भाजपा ने नाराज नेताओं को अलग-अलग समितियों में स्थान देकर खुश करने की कोशिश की गई है। कुछ तो मान गए हैं, लेकिन नाराज नेताओं की लिस्ट इतनी लंबी है कि उन्हें मनाने के लिए भाजपा को बकायदा रणनीति बनानी पड़ी है। उसी के मुताबिक रूठों को मनाने की तैयारी की जा रही है। चुनावी राज्य मध्य प्रदेश में बीजेपी के 60 से ज्यादा नेता नाराज बताये जा रहे हैं,,पूर्व विधानसभा अध्यक्ष  के भाई और पूर्व विधायक गिरिजाशंकर शर्मा फिर कांग्रेस का दामन थाम सकते हैं। उन्होंने खुद इसके संकेत दिए हैं।

उन्होंने कहा कि वर्तमान में सरकार और संगठन की स्थिति खराब है। 7 -7 बार विधायक बन क्र जितने वाले नेता भी पार्टी की बेरुखी से नारज लग रहे हैं,कभी प्रदेश सरकार में प्रभावी मंत्री रहे डॉ. गौरीशंकर शेजवार अपने राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। चुनाव के लिए बनी समितियों में उन्हें जगह नहीं दी गई है। बीजेपी के संस्थापक और पार्टी के सबसे बड़े नेता रहे पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी के भांजे अनूप मिश्रा ने साफ शब्दों में इरादे एक साल पहले ही जाहिर कर दिए थे। उन्होंने एक बयान में कहा था कि मैं चुनाव लड़ूंगा यह तो तय है। अब पार्टी को सोचना है कि वह कहां से लड़ाना चाहती है। उनके यह तेवर अब पार्टी नेतृत्व के लिए उलझन बढ़ा सकते हैं, क्योंकि अनूप अभी तक ग्वालियर पूर्व विधानसभा से चुनाव लड़ते आए हैं।ऐसे कई नेता हैं जो अब खुलकर बोल रहे हैं जिससे बीजेपी मुश्किलें लगातार बढ़ रही है और इनका असर भी चुनावों पर पद सकता है

 

भाजपा के लिए बनता सरदर्द- 

चुनावी साल में वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी से भारतीय जनता पार्टी परेशान है. यही वजह है कि इंदौर में बीजेपी को नई गाइडलाइन जारी करना पड़ी. पार्टी ने यहां अब अपने हर कार्यक्रम में मंच पर पुराने नेताओं को बैठाने औऱ उन्हें पूरा सम्मान देने के निर्देश जारी किए हैं. पार्षदों से लेकर मंडल अध्यक्षों तक को वरिष्ठ नेताओं का विशेष ध्यान रखने के लिए कहा गया है.बीजेपी के वरिष्ठों की नाराजगी पर कांग्रेस चुटकी ले रही है. कांग्रेस प्रवक्ता नीलाभ शुक्ला का कहना है वरिष्ठ नेताओं के सम्मान की परंपरा तो बीजेपी में कभी की खत्म हो चुकी है. वरिष्ठ नेताओं को मार्ग दर्शक मंडल में बैठाकर उनके घरों का मार्ग ही भूल चुके हैं. कई वरिष्ठ नेता पार्टी को लेकर मुखर भी हो चुके हैं. खुद कैलाश विजयवर्गीय ने स्वीकार किया कि पार्टी के वरिष्ठ नेताओ में खासा असंतोष है. विधानसभा चुनाव में बीजेपी को लग रहा है कि वरिष्ठों की नाराजगी भारी पड़ सकती है. इसलिए उन्हें मंच पर बैठाकर सम्मान का लॉलीपाप दिया जा रहा है. कुल मिलाकर राजनैतिक ड्रामेबाजी की जा रही है. कहीं भी इनके मन के अंदर वरिष्ठों को लेकर सम्मान नहीं है।

कर्नाटक और हिमाचल  चुनाव में करारी हार के बाद भाजपा कार्यकर्ताओं का मनोबल कम हुआ है. वहीं बीजेपी के पुराने नेता रही सही कसर पूरी कर रहे हैं. ऐसे में पार्टी पशोपेश में है.  कई नेता है, जो अपनी उपेक्षा से नाराज है,ऐसे में ये देखना दिलचस्प होगा की बीजेपी इन्हें मनाने में किस हद तक कामयाब होती है

 

चुनाव से ठीक पहले फिर फंसी मध्य प्रदेश की मामा सरकार…

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एक और नया ताजा घोटाला- 

मध्य प्रदेश में चुनाव हैं और एक बार फिर यहां घोटालों की आवाज सुनाई देने लग गयी है,मध्य प्रदेश में आजकल घोटाले पर घोटाले सामने आ रहे हैं. अभी एक ताजा घोटाला और सामने आया है.. जिसमें दावा किया जा रहा है कि शिवराज सरकार की एक योजना के तहत  बीजेपी नेताओ के करीबी और रिश्तेदारों पर जनता की कमाई का पैसा उड़ाया जा रहा है.. और उनको मौज कराई जा रही है.. लेकिन  इस नए घोटाले का जिक्र करने से पहले थोड़ी सी जानकारी मध्य्प्रदेश के उस घोटाले की भी लेना जरूरी है, जिसे आजाद भारत का सबसे बड़ा घोटाला कहा जाता है।
आजाद भारत के इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला- 

मध्य प्रदेश की राजनीति,और शिवराज सरकार का जिक्र जब भी आएगा एक घोटाले का नाम हमेशा  सामने आएगा. और वो है ‘व्यापम घोटाला ‘  ये वो घोटाला है जिसे आजाद भारत के इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला कहा जाता है. साल था 2013 जब मध्य प्रदेश में व्यापम घोटाले का खुलासा हुआ था। मध्य प्रदेश के बहुचर्चित व्यावसायिक परीक्षा मंडल  यानी व्यापम घोटाले का पर्दाफाश हुए 10 साल हो गए हैं। अगले कुछ महीने में मध्य प्रदेश में विधानसभा के चुनाव हैं। इस वजह से व्यापम घोटाला एक बार फिर से राजनीतिक चर्चा का विषय बना हुआ है। ये इसलिए भी चर्चित है क्योंकि इस घोटाले का पर्दाफाश होने के बाद कई पत्रकार समेत कई लोगों की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई।

 

2013 में हुई थी इस घोटाले से 40 से ज्यादा की मौतें- 

कई मीडिया रिपोर्ट्स के  एक अनुमान के मुताबिक व्यापम घोटाले से जुड़े 40 से ज्यादा लोगों की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो चुकी है। इतना ही नहीं, इस मामले में कई गिरफ्तारियां भी हुई है. साल 2013 में  व्यावसायिक परीक्षा मंडल यानी व्‍यापम की परीक्षाओं में अभ्यर्थियों की जगह किसी दूसरे को बिठाना, नकल कराना और अन्य तरह की धांधलियों की वजह से इस मामले में अब तक 125 से ज्यादा लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है। इस मामले में जब जांच शुरू हुई तो जांचकर्ता और आरोपियों की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत होने लगी। घोटाले के तार मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के अलावा बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, झारखंड, आंध्र प्रदेश समेत कई राज्यों से जुड़े होने की बात सामने आई। आखिरकार सुप्रीम कोर्ट में ये मामला पहुंचने पर इस मामले की जांच केंद्रीय जांच एजेंसी CBI को सौंपी गई।

 

इस घोटाले के तार कई लोगों से जुड़े मिले-

व्यापम में रिश्वत लेकर प्रवेश परीक्षाओं और भर्तियों में नकल करने के मामले में 4 हजार 46 लोगों को आरोपी बनाया गया है। इसमें से 956 आरोपियों की गिरफ्तारी अब तक भी  नहीं हो पाई है। वहीं CBI ने 1242 लोगों को आरोपी बनाया है। गौर करने वाली बात यह है कि इस मामले में मध्य प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल राम नरेश यादव के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज है। इतना ही नहीं व्यापम घोटाले में तत्कालीन शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा की गिरफ्तारी भी हो चुकी है। इस धांधली का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब एंट्रेंस एग्जाम के बाद अभ्यर्थी इंटरव्यू के लिए पहुंचे तो उनका चेहरा और एडमिट कार्ड पर लगी फोटो दोनों अलग होते। इसके बाद भी उन्हें इंटरव्यू में पास करके उन्हें एडमिशन दे दिया जाता। मामला उजागर होने पर इसके तार मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के कार्यालय और तत्कालीन राज्यपाल राम नरेश यादव तक जुड़ते पाए गए।

 

फिर विवादों में क्यों आयी शिवराज सरकार ?

अब बात उस नए घोटाले की जिससे शिवराज सरकार फिर विवादों में आ गयी है,,मध्य प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा  कोई भी मौका नहीं छोड़ना चाह रही है. सूबे के मुखिया शिवराज सिंह चौहान  युवाओं से लेकर बुजुर्गों तक को रिझाने के लिए रोजाना कुछ न कुछ नया कर रहे हैं. लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है.चुनाव से ठीक पहले मुख्यमंत्री शिवराज ने मुख्यमंत्री हवाई तीर्थ यात्रा की शुरुआत की है.लेकिन इस योजना से बुजुर्गों को हवाई यात्रा का दावा करने वाली शिवराज सरकार की अब पोल खुलती हुई नजर आ रही है।

 

चुनाव से ठीक पहले इस योजना की शुरुवात- 

चुनाव से ठीक पहले मुख्यमंत्री शिवराज ने मुख्यमंत्री हवाई तीर्थ यात्रा की शुरुआत की है. लेकिन इस योजना का लाभ बीजेपी के पदाधिकारी उठा रहे हैं. पैसे वाले रसूखदार लोग उठा रहे हैं, मिली जानकारी के अनुसार हवाई सफर रायसेन से पूर्व जिलाध्यक्ष समेत बीजेपी के दिग्गज नेता सहित हेल्थ मिनिस्टर प्रभुराम चौधरी के सबसे करीबी लोग कर रहे हैं. मंत्री विश्वास सारंग के करीबी रसूखदार बीजेपी भोपाल मंडल अध्यक्ष नीरज पचौरी के ब्रजमोहन भी सीएम की मुफ्त रेवड़ी वाली हवाई यात्रा में तीर्थ दर्शन कर आये. कद्दावर मंत्री प्रभुराम चौधरी ने तीर्थ यात्रियों को हवाई यात्रा पर भेजते हुए फेसबुक पर फोटो डाली, प्रभुराम चौधरी के साथ फोटो में रायसेन से पूर्व जिला अध्यक्ष नरेंद्र सिंह कुशवाह हैं, बीजेपी रायसेन के 2003 से 2007 तक जिला अध्यक्ष रहे हैं. इसके अलावा प्रभुराम चौधरी के खासम खास मलखान सिंह, कालूराम विश्वकर्मा भी हवाई जहाज पर सवार हुए. इस लिस्ट में बड़ी संख्या में बीजेपी नेता प्रयागराज डुपकी लगाने गए।

 

करीबियों को हो रहा है योजना का फायदा- 

भोपाल की हवाई तीर्थ दर्शन की सूची में मंत्री विश्वास के विस्वस्थ हवाई सरकार पर खूब उड़े. मंत्री ने मुख्यमंत्री की योजना को पलीता लगा दिया है. पोस्टर में नजर आ रहे है नीरज पचौरी जो की बीजेपी के मंडल अध्यक्ष पोस्टर पर मंत्री विश्वास सारंग का फोटो बताता है की ये उनके बेहद करीबी हैं, करीबी होने की वजह से फायदे भी मिल रहे हैं. मंडल अध्यक्ष नीरज पचौरी के पिता ब्रजमोहन पचौरी इनके पास करोड़ों की सम्पति है पर मंत्री विश्वास के करीबी हैं तो इन्हें गरीबों की योजना का लाभ मिल रहा है. क्योंकि ब्रजमोहन पचौरी मंत्री विश्वास के लिए वोट बटोरने के लिए नरेला में काम आते है . मकसद ये था कि इस यात्रा में निर्धन परिवार के लोग ही यात्रा करें, लेकिन निर्धन बुजुर्गों के हक को बीजेपी नेताओं ने मार लिया है।

 

12 अप्रैल को सर्कुलर किया था जारी- 

पहली बार किसी राज्य में सरकार के खर्च पर हवाई जहाज से तीर्थ यात्रा की शुरुआत हुई ..शिवराज सिंह चौहान के द्वारा काफी धूम-धाम से शुरु की गयी शिवराज सरकार धार्मिक न्यास और धर्मस्व विभाग ने 12 अप्रैल 2023 को यात्रा से जुड़ा सर्कुलर जारी किया था. इसके मुताबिक, यात्रियों को चुनने के दो क्राइटेरिया पहला, यात्री की उम्र 65 साल से ज्यादा होना चाहिए, दूसरा, वो इनकम टैक्स न देता हो. सर्कुलर के हिसाब से यात्रियों के सिलेक्शन की जिम्मेदारी जिला कलेक्टर को दी गई है. ये भी कहा गया है कि तय संख्या से ज्यादा आवेदन आने पर यात्रियों का सिलेक्शन कम्प्यूटराइज्ड लॉटरी सिस्टम से किया जाए।

 

आखिर इन लोगों को क्यों करवाया गया तीर्थाटन- 

21 मई को पहला ग्रुप राजधानी भोपाल से हवाई जहाज से  प्रयागराज भेजा गया था, इसमें कुल 32 यात्री शामिल थें, लेकिन इन यात्रियों में अधिकांश भाजपा के पदाधिकारी और उसके नेताओं के परिजन थें. इसमें दो यात्रियों की पहचान महाराष्ट्र और तमिलनाडु निवासी के रुप में हुई है. अब सवाल है कि मध्य प्रदेश सरकार उन्हें अपने खर्चे से यात्रा कैसे करवा रही थी?  इसके साथ ही तीर्थ योजना का लाभार्थी के लिए जो मापदंड तय किया गया था, उसकी भी धज्जियां उड़ाई गयी है, मापदंड के विपरीत इसमें से अधिकांश बड़े-बड़े हाउसिंग सोसाइटी में रहने वाले लोग हैं, जिनके पास आलीशान गाड़ियां और लग्जरी भरी जिंदगी है, बावजूद इसके इन सभी को गरीब-वचिंत बताकर तीर्थाटन करवाया गया।

 

10 साल बीत चुके हैं व्यापम घोटाले को-

व्यापम घोटाले का पर्दाफाश हुए 10 साल बीत चुके हैं। लेकिन घोटालों का जिन्न आज भी शिवराज सरकार का पीछा नहीं छोड़ रहा,,  पिछले दिनों पटवारी भर्ती परीक्षा में एक बार फिर से धांधली के आरोप लगे। आरोप ये भी लगे कि ये भी व्यापम की तरह ही एक और घोटाला है, जिससे शिवराज सरकार फिर से निशाने पर आ गयी, ये मामला थोड़ा हल्का पड़ा  ही  था कि अभी हाल ही में एक और घोटाले के आरोपों में शिवराज सरकार घिर गयी है, जिस पर खूब हंगामा मचा हुआ है,और अब विपक्षी भी शिवराज सरकार पर तंज कस रहे हैं कि वो दिन दूर नहीं जब गूगल पर घोटाला सर्च करेंगे  तो शिवराज सिंह चौहान की तस्वीर सामने आएगी।

