Category Archive : राजनीति

पहाड़ की ठण्ड से कांपते उत्तराखंड के ये 36 विधायक, जानिये क्यों नहीं हुआ गैरसैण में विधानसभा का शीतकालीन सत्र।

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उत्तराखंड की राजनीति में गैरसैंण हमेशा एक बड़ा मुद्दा रहा है बावजूद इसके लिए धामी सरकार ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण को लेकर काफी उदासीन दिखाई दे रही है ये बात ऐसे ही नहीं कही जा रही बल्कि इसके पीछे की बड़ी वजह भी है. जिन पहाड़ों की जनता वहां के विधायकों को जीताकर सदन भेजती है वही  विधायक चुनाव जीतने के बाद देहरादून छोड़कर पहाड़ नहीं चढ़ना चाहते। क्योंकि उनको वहां ठंड लगती है.

उत्तराखंड सरकार का बजट सत्र देहरादून में शुरू हो चुका है. बजट सत्र शुरू होने से पहले  इसके लिए सरकार ने विधायकों से राय मांगी थी कि बजट सत्र गैरसैंण में होना चाहिए या फिर देहरादून में इसी विषय को लेकर लगभग 36 विधायकों ने एक पत्र सरकार को सौंपा है विधायकों ने सत्र देहरादून में कराए जाने की बात कही. विधायकों का तर्क था कि गैरसैंण में काफी सर्दी है ऐसे में वहां सत्र करने में काफी मुश्किल होगी इसके बाद सरकार ने अपनी कैबिनेट में यह फैसला लिया कि सत्र इस बार देहरादून में होगा।

क्या कहा हरीश रावत ने- 

वहीं सत्र देहरादून में कराए जाने को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता हरीश रावत का कहना है कि ऐसे विधायकों को हिमालय राज्यों से चले जाना चाहिए जिन्हें यहां पर ठंड लगती है खास बात यह है कि चिट्ठी लिखने वाले विधायकों में छह विधायक कांग्रेस के भी शामिल है तो वहीं एक बसपा और दो निर्दलीय विधायक भी शामिल है, इन विधायकों के पत्र के आधार पर ही सत्र देहरादून में कराया जा रहा है वरना ये सत्र इस बार उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण में होना था इसको लेकर पूर्व सीएम और कांग्रेस के नेता हरीश रावत ने साफ कहा है कि विधायकों की चिट्ठी  से क्या लेना देना सरकार को खुद फैसला करना चाहिए और सत्र गैरसैंण में करना चाहिए ये सरकार की विफलता है।

गांधी पार्क में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने एक घंटे का सांकेतिक मौन व्रत रखा- 
पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ गांधी पार्क में एक घंटे का सांकेतिक मौन व्रत रखा. मौन व्रत के समापन पर उपस्थित सभी कार्यकर्ताओं ने रघुपति राघव राजा राम भजन गाकर धामी सरकार की सद्बुद्धि के लिए प्रार्थना की उन्होंने कहा कि हिमालयी राज्य की अवधारणा के साथ बने राज्य की सरकार को गैरसैंण में ठंड लग रही है.
रावत ने कहा कि यह उत्तराखंड का दुर्भाग्य ही है की यहां के जनप्रतिनिधियों को कुछ ज्यादा ही ठंड लगती है उन्होंने बजट सत्र की अवधि को लेकर भी सवाल उठाए और कहा की प्रचंड बहुमत और डबल इंजन के 7 साल बाद भी प्रदेश सरकार यदि गैरसैंण में कर्मचारियों, पुलिस कर्मियों एवं पत्रकारों के लिए मूलभूत व्यवस्थाएं तक जुटा पाने में समर्थ नहीं रही तो दोष किसको दिया जाए. आम आदमी पार्टी के नेता ने भी अर्धनग्न होकर सरकार के इस फैसले के खिलाफ देहरादून विधानसभा के बाहर प्रदर्शन किया। और कहा कि पहाड़ियों को ठंड नहीं लगती मगर उत्तराखंड के विधायकों ने गैरसैण को लगभग पूरी तरह से गैर बना दिया है।
गैरसैंण में विधानसभा भवन बनाने के लिए करोड़ों रुपया पानी की तरह बहाया गया है, लेकिन सुविधाओं के नाम पर वहां सब कुछ जीरो है यही कारण है कि सत्र के अलावा कोई विधायक या मंत्री गैरसैंण की तरफ जाने को भी तैयार नहीं होता है गैरसैंण को लेकर वैसे तो सत्ताधारी दल कई दावे करता रहता है, लेकिन सत्र कराने तक में परहेज करने वाली सरकार से इसको लेकर बहुत उम्मीद करना बेमानी है ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित होने के बावजूद गैरसैंण से भराड़ीसैंण तक सिर्फ ठंड के सिवाय कोई सरगर्मी नहीं है सैकड़ों करोड़ के भव्य विधानमंडल भवन और आलीशान आवासीय परिसरों के निर्माण से आगे वहां सब कुछ ठहर सा गया है। 12 महीनों में सिर्फ चंद दिनों के लिए गर्मियों की यह राजधानी तभी गुलजार दिखती है जब सरकार यहां सत्र कराने पहुंचती है। सरकार के जाते ही फिर लंबा सन्नाटा पसर जाता है,,ऐसा लगता है मानो उत्तराखंड के माननीय विधायक यहां सिर्फ गर्मियों की छुटियाँ बिताने जाते हैं।
भराड़ीसैंण में विधानसभा सत्र का आयोजन होते कई वर्ष हो चुके हैं, लेकिन सरकारें वहां कभी व्यवस्थाएं नहीं बना पाईं। इन्हीं बदइंतजामी के बहाने अब विधायकों से लेकर अफसर तक वहां जाने से परहेज कर रहे हैं सिर्फ चुनाव के दौरान राजनीतिक पार्टियां गैरसैंण को वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करती रही हैं 2020 में त्रिवेंद्र सरकार ने गैरसैंण को प्रदेश की ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किया. राजधानी बने हुए तीन वर्ष का वक्त हो गया लेकिन इन तीन सालों में गैरसैंण में विकास के नाम पर कितने बदलाव हुए यह सवाल आज भी बना है, लेकिन जब हमारे माननीयों को ही गैरसैण में ठंड लग रही हो तो इसके विकास की उम्मीद भी करना बेमानी है।

Haldwani Mamla: नैनीताल जेल के बैरक नंबर 1 में रखा गया अब्दुल मलिक, सीसीटीवी से रखी जा रही है नजर.

