Category Archive : राज्य

एसआईआर…2003 की मतदाता सूची जारी, 18 विधानसभा सीटें आज अस्तित्व में नहीं, नाम खोजना चुनौती

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चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के लिए उत्तराखंड की वर्ष 2003 की मतदाता सूची तो जारी हो गई लेकिन इसमें नाम खोजना आसान नहीं है। प्रदेशभर में उस वक्त 18 विधानसभा सीटें ऐसी थीं, जो आज अस्तित्व में ही नहीं हैं। परिसीमन के बाद इनके नाम और क्षेत्र बदल गए थे।

एसआईआर के लिए वर्ष 2003 की मतदाता सूची से मिलान किया जाना है। आपका वोट 2003 में था या नहीं, इसके लिए मुख्य निर्वाचन अधिकारी देहरादून कार्यालय ने वेबसाइट ceo.uk.gov.in पर वर्ष 2003 की मतदाता सूची जारी कर दी है। नई पीढ़ी के मतदाता जब यहां देहरादून की धर्मपुर व रायपुर, चमोली की थराली, पौड़ी की चौबट्टाखाल, नैनीताल की लालकुआं व भीमताल, ऊधमसिंह नगर की कालाढूंगी सीट की तलाश करेंगे तो उन्हें नहीं मिलेगी। वर्ष 2003 में ये विधानसभा सीटें थी ही नहीं।

राज्य गठन के बाद पहला परिसीमन वर्ष 2002 में हुआ था, जिसमें राज्य में विधानसभा की 70 और लोकसभा की पांच सीटें तय हुई थीं। 2003 की मतदाता सूची में भी इन्हीं सीटों का जिक्र है। इसके बाद राष्ट्रीय स्तर पर जब वर्ष 2008 में परिसीमन हुआ तो उत्तराखंड की विधानसभा, लोकसभा सीटों की संख्या तो नहीं बदली लेकिन 18 सीटों का वजूद खत्म हो गया था। इसके बजाय नए नाम से सीटें आ गई थीं। वर्तमान मतदाता जब नए नाम को सर्च करेंगे तो उन्हें 2003 की मतदाता सूची में इन 18 सीटों के नाम नहीं मिलेंगे।

2003 और 2025 में ये हुआ बदलाव

चमोली जिले में नंद्रप्रयाग व पिंडर के नाम से विस सीट थीं, जिनकी जगह अब थराली नाम से सीट है। देहरादून जिले में लक्ष्मणचौक व देहरादून के नाम से सीट थी, अब धर्मपुर, रायपुर व देहरादून कैंट के नाम से है। हरिद्वार जिले में इकबालपुर, लंढौरा, बहादराबाद, लालढांग के नाम से सीट थीं, अब इनकी जगह भेल रानीपुर, ज्वालापुर, झबरेड़ा, पिरान कलियर, खानपुर व हरिद्वार ग्रामीण के नाम से है। पौड़ी जिले में धूमाकोट, बीरोंखाल, थलीसैंण के नाम से सीट थीं, अब इनकी जगह चौबट्टाखाल नाम से है। पिथौरागढ़ में कनालीछीना और अल्मोड़ा में भिकियासैंण के नाम से सीट थीं, जो अब नहीं हैं। नैनीताल में मुकतेश्वर व धारी के नाम से सीट थीं, अब लालकुआं, भीमताल व कालाढूंगी के नाम से हैं। यूएसनगर में पंतनगर-गदरपुर, रुद्रपुर-किच्छा के नाम से सीट थीं, जो खत्म हो गईं और इनकी जगह गदरपुर, रुद्रपुर, किच्छा व नानकमत्ता के नाम से सीट है।

वेबसाइट पर पुराने वोटर आईडी या एडवांस सर्च करें

निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट पर आप 2003 की वोटर लिस्ट में अपना नाम पुराने वोटर आईडी कार्ड के इपिक नंबर से सर्च कर सकते हैं। अगर वो नहीं है तो आप एडवांस सर्च में जाकर अपना नाम, पिता का नाम, पोलिंग स्टेशन का नाम, उम्र आदि की जानकारी देकर निकाल सकते हैं।

समान काम के लिए समान वेतन देने का आदेश, पहले चरण में करीब 5500 उपनल कर्मचारियों को मिलेगा लाभ