प्रियंका गांधी के द्वारा मध्य प्रदेश की शिवराज सिंह चौहान को 50 फीसदी कमीशन वाली सरकार बताने पर मुकदमा दर्ज किया गया है,  प्रियंका और दूसरे कांग्रेस नेताओं के खिलाफ करीब 45 थानों में मुकदमा दर्ज किया गया है. साफ है कि जिस प्रकार वहां से भ्रष्टाचार की खबरें आ रही है, और कांग्रेस के आरोपों पर भाजपा जिस गैर जरूरी उग्रता के साथ प्रतिक्रिया दे रही है, मध्यप्रदेश में भी भाजपा कर्नाटक की राह चलती नजर आ रही है।

फिर मुश्किल में मोदी सरकार, पुरानी पेंशन बहाली को लेकर सड़कों पर उतरेंगे देश के करोड़ों कर्मचारी…

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पेंशन से हो सकती है मोदी सरकार में टेंशन-

महंगाई और बेरोजगारी को दूर करने में नाकाम रही नरेंद्र मोदी सरकार अब नई मुसीबत में है. देश सबसे बड़ी हड़ताल की मुहाने पर खड़ा है, रेलगाड़ी, सरकारी दफ्तर, सरकारी बस, सरकारी बैंक, पोस्ट आफिस, मंडियां, कॉलेज, स्कूल, यूनिवर्सिटी सब पर ताला लग सकता है. क्योंकि जिस पुरानी पेंशन योजना ने हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में बीजेपी को सत्ता से बेदखल कर दिया उसकी आवाज अब पूरे भारत से बुलंद होने वाली है, सरकारी कर्मचारियों के संगठन ने भाजपा की ईंट सीट बजाने का ऐलान कर दिया है.. चेतावनी जारी हुई है की अभी भी मोदी के पास समय है या तो वे पुरानी पेंशन योजना लागू कर दें. और नहीं तो अब हम अनिश्चितकाल के लिए धरने पर बैठने को मजबूर होंगे

 
2024 चुनाव में बड़ा मुद्दा बन सकता है ये- 
 

कर्मचारियों ने सरकार को खुली चेतावनी दे डाली है. कि अगर सरकार ने पुरानी पेंशन योजना लागू नहीं की तो 2024 में भाजपा को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा, यानी की अब ये मुद्दा पूरे देश में तूल पकड़ चुका है,,, क्योकि कर्मचारियों को लगता है कि सरकार इस मामले में अड़ियल रवैया अपना रही है. आप जानते ही हैं की कांग्रेस शासित प्रदेशों में OPS यानी  Old Pension Scheme लागू होने के बाद से बीजेपी शासित राज्यों की मुसीबत बढ़ गयी है, इसलिए राजनीति के जानकारों का तो यहां तक दावा है की 2024 लोकसभा चुनावों में ये मुद्दा बड़ा चुनावी मुद्दा जरुर बन सकता है

 
हो सकती है जल्द ही बड़ी हड़ताल-
 

ऐसा इसलिए भी कहा जा रहा है क्योकि OPS के लिए गठित नेशनल ज्वाइंट काउंसिल ऑफ ऐक्शन की संचालन समिति की वरिष्ट सदस्य और AIDEF के महासचिव सी.श्री कुमार ने बताया की सरकार इस मामले पर अडियल रवैया अपना रही है, इसलिए पुरानी पेंशन के लिए कर्मचारी संगठन राष्ट्रीय व्यापी अनिश्चितकालीन हड़ताल कर सकती है

 
देश में स्ट्राइक-
 

इस मामले पर विचार करने के लिए 20 और 21 नवंबर को देशभर में स्ट्राइक बैलेट होगा. इसमें कर्मचारियों की राय ली जाएगी. अगर बहुमत हड़ताल के पक्ष में होता है तो केंद्र और राज्यों में सरकारी कर्मचारी अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले जाएंगे. साथ ही उन्होंने चेतावनी भी दी की अगर ऐसा हुआ तो पूरे देश में रेल के पहिए थम जाएंगे. वही केंद्र एवं राज्यों के कर्मचारी कलम छोड़ देंगे ‘मतलब पूरा देश ठप’

 
 सी.श्री कुमार ने दावा किया की पुरानी पेंशन बहाली के लिए केंद्र एवं राज्यों के कर्मचारी एक साथ आ गए हैं. लगभग देश के सभी कर्मचारी संगठन इस मुद्दे पर एक साथ है.
 

 

केंद्र और राज्यों के विभिन्न निगमों और स्वायत्तता प्राप्त संगठनों ने भी OPS की लड़ाई में शामिल होने की बात कही है. बैंक और इंश्योरेंस कर्मियों से भी बातचीत चल रही है. कर्मचारियों ने हर तरीके से सरकार के सामने पूरानी पेन्शन बहारी की मांग की है. लेकिन उनकी बात सुनी नहीं गई अब उनके पास अनिश्चितकालीन हड़ताल ही एक मात्र रास्ता बचा है. आपको बता दें की 10 अगस्त को दिल्ली के रामलीला मैदान में पूरे देशभर से लाखों सरकारी कर्मचारी आए थे और सबने मिलकर OPS को लेकर हुंकार भरी थी

उठाए जा सकते हैं ये कदम-

 

कर्मचारियों ने दो टूक शब्दों में कहा था की वो किसी भी तरह से पुरानी पेंशन बहाल करा कर दी दम लेंगे सरकार को अपनी जिद्द छोड़नी ही पड़ेगी, कर्मचारियों ने कहा था की वो सरकार को वो फॉर्मूला बताने को तैयार हैं, जिसमें सरकार को OPS लागू करने में कोई नुकसान नहीं होगा, लेकिन अगर इसके बाद भी सरकार पुरानी पेंशन लागू नहीं करती है तो भारत बंद जैसे कई कठोर कदम उठाए जाएंगे

OPS पर सभी विभाग एक साथ-
 
रक्षा कर्मी
सिविल कर्मचारी 
रेलवे 
बैंक 
प्राइमरी स्कूल 
कॉलेज 
यूनिवर्सिटी 
डॉक 
सेकेंडरी स्कूल 
हाई स्कूल 
 
BJP के लिए खड़ी हो सकती है बड़ी परेशानी-
 

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से भी मुलाकात की कोशिश की थी लेकिन वो इसमे कामयाब नहीं हो सके. संचालन समिति के राष्ट्रीय संयोजक ने चुनौती भरे लहजे में कहा था की अगर 2024 लोकसभा चुनाव से पहले पुरानी पेंशन अगर लागू नहीं होती है तो भाजपा को इसकी कीमत चुकाने के लिए तैयार रहना चाहिए, उन्होंने बताया की कर्मियों, पेंशनरों और उनके रिश्तेदारों को मिलाकर ये संख्या 10 करोड़ के पार चली जाती है. चुनावों में बड़ा उलटफेर करने के लिए ये संख्या निर्णायक है. केंद्र के सभी मंत्रालय विभाग, OPS पर एक साथ आ चुके हैं

 
NPS मंजूर नहीं- 
  

सी.श्री कुमार के मुताबिक मोदी सरकार पेंशन पर होशियारी कर रही है. वित्त मंत्रालय ने जो कमेटी बनाई है उसमें OPS का ही जिक्र नहीं है. उसमे तो NPS यानी National Pension System में सुधार की बात की गयी है, इसका मतलब है की केंद्र सरकार OPS को लागू करने के मूड में ही नहीं है. और केंद्र सरकार NPS में चाहे जो भी सुधार कर ले कर्मचारियों को ये मंजूर नहीं है, कर्मियों का केवल एक ही मकसद है बिना गारंटी वाला NPS योजना को खत्म किए जाए और परिभाषित एवं गारंटी वाली पुरानी पेंशन योजना को बहाल किया जाए

NPS में कोई राहत नहीं-
 

AIDEF यानी ऑल इंडिया डिफेंस एम्पलाइज फेडरेशन के महासचिव ने ये भी कहा की NPS में पुरानी पेंशन व्यवस्था की तरह महंगाई राहत का भी कोई प्रावधान नहीं है जो कर्मचारी पुरानी पेंशन व्यवस्था के दायरे में आते हैं उन्हे महंगाई राहत के तौर पर आर्थिक फायदा मिलता है. NPS में सामाजिक सुरक्षा की गारंटी भी नहीं रही, रिटायरमेंट के बाद सरकारी कर्मचारियों को जानबूझकर मुश्किल में धकेला जा रहा है. और हम इसे स्वीकार करने को बिल्कुल भी तैयार नहीं हैं

 
कांग्रेस OPS को अपनी राज्यों की सरकार में कर रही है लागू-
 

इसका मतलब साफ है कि सरकारी कर्मचारियों में अब सरकार के खिलाफ गुस्सा बढ़ता जा रहा है. इसका सीधा असर आने वाले चुनावों चाहे वो विधानसभा चुनाव हो या फिर अगले साल होने वाले आम चुनाव दोनो पर पड़ेगा.. एक तरफ कांग्रेस इस मामले में लीड ले चुकी है, तो बीजेपी बैकफुट पर है. कांग्रेस हर उस राज्य में OPS को लागू कर रही है या लागू करने की घोषणा कर चुकी है जहां-जहां उनकी सरकारे हैं. वहीं बीजेपी अभी तक यही फैला रही है की OPS की तरफ लौटना मतलब देश बर्बाद करना, इज्जत पर अड़े रहना बीजेपी को नुकसान पहुंचा सकता है. क्योकि हिमाचल और कर्नाटक को कहीं ना कहीं इसी मुद्दे की वजह से नुकसान उठाना पड़ा था. अब दोनो राज्यों में कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में इस मुद्दे को शामिल किया और सरकार बनने पर पुरानी पेंशन योजना को लागू करने का वादा किया

 
इन राज्यों में भी भारी पड़ रहा है ये मुद्दा- 
 

इसके साथ ही ये मुद्दा उत्तर प्रदेश, हरिय़ाणा, महाराष्ट्र जैसे बीजेपी शासित राज्यों में भी तेजी से तूल पकड़ने लगा. और अब तो कर्मचारियों ने साफ चेतावनी दे दी है की अगर उनकी मांगे नहीं मानी गय़ी तो वो अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ जाएंगे, ये चेतावनी मोदी सरकार को भारी पड़ सकती है. क्योकि अगर 1 लाख लोगों ने भी दिल्ली में धरना शुरु कर दिया तो एक नया दूसरा अन्ना आंदोलन खड़ा हो सकता है. और फिर OPS ऐसा मुद्दा है जो हर गांव, हर शहर, और हर राज्य में बड़ा आंदोलन खड़ा कर सकता है

 

ऐसे में अब देखना होगा की सरकारी कर्मचारियों की इस चेतावनी पर सरकार ध्यान देती है या नहीं. कर्मचारी सरकार को चेतावनी देने के बाद बेसब्री से उनके जवाब का इंतजार कर रही है. लेकिन अभी जितना ये मामला टलेगा 2024 चुनाव में ये उतना ही बड़ा मुद्दा बनेगा और बीजेपी इसे टालने की हर मुम्किन कोशिश करेगी

वसुंधरा से दूरी बनाती भाजपा, नाराजगी मोदी को पड़ सकती है महंगी… 

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क्या वसुंधरा अब बीजेपी की ज़रूरत की लिस्ट से बाहर हो चुकी हैं? सवाल उठना लाजिमी भी है क्योंकि वसुंधरा राजे न सिर्फ़ दो बार की मुख्यमंत्री रही हैं, बल्कि प्रदेश में पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा भी हैं.राजस्थान चुनाव की तैयारियों में जुटी पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वसुंधरा राजे को बीजेपी ने बड़ा झटका दिया है. गुरुवार को बीजेपी ने चुनाव प्रबंधन समिति और संकल्प पत्र समिति के गठन का ऐलान किया. इन दोनों ही समितियों से वसुंधरा राजे का नाम गायब है. बीजेपी का ये फैसला चौंकाने वाला है.वसुंधरा के किसी समर्थक को भी इन कमेटियों में जगह नहीं मिली है. इसके उलट घनश्याम तिवाड़ी और डॉक्टर किरोड़ी लाल मीणा जैसे नेताओं को शामिल किया गया है, जो वसुंधरा राजे के घोर विरोधी माने जाते हैं. ये वही नेता हैं जो एक समय वसुंधरा राजे की वजह से बीजेपी छोड़कर चले गए थे. हालांकि, अभी कैंपेन कमेटी की घोषणा बाकी है, लेकिन इन दो कमेटियों से वसुंधरा का पत्ता कटने के बाद राजस्थान के राजनीतिक गलियारे में सुगबुगाहट तेज हो गई है. सवाल उठने लगे हैं कि क्या राजस्थान की सियासत में वसुंधरा राजे के साथ खेल हो गया? क्या बीजेपी ने मुख्यमंत्री पद की सबसे बड़ी दावेदार वसुंधरा को साइड लाइन कर दिया?