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पुलिस ने हल्द्वानी हिंसा के मोस्ट वांटेड अब्दुल मलिक को उपद्रव के 81 आरोपियों से अलग रखा है।मलिक को शनिवार देर रात नैनीताल जेल में दाखिल किया गया। मलिक को छोड़कर उपद्रव के सभी आरोपियों को हल्द्वानी उप कारागार में रखा गया है।

लाइन नंबर 8 बनभूलपुरा निवासी अब्दुल मलिक को पुलिस ने शनिवार को दिल्ली से गिरफ्तार किया था। मलिक आठ फरवरी को बनभूलपुरा में हुए उपद्रव के पहले से ही फरार चल रहा था। इसके बाद इस मामले के आरोपी 81 लोगों को गिरफ्तार किया गया और सभी को उप कारागार हल्द्वानी में रखा गया। उम्मीद जताई जा रही थी कि मलिक को भी हल्द्वानी में ही अन्य उपद्रवियों के साथ रखा जाएगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं। गिरफ्तारी और कोर्ट में पेश करने के बाद अब्दुल मलिक को पुलिस ने शनिवार रात जिला जेल नैनीताल में दाखिल किया। मलिक को वहां बैरक नंबर एक में रखा गया है।

अब्दुल मलिक को सुरक्षित बैरक में रखा गया है। बैरक में लगे सीसीटीवी से भी लगातार निगरानी की जा रही है। जो भोजन अन्य बंदी व कैदियों को दिया जा रहा है, वही मलिक को भी दिया गया।

-संजीव ह्यांकी, जेल अधीक्षक नैनीताल

बता दें कि, पुलिस अब्दुल मलिक को पूछताछ के लिए जल्द रिमांड पर लेगी। इसके लिए पुलिस जल्द ही कोर्ट में अर्जी दायर कर सकती है। फिलहाल मलिक को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में नैनीताल जेल भेजा गया है।पुलिस ने गिरफ्तारी के बाद मलिक से शनिवार को पांच से सात घंटे पूछताछ की थी। मलिक से अभी केस में कई चीजें पूछी जानी है। इसमें मलिक की संपत्ति, मलिक घटना के दिन कहां था, क्या उसने उपद्रव के लिए फंडिंग तो नहीं की, लोगों को उसने कैसे भड़काया आदि सवाल के जवाब से पुलिस काफी दूर है।

पुलिस सूत्र बताते हैं कि सोमवार या मंगलवार को पुलिस कोर्ट जा सकती है। कोर्ट से उसे पूछताछ के लिए रिमांड पर लिया जाएगा। एसएसपी प्रहलाद नारायण मीणा का कहना है कि मलिक से पूछताछ में जो बातें सामने आई थी, पुलिस उस दिशा में काम कर रही है। जरूरत पड़ने पर दोबारा मलिक को पूछताछ के लिए रिमांड में लिया जा सकता है।

UP Police Bharti: सीएम योगी आदित्यनाथ का बड़ा फैसला, यूपी पुलिस सिपाही भर्ती परीक्षा-2023 हुई रद्द ।

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युवाओं के हित में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक बड़ा निर्णय लिया है। यूपी पुलिस सिपाही भर्ती परीक्षा-2023 को मुख्यमंत्री ने निरस्त कर दिया है। सीएम ने कहा कि 6 माह के भीतर ही पूर्ण शुचिता के साथ परीक्षा आयोजित की जाएगी । कहा, परीक्षा की गोपनीयता भंग करने वाले एसटीएफ की रडार में हैं कई बड़ी गिरफ्तारियां हो भी चुकी हैं।

परीक्षा के बाद हुआ था खूब प्रदर्शन-

यूपी आरक्षी भर्ती परीक्षा को निरस्त कर दिया गया। परीक्षा निरस्त करने की मांग को लेकर प्रदेश के कई जिलों के अभ्यर्थियों ने प्रदर्शन किया। आरोप लगाया कि प्रश्न पत्र लीक होने के साथ ही परीक्षा में बड़े पैमाने पर धांधली की गई है। हाल ही में प्रयागराज में सैकड़ों की संख्या में सिपाही भर्ती परीक्षा देने वाले अभ्यर्थी हाथ में तख्तियां लेकर परीक्षा निरस्त कराने की मांग को लेकर सड़क पर उतरे थे।

RO/ARO परीक्षा की शिकायतों की होगी जांच, शासन ने मांगे साक्ष्य-

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा बीते 11 फरवरी को आयोजित की गई समीक्षा अधिकारी/ सहायक समीक्षा अधिकारी (प्रारम्भिक) परीक्षा – 2023 से जुड़ी शिकायतों की भी जांच कराने का निर्णय लिया है।

  • अपर मुख्य सचिव, नियुक्ति एवं कार्मिक ने आदेश जारी किया।
  • समीक्षा अधिकारी/ सहायक समीक्षा अधिकारी (प्रारम्भिक) परीक्षा – 2023 की शुचिता व पारदर्शिता के उद्देश्य में निर्णय लिया गया है कि परीक्षा के संबंध में प्राप्त शिकायतों का शासन स्तर पर परीक्षण किया जाए।
  • इस परीक्षा के संबंध में किसी भी प्रकार की शिकायत अथवा इसकी शुचिता को प्रभावित करने वाले तथ्यों को संज्ञान में लाना चाहे तो वह अपना नाम तथा पूरा पता तथा साक्ष्यों सहित कार्मिक तथा नियुक्ति विभाग के ई-मेल आई.डी. – secyappoint@nic.in पर 27 फरवरी 2024 तक उपलब्ध करा सकते हैं।

इतने थे अभ्यर्थी-

सिपाही भर्ती की लिखित परीक्षा निर्धारित तिथि 17 व 18 फरवरी को सभी जिलों में दो पालियों में हुई थी। प्रदेश में 2,385 परीक्षा केंद्रों पर परीक्षा के दौरान बायोमैट्रिक वेरिफिकेशन के बाद ही अभ्यर्थी को प्रवेश दिया गया था। आरक्षी नागरिक पुलिस के 60,244 पदों पर भर्ती के लिए कुल 48,17,441 अभ्यर्थियों में 15,48,969 महिला अभ्यर्थी भी थे। प्रत्येक पाली में 12,04,360 अभ्यर्थी शामिल हुए थे।

AAP और कांग्रेस में हो गई डील, पंजाब में नहीं हुआ पैचअप, दिल्ली-हरियाणा और गुजरात में इन सीटों पर चुनाव लड़ेंगे दोनों दल;।

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लोकसभा चुनाव से पहले आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच सीट बंटवारे पर सहमति बन गई है। संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में पांच राज्यों के लिए सीट बंटवारे का एलान किया गया है। AAP और कांग्रेस के बीच दिल्ली, हरियाणा, गोवा, गुजरात और चंडीगढ़ की सीटों को लेकर आपसी सहमति बन गई है।

जानिए कौन कहां से लड़ेगा चुनाव?