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सरकार के उपनल कर्मचारियों को समान काम के लिए समान वेतन दिए जाने के फैसले से पहले चरण में 5500 कर्मचारियों को इसका लाभ मिलेगा। प्रदेश के उपनल कर्मचारी नियमित करने एवं समान काम के लिए समान वेतन दिए जाने की मांग कर रहे थे।

लंबित मांगों के लिए कर्मचारी पिछले 16 दिन से हड़ताल पर थे, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर कर्मचारियों को समान काम के लिए समान वेतन दिए जाने का आदेश जारी हुआ। सैनिक कल्याण मंत्री गणेश जोशी के मुताबिक पहले चरण में प्रदेश के करीब 5500 उपनल कर्मचारियों को इसका लाभ मिलेगा। हालांकि इसके बाद सभी कर्मचारियों को चरणबद्ध तरीके से समान काम के लिए समान वेतन का लाभ दिया जाना है।

उत्तराखंड में 3.30 लाख स्मार्ट मीटर लगने के बाद लगी रोक

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भारी प्रचार प्रसार के बावजूद खराब स्मार्ट मीटर विभाग के गले की हड्डी बनते जा रहे हैं। स्मार्ट मीटर में तमाम प्रकार की गड़बड़ी पकड़ में आने के बाद सम्बंधित विभाग यूपीसीएल कठघरे में खड़ा है।

विभाग से जुड़े कई उच्च पदस्थ अधिकारी उपभोक्ताओं की शिकायतों को लगातार अनसुनी करते हुए अपने मन की कर रहे थे। इस शर्मनाक गड़बड़ एपिसोड के ‘अलंबरदारों’ ने भाजपा सरकार की भी फजीहत करवा दी। समय रहते कारगर कदम उठा लिए जाते तो आज किरकिरी का सामना नहीं करना पड़ता।
ऊर्जा विभाग में पदस्थ अधिकारियों की ताजपोशी को लेकर शुरू से ही सवाल उठते रहे हैं।

उत्तराखंड में बिजली उपभोक्ताओं की लगातार बढ़ती नाराजगी और सोशल मीडिया से सड़क तक उठते विरोध के बाद आखिरकार प्रदेश सरकार और यूपीसीएल हरकत में आ गए हैं। ऊर्जा निगम ने राज्यभर में स्मार्ट मीटर लगाने की प्रक्रिया पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है।

हैरानी की बात यह है कि यह निर्णय तब लिया, जब प्रदेश में 3.30 लाख से अधिक स्मार्ट मीटर पहले ही इंस्टॉल किए जा चुके हैं। निगम के नए आदेश ने साफ कर दिया है कि उपभोक्ताओं की शिकायतें झूठी या बढ़ा-चढ़ाकर पेश की गई नहीं थीं, बल्कि स्मार्ट मीटरों की गुणवत्ता, रीडिंग और बिलिंग को लेकर गंभीर खामियां मौजूद थीं।

स्मार्ट मीटरों को लेकर महीनों से उठ रहे सवाल आखिरकार सही साबित हुए हैं। यूपीसीएल ने आधिकारिक आदेश जारी करते हुए राज्य में स्मार्ट मीटर इंस्टॉलेशन पर रोक लगा दी है। प्रबंध निदेशक अनिल यादव के निर्देश के अनुसार जहां भी गलत रीडिंग, तकनीकी त्रुटि या उपभोक्ता की आपत्ति मिलेगी, वहां मौजूदा स्मार्ट मीटर हटाकर नया तकनीकी रूप से उपयुक्त मीटर लगाया जाएगा।

मुख्य अभियंता बीएमएस परमार ने स्पष्ट किया है कि सभी शिकायतों की गंभीर समीक्षा की जाएगी और फील्ड अधिकारी खुद मौके पर जाकर निस्तारण करेंगे। अब उपभोक्ताओं को बिल सही है, मीटर ठीक है जैसे औपचारिक जवाब नहीं मिलेंगे।
आदेश में पहली बार यह स्वीकार किया है कि दोष उपभोक्ता का नहीं, बल्कि मीटर और सिस्टम का भी हो सकता है। इससे लाखों उपभोक्ताओं के उन सवालों को मजबूती मिली है, जो लंबे समय से नजरअंदाज किए जा रहे थे।

आखिर इतनी देर क्यों जागा निगम?