 
राजस्थान में जहां भाजपा जीत की आस लगा रही है,पर कुछ ऐसे कारण राजस्थान में बन रहे हैं जिससे जहां कांग्रेस को थोड़ा राहत और भाजपा में बेचैनी दिखाई दे रही है, राजस्थान में भाजपा की जीत सबसे ज्यादा निर्भर करेगी वसुंधरा राजे पर, राजस्थान विधानसभा चुनावों को लेकर बीजेपी ने हाल ही में दो समितियां गठित की हैं. इन दोनों समितियों में पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का नाम नहीं होने से उनके समर्थकों में नाराजगी है.बीजेपी में चुनाव समितियों का बड़ा महत्व माना जाता है.इसलिए दोनों समितियों में वसुंधरा राजे का नाम नहीं होने से फिर एक बार बीजेपी में उनकी अहमियत को लेकर चर्चा शुरू हो गई है.हालांकि, बीजेपी का कहना है कि वसुंधरा राजे बीजेपी की बड़ी नेता हैं. वे चुनावों में प्रचार-प्रसार करेंगी। 
 
 
राजस्थान में कैंपेनिंग कमेटी की घोषणा- 
 

दूसरी तरफ कांग्रेस ने राजस्थान में नाराज चल रहे सचिन पायलट को कांग्रेस वर्किंग कमेटी में शामिल कर लिया है. रविवार को कांग्रेस वर्किंग कमिटी की जो लिस्ट आई उसमें सचिन पायलट का भी नाम है.जहाँ कांग्रेस सचिन पायलट को साथ लेकर चलने की कोशिश कर रही है, वहीं बीजेपी में वसुंधरा राज्य निर्णायक भूमिका में नहीं दिख रही हैं.बीजेपी पहली बार राजस्थान में कैंपेनिंग कमिटी की घोषणा भी करने वाली है. चुनावों में बीजेपी की कैंपेनिंग कमेटी को बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है.ऐसे में वसुंधरा राजे की भूमिका को लेकर सबकी निगाहें अब कैंपेनिंग कमिटी की घोषणा पर टिकी हुई हैं.17 अगस्त के दिन जयपुर में बीजेपी ने कोर कमिटी की बैठक बुलाई थी. लेकिन, इस बैठक में पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे शामिल नहीं हुईं.इस बैठक से पहले बीजेपी ने आगामी राजस्थान विधानसभा चुनाव के दो समितियों की घोषणा की.प्रदेश चुनाव प्रबंधन समिति और प्रदेश संकल्प पत्र समिति. इन दोनों ही समितियों से पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का नाम नहीं है.वसुंधरा राजे के चेहरे पर 2018 में राजस्थान विधानसभा चुनाव में बीजेपी सत्ता से बाहर हो गई थी.इसके बाद से ही दिल्ली के बीच उनके मतभेद देखने को मिले हैं. चर्चाएं रहीं कि बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व वसुंधरा राजे को महत्व नहीं दे रहा है.इस बार इसलिए भी सवाल उठाए जा रहे हैं क्योंकि पिछले विधानसभा चुनाव में वसुंधरा राजे का चुनावों के लिए बनाई गईं सभी समितियों में नाम था.तब चुनाव प्रबंधन समिति में भी वसुंधरा राजे शामिल रहीं थीं लेकिन इस बार उनका नाम नहीं है.वसुंधरा राजस्थान बीजेपी की सबसे बड़ी नेता है,भाजपा भले कुछ भी दावे करे लेकिन ये भी सच है कि वसंधुरा को अगर भाजपा राजस्थान से किनारे करती है तो आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी को मुश्किलों के दौर से गुजरना पड़  सकता है

चुनावी रणनीति पर दिल्ली की पकड़ मजबूत- 


वसुंधरा राजे का पिछले चुनावों में जो क़द था, वो इस बार नहीं रहा है. इसका अब कारण दिल्ली से राज्यों का चुनाव संचालन हो सकता है.चुनाव में प्रत्याशियों के चयन से लेकर चुनावी रणनीति तक सभी फ़ैसलों पर दिल्ली की पकड़ मजबूत हो गई है. इसके बाद से ऐसा देखा नहीं गया कि वसुंधरा राजे को कोई बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई हो,वसुंधरा समर्थक चाहते हैं कि उनको राजस्थान सीएम का चेहरा बनाया जाए.बीजेपी में सबसे महत्वपूर्ण कैंपेन कमेटी मानी जाती है. इस कमेटी का चेहरा चुनावों का चेहरा माना जाता है और इसलिए सब की निगाहें कैंपेन कमेटी पर टिकी हैं.राजस्थान में पहली बार कैंपेन कमेटी की घोषणा होने जा रही है.माना जा रहा है कि कैंपेन कमेटी में वसुंधरा राजे को शामिल किया जा सकता है. अगर नहीं किया जाएगा तो बीजेपी आलाकमान का यह सीधा संदेश होगा कि वसुंधरा राजे को दरकिनार करके चुनावों में जा रहे हैं.पहली बार साल 2014 में लोकसभा चुनाव के दौरान कैंपेनिंग कमेटी बनाई गई थी, जिसका अध्यक्ष नरेंद्र मोदी को बनाया गया था. इसलिए माना जाता है कि कैंपेनिंग कमिटी का चेहरा ही आगामी चुनाव का चेहरा होगा

 

बीजेपी ने प्रदेश संकल्प पत्र समिति का संयोजक बीकानेर से सांसद और केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल को सौंपी है.राजस्थान में अर्जुन राम मेघवाल बीजेपी के बड़े दलित चेहरा हैं.राजनीति में आने से पहले वे भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी रहे हैं.संकल्प पत्र समिति में राज्यसभा सांसद घनश्याम तिवाड़ी और राज्यसभा सांसद डॉ किरोड़ी लाल मीणा हैं.ये दोनों ही नेता एक समय पर वसुंधरा राजे के धुर विरोधी रहे हैं. संकल्प पत्र समिति में छह सह संयोजक और 17 सदस्य समेत कुल 25 नेता शामिल हैं.प्रदेश चुनाव प्रबंधन समिति का संयोजक नारायण पंचारिया को बनाया गया है.पंचारिया बीजेपी से पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष और सांसद रहे हैं. वे केंद्रीय नेतृत्व के करीबी माने जाते हैं.बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और जयपुर ग्रामीण सांसद राज्यवर्धन सिंह राठौर समेत छह सह संयोजक और 14 सदस्यों समेत 21 नेताओं को समिति में शामिल किया गया है

 
क्या वसुंधरा की अहमियत भाजपा में कम?


ऐसे में एक सवाल उठता है कि क्या वसुंधरा राजे की अहमियत भाजपा में कम हो रही है,वसुंधरा राजे एक समय में पार्टी में मजबूत कद रखती थी,वसुंधरा अटल और आडवाणी के दौर में एक समय 2014 से पहले प्रधानमंत्री के पद की दावेदार के रूप में थी,लेकिन मोदी सत्ता में उनको इतना महत्व नहीं दिया गया,वसुंधरा राजे के चेहरे पर 2018 में राजस्थान विधानसभा चुनाव में बीजेपी सत्ता से बाहर हो गई थी.इसके बाद से ही दिल्ली के बीच उनके मतभेद देखने को मिले हैं. चर्चाएं रहीं कि बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व वसुंधरा राजे को महत्व नहीं दे रहा है.इस बार इसलिए भी सवाल उठाए जा रहे हैं क्योंकि पिछले विधानसभा चुनाव में वसुंधरा राजे का चुनावों के लिए बनाई गईं सभी समितियों में नाम था.तब चुनाव प्रबंधन समिति में भी वसुंधरा राजे शामिल रहीं थीं लेकिन इस बार उनका नाम नहीं है

बीजेपी राजस्थान में परिवर्तन यात्रा निकाल रही है,हालांकि, इस बार परिवर्तन यात्रा एक चेहरे पर नहीं बल्कि चार दिशाओं से चार चेहरों पर टिकी होगी.ऐसे में यह भी कयास लगाए जा रहे हैं कि इस बार यह यात्रा सिर्फ़ वसुंधरा राजे को साइड लाइन करने के लिए किया गया है. राजनीतिक विश्लेषक मिलाप चंद डांडी कहते हैं, “राजस्थान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ही चेहरे पर ही चुनाव लड़ा जाएगा. मुझे नहीं लगता कि वसुंधरा राजे का चेहरा सामने किया जाएगा. क्योंकि उन पर गहलोत से मिले होने के आरोप हैं.अभी तक तो ऐसा लग रहा है कि आगामी विधानसभा चुनाव मोदी बनाम गहलोत होगा. मीडिया में भी मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर वसुंधरा से अलग नाम तैर रहे हैं.. कभी गजेंद्र सिंह शेखावत, कभी सतीश पूनिया तो कभी अश्विनी वैष्णव. मतलब साफ़ है, वसुंधरा के लिए संकेत अच्छे नहीं हैं. शायद, वसुंधरा राजे को भी इसका अहसास हो चुका है, इसलिए अक्सर वो पार्टी की बैठकों से नदारद रहती हैं. गुरुवार को भी राजस्थान में भाजपा का विशेष सदस्यता अभियान चल रहा था, लेकिन कोर कमेटी की मेंबर होने के बावजूद वसुंधरा नहीं पहुंचीं

क्या बीजेपी के लिए आसान होगा ये?


अब सवाल उठता है  की क्या  वसुंधरा को किनारे करना बीजेपी के लिए आसान होगा ? पार्टी के अंदर ही वसुंधरा राजे के खिलाफ एक बड़ी लॉबी बन गई है. हाल में अमित शाह के दौरे में इसकी झलक भी दिखी थी. उदयपुर में मंच पर अमित शाह के साथ वसुंधरा राजे भी थीं. नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ ने वसुंधरा की अनदेखी कर भाषण के लिए अमित शाह का नाम लिया. हालांकि, अमित शाह ने वसुंधरा राजे की ओर इशारा कर भाषण के लिए कहा. अब सवाल है कि क्या बीजेपी के लिए वसुंधरा राजे को साइड लाइन करना आसान होगा? जवाब है- बिल्कुल नहीं. वसुंधरा राजे का एक अपना व्यक्तित्व है जो सियासत को किसी करवट बदलने का माद्दा रखता है. अगर राजस्थान की सियासत में वसुंधरा के दुश्मन हैं तो दोस्त भी. वसुंधरा के करीबी और सात बार के विधायक रहे देवीसिंह भाटी ने तो वसुंधरा को चेहरा न बनाए जाने की स्थिति में तीसरा मोर्चा बनाने तक की बात कह दी है. हालांकि, वसुंधरा राजे अभी वेट और वॉच वाली स्थिति में हैं. इलेक्शन कैंपेन कमेटी की घोषणा अभी बाक़ी है. माना जाता है कि इलेक्शन कैंपेन कमेटी का संयोजक ही चुनाव में पार्टी का चेहरा होता है. ऐसे में इस पद के लिए वसुंधरा प्रेशर पॉलिटिक्स से नहीं चूकेंगी. लेकिन, अगर ऐसा नहीं हुआ तो इतना तो तय है कि वसुंधरा को साइड लाइन करना बीजेपी के लिए फायदे का सौदा नहीं होगा

 
 
क्या खतरनाक प्रतिद्वंद्वी साबित हो सकती हैं ये- 


फिलहाल, BJP के बड़े नेता अपनी तरफ से गुटबाजी पर लगाम लगाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं क्योंकि गुटबाजी भगवा कुनबे की चुनावी संभावनाओं के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है,राजस्थान में नेतृत्व की दुविधा हल करने में BJP की नाकामी के इन चुनावों में तकलीफदेह नतीजे हो सकते हैं. राजस्थान में पार्टी की सबसे लोकप्रिय नेता वसुंधरा राजे की अपरिभाषित भूमिका BJP की चुनावी संभावनाओं पर किस तरह असर करेगी, यह एक जटिल सवाल है. अगर उनके कुछ वफादारों के नाराजगी भरे बयान कोई इशारा हैं,  तो ‘एंग्री वूमेन’ अपनी ही पार्टी के लिए एक खतरनाक प्रतिद्वंद्वी साबित हो सकती है !

5 राज्यों का खेला, किसने किसको पेला, ये बिगाड़ देंगे भाजपा-कांग्रेस दोनों का ही खेल…

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अगले दो-तीन महीनों में पांच राज्यों की विधानसभा के चुनाव प्रस्तावित हैं। इनमें से हिंदी पट्टी के तीन राज्यों राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं। इस बीच आ रहे अलग-अलग सर्वे में कहीं भारतीय जनता पार्टी, कहीं कांग्रेस तो कहीं किसी को भी स्पष्ट बहुमत मिलता दिखाई नहीं दे रहा है।  इनमें से दो छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस की सरकार है, जबकि मध्य प्रदेश में भाजपा की शिवराज सिंह चौहान की सरकार है। ये चुनाव 2024 लोकसभा का सेमीफाइनल की तरह होगा और इनके नतीजे 24 के लोकसभा पर बड़ा असर डालेंगे,, इन तीनों ही राज्यों में भाजपा और कांग्रेस  दोनों दल बड़े खिलाड़ी हैं लेकिन तीनों राज्यों में 9 ऐसे छोटे दल हैं जो दोनों ही बड़ी पार्टियों का खेल बिगाड़ने को आतुर हैं। सियासी जानकारों का मानना है कि अगर दोनों ही बड़ी राजनीतिक पार्टियों ने छोटे दलों को नहीं साधा तो उन्हें नुकसान उठाना पड़ सकता है।2024 लोकसभा  से पहले जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव हैं, मोदी सरकार के लिए ये सबसे अहम चुनाव साबित होंगें,तीसरी बार सत्ता तक पहुंचने के लिए भाजपा को इन चुनावों में जीत बेहद जरूरी है,इनमे सबसे अधिक सीट वाले मध्य प्रदेश और राजस्थान के चुनावी नतीजे कई हद तक 2024 की दिशा तय करेंगे,इन राज्यों में जीत दर्ज करने वाली पार्टी एक बड़े मनोबल से 24 के रण में उतरेगी,भाजपा अगर यहां जीत दर्ज करने में कामयाब होती है तो पुरे देश में उनका माहौल बनेगा,और अगर कांग्रेस इसमें कामयाब हुई तो न केवल गटबंधन में कांग्रेस का पक्ष सबसे मजबूत होगा बल्कि पुरे देश में कांग्रेस एक नए उत्त्साह से चुनाव लड़ेगी और ये विपक्षी खेमें में भी जोश भरेगी,, लेकिन मध्य प्रदेश,राजस्थान,छतीशगढ में कुछ छोटे ऐसे दल भी हैं जो इन दोनों पार्टियों में किसी की भी पार्टी का गणित बिगाड़ सकते हैं,इन राज्यों का समीकरण हम आपको सिलसिलेवार तरिके बताते हैं।

123 सीटों पर होने वाला है खेल-

पहले बात मध्य प्रदेश की जहां लोकसभा की 29 सीट हैं,,जहां से 2019 में मोदी सरकार 28 सीट जितने में कामयाब रही थी,लेकिन विधानसभा में कांग्रेस ने उसको नजदीकी मुकाबले में हरा दिया और राज्य की सत्ता पाने में कामयाबी हासिल की,हलाकि कुछ समय बाद ज्योतिराज सिंधिया कुछ विधयकों को लेकर भाजपा में शामिल हो गए और कांग्रेस की कमलनाथ सरकार अल्पमत के कारण गिर गयी,और शिवराज फिर मुख़्यमंत्री बन गए,लेकिन इस बार कांग्रेस मध्य प्रदेश में भाजपा को फिर कड़ी चुनौती देती दिखाई दे रही है और एक बार फिर भाजपा कांग्रेस में यहां कांटे का मुकाबला देखने को मिल सकता है,लेकिन इस बार छोटे दल और निर्दलीय यहां किसी भी पार्टी का समीकरण बिगाड़ने को तैयार है,ये भी सम्भव है कि चुनाव नतीजों के बाद ये किंग मेकर की भूमिका निभा सकते हैं, मध्य प्रदेश में विधानसभा की कुल 230 सीटें हैं। इनमें से 47 अनुसूचित जनजाति और 35 अनुसूचित जाते के लिए आरक्षित हैं। इन सीटों के अलावा 41 और सामान्य सीटें हैं, जहां SC/ST वोटर हार-जीत तय करते हैं। यानी कुल 123 सीटों पर तगड़ा खेल होने वाला है क्योंकि इन सीटों पर तीन छोटे दलों की मौजूदगी और अच्छी पकड़  मानी जाती है। उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे बुंदेलखंड क्षेत्र में मायावती की पार्टी बहुजन समाज पार्टी एक प्रमुख सियासी खिलाड़ी है। ग्वालियर चंबल क्षेत्र में दलित (SC) मतदाताओं पर बसपा का अच्छा प्रभाव माना जाता है।