आपको बता दें कि दिल्ली की 7 लोकसभा सीटों में से 4 पर आम आदमी पार्टी चुनाव लड़ेगी और तीन सीटों पर कांग्रेस प्रत्याशी अपनी किस्मत को आजमाएंगे।

दिल्ली में लोकसभा की हैं 7 सीटें-

दिल्ली में AAP चार पर लड़ेगी

  • नई दिल्ली
  • वेस्ट दिल्ली
  • साउथ दिल्ली
  • ईस्ट दिल्ली

कांग्रेस तीन सीटों पर लड़ेगी चुनाव-

  • चांदनी चौक
  • नॉर्थ ईस्ट
  • नॉर्थ वेस्ट

गुजरात में 26 लोकसभा सीटें

कांग्रेस की हैं – 24

AAP की हैं – 2 (भरूच और भावनगर)

हरियाणा में 10 लोकसभा सीटें

9 सीटें पर कांग्रेस लड़ेगी चुनाव

AAP लड़ेगी एक सीट (कुरुक्षेत्र) पर चुनाव

चंडीगढ़ और गोवा की सीटों पर हुआ ये फैसला-

चंडीगढ़ में कांग्रेस का प्रत्याशी चुनाव लड़ेगा।

गोवा में दोनों सीटों पर कांग्रेस चुनाव लड़ेगी।

पंजाब में नहीं बन पाई बात-

इसके अलावा AAP और कांग्रेस ने पंजाब में अलग-अलग चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। कांग्रेस महासचिव और सांसद मुकुल वासनिक ने बताया कि कांग्रेस और AAP के बीच आगामी लोकसभा चुनाव 2024 के लिए सीट बंटवारे पर सहमति बन गई है। उन्होंने कहा कि चंडीगढ़ पर लंबी चर्चा के बाद अंत में यह निर्णय लिया गया कि कांग्रेस का उम्मीदवार वहां से चुनाव लड़ेगा।

‘देश को जिताने के लिए हुआ INDI गठबंधन का जन्म’

AAP सांसद संदीप पाठक ने कहा कि हर राज्य की अपनी राजनीतिक परिस्थिति है और उन्हीं परिस्थितियों को देखकर चुनाव जीतने के उद्देश्य से ये फॉर्मूला बनाया गया है। INDI गठबंधन का जन्म देश को जिताने के लिए हुआ है, देश की जनता को जिताने के लिए हुआ है किसी को हराने के लिए नहीं हुआ है।’

 

पूर्व मंत्री हरक सिंह रावत समेत 5 लोगों को ईडी का समन, पूछताछ के लिए बुलाया।

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पाखरो रेंज घोटाले में मनी लॉन्ड्रिंग प्रकरण से संबंधित पूर्व वन मंत्री हरक सिंह रावत समेत अन्य लोगों को ईडी ने अब समन भेजे हैं। ईडी ने हरक सिंह रावत को 29 फरवरी को पूछताछ के लिए अपने कार्यालय बुलाया है। इसके अलावा अन्य को अलग-अलग तिथियों में उपस्थित होने के लिए कहा गया है।

ईडी के छापे में कई जगहों से एक करोड़ रुपये से अधिक का कैश और 80 लाख रुपये से अधिक के जेवर बरामद हुए थे। ईडी ने पिछले दिनों हरक सिंह रावत, आईएफएस अफसर सुशांत पटनायक आदि के यहां छापे मारे थे। इस छापे में पटनायक के घर पर इतना कैश बरामद हुआ था कि वहां पर नोट गिनने के लिए मशीन भी मंगाई गई थी।

इसके अलावा पूर्व डीएफओ किशनचंद व अन्य अफसरों के घर भी कैश व गहने ईडी ने जब्त किए थे। इसी क्रम में ईडी ने रावत की करीबी लक्ष्मी राणा के लॉकर खुलवाकर वहां से 45 लाख रुपये के जेवर बरामद किए थे। इस कार्रवाई में ईडी ने करीब 80 करोड़ रुपये के जमीनों के कागजात जब्त किए। साथ ही छह लॉकर को भी फ्रीज कराया था।

ईडी इस मामले में मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के तहत जांच कर रही है। अब ईडी की ओर से इन सभी को समन भेजकर पूछताछ के लिए अपने कार्यालय बुलाया है। ईडी इस कैश और जमीन व सोने के जेवरों के संबंध में पूछताछ करेगी। सूत्रों के मुताबिक, ईडी को पटनायक के घर से कई लिफाफे भी अफसरों के नाम के मिले थे।

उन्हें भी ईडी जल्द समन भेजकर पूछताछ के लिए बुला सकती है। ईडी की इस कार्रवाई से घपले के वक्त तैनात रहे सभी अधिकारियों और नेताओं के खेमे में खलबली मची हुई है। सभी अपने-अपने हिसाब से ईडी की इस कार्रवाई से पार पाने का प्रयास कर रहे हैं।

जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मालिक के आवास पर CBI का छापा, 30 से ज्यादा ठिकानों पर छापेमारी।

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जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक के खिलाफ सीबीआई ने कार्रवाई की है। सीबीआई ने उनके परिसरों समेत 30 से अधिक स्थानों पर छापेमारी की है। न्यूज एजेंसी  एएनआई सूत्रों के मुताबिक, दिल्ली में गुरुवार सुबह से मलिक के यहां कार्रवाई चल रही है।

जानकारी मिली है कि जम्मू कश्मीर के पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक के दिल्ली स्थित घर पर CBI ने छापेमारी की है। दरअसल, सीबीआई ने हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट मामले में यह छापा मारा है। बीमा घोटाले में सीबीआई मलिक के खिलाफ कार्रवाई कर चुकी है। बीमा घोटाले के मामले में सीबीआई सत्यपाल मलिक और उनके करीबियों के ठिकानों पर छापा मार चुकी है।
 

मुझे 300 करोड़ रुपये की रिश्वत की पेशकश की गई थी: सत्यपाल मलिक

23 अगस्त 2018 से 30 अक्टूबर 2019 के बीच जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल रहे सत्यपाल मलिक ने दावा किया था कि उन्हें दो फाइलों को मंजूरी देने के लिए 300 करोड़ रुपये की रिश्वत की पेशकश की गई थी। इसके बाद सीबीआई ने पिछले साल अप्रैल में एक मामला दर्ज किया था।

इस मामले में जांच एजेंसी ने कई अधिकारियों और व्यक्तियों से जुड़े परिसरों पर पिछले तीन मौकों पर तलाशी ली थी। मामला दर्ज करने के बाद सीबीआई ने पिछले साल अप्रैल में 10 स्थानों पर और जून 2022 में 16 स्थानों पर तलाशी ली। इस साल मई में भी 12 स्थानों पर तलाशी ली गई थी।

कई अधिकारियों के खिलाफ मामला दर्ज किया- 

सीबीआई ने पहले कहा था, “2019 में किरू हाइड्रो इलेक्ट्रिक पावर प्रोजेक्ट (एचईपी) के लगभग 2,200 करोड़ रुपये के सिविल कार्यों का ठेका एक निजी कंपनी को देने में कदाचार के आरोप में मामला दर्ज किया गया था।”

एजेंसी ने चिनाब वैली पावर प्रोजेक्ट्स (पी) लिमिटेड के पूर्व अध्यक्ष नवीन कुमार चौधरी और अन्य पूर्व अधिकारियों एम एस बाबू, एम के मित्तल और अरुण कुमार मिश्रा और पटेल इंजीनियरिंग लिमिटेड के खिलाफ मामला दर्ज किया है।

पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने सोशल मीडिया एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा कि पिछले 3-4 दिनों से मैं बीमार हूं और अस्पताल में भर्ती हूं। इसके वावजूद मेरे मकान में तानाशाह द्वारा सरकारी एजेंसियों से छापे डलवाए जा रहे हैं। मेरे ड्राइवर, मेरे साहयक के ऊपर भी छापे मारकर उनको बेवजह परेशान किया जा रहा है। में किसान का बेटा हूं, इन छापों से घबराऊंगा नहीं। मैं किसानों के साथ हूं। सत्यपाल मलिक (पूर्व गवर्नर)

मनमोहन सिंह या नरेंद्र मोदी, 10 साल किसके बेहतर ?