ऊर्जा निगम के भीतर सूत्र बताते हैं कि बीते कुछ महीनों में स्मार्ट मीटरों को लेकर शिकायतों का अंबार लग गया था। कई उपभोक्ता तीन-चार गुना बढ़े हुए बिल के खिलाफ लगातार विरोध कर रहे थे।

विधायक, पार्षद, जनप्रतिनिधि लगातार मीटरों की खराबी की बात उठा रहे थे, लेकिन निगम ने अब तक मीटर में गलती नहीं का रटा-रटाया जवाब ही दिया। बताया जा रहा है कि विभिन्न जिलों से मिली रिपोर्टों में मीटरों की तकनीकी कमियां उजागर हुईं—कहीं गलत रीडिंग, कहीं बैकएंड डेटा सिंकिंग खराब, तो कई स्थानों पर पूरे सिस्टम की त्रुटियां सामने आईं।

इन बढ़ती शिकायतों ने दबाव बनाया, जिसके बाद निगम को आदेश जारी करने पड़े। विशेषज्ञों का कहना है कि परियोजना को जल्दबाजी में लागू किया गया, फील्ड टेस्टिंग कमजोर थी और ठेकेदारों की मॉनिटरिंग भी सवालों में है। अब 3.30 लाख मीटर लगने के बाद रोक लगाना इस बात का संकेत है कि सिस्टम शुरू से ही मजबूत नहीं था। इससे उन हजारों उपभोक्ताओं को राहत मिलने की संभावना है, जो अब तक बढ़े हुए बिलों के सामने बेबस थे।

गौरतलब है कि रुद्रपुर से कांग्रेस विधायक तिलकराज बेहड़ ने स्मार्ट मीटर को खुलेआम तोड़ कर सम्बंधित कंपनी को भगा दिया था। कांग्रेस का आरोप है कि देश के प्रसिद्ध उद्योगपति को फायदा पहुंचाने के लिए जबरदस्ती स्मार्ट मीटर लगाए जा रहे हैं।

नए आदेश के बाद उपभोक्ताओं को यह अधिकार मिला है कि—

  • गलत बिल आने पर तकनीकी जांच की मांग कर सकें।
  • स्मार्ट मीटर की खराबी साबित होने पर मीटर बदलवाएं।
  • फील्ड अधिकारी मौके पर जांच करेंगे, केवल कागजी जवाब नहीं दिया जाएगा।
  • उपभोक्ता आदेश की कॉपी दिखाकर अधिकारियों से जवाबदारी तय कर सकेंगे।

बड़े सवाल जो अभी भी अनुत्तरित हैं-

  • गलत मीटर लगाने की जिम्मेदारी किसकी?
  • क्या ठेकेदारों की जांच होगी?
  • क्या पहले से लगे 3.30 लाख मीटरों का ऑडिट होगा?
  • उपभोक्ताओं को गलत बिलों का क्या मुआवजा मिलेगा?
  • मीटरों से हुए अधिक बिल का समायोजन कैसे होगा?

देखें रोक का आदेश

 

उक्रांद के उठान और ढलान का फील्ड मार्शल,अनछुए संस्मरण

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श्रद्धांजलि- उक्रांद के उठान और ढलान का फील्ड मार्शल

राज्य आंदोलनकारी डॉ एसपी सती ने साझा किए अनछुए संस्मरण

दिवाकर भट्ट नहीं रहे। दिवाकर भट्ट से मेरी पहली मुलाकात शायद सितंबर 1994 में हरिद्वार में हुई थी। हरिद्वार में साथी मधुसूदन थपलियाल (अब अध्यापक एवं प्रसिद्ध लोक कवि), सुशील बहुगुणा (अब एनडीटीवी के सुविख्यात पत्रकार) आदि साथियों ने राज्य आंदोलन की एक रैली रखी थी जिसमें स्व. अनिल काला, प्रभाकर बाबुलकर, स्व. रणजीत भण्डारी और मुझे बतौर वक्ता बुलाया गया था। रैली हुई भी और नहीं भी हुई क्योंकि इस जनसभा में अपेक्षा से कहीं कम लोग पहुंचे थे। हमारे आयोजक साथियों का आरोप था कि इस रैली को फ्लॉप करने के लिए दिवाकर भट्ट जी ने साजिश की।