इसी तरह महाकोशल क्षेत्र की कई सीटों पर गोंडवाना गणतंत्र पार्टी (जीजीपी) की मजबूत पकड़ मानी जाती है। पांच साल पहले यानी 2018 के चुनावों में जीजीपी ने अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन बनाकर कुल 125 सीटों पर चुनाव लड़ा था लेकिन उस गठबंधन को सिर्फ एक सीट ही मिली थी। इन दोनों के अलावा हीरालाल अलावा के नेतृत्व  वाले जय आदिवासी युवा शक्ति (JAYS) इस साल मई में मध्य प्रदेश में एसटी के लिए आरक्षित 47 सीटों सहित कुल 80 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की थी। पिछली बार उन्होंने कांग्रेस के साथ समझौता किया था और उसी की टिकट पर हीरालाल विधायक चुने गए थे। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि इन छोटे दलों की खींचतान की वजह से भाजपा या कांग्रेस किसी को भीनुकसान  हो सकता है।  इन छोटे दलों का वोट प्रतिशत लोकसभा चुनाव में  देखें तो एक बड़ा अंतर् दिखाई देता है लेकिन वही मत प्रतिशत विधानसभा चुनावों के नतीजों पर  बड़ा असर डालता दिखाई देता है और किसी भी सीट पर जितने वाले प्रत्याशी का समीकरण खराब कर सकता है।

 

छत्तीसगढ़ में दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था की तुलना-

बात छत्तीसगढ़ की करें तो यहां भी कई दल दोनों राष्टीय दलों का गेम बिगाड़ने के लिए तैयार हैं,, छत्तीसगढ़ में भी मुख्य लड़ाई आदिवासी वोट बैंक और सीटों की है। राज्य की 90 सीटों में से 29 सीटें एसटी कैटगरी के लिए आरक्षित हैं, जबकि अन्य 20 सीटें पर आदिवासी मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जेसीसी) ने 2018 का विधानसभा चुनाव बसपा के साथ गठबंधन में लड़ा था और कुल 11% वोट परसेंट के साथ सात सीटें जीतीं थी। इस बीच, अनुभवी आदिवासी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम द्वारा स्थापित पार्टी (हमर राज) तेजी से अपने विस्तार कर रहा है। नेताम बस्तर क्षेत्र से आते हैं। वह बसपा और सीपीआई (एम) के साथ गठबंधन कर 50 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की योजना बना रहे हैं। बसपा का राज्य भर में दलित वोटों के एक वर्ग पर खासा प्रभाव माना  जाता है। ये भी यहां भाजपा और कांग्रेस किसी भी पार्टी का गणित बिगाड़ सकते हैं ।

लेकिन इस बार राष्ट्रिय पार्टी का दर्जा मिलने के बाद केजरीवाल की पार्टी आप भी यहां अपना दम दिखाने जा रही है, जो कांग्रेस और बीजेपी का समीकरण बिगाड़ सकती है ,छत्तीसगढ़ में आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने 9 गारंटी दी। उन्होंने इस दौरान दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था से छत्तीसगढ़ की शिक्षा की तुलना की। आप नेता व दिल्ली के सीएम ने अपने सहयोगी कांग्रेस पार्टी की सरकार को निशाने पर लिया।अरविंद केजरीवाल और पंजाब के सीएम भगवंत मान ने शुक्रवार का छत्तीसगढ़ में आम आदमी पार्टी की सरकार बनाने की अपील की।दरअसल, कांग्रेस की छत्तीसगढ़ सरकार पर केजरीवाल ने ऐसे वक्त में ये टिप्पणी की हैस जब दोनों पार्टियों के बीच अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में दिल्ली में कौन कितनी सीटों पर चुनाव लड़ेगा इसको लेकर बहस छिड़ी हैं। केजरीवाल के यहां चुनाव लड़ने का असर कांग्रेस पर ज्यादा पड़ने के आसार लग रहे हैं,अगर आप यहां थोड़े वोट काटने में कामयाब हुई तो किसी भी पार्टी का समीकरण बिगड़ सकता है।

 

छोटे दलों को मिल सकता है फायदा-

राजस्थान में भी तीन छोटे दल सत्ताधारी कांग्रेस और मुख्य विपक्षी भाजपा के लिए चुनौती बने हुए हैं। इनमें राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (आरएलपी) की स्थापना पूर्व भाजपा नेता और नागौर से सांसद हनुमान बेनीवाल ने की है। वह तीन कृषि कानूनों का विरोध करते हुए एनडीए से बाहर हो गए थे। उनका जाटों के बीच प्रभाव है। इसके अलावा, जयंत चौधरी के नेतृत्व वाली आरएलडी भी एक सियासी खिलाड़ी है जिसने पिछली बार एक विधानसभा सीट जीती थी। आरएलडी का यूपी से सटी सीमा खासकर भरतपुर, धौलपुर और अलवर के इलाकों में जाट वोटरों पर अच्छी पकड़ मानी जाती है। इनके अलावा मायावती की बसपा भी राजस्थान में दोनों बड़े दलों के लिए सियासी शत्रु है। 2018 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने कुल चार फीसदी वोट बैंक पर कब्जा जमाते हुए छह सीटें जीती थीं। हालांकि बाद में बसपा के विधायक कांग्रेस में शामिल हो गए थे।ये छोटे दल हलाकि ज्यादा सीट तो नहीं जीत पाती है लेकिन ये कई सीट पर इतना प्रभाव रखती है कि इनको मिलने वाला वोट प्रतिशत किसी भी दल के प्रत्याशी की जीत को हार में बदल सकता है,,,जिस तरह से भाजपा और कांग्रेस में यहां अंदरूनी जंग छिड़ी है उसका थोड़ा फायदा भी छोटे दलों को मिल सकता है।

 

2024 की राह कितनी आसान-

राजस्थान में जातिगत समीकरणों का भी बड़ा असर रहता है,चुनाव नजदीक आने के साथ जातीय गणित को लेकर भी पार्टियां मंथन में जुटी है। लेकिन राजस्थान की बात करें तो यहां वर्षों से जातिगत समीकरण कई पार्टियों के लिए चौंकाने वाले रहे हैं। पूर्वी बेल्ट राजस्थान का महत्वपूर्ण क्षेत्र है जो मीणा और गुर्जर वोटों के प्रभुत्व के लिए जाना जाता है, जबकि शेखावाटी और मारवाड़ बेल्ट महत्वपूर्ण जाट वोटों के लिए जाना जाता है। मीणाओं ने 2018 में अपने समुदाय के सबसे बड़े नेता किरोड़ी लाल मीणा को खारिज कर सबको चौंका दिया था। जाटों में हनुमान बेनीवाल ने रिकॉर्ड अंतर से जीत हासिल की, क्योंकि उन्होंने खुद को जाट नेता के रूप में प्रचारित किया। ऐसे उदाहरणों से समझा जा सकता है कि राजस्थान में पार्टियों के लिए जातीय समीकरणों का अनुमान लगाना कितना कठिन है।

इन राज्यों में सत्ता किसके पास जाएगी यह अभी स्‍पष्‍ट नहीं है लेकिन अलग-अलग सर्वे में कहीं भारतीय जनता पार्टी, कहीं कांग्रेस तो कहीं किसी भी दल को भी स्पष्ट बहुमत मिलता दिखाई नहीं दे रहा है।ऐसे में ये छोटे दल किंग मेकर की भूमिका में आ सकते हैं,जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव की घोषणा की गई है, उनमें राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, मिजोरम और तेलंगाना शामिल हैं. राजस्थान, मध्य प्रदेश, मिजोरम और तेलंगाना में एक चरण में चुनाव होंगे, जबकि छत्तीसगढ़ में दो चरणों में चुनाव होंगे. सभी राज्यों के विधानसभा चुनाव के लिए 11 दिसंबर को मतगणना होगी और इसी दिन नतीजे आएंगे ,इसी दिन साफ़ हो जायेगा कि 2024 की राह किसकी आसान होगी और किसकी मुश्किलों में इजाफा होगा।

INDIA गठबंधन में जाने को तैयार मोदी के सहयोगी दल…

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2024 के लिए राजनीतिक मैदान सज रहा है NDA VS INDIA में कौन बाजी मारेगा,अभी ये कहना मुश्किल है,लेकिन जिस तरह सत्ताधारी पार्टी भाजपा ने 38 दल अपने साथ जोड़े है उसको देख भले वो आज खुश दिखाई दें लेकिन अंदर ही अंदर एक सबसे बड़ी चिंता उनको 24 तक साथ रखने की भी है,इतने दलों को साथ लाने का मतलब ये तो साफ़ है कि भाजपा 2024 में एकतरफा मुकाबला मानकर तो नहीं चल रही है,, क्योकि जिस तरह इंडिया गठबंधन खेमे में महाजुटान हुआ है उससे कहीं न कहीं मोदी सरकार चिंतित प्रतीत होती है,और यही कारण है कि भाजपा लगातार अपने साथी कुनबे को बढ़ाने में लगी है,लेकिन इतने दलों को साथ रख पाने के लिए भाजपा को कई समझौते भी करने पड़ेंगे,मगर,,, क्या प्रचंड बहुमत की मोदी सरकार ऐसा कर पायेगी ? आज के वीडियो में बात भाजपा की आने वाले दिनों की उस सबसे बड़ी चिंता की और उन दलों की जो मोदी के साथ हैं,, साथ ही विपक्षी खेमें में कांग्रेस की परेशानी और विपक्षी एकता की बात भी… विस्तार से समझने के लिए इस वीडियो को अंत तक देखिए…अगर सर चक्कराना जाए तो कहना.

PM के नेतृत्व में 38 दल- 

एनडीए आज अपनी बढ़ी हुई ताकत दिखा रहा है. गौर कीजिए जहां अटल बिहारी वाजपेयी के समय एनडीए में 24 दल हुआ करते थे, वहीं आज नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए में 38 दल शामिल हुए हैं. आने वाले समय में यह संख्या और बढ़ सकती है, लेकिन लोकसभा चुनाव 2024 में बीजेपी के लिए इन सहयोगी दलों में सीटों का बंटवारा करना इतना आसान भी नहीं होगा. खासतौर से बिहार और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में.. जहां पर यूपी को छोड़ दें तो सीटों की संख्या अधिक है.

 
 
सबसे पहले बात बिहार की- 

 

सबसे पहले बात बिहार की जहां से विपक्षी गठबंधन इंडिया की शुरुआत हुई,,, 2019 में बीजेपी ने जेडीयू और लोक जनशक्ति पार्टी के साथ मिल कर चुनाव लड़ा था. समझौते के तहत बीजेपी और जेडीयू ने 17-17 और लोक जनशक्ति पार्टी ने 6 सीटों पर चुनाव लड़ा. लोक जनशक्ति पार्टी को एक राज्य सभा सीट भी एनडीए की तरफ से दी गई थी, जिससे रामविलास पासवान संसद में पहुंचे थे. तब एनडीए ने राज्य की 40 में से 39 सीटों पर जीत हासिल की थी. इनमें बीजेपी ने 17, जेडीयू ने 16 और एलजेपी ने 6 सीटों पर जीत हासिल की थी. ऐसा माना जाता है कि बाद में जेडीयू के दबाव में लोक जनशक्ति पार्टी में विभाजन हुआ और चिराग पासवान अलग कर दिए गए. अब बीजेपी चाहती है कि पशुपति पारस और चिराग पासवान अपनी विभाजित पार्टियों का विलय कर दें, लेकिन पशुपति इसके लिए तैयार नहीं. उधर चिराग चाहते हैं कि 2019 के फार्मूले के तहत उनकी पार्टी को छह लोक सभा सीटें और एक राज्य सभा सीट दी जाए. इस विवाद को सुलझाना बीजेपी के लिए यकीनन बड़ी चुनौती होगी. उधर, उपेंद्र कुशवाहा और जीतन राम मांझी भी चाहेंगे कि उनकी पार्टियों को अधिक संख्या में लोकसभा सीटें दी जाएं, जबकि बीजेपी चाहेगी कि इस बार वह पिछली बार से अधिक संख्या पर सीटों पर चुनाव लड़े क्योंकि जेडीयू उसके साथ अब नहीं है.

 
 
 
BJP के ये बड़ी चुनौती- 
 

अब बात दूसरे राज्य महाराष्ट्र की,,जहां यूपी के बाद सबसे अधिक लोकसभा सीट है पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी, शिवसेना गठबंधन था. राज्य की 48 में से 25 पर बीजेपी ने और 23 पर शिवसेना ने चुनाव लड़ा था. बीजेपी ने 23 और शिवसेना ने 18 सीटों पर जीत हासिल की थी. अब शिवसेना के बीच विभाजन होने के बाद भाजपा के गुट में आए. एकनाथ शिंदे का गुट उन सभी 18 सीटों पर दावेदारी कर रहा है, जो 2019 में शिवसेना ने लड़ी थीं. इस बीच, एनसीपी में भी विभाजन हुआ. और अजीत पवार का गुट बीजेपी के साथ है. लिहाजा अजित पवार भी उम्मीद पाले हुए हैं की वो एनसीपी कोटे की सभी सीटों पर चुनाव लड़े…याद रहे की 2019 में एनसीपी ने चार सीटें जीती थीं. बीजेपी के सामने इन 48 सीटों के बंटवारे की भी चुनौती रहेगी.

 
अब बात यूपी की-
 

वो राज्य जिसने मोदी को देश की सत्ता सौंपने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई अब बात उस राज्य यूपी की करना बेहद जरुरी है क्योकि सत्ता की चाभी यूपी से ही होकर निकलती है… 2019 में बीजेपी ने अपना दल के साथ मिल कर लोक सभा चुनाव लड़ा था. तब अपना दल को दो सीटें दी गई थीं जो उसने जीत ली थी. इस बार ओमप्रकाश राजभर और निषाद पार्टी भी बीजेपी के साथ है. बीजेपी को सीट बंटवारे में भी उन्हें भी साथ रखना होगा. गाजीपुर लोक सभा सीट पर उपचुनाव में राजभर के बेटे खड़े हो सकते हैं. इसके अलावा जयंत चौधरी की राष्ट्रीय लोक दल से भी बीजेपी की बातचीत चल रही है. ऐसा राजनीतिक जानकारों का मानना भी है… भाजपा चाहती है कि आरएलडी का बीजेपी में विलय हो जाए जिसके लिए जयंत तैयार नहीं. अगर भविष्य में आरएलडी साथ आए तो बीजेपी को उसे भी सीटें देनी होगी…यानी बीजेपी के लिए उत्तर प्रदेश का सीटों को लेकर बंटवारा मुश्किल तो पैदा जरुर करेगा.