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2024 का लोकसभा चुनाव देश की दहलीज पर खड़ा है,  सत्ताधारी पार्टी और विपक्ष एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप की झाड़ियां लगा रहे हैं इसमें कोई संदेह नहीं कि आरोप और प्रत्यारोप भारतीय लोकतंत्र के चुनावों में ब्रह्मास्त्र से भी बड़े अस्त्र है लोकसभा के चुनाव से पहले जनता को अपने पक्ष में करने के लिए सत्ता पक्ष और विपक्ष आरोप -प्रत्यारोपों के साथ-साथ अपने कार्यकाल की उपलब्धियां भी गिना रहे हैं चलो उपलब्धियां गिनाने तक तो ठीक है मगर ये एक- दूसरे के कार्यकाल को  अपशब्दों से  भी  अलंकृत  कर रहे हैं बीजेपी के नेतृत्व वाली नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस यानी NDA ने कांग्रेस के 2004 से 2014 तक के कार्यकाल को अर्थव्यवस्था की बदहाली के आधार पर विनाश काल कहा जबकि कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूनाइटेड प्रोग्रेसिव एलाइंस  यानी UPA ने बीजेपी के 2014 से 2024 तक के कार्यकाल को अन्याय काल की संज्ञा दी. अब प्रश्न यह उठता है कि किसका कार्यकाल सबसे बेहतर रहा बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए का या कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए का। 

हाल ही में बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए ने अपने और कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए के कार्यकाल के दौरान की आर्थिक नीतियों की तुलना के लिए एक श्वेत पत्र जारी किया इस श्वेत पत्र में एनडीए ने 2004 से 2014 तक की यूपीए के कार्यकाल को विनाश काल की संज्ञा दी तथा 2014 से 24 तक के स्वयं के कार्यकाल को अमृत काल कहा वहीं एनडीए के इस फैसले के जवाब में कांग्रेस ने एक ब्लैक पेपर जारी किया और 2014 से 24 तक के एनडीए के कार्यकाल को 10 साल अन्याय काल  की संज्ञा दी इस बेहतर दिखने की प्रतियोगिता पर मुझे एक शेर याद आता है “खुद को ऊंचा दिखाने के लिए, दूसरे को नीचा दिखाओ. कोई तुम्हें ऊंचा माने या ना माने, खुद से ही मनवाओ”. दोनों ही दस्तावेज़ 50 से 60 पन्ने के हैं और इनमें आंकड़े और चार्ट की मदद से आरोप और दावे किए गए हैं। 

बीजेपी ने कांग्रेस पर क्या क्या आरोप लगाए-

खैर बीजेपी ने अपने श्वेत पत्र में कांग्रेस पर बजट घाटे से भागने, कोल ब्लॉक आवंटन घोटाला, 2G स्पेक्ट्रम घोटाला, राष्ट्रमंडल खेल घोटाला, जैसे कई घोटालों की एक श्रृंखला बनाने का आरोप लगाया, और कहा कि  इन घोटालों के कारण देश में निवेश की गति धीमी हुई , फलस्वरूप आर्थिक विकास पिछड़ता चला गया वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस ने भी  जवाब  देते हुए , एनडीए के कार्यकाल में बेरोजगारी बढ़ने नोटबंदी करने और  आधे अधूरे तरीके से जीएसटी व्यवस्था लागू करने, जैसे विनाशकारी आर्थिक फैसले लेने का आरोप लगाया और कहा कि इन फैसलों से अमीर और गरीब के बीच खाई बढ़ती जा रही है। 

कांग्रेस के अनुसार उसका दस्तावेज़ सत्ताधारी बीजेपी के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक ‘अन्यायों’ पर केंद्रित है जबकि सरकार का जारी श्वेत पत्र यूपीए सरकार की आर्थिक गलतियों पर रोशनी डालने तक सीमित है अर्थव्यवस्था को लेकर कांग्रेस का कहना है कि पीएम मोदी का कार्यकाल भारी बेरोजगारी, नोटबंदी और आधे-अधूरे तरीके से गुड्स एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) व्यवस्था लागू करने जैसे विनाशकारी आर्थिक फ़ैसलों, अमीरों-गरीबों के बीच बढ़ती खाई और निजी निवेश के कम होने का गवाह रहा है दूसरी तरफ बीजेपी ने बैड बैंक लोन में उछाल, बजट घाटे से भागना, कोयला से लेकर 2जी स्पेक्ट्रम तक हर चीज़ के आवंटन में घोटालों की एक श्रृंखला और फैसला लेने में अक्षमता जैसे कई आरोप कांग्रेस पर लगाए हैं बीजेपी का कहना है कि इसकी वजह से देश में निवेश की गति धीमी हुई है। 

विभिन्न विश्लेषणों से शायद ये पता चले कि दोनों ही पार्टियां एक-दूसरे के बारे में जो दावे कर रही हैं, कुछ हद तक वो सही बातें भी हैं दोनों ओर के आरोपों में कुछ सच्चाई है. दोनों ने बुरे फैसले लिए,, कांग्रेस ने टेलीकॉम और कोयला में और बीजेपी ने नोटबंदी में,, यूपीए और एनडीए के एक दूसरे पर लगाए गए आरोप सत्य है या भ्रामक इसके लिए हमने सबसे पहले दोनों पार्टियों के पिछले 10-10 वर्षों के दौरान लिए गए आर्थिक फैसलों का आंकड़ों सहित अध्ययन किया, और आज हम इन आंकड़ों का विस्तृत विवरण आपके सामने रख रहे हैं, जिससे आप स्वयं यह फैसला ले सके कि किसका 10 वर्ष का कार्यकाल बेहतर रहा, यूपीए का 2004 से 2014 तक का या फिर एनडीए का 2014 से 2024 तक का। 