उन दिनों उक्रांद और उत्तराखंड संयुक्त छात्र संघर्ष समिति के बीच इस तरह का अविश्वास कायम था। रैली के समाप्त होते ही हम साथियों ने निर्णय लिया कि दिवाकर भट्ट जी से मिला जाए।

इत्तेफाक से वह उस दिन हरिद्वार में ही थे। हम लोग जैसे ही उनके घर पहुंचे, उन्होंने गर्मजोशी से हमारा स्वागत किया। और ज़िद की कि खाना खाकर जाएंगे। भाभी ने स्वादिष्ट खाना बनाया। उस दिन एक तरह से हमारे संबंधों की आइस ब्रेकिंग हुई। जानते हमको वह भी थे और हम भी उनके नाम से खासे परिचित थे, परंतु मुलाकात की कोशिश न उधर से कभी हुई और न हमारी तरफ से ही।

खैर उस दिन के बाद दिवाकर भट्ट जी से आंदोलन के सिलसिले में मुलाकातें होती रहीं। उन दिनों उक्रान्द में गहरे मतभेद चल रहे थे जिसके चलते कुछ दिनों बाद दिवाकर भट्ट जी को पार्टी से निष्काषित किया गया।

लिहाजा बीच आंदोलन में उक्रांद दो फाड़ हो गई। एक बन गया काशी सिंह ऐरी गुट और दूसरा पूरन सिंह डंगवाल गुट। दिवाकर भट्ट जी डंगवाल गुट के हो गए। अब आंदोलन के बड़े कार्यक्रम देने की बारी थी। दिवाकर भट्ट जी ने इसके लिए श्रीयंत्र टापू को चुना।

सितंबर 1995 में दो आंदोलनकारी दौलतराम पोखरियाल और विशन सिंह पँवार को अलकनंदा नदी के बीच ऐतिहासिक श्रीयंत्र टापू में उनकी इच्छा से भूख हड़ताल पर बिठाया गया। उनका साथ देने के लिए हम भी तन मन से उस आंदोलन में श्रीयंत्र टापू में जुट गए। वहाँ हमारी दिवाकर जी से अत्यंत प्रगाढ़ता हो गई थी, जो राज्य गठन के बाद 2007 में भाजपा सरकार में उनके मंत्री बनने तक जारी रही।

यहाँ यह बताना जरूरी है कि 2002 के चुनाव में दिवाकर जी हार गए। राज्य आंदोलन में सर्वस्व न्योछावर करने के बावजूद उनके हार जाने से दुखी होकर उनकी पत्नी और हमारी भाभी ने आत्महत्या कर दी। जब हम संवेदना व्यक्त करने गए तो यह आदमी तब भी राज्य के बारे में ही बात कर रहा था।

उनसे संपर्क तब टूटा जब वह 2007 के चुनाव में जीत कर भुवंचन्द्र खन्डूरी मंत्रिमंडल में मंत्री बन गए। यह अलग मुद्दा है, जिसकी समीक्षा फिर कभी।

दिवाकर भट्ट राज्य आंदोलन के एक बड़े कालखंड के सबसे चमकते सितारे तो थे ही, उससे पहले अंशकालिक शिक्षकों के आंदोलन से लेकर कई आंदोलनों को धार देने में उनका योगदान अद्वितीय था।
यह भी सच है कि उत्तराखंड क्रांति दल राज्य की आकांक्षा का अकेला संगठन बन पाया तो उसमें दिवाकर का योगदान किसी भी नेता से अधिक प्रभावशाली रहा। वहीं दूसरी तरफ यह संगठन अगर एक कामयाब राजनैतिक दल के रूप में स्थापित न हो सका तो इसका भी सबसे अधिक श्रेय दिवाकर के कई निर्णयों को जाना चाहिए। यद्यपि इस पर बात करने का आज न तो मौका है और न ही इस संक्षिप्त लेख का उद्देश्य।