 
 
यहाँ से चुनाव लड़ सकते हैं पीएम मोदी-

 

 

तमिलनाडु में  बीजेपी और AIADMK के बीच 2024 चुनाव मिलकर लड़ने पर सहमति है. कुछ अन्य सहयोगी दल भी साथ लड़ेंगे. 2019 में भी इन दलों ने मिल कर चुनाव लड़ा था. राज्य की 39 लोकसभा सीटों में  AIADMK ने 20, PMK  ने 7, बीजेपी ने 5, DMDK ने 4, पीटी ने 1, तामिल मनीला कांग्रेस एक और PNK ने 1 सीट पर चुनाव लड़ा था.. इस बार कुछ नई पार्टियां भी साथ आईं हैं और बीजेपी तमिलनाडु पर खासतौर से ध्यान दे रही है. पीएम मोदी के भी यहां से लोकसभा चुनाव लड़ने की चर्चा है.. इसका इशारा कई बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषणों में भी दिखाई देता है,, जहां वो साउथ को दिल्ली के करीब और दिल्ली के दिल में बसे होने की बात करते हुए भी दिखाई देते हैं.. ऐसे में सीटों के बंटवारे पर सबकी नजरें रहेंगी.

 
हरियाणा में भी यही हाल-
 

हरियाणा में बीजेपी और दुष्यंत चौटाला की जननायक जनता पार्टी राज्य में मिल कर सरकार चला रहे हैं, लेकिन बीजेपी साफ कर चुकी है कि वह सभी दस लोक सभा सीटों पर अकेले ही चुनाव लड़ेगी और जेजीपी के साथ समझौता नहीं होगा. अटकल यह भी है कि लोक सभा चुनाव से पहले बीजेपी और जेजीपी का गठबंधन टूट जाए और दोनों पार्टियां अलग-अलग चुनाव लड़ें.

दोनों पार्टियों की  चुनाव लड़ने की संभावना-

झारखण्ड में भी बीजेपी ने 2019 में पहली बार आजसू के साथ लोक सभा चुनाव गठबंधन में लड़ा था. राज्य की 14 में से 11 सीटें बीजेपी और एक सीट आजसू ने जीती थी. इस बार भी दोनों पार्टियों के मिल कर चुनाव लड़ने की संभावना है. 2019 में असम में  बीजेपी ने एजीपी और बीपीएफ के साथ मिल कर चुनाव लड़ा था. बीजेपी ने राज्य की 14 में से 10 सीटों पर चुनाव लड़ा, जबकि एजीपी को 3 और बीपीएफ को एक सीट दी गई थी. तब बीजेपी ने 10 में से नौ सीटों पर जीत हासिल की थी, जबकि एजीपी और बीपीएफ कोई सीट नहीं जीत सके थे. बदली परिस्थितियों में बीजेपी अधिक सीटों पर लड़ना चाहेगी. अन्य राज्यों जैसे केरल और पूर्वोत्तर में सहयोगी दलों की जमीनी ताकत इतनी अधिक नहीं कि वे लोकसभा चुनाव में बीजेपी से मोल-भाव कर सकें. इसलिए बीजेपी को वहां अपनी शर्तों के हिसाब से चुनाव लड़ने में कोई भी परेशानी नहीं आएगी.
भाजपा को इन राज्यों में लग सकता है झटका-

कुल मिलाकर बीजेपी 38 दलों को साथ लेकर तो चल रही है,लेकिन इन सब के साथ टिकट बंटवारा कितना आसान होगा ये आने वाला समय बताएगा, राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर टिकट बंटवारे में सहयोगी दलों को भाजपा संतुष्ट नहीं कर पाई तो कई दल ऍन चुनाव के वक्त पर भाजपा का साथ छोड़ कर इंडिया गठबंधन या अकेले चुनाव मैदान में उतर सकते हैं.. जिससे भाजपा की कई राज्यों में न केवल मुश्किलें बढ़ेंगी बल्कि 2024 की जीत का सपना देख रही भाजपा को इन राज्यों में झटका भी लग सकता है,,
क्या ममता लेफ्ट के साथ चुनाव लड़ पाएंगी? 

ऐसा नहीं है कि ऐसी परेशानी विपक्षी दलों की एकता में नहीं हो सकती है,, आज की कांग्रेस इस स्थिति में नहीं है कि ज्यादा मोल भाव कर सकती है. हालांकि कर्नाटक और हिमाचल जीत से कांग्रेस का दावा गठबंधन में मजबूत जरूर हुआ है. लेकिन कई राज्यों में कांग्रेस की सीटों को लेकर सहयोगी दलों के साथ कॉम्प्रोमाईज़ करना पड़ेगा,जैसे बंगाल,बिहार,महाराष्ट्र,और यूपी. ऐसे में परेशानी विपक्षी खेमे में भी आ सकती है. पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को TMC प्रमुख और ममता बनर्जी को सबसे ज्यादा सीट देनी पड़ेगी, साथ ही लेफ्ट भी गठबंधन का साथी है तो उनकी बात भी रखनी पड़ेगी,यहां कांग्रेस की स्थिति ये नहीं है कि वो इनसे मोल भाव कर सके खासतौर पर ममता से,, एक सवाल और भी खड़ा होता है,,, क्या ममता लेफ्ट के साथ चुनाव लड़ पाएंगी ? ऐसी ही स्थिति बिहार में भी देखने को मिल सकती है,जहां एक तरफ नीतीश कुमार होंगे और दूसरी तरफ तेजस्वी यादव,,यहां भी कांग्रेस को समझौता करना पड़ेगा,, दिल्ली में भी आम आदमी पार्टी सत्ता में होने के कारण सबसे अधिक सीटों पर चुनाव लड़ना चाहेगी,, ऐसा ही कांग्रेस के साथ महाराष्ट्र में भी परेशानी सामने आएगी,जहां उद्धव  और शरद पवार जैसे नेता गठबंधन के साथी हैं, ऐसे में कांग्रेस कितनी जगह कितना समझौता करेगी INDIA गठबंधन की एकता इस पर काफी हद तक निर्भर करेगी.


ऐसे हालात कई राज्यों में-
कुल मिलाकर कमोबेश ऐसे हालात कई राज्यों में भाजपा और कांग्रेस जैसे मुख्य दलों के सामने आने वाले हैं. बहरहाल पक्ष और विपक्ष की एकता मुख्य रूप से टिकट बंटवारे पर निर्भर करेगी, और यहीं से 2024 की दिशा भी तय होगी, जो भी इस फॉर्मूले को सही ढंग से साध लेगा उसको 2024 में निश्चित रूप से फायदा मिलेगा? यानी सत्ता पर काबिज होने का मौका मिलेगा.

मोदी सरकार की घोटालों की लिस्ट बाहर, गोदी मीडिया में पसरा सन्नाटा…

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देश की मुख्यधारा की मीडिया ने मोदी सरकार के इन 10 सालों में जो भूमिका निभाई, वो कहीं न कहीं बदली हुई नजर आती  है, जिस तरह से मीडिया ने UPA के दौर में गलत फैसलों और घोटालों को लेकर मनमोहन सरकार  की खूब आलोचना की थी , फिर चाहे वो अखबारों के पन्ने से रंगे घोटालों की आवाज़ हों या फिर टीवी डिबेटों से कटघरे में खड़ा करते पत्रकार हों. मनमोहन सरकार को कटघरे में खड़ा करने का एक भी मौका मीडिया ने चूका नहीं, लेकिन अब मोदी सरकार में इसी मेन स्ट्रीम  मीडिया ने अपना पुराना रुख बदल दिया है, अब मोदी सरकार के गलत कार्यों की आलोचना करने के बजाय ये मीडिया समूह कई बार सरकार का बचाव करते दिखाई देते हैं, यही कारण है कि मोदी सरकार में मीडिया की भूमिका पर सबसे ज्यादा सवाल उठते हैं और कई लोग अब इसी मीडिया को गोदी मीडिया भी कहते हैं। उस मीडिया को .जिसको कभी खोजी मीडिया का नाम देश की जनता जनार्दन दिया करती थी।

जब मनमोहन सिंह की सरकार थी-


UPA  की सरकार के दौरान  आयी C. A.G यानी कैग की रिपोर्ट के आधार पर उस समय की मनमोहन सरकार पर कई बड़े-बड़े घोटालों के आरोप लगे,कोयला घोटाला, 2G घोटाला और साथ ही कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला जैसे बड़े घोटाले सामने आने के बाद मनमोहन सरकार की पुरे देश में में खूब आलोचना हुई, उस समय विपक्ष में बैठी भाजपा ने  सरकार को हर जगह घेरना शुरू कर दिया था,कैग की रिपोर्ट का ही असर था कि ये घोटाले सामने आये और इसका एक बड़ा असर देश में ये पड़ा कि 2014 में UPA सरकार की विदाई हो गयी और प्रचंड बहुमत से भाजपा की नरेंद्र मोदी की सरकार सत्ता में आ गई। 


क्या है 
CAG रिपोर्ट-

वक्त बदला ,हालात बदले और एक बार फिर  कैग की रिपोर्ट  सामने आई है. मगर अब UPA नहीं बल्कि NDA की मोदी सरकार का युग है. और मोदी सरकार के घिरने पर भी हर तरफ निल बटा सन्नाटा है. कैग की रिपोर्ट में दो बड़ी गड़बड़ियां सामने आयी हैं,, दिल्ली में बनाए जा रहे द्वारका एक्सप्रेसवे पर CAG की रिपोर्ट ने कई अहम सवाल उठाए हैं. CAG रिपोर्ट में कहा गया है कि इस सड़क की लागत कई गुना ज्यादा है. रिपोर्ट के मुताबिक, जो लागत प्रति किलोमीटर 18 करोड़ रुपये होनी थी, वहीं पर 250 करोड़ रुपये तक खर्च हुए हैं. सीएजी की ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया है कि कैबिनेट ने इस सड़क के लिए प्रति किलोमीटर का बजट 18.20 करोड़ रुपये प्रस्तावित किया था लेकिन इसके लिए प्रति किलोमीटर 251 करोड़ रुपये का बजट पास किया गया. अब इस लागत में इतना ज्यादा अंतर आने पर सवाल खड़े हो रहे है। 

 

दिल्ली-वडोदरा एक्सप्रेसवे पर भी सवाल खड़े-

भारतमाला परियोजना-1 के तहत बनाया जा रहा यह द्वारका-एक्सप्रेसवे दिल्ली और गुरुग्राम में आता है. दिल्ली को गुरुग्राम से जोड़ने वाली ये सड़क 29 किलोमीटर लंबी है. यह सड़क दिल्ली के महिपालपुर में शिव मूर्ति के पास से शुरू होती है और गुरुग्राम में खेरकी टोल प्लाजा तक जाती है . यह एक्सप्रेसवे 14 लेन का बनाया जा रहा है. अब इसकी लागत को लेकर हंगामा खड़ा हो गया है और विपक्षी नेताओं ने भी इस पर सवाल पूछने शुरू कर दिए हैं। 

CAG ने द्वारका एक्सप्रेसवे के इस प्रोजेक्ट की 2017 से 2021 तक की रिपोर्ट का ऑडिट किया है. द्वारका एक्सप्रेसवे  के साथ-साथ दिल्ली-वडोदरा एक्सप्रेसवे पर भी सवाल खड़े हुए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, यह पूरा प्रोजेक्ट CCEA की ओर से अप्रूव्ड प्रोजेक्ट की लिस्ट में ही.. नहीं था  और  और उस  पर भी NHAI ने अपने स्तर पर 33 हजार करोड़ रुपये खर्च कर लिए. CAG की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतमाला परियोजना-1 के तहत लगभग 76,999 किलोमीटर की सड़कें बनाई जा रही है. इसमें से 70,950 किलोमीटर सड़क NHAI बना रहा है. NHAI के कई फैसलों पर अब सवाल उठ रहे हैं. ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक, NHAI ने CCEA की ओर से तय की गई नियमावली का भी सही से पालन नहीं किया. 50 में से 35 प्रोजेक्ट ऐसे हैं जहां टेंडर से जुड़ी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया है।

CAG रिपोर्ट में एक और बड़ा खुलासा-


कैग की रिपोर्ट में एक और बड़ा और हैरान करने वाला खुलासा हुआ है,आयुष्मान भारत योजना  को लेकर..
भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) की एक और चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है. जिसमें बताया गया है कि आयुष्मान भारत योजना के तहत 6.9 करोड़ रूपये उन लोगों के इलाज पर खर्च किये गए जो इस दुनिया में ही नहीं हैं,मतलब पहले ही मर चुके लोगों के नाम पर ये खर्च किया गया, आयुष्मान भारत- प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना  को साल 2018 में शुरू किया गया था. इसका मकसद गरीबों को मुफ्त इलाज देना था, जिसे ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में शुरू किया गया. इस रिपोर्ट के मुताबिक कुल 3,446 ऐसे मरीजों के इलाज पर कुल 6.97 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया, जो पहले ही मर चुके थे. डेटाबेस में इन सभी मरीजों को मृत दिखाया गया है. ये पहला मौका नहीं है जब आयुष्मान भारत योजना को लेकर ऐसी रिपोर्ट सामने आई हो, इससे पहले भी सीएजी की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि करीब 7.5 लाख से ज्यादा लोगों को एक ही मोबाइल नंबर पर रजिस्टर कर दिया गया और जिस पर रजिस्ट्रेशन हुआ वो नंबर भी अमान्य था। 

 
 
क्या कहती है इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट- 


इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक केरल में ऐसे मरीजों की संख्या सबसे ज्यादा थी. यहां कुल 966 ऐसे मरीज पाए गए, जिन्हें मृत घोषित करने के बावजूद उनका इलाज जारी था. इनके इलाज पर  करोडों रुपये का भुगतान अस्पतालों को किया गया. इसके बाद मध्य प्रदेश में 403 और छत्तीसगढ़ में 365 ऐसे मरीज मिले. जिनके इलाज पर लाखों रुपये खर्च हुए. फिलहाल योजना के तहत जो गाइडलाइन बनाई गई हैं, उनके मुताबिक अगर किसी मरीज की अस्पताल में भर्ती होने और डिस्चार्ज होने के बीच मौत हो जाती है तो ऑडिट के बाद अस्पताल को इसका भुगतान किया जाता है।