अब बात जीडीपी की-

सबसे पहले बात करते हैं आर्थिक विकास के मुख्य संकेतक जीडीपी यानी ग्रास डोमेस्टिक प्रोडक्ट की,  आईएमएफ के अनुसार -यूपीए के  10 वर्षों के कार्यकाल के दौरान 2008-09 के बीच के वैश्विक आर्थिक संकट को छोड़ दिया जाए तो  औसत जीडीपी दर 8.1% रही, आपको बता दे 2008- 9  के दौरान पूरे विश्व में आर्थिक मंदी छाई हुई थी और लगभग आर्थिक गतिविधियां स्थिर हो गई थी, जबकि एनडीए के 10 वर्षों के कार्यकाल में  2020-21 में कोविड महामारी को छोड़ दिया जाए तो  औसत जीडीपी दर 7.1% रही,,  जो कि यूपीए के कार्यकाल की जीडीपी से एक प्रतिशत कम रही लेकिन सच ये है कि भारत की अर्थव्यवस्था पर वैश्विक आर्थिक संकट के मुकाबले कोविड महामारी के कहर का असर अधिक था इसलिए ताज्जुब नहीं कि एनडीए सरकार के दौरान एक दशक का जीडीपी औसत कम रहा कोविड ने अर्थव्यवस्था के सामने जो बाधा पैदा की वो बहुत बड़ी थी  इस महामारी ने इस दशक के दौरान कुछ सालों के लिए अर्थव्यवस्था की गति को धीमा कर दिया। 

अब बात करते हैं भारतीय युवाओं की मुख्य आवश्यकता रोजगार की विश्लेषकों का मानना है कि रोजगार देने के मामले में बीजेपी सरकारों का अभी तक का इतिहास बहुत काला रहा,,, सच क्या है / इसकी वास्तविकता जानने के लिए हमने “सेंटर फॉर मॉनेटरी इंडियन इकॉनमी के Prowess IQ ” डेटाबेस का अध्ययन किया और पाया कि यूपीए के कार्यकाल के अंतिम वर्ष जनवरी 2014 में बेरोजगारी दर 5.42 पर्सेंट थी जबकि एनडीए के कार्यकाल के अंतिम वर्ष जनवरी 2024 में बेरोजगारी दर बढ़कर 6.57 % हो गई,

 

देखा जाए तो यह बेरोजगारी दर अब भी लगातार बढ़ती जा रही है, ,,जबकि एनडीए सरकार ने 2019 के अपने घोषणा पत्र में लाखों लोगों को रोजगार देने की बात कही थी सेंटर फ़ॉर मॉनिटरिंग द इंडियन इकोनॉमी (CMIE) के आँकड़ों के अनुसार, 2017-18 में बेरोज़गारी बीते 45 सालों में सबसे अधिक यानी 6.1% पर थी,, प्यू रिसर्च के अनुसार, 2021 की शुरुआत से अब तक 2.5 करोड़ से अधिक लोग अपनी नौकरी गँवा चुके हैं और 7.5 करोड़ लोग ग़रीबी रेखा पर पहुँच चुके हैं, जिनमें 10 करोड़ मध्यम वर्ग का एक तिहाई शामिल है हालाँकि यहाँ एक बात और confusion पैदा करती है की ,गरीबी के आंकड़े विभिन्न माध्यमों से देखा जाए तो कई बार अलग अलग दिखाई देते हैं,, उसका आंकलन इस बात से भी लगाया जा सकता है की भारत में मोदी सरकार के द्वारा 60 करोड़ से ज्यादा  लोगों को मुफ्त राशन दिया जा रहा है खैर, हर साल देश की अर्थव्यवस्था को 2 करोड़ नौकरियाँ चाहिए लेकिन भारत में बीते दशक में हर साल केवल 43 लाख नौकरियाँ ही पैदा हुईं। इन आंकड़ों को देखकर पता चलता है कि वर्तमान मोदी सरकार पूर्व की मनमोहन सरकार से रोजगार देने के मामले में काफी पीछे रही। 

अब बात देश की अर्थव्यवस्था के मुख्य आधार निर्यात की- 

कहते हैं जिस देश में निर्यात अधिक और आयात कम होते हैं वहां की अर्थव्यवस्था संपन्न अर्थव्यवस्था मानी जाती है,  चलो देखते हैं यूपीए और एनडीए के कार्यकालों में किसके समय निर्यात अधिक रहा,, “प्रेस इनफार्मेशन ब्यूरो के अनुसार” जहां 2004 में भारत से निर्यात 80 अरब डॉलर का होता था वह 10 सालों में  साढ़े तीन गुना बढ़कर 2014 तक 300 अरब डॉलर का हो गया,,, फिर 2014 में एनडीए का कार्यकाल आया और उसके 10 सालों के दौरान निर्यात  300 अरब डॉलर से से बढ़कर 437 अरब डालर तक ही पहुंच  पाया यानी निर्यात में मात्र डेढ़ गुना की वृद्धि हुई अर्थात यूपीए के समय के आधे, ये दोनों ही कई कारकों की वजह से हैं, जैसे भूमि अधिग्रहण और फैक्ट्रियों के लिए पर्यावरण की मंजूरी मिलने में मुश्किलें. साथ ही एक सच्चाई ये भी है कि भारत उस तरह वैश्विक व्यापार से नहीं जुड़ा है जैसा उसे होना चाहिए। लंबे समय से ये कारक देश के मैन्युफ़ैक्चरिंग और निर्यात वृद्धि को कम रखने का कारण रहे हैं देखा जाए तो यूपीए की तुलना में एनडीए इस मोर्चे पर भी असफल रही। 

अब बात करते हैं अर्थव्यवस्था की रीढ़ देश के नागरिकों की,, किसी देश के समृद्ध नागरिक वहां के लिए संसाधन माने जाते हैं संयुक्त राष्ट्र का अभिकरण यूएनडीपी विभिन्न देशों के लिए मानव विकास सूचकांक जारी करता है. यह सूचकांक किसी देश के नागरिकों के स्वास्थ्य , शिक्षा तथा जीवन स्तर पर आधारित होता है इस सूचकांक में देशो को रैंक दी जाती है  यूएनडीपी के मानव विकास सूचकांक में जहां 2004 में भारत विश्व के 191 देश में 131 वे  स्थान पर था,, वही आज 20 साल गुजरने पर भी हम एक स्थान नीचे गिरकर 2023 में 132 में स्थान पर आ गए है  जो कि देश के लिए बहुत ही चिंताजनक है।  इस पर आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा था  ” कि फिजिकल कैपिटल बनाने में बहुत ध्यान दिया जा रहा है लेकिन ह्यूमन कैपिटल बनाने में और शिक्षा स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में सुधार पर अधिक ध्यान नहीं दिया जा रहा है” उन्होंने कहा कि सच्चाई ये है कि भारत में कुपोषण अफ़्रीकी देशों के कुछ हिस्सों से भी अधिक था यह ऐसे देश के लिए  ‘अस्वीकार्य’ है जिसकी विकास दर दुनिया के अधिकांश हिस्से को पीछे छोड़ रही है। 