एक बात जो कल उनको अस्पताल से डिस्चार्ज करते हुए अखरी कि उक्रांद का कोई भी बड़ा नेता वहाँ मौजूद नहीं था, न ही कोई बड़ा आंदोलनकारी। इसी से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि उक्रांद क्यों एक राजनैतिक दल नहीं बन सका। सब कुछ तो उनके पक्ष में है, मुद्दे, माहौल, मानसिकता, बस सोने की बिल्ली म्याऊं ही नहीं कर रही।

तुम्हें मेरी बेहद खुद वाली श्रद्धांजलि हे ! पुरोधा।
प्रणाम प्रणाम प्रणाम

मुख्यमंत्री ने सुनी किसानों की समस्या, लिया गन्ने का स्वाद

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मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से मंगलवार को हरिद्वार जनपद से आए गन्ना किसानों ने मुलाकात की। किसानों ने पेराई सत्र 2025-26 के लिए गन्ना का समर्थन मूल्य घोषित करने सहित अन्य मांगों को लेकर मुख्यमंत्री को ज्ञापन सौंपा।

इस मौके पर किसानों ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को गन्ना भी दिया, मुख्यमंत्री ने किसानों के साथ ही धूप के बीच लॉन में ही बैठकर ही गन्ना का स्वाद लिया, साथ ही किसानों की मांगों पर सकारात्मक आश्वासन दिया।

विधायक आदेश चौहान और पूर्व कैबिनेट मंत्री स्वामी यतीश्वरानंद के नेतृत्व में मिले गन्ना किसानों ने रायसी – बालावाली पुल तक तटबंद का निर्माण, इकबालपुर झबरेड़ा भगवानपुर क्षेत्र में शुगर मिल स्थापित किए जाने, इकबालपुर झबरेड़ा क्षेत्र में सिंचाई नहर निर्माण और डोईवाला मिल पर किसानों का बकाया भुगतान कराने की मांग उठाई। किसानों ने पेराई सत्र 2025-26 के लिए राज्य परामर्शित मूल्य घोषित करने की मांग उठाई।

मुख्यमंत्री ने लॉन में बैठकर ही किसानों की मांगों को सुनते हुए, गन्ना मूल्य सहित अन्य सभी मांगों पर सकारात्मक निर्णय का आश्वासन दिया। मुख्यमंत्री ने किसानों के साथ जमीन पर बैठक गन्ना का स्वाद भी लिया। इस मौके पर विधायक प्रदीप बत्रा जिला पंचायत अध्यक्ष किरन चौधरी के साथ ही पूर्व विधायक संजय गुप्ता भी शामिल हुए।

मांस वाहन को रोकने और वाहन चालक से मारपीट के मामले में फरार भाजपा नेता स्कूटी से पहुंचे कोतवाली आत्मसमर्पण करने, कोर्ट में पेश कर भेजा जेल

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मीट प्रकरण में फरार चल रहे भाजपा पूर्व नगर अध्यक्ष मदन जोशी स्कूटी से कोतवाली पहुंचे और आत्म समर्पण कर दिया। उधर पुलिस ने आरोपी को कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया है। भाजपा नेता की गिरफ्तारी को लेकर विधायक समेत बड़ी संख्या में भाजपा कार्यकर्ता कोतवाली पहुंचे। 23 अक्तूबर को मांस वाहन को रोकने और वाहन चालक से मारपीट के मामले में पुलिस ने वाहन चालक की पत्नी की तहरीर पर भाजपा नेता मदन जोशी समेत पांच नामजद व 30 अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या के प्रयास में मुकदमा दर्ज किया था। जिसके बाद पुलिस लंबे से भाजपा नेता की गिरफ़्तारी के प्रयास कर रहे थी।

वहीं सोमवार को भाजपा नेता की हाई कोर्ट से ज़मानत याचिका ख़ारिज होने के बाद मंगलवार सुबह मदन जोशी ने समर्पण के लिए सोशल मीडिया पर वीडियो अपलोड की। जिसके कुछ देर बाद बड़ी संख्या भाजपा कार्यकर्ता व समर्थक कोतवाली पहुंच गए।

उधर गिरफ्तारी को लेकर पुलिस भी भारी संख्या में तैनात की गई। इसी बीच भाजपा नेता भीड़ के बीच स्कूटी से कोतवाली पहुंचे और आत्मसमर्पण किया। कोतवाल सुशील कुमार ने बताया कि आरोपी को कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया है।