 
स्वदेश दर्शन योजना पर भी उठे सवाल- 

अयोध्या विकास को लेकर बनाए जा रहे स्वदेश दर्शन योजना पर भी कैग ने सवाल उठाया है. कैग के मुताबिक इस परियोजना में ठेकेदारों को 19.73 करोड़ रुपये का अनुचित लाभ दिया गया है. इस मामले का खुलासा होने के बाद से सियासी गलियारों में हंगामा मचा है. इस बीच दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा है कि मोदी सरकार ने भ्रष्टाचार के 75 वर्ष के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए।वरिष्ट नेता  जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री से पूरे मामले में चुप्पी तोड़ने के लिए कहा है. यह पहली बार नहीं है, जब कैग की रिपोर्ट ने सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. पूर्व में कैग रिपोर्ट की वजह से मुख्यमंत्री और मंत्रियों की कुर्सी तक जा चुकी है. इतना ही नहीं, कैग की रिपोर्ट से बने भ्रष्टाचार के माहौल में UPA की पूरी मनमोहन सरकार ही चली गई थी

CAG रिपोर्ट में कई और खुलासे-


आपको बताते चलें कि संविधान में सरकारी खर्च की पड़ताल के लिए एक सरकारी एजेंसी बनाने का प्रावधान है. अनुच्छेद 148 के मुताबिक इस एजेंसी के प्रमुख की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, इसके  प्रमुख को उसी तरह से हटाया  जा सकता है, जिस तरह सुप्रीम कोर्ट के एक जज को संविधान के अनुच्छेद 149, 150 और 151 में कैग के कामकाज और शक्तियों के बारे में जिक्र किया गया है जिसको चाहें तो विस्तार से वहां पर भी पढ़ा जा सकता  है. कैग का काम सभी सरकारी संस्थाओं का ऑडिट करना और उसकी रिपोर्ट संसद या विधानसभा के पटल पर रखना होता है. वर्तमान में कैग 2 तरह से ऑडिट करता है. पहला-रेग्युलेरिटी ऑडिट और दूसरा -परफॉर्मेंस ऑडिट.रेग्युलेरिटी ऑडिट को कम्पलायंस ऑडिट भी कहते हैं. इसमें सभी सरकारी दफ्तरों के वित्तीय ब्यौरे का विश्लेषण किया जाता है. विश्लेषण में मुख्यत: यह देखा जाता है कि सभी नियम-कानून का पालन किया गया है या नहीं? 2जी स्पैक्ट्रम की नीलामी का मामला रेग्युलेरिटी ऑडिट की वजह से ही उठा था. इसी तरह परफॉर्मेंस ऑडिट में कैग के द्वारा यह पता लगाया जाता है कि क्या सरकारी योजना शुरू करने का जो मकसद था, उसे कम खर्च पर सही तरीके से किया गया है या नहीं? इस दौरान योजनाओं का बिंदुवार विश्लेषण किया जाता है।

कैग रिपोर्ट से देश में क्या पड़ा-

सितंबर 2001 में कैग ने गुजरात को लेकर एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी. रिपोर्ट में कहा गया कि गुजरात के तत्कालीन  मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल बिना वजह 2 बार विदेश यात्रा पर गए. इस दौरान वो अपने 2 करीबी अधिकारियों को भी साथ ले गए, जो वहां मनोरंजन के नाम पर लाखों खर्च कर आए. कैग ने मुख्यमंत्री के 2 करीबी अधिकारियों को सरकारी मद से खर्च रुपयों का भुगतान करने के लिए भी कहा.
रिपोर्ट आने के बाद गुजरात की सरकार हरकत में आ गई. केशुभाई पटेल की मीडिया टीम ने कैग के खिलाफ ही एक विज्ञापन निकलवा दिया. इसमें कहा गया कि मुख्यमंत्री निवेश लाने गए थे मगर कैग ने लोगों को गुमराह किया है। 


इस बीच कैग और सरकार की लड़ाई में विपक्ष भी कूद गया. केंद्र में अटल बिहारी वाजपेई की सरकार थी. राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री रहे छविदास मेहता ने प्रधानमंत्री को पत्र लिख पूरे मामले में एक्शन लेने के लिए कहा. गुजरात में इस प्रकरण के एक साल बाद ही विधानसभा का चुनाव प्रस्तावित था. चिंतित बीजेपी ने आनन-फानन में गुजरात के नेताओं की बैठक बुलाई. इसी बैठक में केशुभाई पटेल के हटाने पर सबके बीच सहमति बनी। 


6 अक्टूबर 2001 को केशुभाई पटेल को अपना इस्तीफा देना पड़ा था  और फिर पटेल की जगह पर नरेंद्र मोदी को विधायक दल का नेता चुना गया. यानी गुजरात प्रदेश का मुख्यमंत्री


जब रामविलास पासवान पहली बार केंद्रीय मंत्री बनाए गए-


1989 में वीपी सिंह की सरकार में रामविलास पासवान पहली बार केंद्रीय मंत्री बनाए गए. मंत्री के रूप में उन्हें 12 जनपथ का बंगला दिया गया. 1991 में कैग की रिपोर्ट ने राम विलास पासवान के बंगले को लेकर एक रिपोर्ट जारी कर दी. रिपोर्ट के मुताबिक पासवान ने घर सजवाने के लिए तय रकम से ज्यादा रुपए खर्च कर दिए. रिपोर्ट में कहा गया कि पासवान को जब बंगला मिला तो EPFO ने अपने मद से साज-सज्जा के लिए लाखों रुपए खर्च कर दिए. EPFO की ओर से डबल बेड के लिए 10,945 रुपए, रंगीन टीवी के लिए 13,500 रुपए, पर्दे के लिए 52,300 रुपए दिए गए, जो गलत निर्णय था. कैग रिपोर्ट पर हंगामा मच गया और विपक्ष ने ईमानदार राजनीति की बात करने वाले पूर्व पीएम वीपी सिंह को निशाने पर ले लिया. जानकारों का कहना है कि रामविलास पासवान के मामले में सिंह बैकफुट पर आ गए, क्योंकि पासवान उनके काफी करीबी थे. 1991 में वीपी सिंह की पार्टी को चुनाव में करारी हार मिली. सिंह ने इसके बाद 10 साल तक कोई भी पद नहीं लेने का अघोषित वादा कर लिया।

2014 के चुनाव में क्यों हारी थी मनमोहन सरकार-


2010 में कैग ने एक रिपोर्ट जारी की, जिसने तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी. कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि 2G स्पैक्ट्रम के आवंटन में धांधली की गई है. यह आवंटन साल 2008 में किया गया था.  कैग के मुताबिक 2G आवंटन में धांधली की वजह से सरकार को 1.76 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ.  उस वक्त दूरसंचार विभाग डीएमके के सांसद ए. राजा के पास था. कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि ए. राजा ने स्पैक्ट्रम आवंटन में प्रधानमंत्री कार्यालय, वित्त मंत्री कार्यालय की सलाहों को नजरअंदाज कर दिया था . मामला सामने आने के बाद बीजेपी ने संसद में मनमोहन सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. आनन-फानन में मनमोहन सिंह ने सीबीआई से जांच कराने की बात कही. सीबीआई ने शुरुआती जांच के बाद ए.राजा को गिरफ्तार कर लिया, जिसके बाद उन्हें कैबिनेट से भी हटा दिया गया. हालांकि, बाद में सीबीआई मामले को साबित नहीं कर पाई और कोर्ट से ए.राजा को क्लीन चिट मिल गई.2-जी स्पैक्ट्रम के बाद कैग ने कोल आवंटन पर भी सवाल उठा दिया. लगातार घपले-घोटाले सामने आने के बाद सरकार बैकफुट पर चली गई.  इसी बीच अन्ना हजारे के नेतृत्व में लोकपाल बनाने की मांग शुरू हो गई . इसने भी कांग्रेस सरकार को काफी डेमेज किया, दूसरी तरफ सीएजी रिपोर्ट के बाद बीजेपी अटैकिंग मोड में और कांग्रेस डिफेंसिव मोड में चली गई, जिसका असर 2014 के चुनाव पर हुआ और मनमोहन सरकार बुरी तरह हार गई। 


अब मोदी सरकार भी कटघरे में-

ये तमाम चीजें हैं जो मनमोहन सरकार की तरह मोदी सरकार को भी कटघरे में खड़ा करती हैं, लेकिन मेन स्ट्रीम मीडिया ने इस पर एक हल्की सी रिपोर्ट दिखाकर और चार लाइनों की खबर लिख कर इस मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया,यही कारण है कि मीडिया की भूमिका को लेकर सवाल खड़े होते हैं, सरकार का पक्ष लेने और सरकार से सवाल न पूछने के कारण अब ऐसे मीडिया समूह को कई जगहों पर बायकॉट किया  जाता है, और उसके उलट सोशल मीडिया और यू ट्यूब के जरिये कई स्वतंत्र पत्रकार लगातार सरकार से सवाल कर रहे हैं जिससे उनकी एक अलग पहचान भी बन रही है। 

 

नरेंद्र मोदी का गिरता और योगी आदित्यनाथ का बढ़ता ग्राफ…

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भारतीय जनता पार्टी को साल 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बहुमत मिला. करीब 15 साल बाद बीजेपी ने सत्ता में वापसी की थी.. सरकार का मुखिया कौन होगा यानी मुख्यमंत्री कौन बनेगा,, इस सवाल के जवाब में कई नाम सामने थे. लेकिन, फ़ाइनल मुहर लगी योगी आदित्यनाथ के नाम पर.. बहुत से लोगों के लिए ये फैसला एक ‘सरप्राइज़’ था. योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री पद की रेस कैसे जीती,, ये सवाल आज तक पूछा जाता है,,,  तब बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे अमित शाह ने भी कुछ साल पहले इसका ज़िक्र किया था, अमित शाह ने तब कहा था कि “जब योगी जी को मुख्यमंत्री बनाया तो किसी ने कल्पना नहीं की थी कि योगी जी मुख्यमंत्री बनेंगे. कई सारे लोगों के फोन आए कि योगी जी ने कभी म्युनिसिपलिटी भी नहीं चलाई. वास्तविकता भी यही थी. कि नहीं चलाई थी. योगी जी कभी किसी सरकार में मंत्री तक नहीं रहे.” अमित शाह के मुताबिक उस वक्त उनसे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कुछ अलग सलाह दी गई थी, “योगी जी संन्यासी हैं, पीठाधीश हैं और इतने बड़े प्रदेश का आप उनको मुख्यमंत्री बना रहे हो.

क्या कहती हैं राधिका रामाशेषन- 

7 साल बाद स्थिति पूरी तरह बदल गई है. अब योगी आदित्यनाथ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उत्तराधिकारी तलाशने वालों की संख्या बढ़ती नज़र आ रही है,, ऐसे लोगों में सिर्फ़ योगी आदित्यनाथ के उत्साही समर्थक नहीं हैं. बीजेपी के कई कार्यकर्ता और राजनीतिक विश्लेषक भी दावा करते हैं कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का कद पार्टी में अपने समकालीन नेताओं से काफी ऊंचा हो गया है… भारतीय जनता पार्टी की राजनीति पर वर्षों से करीबी नज़र रखने वाली वरिष्ठ पत्रकार राधिका रामा शेषन कहती हैं, “दिल्ली में अक्सर हमें दोनों का पोस्टर देखने को मिलता है, मोदी और योगी. योगी जी का स्टेटस  पार्टी में दूसरे नंबर का हो गया है. उन्होंने सबको पीछे छोड़ दिया है.

सवाल ये भी-


ऐसे में ये भी सवाल उठता है कि क्या योगी आदित्यनाथ को अब नरेंद्र मोदी की ज़रूरत नहीं है? इस सवाल का जवाब कई बातों से भी मिलता दिखाई देता है, योगी आदित्यनाथ का  असर ज़मीन पर भी दिखता है. मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के पहले योगी आदित्यनाथ पांच बार लोकसभा के सांसद चुने जा चुके थे लेकिन कई विश्लेषक ये भी मानते हैं कि तब उनका प्रभाव क्षेत्र सीमित था… मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ के कामकाज ने जिस यूपी मॉडल को खड़ा किया, उसकी चर्चा अब उसी तरह होती है जैसे साल 2014 के पहले बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्री और पार्टी के कार्यकर्ता नरेंद्र मोदी के गुजरात मॉडल का ज़िक्र करते थे.. योगी आदित्यनाथ ने अपना काफी प्रभाव छोड़ा है. मध्य प्रदेश और कर्नाटक में जब बीजेपी की सरकार थी तब वहां के नेता भी यूपी मॉडल का काफी ज़िक्र करते रहते थे.”

क्या कहते हैं ये राजनीतिक विश्लेषक-

राजनीतिक विश्लेषकों की राय है कि उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी को चुनाव दर चुनाव मिलने वाली कामयाबी की वजह से हर तरफ योगी आदित्यनाथ के ‘यूपी मॉडल’ की बात हो रही है… उत्तर प्रदेश की राजनीति पर करीबी नजर रखने वाले कहते हैं कि योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में प्रदेश में बीजेपी को मिले चुनाव नतीजों के जरिए उनका मूल्यांकन हो रहा है,, किसी भी व्यक्ति का मूल्यांकन रिजल्ट से होता है. योगी आदित्यनाथ के साथ भी यही बात है. वो 2017 में सत्ता में आए. साल 2019 के लोकसभा चुनाव में अच्छा रिजल्ट दिया. तब सपा, बसपा और आरएलडी का गठबंधन था… उस गठबंधन के मुक़ाबले 64 सीट जीतना  बड़ी उपलब्धि थी.. जबकि तब लोगों को लग रहा था कि बीजेपी का सफाया हो जाएगा. उसके बाद आया 2022 का विधानसभा चुनाव… दूसरी बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाना निश्चित तौर पर एक बड़ी बात थी… फिर अभी निकाय चुनाव हुए,, बीजेपी ने सारे बड़े शहरों में क्लीन स्वीप किया. ये रिपोर्ट कार्ड है योगी आदित्यनाथ का, जिसने उनको राष्ट्रीय नेताओं की कतार में मोदी के समकक्ष खड़ा कर दिया।
काबिले तारीफ़ हैं योगी-


‘योगी आदित्यनाथ. रिलीजन, राजनीतिक और पावर, द अनटोल्ड स्टोरी ‘ किताब के लेखक और उत्तर प्रदेश की राजनीति को कई दशक से कवर कर रहे वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान दावा करते हैं कि आज की तारीख में प्रदेश में योगी आदित्यनाथ दूसरे सभी नेताओं से आगे हैं.. वो कहते हैं, “जहां तक यूपी का सवाल है यहां नरेंद्र मोदी से भी ज्यादा योगी आदित्यनाथ का असर है. नरेंद्र मोदी 2024 में जहां फिर से पहुंचना चाहते हैं, उसके लिए यूपी ज़रूरी है और योगी भी. इसमें कोई शक नहीं है कि योगी आदित्यनाथ ने अपने आपको जिस तरह से आगे बढ़ाया है, वो काबिले तारीफ है.”