2004 से 2013 के बीच भारत के एचडीआई मूल्य में 15 फीसदी का सुधार-
 

मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) के मामले में भी एनडीए का प्रदर्शन यूपीए के मुकाबले बुरा रहा है यह सूचकांक, स्वास्थ्य क्षेत्र में प्रगति, शिक्षा तक पहुंच और व्यक्ति के जीवन स्तर में प्रगति का मानक है 2004 से 2013 के बीच भारत के एचडीआई मूल्य में 15 फीसदी का सुधार हुआ,  हालांकि यूएनडीपी के ताज़ा उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2014 और 2021 के बीच इसमें केवल 2 फीसदी का सुधार हुआ. अगर कोविड महामारी के दो सालों को छोड़ भी दिया जाए तो भी 2019 तक एचडीआई में, यूपीए के पांच सालों के 7 फीसदी के मुकाबले केवल 4 फीसदी का सुधार रहा है। 

अब बात पूंजीगत निर्माण को लेकर,,, मोदी  सरकार ने पूर्व की मनमोहन सरकार से सड़क निर्माण जैसे पूंजीगत व्यय पर अधिक ख़र्च किया, बात करें यूपीए सरकार के 10 सालों की तो इस दौरान 10 सालों में सिर्फ 27 हजार किलोमीटर सड़कों का निर्माण हुआ जबकि इस मामले में मोदी सरकार के 10 साल बेहतर साबित हुए,,,मोदी सरकार के 10 सालों में 54 हजार किलोमीटर के राष्ट्रिय राजमार्गो का निर्माण हुआ है. जीडीपी में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की बात करें तो एनडीए के शासनकाल में जीडीपी में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का जो हिस्सा होता है उसमें कमी आई है विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार जिन 10 सालों में यूपीए सरकार सत्ता में थी, उन सालों में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का औसत 15 से 17 फीसदी के बीच था, वहीं मोदी सरकार के कार्यकाल में ‘मेक इन इंडिया’ जैसी मुहिम और उत्पादन से जुड़ी छूट पर अरबों डॉलर खर्च करने के बावजूद, 2022 के लिए उपलब्ध ताज़ा आंकड़ों के अनुसार मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का जीडीपी में हिस्सा गिरकर 13 फीसदी आ गया। 

 
NDA vs UPA में आर्थिक प्रदर्शन में कौन आगे है ? 

 केंद्र सरकार द्वारा हाल ही में प्रस्तुत श्वेत पत्र में इस बात पर जोर दिया गया है कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) सरकार के कार्यकाल के 10 वर्षों में देश का आर्थिक प्रदर्शन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) सरकार के 10 वर्षों  की तुलना में बेहतर रहा है,,,,इसमें कोई दो राय नहीं है कि बीते 10 वर्षों में हालात में उल्लेखनीय सुधार हुआ है लेकिन सरकारी ऋण और आम सरकारी घाटा ऊंचे स्तर पर बना हुआ है,,, राजकोषीय घाटे की बात करें तो 2023-24 में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के प्रतिशत के रूप में इसका संशोधित अनुमान 5.8 के स्तर पर रहा जबकि 2013-14 में यह 4.4 के स्तर पर था।

ऐसा मोटे तौर पर इसलिए हुआ कि कोविड-19 ने कई तरह की बाधाएं पैदा की थीं। बहरहाल एक तथ्य यह भी है कि UPA सरकार को भी 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट से जूझना पड़ा था जिसकी वजह से राजकोषीय घाटे में काफी इजाफा हुआ था। पर सच ये भी है की कोविड-19 महामारी का आर्थिक प्रभाव कहीं अधिक गहरा था केंद्र सरकार का पूंजीगत व्यय 2024-25 में जीडीपी के 3.4 फीसदी के स्तर पर है। इससे न केवल अर्थव्यवस्था को मदद मिलेगी बल्कि सरकार को समय के साथ व्यय को सीमित करने का अवसर भी  मिलेगा। एक बार निजी निवेश के गति पकड़ने के बाद सरकार पूंजीगत व्यय कम कर सकती है और अपनी वित्तीय स्थिति मजबूत करने पर विचार कर सकती है। पूंजीगत व्यय की बात करें तो 2023-24 में यह कुल व्यय का 28 फीसदी था जबकि 2013-14 में यह उसका केवल 16 फीसदी था इस बीच NDA सरकार का राजस्व व्यय UPA की तुलना में धीमी गति से बढ़ा है, राजस्व व्यय में NDA के कार्यकाल में सालाना 9.9 फीसदी की दर से वृद्धि हुई जबकि उससे पहले के 10 वर्षों में यह 14.2 फीसदी की दर से बढ़ा था ।

अब कुछ और मुख्य बिंदु-
पहला मुद्रास्फीति-  जो तब  FY 2004 – FY 2014 के बीच मुद्रास्फीति का  सीएजीआर  8.2% रहा  जबकि वित्त वर्ष 2014 – वित्तीय वर्ष 23 के बीच मुद्रास्फीति का सीएजीआर  5.0% रहा है।
प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद  यानी GDP Per Capita वित्त वर्ष 2005 से वित्त वर्ष 2014 के बीच तब  :3,889 $   जबकि वित्त वर्ष 2015-वित्त वर्ष 23 के बीच: $6,016 रही।
वित्त वर्ष 2014 के लिए सकल घरेलू उत्पाद के प्रतिशत के रूप में पूंजीगत व्यय तब 1.7% था,जबकि वित्त वर्ष 2024 के लिए सकल घरेलू उत्पाद के प्रतिशत के रूप में पूंजीगत व्यय अब 3.2% है।
प्रत्यक्ष विदेशी निवेश तब $305 बिलियन था जबकि अब $596.5 बिलियन है बहुआयामी गरीबी 2013-14 के अंत तक  तब 29.2% थी, जबकि अब 2023 के अंत तक अनुमानित 11.3% है।
अप्रत्यक्ष कर की दर तब 15%  अब 12.2% तक है,स्टार्ट-अप की संख्या 2014 तक,, तब मात्र 350 थी, जबकि 31 दिसंबर 2023 तक इनकी संख्या अब जबरदस्त तरीके से बढ़ कर  1,17,257 हो गयी है।

मेट्रो रेल वाले शहरों की संख्या 2014 के अंत तक सिर्फ 5 थी,जबकि 2023 के अंत तक यह संख्या 20 हो गयी है, राजमार्ग निर्माण की गति 2013-14 में  तब 12 किलोमीटर प्रतिदिन थी जबकि 2022-23 में गति  28 किलोमीटर प्रतिदिन है. वित्तीय वर्ष 2005 और वित्तीय वर्ष 2014 के बीच देश में रेल दुर्घटनाओं की औसत संख्या 233 थी जो अब वित्त वर्ष 2015 और वित्तीय वर्ष 23 के बीच दुर्घटनाओं की औसत घटकर संख्या 34 हो गयी है,,,2014 तक विद्युतीकृत ब्रॉड-गेज रेल नेटवर्क 21.8 हजार किमी थी जो अब 60.8 हजार किमी है,,,हवाई अड्डों की संख्या 2014 के अंत तक 74 थी जबकि 2024 तक ये संख्या 149 है. कुल स्थापित बिजली क्षमता मार्च 2014 तक 249 गीगा वाट थी, जो अब  दिसंबर 2023 तक  429 गीगावाट है ।

ये कुछ ऐसे बिंदु है जिसमें आप दोनों सरकारों के कामकाज का आकलन कर सकते हैं। इस तरह हमने एनडीए और यूपीए के कार्यकाल के 10-10 सालों की आर्थिक नीतियों का विवरण आपके सामने आंकड़ों तथा तथ्यों के साथ रखा है अब आप खुद ही फैसला कीजिये कि किसका कार्यकाल बेहतर रहा, 2004 से 2014 यूपीए का या फिर 2014 से 2024 एनडीए का ?