गुजरात मॉडल  की तर्ज पर है यूपी मॉडल-


योगी आदित्यनाथ और यूपी मॉडल एक दूसरे के पर्याय बन चुके हैं.. लेकिन ‘यूपी मॉडल’ है क्या ? योगी जी का यूपी मॉडल है कानून व्यवस्था और विकास.. साथ में हिंदुत्व का तड़का. यानी हिंदुत्व के तड़के के साथ विकास और कानून व्यवस्था पर फोकस करना… नरेंद्र मोदी के ‘गुजरात मॉडल’ की ही तरह योगी आदित्यनाथ के ‘यूपी मॉडल’ में भी सबसे मुख्य बात हिंदुत्व है… जैसे गुजरात मॉडल का मेन फ़ीचर विकास, इन्फ्रा स्ट्रक्चर और आर्थिक उन्नति थी, तो यहां यूपी मॉडल में कानून व्यवस्था मुख्य स्तंभ है… विकास की बात उसके बाद आती है.. कानून  व्यवस्था के मामले में योगी  ने काफी प्रभाव छोड़ा है. मध्य प्रदेश और कर्नाटक भी यूपी मॉडल का काफी ज़िक्र कर रहे थे… वो कह रहे थे कि कोई क़ानून हाथ में ले या उल्लंघन करे तो एक ही उपाय है, ‘बुलडोजर चलना’…  बुलडोज़र योगी आदित्यनाथ की सरकार का एक सिंबल बन गया है. हालांकि, योगी आदित्यनाथ के इस ‘यूपी मॉडल’ को लेकर आलोचक लगातार सवाल उठाते रहे हैं.. योगी आदित्यनाथ की अभी मेन USP  क्या है, जिसे दूसरे लोग भी कॉपी कर रहे हैं, खासकर बीजेपी शासित राज्य चाहे मध्य प्रदेश हो या असम वाले मुख्यमंत्री,, किसी ने कुछ गड़बड़ की, भले ही वो प्रूफ नहीं हुआ हो, केस चल रहा हो, ये कहते हैं कि उसे बुलडोज़ कर दो. बकायदा ऐसी भाषा बोलते हैं. ये क़ानून के मुताबिक नहीं है.. अगर आप देश के कानून को ताक पर रखकर अपना क़ानून चलाएंगे तो कुछ दिन तो अच्छा लगेगा लेकिन जब गाज आम आदमी पर गिरने लगेगी तो फिर लोग इस पर भी सवाल उठाने शुरू करेंगे। योगी आदित्यनाथ ने अपना एक प्रोफ़ाइल बना लिया है कि भई ये है सॉलिड आदमी, ये तुरंत तय करता है,  योगी आदित्यनाथ ने प्रचार के जरिए तरक्की की है. मोदी का मॉडल फोलो किया है,

अपने तौर पर ही करेंगे काम- योगी 


वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र सिंह कहते हैं कि आलोचक भले ही कुछ भी कहें. योगी आदित्यनाथ का मॉडल एक ख़ास तरह से ही काम करता है.. राधिका रामाशेषन कहती हैं कि योगी आदित्यनाथ के यूपी मॉडल में एक और ख़ास बात है जो बीजेपी शासित किसी और राज्य में दिखाई नहीं देती… और वो है कि योगी आदित्यनाथ अन्य बीजेपी नेताओं की तरह केंद्र  की हर बात आंख मूंदकर नहीं मानते.. 2017 में मुख्यमंत्री पद के लिए मोदी जी की पहली पसंद मनोज सिन्हा माने जाते  थे. केशव प्रसाद मौर्य जैसे कुछ और नाम चल रहे थे.. लेकिन अंत में योगी सबसे बड़े नेता के रूप में उभरे.. नोट करने वाली बात है कि पहले दिन से उन्होंने ये सिग्नल भेजा कि वो दिल्ली से निर्देश और आदेश नहीं लेने वाले हैं.. वो खुद अपने तौर पर ही राज चलाएंगे.. भले ही ये दिल्ली को पसंद न आया हो.. कई ऐसे उदाहरण हैं जब दिल्ली और लखनऊ के बीच में टेंशन हुई है.. ” उसका नजारा इस बात से दिखाई देता है, जब  “अरविंद शर्मा गुजरात में मोदी जी के पसंदीदा अधिकारी थे. उन्होंने इस्तीफा दिया और उन्हें MLC बनाया गया.. बहुत प्रयास हुआ कि 2022 विधानसभा चुनाव के पहले उन्हें मंत्री बनाया जाए.. ख़बर यहाँ तक आयी  कि उनके लिए एक बंग्ला भी कालिदास मार्ग पर देखा गया था, लेकिन योगी जी अड़े रहे और उन्हें अपने मंत्रिमंडल में नहीं लिया. अभी वो मंत्री हैं लेकिन उनकी ज़्यादा चर्चा नहीं है. केशव प्रसाद मौर्या भी समानांतर खड़ा करने का प्रयास हुआ लेकिन वो भी सफल नहीं हो पाए हैं. “

 

एक बड़ा वर्ग बीजेपी के साथ जुड़ा है-

 

वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान दावा करते हैं कि योगी आदित्यनाथ ने आज “ऐसी पोजिशनिंग कर ली है कि वो अपनी ही पार्टी में कई लोगों की आंख का कांटा बन गए हैं.. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि योगी आदित्यनाथ के मॉडल में एक और बात है जो उन्हें मौजूदा दौर के दूसरे नेताओं से अलग करती है…योगी आदित्यनाथ के आलोचक उन्हें एक ख़ास जाति का समर्थक बताते हैं लेकिन ये आरोप का उनके राजनीतिक ग्राफ पर असर होता नहीं दिखता.. इसकी वजह है,, उनका भगवा परिधान.. वो गोरक्षनाथ पीठ के पीठाधीश्वर हैं. वो भले ही सवर्ण हैं लेकिन उस पीठ की Following पिछड़ों में काफी है. दूसरे भगवा वेश की वजह से पिछड़े नेतृत्व की बात डाइल्यूट हो जाती है.. फिर यूपी में अब मुलायम सिंह यादव और कल्याण सिंह के कद का कोई पिछड़ा नेता भी नहीं है. मायावती का दलितों में आधार घट रहा है.”यूपी में राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान से ही ओबीसी और पिछड़ों का एक बड़ा वर्ग बीजेपी के साथ जुड़ा हुआ है. बीजेपी उन्हें पद भी देती है, जैसे केशव मौर्या उपमुख्यमंत्री हैं. वो योगी आदित्यनाथ के भी साथ है.

योगी की अगली परीक्षा 2024 चुनाव में-


उत्तर प्रदेश के निकाय चुनाव में विपक्ष को हाशिए पर धकेलने वाले योगी आदित्यनाथ की अगली परीक्षा साल 2024 में लोकसभा के आम चुनाव के दौरान होगी.. तब नरेंद्र मोदी और बीजेपी के साथ विपक्षी दलों के लिए बहुत कुछ दांव पर होगा.. उस वक्त योगी आदित्यनाथ और उनका मॉडल बीजेपी के लिए कितना अहम होगा? इस सवाल पर पत्रकार शरत प्रधान कहते हैं, “कि योगी आदित्यनाथ ने  support base सॉलिड बना लिया है. विपक्ष बिल्कुल कमज़ोर है.. अखिलेश यादव सॉफ्ट हिंदुत्व प्ले करने लगे हैं. ये भी योगी के हक में जाता है, जब आप दूसरे की पिच पर खेलेंगे तो कैसे जीतेंगे.”

योगी का सबसे बड़ा एडवांटेज

 

वहीं, राजेंद्र सिंह कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में आगे भी बीजेपी मौजूदा रास्ते पर ही चलेगी… यूपी में कोई बड़ी चुनौती बीजेपी के सामने नहीं है..  2019 का आपको ध्यान है, तब सपा बसपा और आरएलडी का गठबंधन था लेकिन बीजेपी बहुत आगे रही.” राजेंद्र सिंह कहते हैं, “सरकार बनी तो मोदी पीएम होंगे. योगी आदित्यनाथ भी उनका गुणगान करते हैं. जब कभी मोदी हटेंगे तब सवाल भले उठ सकता है..
यूपी के अंदर विधानसभा में योगी नंबर वन हैं, लेकिन लोकसभा के लिहाज से अभी भी शायद मोदी नंबर वन हैं.. 2024 में अगर बीजेपी को पहले से ज्यादा सीटें मिली तो मोदी ही प्रधानमंत्री होंगे, थोड़ा कम भी हो तो भी मोदी होंगे. योगी आदित्यनाथ अगर अपना दावा पेश भी करते हैं तो किन परिस्थितियों में करेंगे,, ये देखना होगा,, योगी आदित्यनाथ अभी सिर्फ़ 51 साल के हैं और ये उनका एडवांटेज है.

 

प्रधानमंत्री मोदी ने सुप्रीम कोर्ट के लिए आखिर ऐसा क्या कहा की मुख्य न्यायाधीश ने दिया ऐसा रिएक्शन…

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भारत आज 77 वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को लाल किले की प्राचीर से दसवां स्वतंत्रता दिवस पर भाषण दिया। आज सभी न्यूज़ चैनल से लेकर सभी स्वतंत्र पत्रकार और मीडिया प्रधानमंत्री के भाषण की व्याख्या की किसी ने प्रधानमंत्री के भाषण को अच्छा और किसी ने निराशाजनक बताया। लेकिन आज हम इस भाषण को न ही सही और न ही गलत बता रहे हैं ,बल्कि हम आज आपको प्रधानमंत्री के भाषण की मुख्य बातों को बताएंगे, आपको इस खबर में ये बताएँगे कि प्रधानमंत्री के भाषण में किस चीज को कितनी बार दोहराया गया.
 
प्रधानमंत्री मोदी ने की सुप्रीम कोर्ट की सराहना- 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज लाल किले की प्राचीर से देश की जनता को 10 वीं बार सम्बोधित किया,  इस दौरान उन्होंने मणिपुर से लेकर परिवारवाद तक का अपने भाषण में जिक्र किया। वहीं पीएम ने अदालती फैसलों को क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध कराने को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सराहना की। स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम में भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ भी मौजूद थे, उन्होंने प्रधानमंत्री की टिप्पणी को हाथ जोड़कर स्वीकार किया और अभिवादन किया। पीएम मोदी ने कहा कि मैं सुप्रीम कोर्ट को भी धन्यवाद देता हूं। सीजेआई चंद्रचूड़ ने अक्सर अदालतों द्वारा क्षेत्रीय भाषाओं में फैसले देने की आवश्यकता पर जोर दिया है। गणतंत्र दिवस और अपने स्थापना दिवस को और यादगार बनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 26 जनवरी को एक हजार से ज्यादा फैसलों का दस भाषाओं में अनुवाद जारी कर इसकी शुरुआत की थी,
 
 
PM ने कई बार किया इन विषयों का जिक्र- 
 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से देश को 10वीं बार संबोधित किया. 90 मिनट के अपने संबोधन में पीएम मोदी  ने 48 बार परिवारजन, 43 बार सामर्थ्य का इस्तेमाल किया. वहीं, महिलाएं/नारी शब्द का इस्तेमाल 35 बार किया.. इसके अलावा पीएम मोदी ने अपने संबोधन में 19 बार संकल्प शब्द बोला,,जबकि आजादी 16 बार,, पीएम मोदी के भाषण में युवाओं का 12 बार जिक्र आया.. जबकि 5 बार उन्होंने सामाजिक न्याय की बात कही.  90 मिनट के अपने संबोधन में पीएम मोदी ने 12 बार परिवारवाद, 11 बार भ्रष्टाचार और 8 बार तुष्टिकरण का जिक्र किया. पीएम ने मणिपुर मुद्दे का जिक्र करते हुए कहा कि पूरा देश मणिपुर के साथ खड़ा है. पिछले कुछ दिनों से जो शांति बनाकर रखी है, मणिपुर के लोग उसे आगे बढ़ाएं। ‘अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने कहा कि इस बार प्राकृतिक आपदा ने देश के अनेक हिस्सों में अकल्पनीय संकट पैदा किए है। जिन्होंने इसे सहा, उनके प्रति मैं गहरी संवेदना प्रकट करता हूं। 
 
 
क्या कहा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने-
 
प्रधानमंत्री ने कहा कि ‘इस कालखंड में हम जो करेंगे, जो कदम उठाएंगे, त्याग करेंगे, तपस्या करेंगे, आने वाले एक हजार साल का देश का स्वर्णिम इतिहास उससे अंकुरित होने वाला है। पीएम मोदी ने आगे कहा कि अगली बार 15 अगस्त को इसी लाल किले से मैं आपके सामने देश की उपलब्धियां, आपके सामर्थ्य, उसमें हुई प्रगति और सफलता के गौरव गान को इससे भी अधिक आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत करूंगा। उन्होंने कहा कि अगली बार इसी लाल किले पर और अधिक आत्मविश्वास के साथ आऊंगा। उन्होंने कहा कि मैं साल 2014 में परिवर्तन का वादा लेकर आया था। देश के 140 करोड़ लोगों ने मुझ पर भरोसा किया। रिफॉर्म, परफॉर्म, ट्रांसफर का वादा विश्वास में बदल गया। मैंने इस वादे को विश्वास में बदल दिया है। 
 