Farmers Protest: MSP पर सरकार का प्रस्ताव या ‘खेल’, क्यों नहीं माने किसान ?

300 Minutes Read -

प्रदर्शन कर रहे किसानों और केंद्र सरकार के बीच गतिरोध खत्म नहीं हो रहा. फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी (MSP) पर नरेंद्र मोदी सरकार ने जो प्रस्ताव रखा था,उसे किसानों ने खारिज कर दिया है और कहा कि वो 21 फरवरी की सुबह अपना ‘दिल्ली चलो’  मार्च फिर से शुरू करेंगे. किसान नेताओं का कहना है कि सरकारी प्रस्ताव में स्पष्टता नहीं है और वो उनके हित में भी नहीं है.

किसानों की दो प्रमुख मांगें हैं पहली कि सरकार MSP गारंटी पर कानून बनाए. भले ही सरकार उनकी पूरी फसल न ख़रीदे, पर अगर किसान खुले बाजार में भी अपनी उपज बेचता है, तो उसे न्यूनतम कीमत की गारंटी मिले. क़ानून बन जाने से सरकार, प्राइवेट कंपनियां या पब्लिक सेक्टर एजेंसियां, कोई भी मनमाने दाम पर फसल नहीं खरीद पाएगा.

दूसरी मांग- MSP गारंटी के साथ किसान स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करवाना चाहते हैं,, इसके अलावा किसानों और खेतिहर मजदूरों को पेंशन मिले, बिजली दरों में बढ़ोतरी न हो, किसानों का कर्ज माफ हो, भूमि अधिग्रहण अधिनियम (2013) बहाल किया जाए, लखीमपुर खीरी हिंसा मामले में न्याय मिले 2020-21 में हुए आंदोलन के दौरान मारे गए किसानों के परिवारों को मुआवजा दिया जाए और पुलिस ने जो मामले दर्ज किए थे, वो भी वापस लिए जाएं.

कृषि केंद्रीय मंत्रियों ने रखा सरकार की ओर से ये प्रस्ताव- 

वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल, कृषि व किसान कल्याण मंत्री अर्जुन मुंडा और गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने चंडीगढ़ में किसान नेताओं के साथ चौथे दौर की बातचीत की केंद्रीय मंत्रियों के पैनल ने सरकार की ओर से प्रस्ताव रखा. सरकार का कहना है कि मसूर, उड़द, तुअर, मक्का और कपास उगाने वाले किसानों के साथ दो सहकारी एजेंसियां राष्ट्रीय सहकारी उपभोक्ता संघ और  भारतीय राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ 5 साल का एग्रीमेंट करेंगी और इस एग्रीमेंट के ज़रिए सीधे किसानों से ये फसलें MSP पर खरीदा जाएंगी ख़रीद की मात्रा पर कोई सीमा नहीं होगी, और इसके लिए एक पोर्टल बनाया जाएगा.

इससे पहले, 18 फरवरी की रात केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि साल 2004 से 2014 के बीच UPA सरकार ने केवल साढ़े 5 लाख करोड़ रुपये की फसलों की ख़रीद MSP पर की थी और मोदी सरकार ने बीते दस सालों में 18 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा की ख़रीद की है बैठक के बाद किसान नेताओं ने कहा था कि वो अपने संगठन के साथ सरकार के प्रस्ताव पर चर्चा करेंगे और दो दिनों में आगे की रणनीति तय करेंगे.

केंद्रीय मंत्री ने तो दावा कर दिया. मगर किसान इससे खुश नहीं हैं. उनका सीधा कहना है कि केवल पांच नहीं, सभी 23 फसलों पर MSP की गारंटी चाहिए किसान मजदूर मोर्चा के नेता सरवन सिंह ने शंभू सीमा पर मीडिया से कहा, कि हम सरकार से अपील करते हैं कि या तो हमारे मुद्दों का समाधान करें या बैरिकेड हटा दें और हमें शांतिपूर्वक विरोध करने के लिए दिल्ली जाने की अनुमति दें.

क्या कहते हैं इस पर विशेषज्ञ-
 

अब सवाल ये है कि आगे का रास्ता क्या हो सकता है विशेषज्ञ मानते हैं अब इसके दो तरीके हैं. पहला कि खरीदारों को MSP पर फसल खरीदने के लिए फोर्स किया जाए मसलन, क़ानून कहता है कि गन्ना उत्पादकों को चीनी मिलों की तरफ से खरीद के 14 दिनों के अंदर ‘उचित और लाभकारी’ या राज्य-सलाहित मूल्य मिलेगा लेकिन ये व्यावहारिक नजरिए से मुश्किल है हो सकता है MSP देने के ‘डर’ से फसल खरीदी ही न जाए दूसरा तरीका ये है कि सरकार ही किसानों की पूरी फसल MSP पर खरीद ले  मगर ये भी वित्तीय लिहाज़ से टिकाऊ प्लान नहीं है.

इन दोनों तरीकों के अलावा कृषि विशेषज्ञ एक तीसरे तरक़े की ओर इशारा करते हैं मूल्य कमी भुगतान यानी PDP इसमें सरकार को किसी भी फसल को खरीदने या स्टॉक करने की ज़रूरत नहीं है बस अगर बाजार मूल्य और MSP कम है, तो सरकार सुनिश्चित कर दे कि किसानों को इन दोनों के बीच का अंतर मिल जाए मगर राष्ट्र के स्तर पर इसे लागू करने के लिए बहुत सोचा-समझा एक  प्लान चाहिए. अब सरकार और किसानों के अगले रुख पर अब सबकी नजरें टिकी हुई हैं.