 
विपक्ष ने किया पलटवार-
 
इस मौके पर पक्ष-विपक्ष के नेता और सांसद लाल किले पर पहुंचे थे, वहीं एक कुर्सी भी खाली दिखाई दी। ये कुर्सी कांग्रेस के एक बड़े नेता की थी। ये सीट राज्यसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की थी। वो पीएम मोदी का भाषण सुनने नहीं पहुंचे, जिससे राजनीतिक गलियारों में चर्चा शुरू हो गई। हालांकि, कांग्रेस ने इस पर सफाई भी दी। उन्होंने कहा कि खरगे को ठीक महसूस नहीं हो रहा था, इसलिए वो लाल किले पर नहीं पहुंचे। 90 मिनट के अपने संबोधन में पीएम मोदी ने ऐलान किया कि वे 2024 में भी लाल किले पर तिरंगा फहराएंगे. पीएम मोदी के इस बयान पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राजद चीफ लालू यादव ने पलटवार किया है. खड़गे ने कहा कि मोदी झंडा तो फहराएंगे, लेकिन अपने घर पर. लालू ने कहा कि ये आखिरी बार है. 
 पीएम मोदी ने अगले 5 साल की दी गारंटी-
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर बार स्वतंत्रता दिवस पर अपने परिधान और वेशभूषा को लेकर चर्चा में रहते हैं। इसके अलावा उनके साफा बांधने का अंदाज सबसे ज्यादा आकर्षक होता है। हर ध्वजारोहण में प्रधानमंत्री अलग-अलग रंगों की पगड़ी पहन कर ध्वजारोहण कर चुके हैं,, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लालकिले की प्राचीर से देश के सामने अपनी सरकार के नौ साल का बही खाता रखा। 2024′ से पहले ही मोदी ने अगले पांच साल की गारंटी भी दे दी। उन्होंने कहा, हम आज जो शिलान्यास कर रहे हैं, उनका उद्घाटन भी मेरे नसीब में है। बतौर मोदी, अगले स्वतंत्रता दिवस पर मैं आपके सामने अपनी सरकार की सफलता का रिपोर्ट कार्ड पेश करूंगा।
 प्रधानमंत्री मोदी ने 10वीं बार किया सम्बोधित- 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब तक कुल 10 बार लाल किले से देश को संबोधित कर चुके हैं। केवल एक बार उन्होंने देश को एक घंटे से कम समय के लिए संबोधित किया। 2017 के स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री का भाषण केवल 56 मिनट का रहा था। ये उनका अब तक का सबसे छोटा भाषण है। प्रधानमंत्री ने जब साल 2014 में देश को पहली बार लाल किले से संबोधित किया तो उन्होंने कुल 65 मिनट तक भाषण दिया। इसके बाद, साल 2015 में उन्होंने 86 मिनट तक देश को संबोधित किया। देश जब आजादी की 70वीं वर्षगांठ मना रहा था, उस दौरान पीएम मोदी ने देश को लाल किले से 94 मिनट तक संबोधित किया। यह उनके प्रधानमंत्री के रूप में रहने के दौरान लाल किले से दिया गया सबसे लंबा भाषण है। पीएम मोदी ने 2017 के स्वतंत्रता दिवस के मौके पर 57 मिनट, 2018 में 82 मिनट और 2019 में 92 मिनट तक देश को संबोधित किया।  इसके बाद 2020 में 86 मिनट, 2021 में 88 मिनट, 2022 में 83 मिनट और 2023 में 90 मिनट तक पीएम मोदी ने लाल किले से भाषण दिया।
 
सबसे ज्यादा बार किस ने फहराया तिरंगा-
 
जवाहरलाल नेहरू आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री थे। लाल किले की प्राचीर से सबसे ज्यादा बार तिरंगा झंडा लहराने का अवसर उन्हें ही मिला था। नेहरू 1947 से लेकर 1964 तक भारत के प्रधानमंत्री रहे। इस दौरान उन्होंने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले पर रिकॉर्ड 17 बार झंडा फहराया। इस मामले में दूसरे नंबर पर भारत की एकमात्र महिला प्रधानमंत्री और जवाहरलाल नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी हैं। उन्होंने लाल किले पर 16 बार राष्ट्रीय ध्वज फहराया है। 

 

मणिपुर की आग से 24 तबाह, दक्षिण में ढहता भाजपा का किला…   

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मणिपुर हिंसा का भाजपा की दक्षिण की राजनीति पर असर दिखना शुरू हो गया है, वो लोग, जिन्हें उनके समुदाय के नेताओं के ये कहने से कोई आपत्ति नहीं थी कि बीजेपी से अल्पसंख्यकों को कोई दिक्कत नहीं है, उनके  सुर भी अब पूरी तरह से बदलते हुए दिखाई देते हैं,  पिछले कुछ हफ्तों से इस समुदाय के लोग मणिपुर में हो रहे हमलों, हत्याओं और चर्चों को जलाए जाने के खिलाफ धरना प्रदर्शन कर रहे हैं जिनमें से कुछ प्रदर्शन ऐसे हैं जिनकी अगुवाई खुद वहां के पादरियों ने की है और लगातार कर भी रहे हैं. राज्य में चर्चों का प्रशासन देखने वाली संस्था केरल कैथोलिक बिशप काउंसिल (केसीबीसी) ने तो यहां तक कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इतने समय तक क्यों चुप्पी साधे रखी,, कुल मिलाकर केरल में जो समुदाय भाजपा के साथ दिखाई देता था अब वो उनसे दूरी बनाने लगा है। केरल ही नहीं, अब के हालात में मणिपुर में रहने वाले अधिकतर नागरिक जो या तो कुकी समुदाय से हैं या फिर मैतई से, कहीं न कहीं ये दूरी उनके मन में भी होगी, ऐसा वहां के हालात को देखकर महसूस किया जा सकता है

 

मणिपुर मामले जब फिर कुछ नहीं बोले PM-  
 
100 दिन से अधिक समय तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार 36 सेकंड और दूसरी बार तकरीबन 3 मिनट से कम समय ही निकाला है मणिपुर के मुद्दे पर बोलने के लिए, ये माना जा रहा था की संसद में अविश्वास प्रस्ताव के दौरान जब  प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी बोलेंगे तो न केवल मणिपुर के लिए ज्यादा से ज्यादा केंद्रित होकर अपना भाषण देंगे बल्कि उम्मीद ये भी की जा रही थी कि तुरंत कोई बड़ा कदम उठाकर मणिपुर की जनता के जख्मों पर मरहम भी रखेंगे, पर न तो वहां हुई मौत के आंकड़ों पर और न ही नग्न अवस्था में परेड करवाई गयी महिलाओं के प्रति कोई गंभीर संवेदना दिखाई दी. अपने भाषण के दौरान उन्होंने ये जरुर कहा की अमित भाई यानी देश के गृहमंत्री अमित शाह इस मुद्दे पर सब कुछ पहले ही बोल चुके हैं
 2024 चुनाव में डाल सकता है असर- 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लगभग पूरा भाषण हंसी-ठट्टे, कांग्रेस को कोसने, विपक्षी दलों की असफलता, इंडिया को घमंडिया कहने में ही गुजर गया. सत्ता पक्ष का ये रवैया 2024 के लोकसभा चुनाव में खासा असर डाल सकता है. खासकर पूर्वोत्तर राज्यों में जहां पर अल्पसंख्यकों की यानी ईसाइयों की संख्या थोड़ी ज्यादा है.  गौरतलब है की इन अल्पसंख्यकों के वोट बैंक पर बहुत पहले से भाजपा की नजर रही है, और इस वोट बैंक को हासिल करने में पूर्व में भाजपा कामयाब भी हुई है, मगर हालात अब थोड़े जुदा हैं. याद कीजिए जब एक वक्त ऐसा भी था की प्रधानमंत्री ने पूर्वोत्तर के तीन राज्यों पर जीत के बाद अपनी सरकार बनाने के बाद कहा था, पूर्वोत्तर न दिल्ली से दूर है ना मेरे दिल से… पर 100 दिन से भी अधिक समय तक मणिपुर से दूरी बनाना ये संकेत जरुर देता है की दिल और दिल्ली दोनो से कम से कम मणिपुर से तो दूर ही है ।   


क्या कहती है BBC की रिपोर्ट- 

बीबीसी की एक  रिपोर्ट के अनुसार केरल के लोगों का कहना है कि “मणिपुर के लोग इसी भारत के सम्मानित नागरिक हैं. उनके घर जला दिए गए हैं और अब दिखाने के लिए उनके पास कोई रिकॉर्ड भी नहीं बचा है हालात ये हैं कि वो भारतीय हैं. ये साबित करना भी अब उनके लिए मुश्किल हो सकता है, आखिर वो अपनी पहचान कैसे साबित करेंगे बिना कागजों के, अपनी ही ज़मीन पर बाहरी होते ये लोग दोनो तरफ से हैं चाहे फिर वो कुकी समुदाय हो या फिर मैतई… ”राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ईसाई समुदाय में कांग्रेस नीत यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट  के मजबूत आधार में सेंध लगाने के लिए बीजेपी के मेलजोल कार्यक्रम को केरल में ‘तगड़ा झटका’ लगा है.आपको बता दें कि राज्य में अल्पसंख्यकों की आबादी लगभग 46% है, जिसमें 26.56% मुसलमान और 18.38% ईसाई हैं

एक ऐसा भी समय रहा है, जब सीपीएम नीत लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ़) इन दोनों समुदायों से वोट हासिल करने में सफल रहा. लेकिन आम तौर पर अल्पसंख्यकों का वोट यूडीएफ के साथ ही रहा है. बीजेपी इसी में सेंध लगाने की कोशिश में थी, जिसमे वो काफी हद तक कामयाब होती भी दिखाई दे रही थी,लेकिन मणिपुर की हिंसा ने इन कोशिशों पर मानो पानी फेर दिया है।


क्या कहते हैं राजनीतिक विश्लेषक- 

राजनीतिक विश्लेषक एमजी राधाकृष्णन के अनुसार, “मणिपुर निश्चित रूप से बीजेपी के लिए एक झटका है, जो कि ईसाई वोटरों को रिझाने की कोशिश करती रही है. पिछले कुछ समय से वे इस ओर अच्छी खासी सफलता भी हासिल करती दिखाई दे रही थी. ”एमजी राधाकृष्णन कहते हैं, “अभी पिछले ईस्टर में ही कार्डिनल जॉर्ज एलेनचेरी ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि बीजेपी बहुत अच्छी है और अल्पसंख्यकों को इस पार्टी से कोई दिक्कत नहीं है. इससे पहले एक और बिशप ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि अगर केंद्र सरकार रबर की सही कीमत दिलाए तो केरल से एक बीजेपी सांसद भेजा जा सकता है


2024 चुनाव में बीजेपी को लग सकता है झटका-

पूर्वोत्तर राज्यों में अल्पसंख्यक वोट कितने महत्वपूर्ण हैं उसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ईसाई समुदाय को अपनी तरफ लाने के अभियान की बागडोर खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने हाथ में ले रखी थी. चाहे वो पोप फ़्रांसिस को भारत आमंत्रित करना हो या मलंकारा चर्च में 400 साल पुराने विवाद को हल करने की कोशिश हो या इसी साल अप्रैल में केरल में आठ प्रमुख चर्चों के प्रमुखों के साथ डिनर हो.  इसी डिनर में भारत के सबसे बड़े सायरो मालाबार चर्च के प्रमुख कार्डिनल एलेनचेरी ने प्रधानमंत्री की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी. इसके बाद ही एक के बाद एक बिशप ने विवादास्पद बयान दिए थे. एक बिशप ने ईसाइयों को ‘नार्को टेररिज़्म’ के भ्रम में फंसने को लेकर चेताया था जबकि दूसरे ने लव जिहाद को लेकर सावधानी बरतने की बात कही थी.लेकिन लगता है मणिपुर हिंसा ने इन सब कोशिशों पर एक झटके में पानी फेर दिया है।


मणिपुर की घटना से बीजेपी को झटका- 

एमजी राधाकृष्णन ने कहा कि समुदाय में बीजेपी समर्थक रवैया दिखाई देता रहा है. समुदाय के ख़ासकर संपन्न लोगों में सोशल मीडिया पर इस्लामोफोबिया अभियान चल रहा है और समाज में बीजेपी के प्रति नरम रुख साफ़ दिखता है.. वो कहते हैं, “कुल मिलाकर बीजेपी बहुत आरामदायक स्थिति में थी. लेकिन अब मणिपुर की घटना ने उन्हें झटका दिया है, चर्च सत्तारूढ़ पार्टी के ख़िलाफ़ खुलकर सामने आ गए हैं.और अब  इस रिश्ते में अब बड़ी बाधा खड़ी हो गई है.”  राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि “इस हालात में ईसाई समुदाय में बीजेपी का प्रचार ठप पड़ सकता है क्योंकि ईसाई नेतृत्व सार्वजनिक रूप से बीजेपी का समर्थन करने का बहाना नहीं ढूंढ पाएंगे.”“मणिपुर की घटनाओं से अब एक जटिल स्थिति पैदा हो गई है. एक छोटा समूह था जो बीजेपी की ओर झुकाव रख रखा था. अब उन्हें फिर से अपना मन बनाना पड़ेगा कि वो बीजेपी के साथ हैं या नहीं

क्या कहते हैं लेखक राधाकृष्णन-

लेखक और एकेडमिक केएस राधाकृष्णन कहते हैं कि “ईसाई समुदाय के पास किसी भी संगठन या विचारधारा के साथ स्थायी राजनीतिक वफादारी नहीं है. वे अपने हित देखते हैं. अगर वे सोचते हैं कि बीजेपी उनका शुभचिंतक है तो वे उसका समर्थन कर देंगे. अगर ये उनके लिए फायदेमंद होगा तो वो बीजेपी के साथ चले जाएंगे.” उनके मुताबिक, “ईसाई समुदाय कांग्रेस और एलडीएफ दोनों का समर्थन कर चुका है. इन सबके बीच कांग्रेस परिस्थितियों पर बारीक नज़र बनाए हुए है. एर्नाकुलम से कांग्रेस के सांसद हिबी इडेन ने कहा, “मणिपुर के बाद, बीजेपी का समर्थन करने वाले कुछ ईसाई नेता समझ गए कि उस पार्टी का अल्पसंख्यकों के प्रति यही बुनियादी बर्ताव है.”

एमजी राधाकृष्णन का कहना है कि ईसाई समुदाय में बीजेपी समर्थक कूटनीतिक रूप से कम मुखर रहेंगे. जब मणिपुर मुद्दा खत्म हो जाएगा, वे बीजेपी के साथ जाने का कोई और बहाना ढूंढ लेंगे. लेकिन 2024 के लिए तो ये मुश्किल होगा क्योंकि अब बहुत समय बचा नहीं है. इसलिए सार्वजनिक रूप से वो कोई पक्ष नहीं लेंगे.  फ़ादर जैकब पालाकाप्पिल्ली कहते हैं, “मणिपुर के हालात के बारे में हम बहुत दुखी और सदमे में हैं. प्रधानमंत्री ने पीड़ितों को ढांढस तक नहीं बंधाया. शांति के लिए हम किस से कहेंगे


पूरे देश में मणिपुर हिंसा का असर- 

ये वो तमाम घटनाक्रम और बयान है जो बताते हैं कि मणिपुर में हिंसा का असर अब राजनीतिक रूप से भी दिखना शुरू हो गया है,  और साथ ही  2024 में बीजेपी को यहां झटका लग सकता है। भाजपा दक्षिणी राज्यों में अपना आधार पहले ही खोती दिखाई दे रही है. और मणिपुर की घटना से पूर्वोत्तर में भी वोट बैंक पर असर पड़ना तय माना जा रहा है.सिर्फ दक्षिण ही नहीं बल्कि देश के कई ऐसे राज्य जहां पर अल्पसंख्यक बहुतायत में हैं याद रहे ये अल्पसंख्यक कहने से मतलब सिर्फ मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र ही नहीं बल्कि अन्य अल्पसंख्यक समुदाय पर भी असर पड़ना तय माना जा रहा है.. क्योकिं मणिपुर हिंसा से सरकार की छवि न केवल आसपास के राज्यों में खराब हुई है बल्कि पूरे देश मे इसका असर पड़ा है, जैसे केरल में ये असर देखने को मिल रहा रहा है. मोदी सरकार से पहले ही किसान, बेरोजगार, महंगाई से त्रस्त लोग नाराज हैं