ये हैं किसानों की प्रमुख मांगें
  • स्वामीनाथन रिपोर्ट के अनुसार सभी फसलों की एमएसपी की कानूनी गारंटी की मांग
  • किसानों और खेत मजदूरों की कर्ज माफी की मांग
  • लखीमपुर खीरी में जान गंवाने वाले किसानों को इंसाफ और आशीष मिश्रा की जमानत रद्द कर सभी दोषियों को सजा की मांग
  • लखीमपुर खीरी कांड में घायल सभी किसानों को वादे के मुताबिक 10 लाख रुपये मुआवजे की मांग
  • किसान आंदोलन के दौरान दर्ज केस रद्द करने की मांग
  • पिछले आंदोलन में जान गंवाने वाले किसानों के आश्रितों को नौकरी
  • 200 दिन मनरेगा की दिहाड़ी मिले
  • 700 रुपये प्रतिदिन मजदूरी की मांग
  • फसल बीमा सरकार खुद करे
  • किसान और मजदूर को 60 साल होने पर 10 हजार रुपये महीना मिले
  • विश्व व्यापार संगठन से खेती को बाहर किया जाए

MP Politics: कमलनाथ के साथ उनके बेटे नकुलनाथ भी होंगे बीजेपी में शामिल? सोशल मीडिया प्रोफाइल से हटाया कांग्रेस का नाम और लोगो।

240 Minutes Read -

अब मध्यप्रदेश में कांग्रेस पार्टी को एक बड़ा झटका लग सकता है। पार्टी के दिग्गज नेता कमलनाथ और उनके बेटे नकुलनाथ की भाजपा में शामिल होने की अटकलें अब तेज हो गई है। इस बीच नकुलनाथ के एक्स हैंडल पर उनकी पुरानी पार्टी का नाम और लोगो भी हट गया है।

नकुलनाथ ने अपने बायो से कांग्रेस का लोगो हटाया-

छिंदवाड़ा सांसद नकुलनाथ ने अपने तीनों सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक, इंस्टाग्राम और एक्स में अपने बायो से कांग्रेस का नाम हटा दिया है और अब केवल उनके नाम के आगे सिर्फ छिंदवाड़ा सांसद लिखा है।

कमलनाथ के कांग्रेस में शामिल होने की अटकलों के बीच अब सोशल मीडिया मीडिया एक्‍स पर भी कमलनाथ खूब ट्रेंड कर रहा है, जिसमें कमलनाथ के भाजपा में शामिल होने के बड़े-बड़े दावे किये जा रहे है। हालांकि, पिछले कई दिनों से जब कमल नाथ से उनके भाजपा में जाने पर सवाल पूछा गया तो उन्होंने इसका कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया था।

सुमित्रा महाजन ने दिया था उन्हें न्योता-

पूर्व लोकसभा स्‍पीकर और पूर्व इंदौर सांसद सुमित्रा महाजन ने पिछले दिनों कमलनाथ को जय सियाराम के नारे के साथ भाजपा में आने का निमंत्रण दिया था। उन्होंने कहा था कि यदि विकास पसंद है तो पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ भाजपा में शामिल हो सकते हैं।

भाजपा ने कहा- उनका स्वागत है

कमलनाथ के भाजपा में शामिल होने के सवाल पर भाजपा प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा ने कहा कि अगर वो अपनी पार्टी से परेशान हैं तो उनका भाजपा में स्वागत है। वहीं, भाजपा प्रवक्ता नरेंद्र सलूजा ने भी कमलनाथ और नकुलनाथ की फोटो के साथ जय श्री राम का नारा लिखा है।

क्या कहा दिग्विजय सिंह ने-

कमलनाथ के भाजपा में शामिल होने के सवाल पर दिग्विजय सिंह ने कहा कि कल रात मेरी कमलनाथ से बातचीत हुई है। वह छिंदवाड़ा में हैं और वह ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने अपना राजनीतिक करियर नेहरू-गांधी परिवार के साथ शुरू किया था। इसलिए उनके भाजपा में जाने की बात गलत है।https://youtu.be/AWGz5VvxKc0

कांग्रेस के खातों पर लगे प्रतिबंध के खिलाफ IT ट्रिब्यूनल पहुंची कांग्रेस, मिली राहत; आयकर विभाग ने किए थे फ्रीज.

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कांग्रेस को आयकर विभाग की तरफ से खातों पर लगाए प्रतिबंधों के मामले में ट्रिब्यूनल की तरफ से बड़ी राहत मिली है। पार्टी के नेता विवेक तन्खा ने बताया है कि इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल ने कांग्रेस को अंतरिम राहत देते हुए उसे खातों को चलाने की छूट दी है। ट्रिब्यूनल इस मामले में अंतरिम राहत के लिए बुधवार को सुनवाई करेगा।

गौरतलब है कि इससे पहले पार्टी के प्रवक्ता अजय माकन ने शुक्रवार को ही प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि आयकर विभाग ने 2018-19 के आयकर रिटर्न के आधार पर कांग्रेस और यूथ कांग्रेस के खातों को फ्रीज कर दिया है। उन्होंने कहा कि आयकर विभाग ने इन दोनों खातों से 210 करोड़ रुपये की रिकवरी का भी आदेश दिया है। उन्होंने कहा कि हमारे अकाउंट में जो भी क्राउडफंडिंग से जुटाई गई राशि है, उसे हमारी पहुंच से दूर कर दिया गया है
माकन ने कहा कि चुनाव के एलान से महज दो हफ्ते पहले ही विपक्षी पार्टी का अकाउंट फ्रीज कर दिया गया। यह लोकतंत्र को फ्रीज करने जैसा है। माकन ने बताया कि इस खाते में एक महीने की सैलरी भी दी है। हमने आयकर विभाग को उन दानकर्ताओं के नाम भी दिए हैं।

माकन ने कहा, “हमें एक दिन पहले ही जानकारी मिली थी कि बैंकों को हम जो चेक भेज रहे थे, उनका निपटारा नहीं हो पा रहा था। जांच पर पता चला कि यूथ कांग्रेस का बैंक अकाउंट फ्रीज कर दिया गया है। इसके साथ ही कांग्रेस पार्टी के खाते भी बंद होने की बात सामने आई। कुल चार अकाउंट फ्रीज किए गए हैं। आयकर विभाग की तरफ से बैंकों को यह निर्देश दिया गया है कि हमारे कोई भी चेक स्वीकार न करें और हमारे खातों में जो भी राशि है उसे रिकवरी के लिए रखा जाए।”

भाजपा पर लगाए आरोप-
माकन ने कहा कि कांग्रेस ने इस मामले को लेकर आयकर अपीलीय अधिकरण का रुख किया है। उन्होंने उम्मीद जताई कि न्यायपालिका लोकतंत्र की रक्षा करेगी। कांग्रेस नेता ने भाजपा पर आरोप लगाते हुए कहा कि क्या वे यही चाहते हैं कि देश में सिर्फ एक ही पार्टी रहे। उन्होंने कहा कि अगर किसी के खाते सील होने चाहिए तो भारतीय जनता पार्टी के होने चाहिए क्योंकि उन्होंने ‘असंवैधानिक’ चुनावी बॉन्ड के जरिए कॉर्पोरेट जगत से पैसे लिए हैं।

‘हमारे पास बिजली का बिल भरने के पैसे भी नहीं’-
कांग्रेस के ट्रेजरर माकन ने कहा कि अभी कांग्रेस के पास खर्च करने के लिए पैसे तक नहीं हैं। उन्होंने कहा कि हमारे पास बिजली के बिल देने के लिए, अपने कर्मचारियों को सैलरी देने के लिए तक राशि नहीं बची है। उन्होंने कहा कि इससे हर चीज पर प्रभाव पड़ेगा। न सिर्फ न्याय यात्रा, बल्कि सभी तरह की राजनीतिक गतिविधियां प्रभावित होंगी।