चुनाव आयोग के एसआईआर के नाम पर ठगी शुरू, उत्तराखंड में कई लोगों के पास आ चुके हैं OTP

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चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के नाम पर कई राज्यों में ठगी शुरू हो गई है। उत्तराखंड में भी इसे लेकर सतर्क रहने की अपील की गई है। साइबर पुलिस और चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि एसआईआर के लिए बीएलओ को ओटीपी की जरूरत नहीं होती है।

प्रदेश में जल्द ही एसआईआर शुरू होने वाला है। वर्तमान में पड़ोसी राज्य यूपी समेत देश के 12 राज्यों में एसआईआर की प्रक्रिया चल रही है। इस बीच यूपी में कई ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जब ठग बीएलओ या चुनाव आयोग के नाम पर फोन करके ओटीपी पूछकर खाते खाली कर रहे हैं। इससे एसआईआर को लेकर लोगों के बीच भ्रम भी बढ़ाया जा रहा है।

साइबर पुलिस भी ठगी के इस नए ट्रेंड पर नजर बनाए हुए
उत्तराखंड के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय के मुताबिक, पहली बात तो ये है कि उत्तराखंड में अभी एसआईआर शुरू नहीं हुआ है। दूसरा बीएलओ को मोबाइल ओटीपी की जरूरत नहीं होती। बीएलओ आपको जो एन्म्यूरेशन फॉर्म देंगे, उसे भरकर वापस जमा कराना है। अगर आप ऑनलाइन एसआईआर भर रहे हैं तो इसमें ओटीपी की जरूरत पड़ सकती है लेकिन यह आपको खुद भरना होता है। आयोग ने स्पष्ट किया है कि एसआईआर के नाम पर किसी तरह के ठगों के जाल में न आएं। उत्तराखंड की साइबर पुलिस भी ठगी के इस नए ट्रेंड पर नजर बनाए हुए हैं।

एसआईआर की जानकारी टोलफ्री नंबर से लें
अगर आपके मन में एसआईआर को लेकर कोई सवाल है। आप सीधे चुनाव आयोग के टोल फ्री नंबर 1950 पर संपर्क कर सकते हैं। आपको यहां सभी तरह की जानकारी, जरूरी दस्तावेज, एसआईआर की प्रक्रिया की पूरी जानकारी मिलेगी।

पेयजल निगम में 2,690 करोड़ के कथित घोटाले का खुलासा

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उत्तराखंड पेयजल निगम में भारी वित्तीय अनियमितताओं का मामला अब बड़े घोटाले का रूप ले चुका है। आरटीआई एक्टिविस्ट और अधिवक्ता विकेश नेगी के अनुसार, भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में 2016 से मई 2025 के बीच निगम की विभिन्न परियोजनाओं में लगभग 2,690 करोड़ 27 लाख की वित्तीय अनियमितताएं सामने आई हैं। नेगी ने दावा किया है कि यह रिपोर्ट न केवल गंभीर वित्तीय भ्रष्टाचार का संकेत देती है, बल्कि इसे वर्षों तक जनता और विधानमंडल से छिपाया गया। उन्होंने इस संबंध में शिकायत और दस्तावेज प्रदेश के मुख्यमंत्री को भेजते हुए उच्च स्तरीय जांच और अभियोजन की मांग की है।

सबसे बड़ा सवाल — रिपोर्ट विधानसभा में क्यों नहीं रखी गई?
अधिवक्ता नेगी के अनुसार, कैग की यह रिपोर्ट तीन साल तक सार्वजनिक नहीं की गई और न विधानसभा में प्रस्तुत हुई। उनका आरोप है कि जनता के हक की सबसे महत्वपूर्ण रिपोर्ट को व्यवस्था ने छिपाए रखा, ताकि भ्रष्टाचार उजागर न हो सके।

रिपोर्ट में दर्ज वित्तीय अनियमितताएं

( करोड़ में)

वित्तीय वर्ष अनियमितता
2016-17 92.41
2017-18 ऑडिट नहीं
2018-19 ऑडिट नहीं
2019-20 656.05
2020-21 829.90 (सबसे अधिक)
2021-22 43.48
2022-23 96.99
2023-24 803.00
2024-25 (मई तक) 38.41

कुल कथित अनियमितता : 2,660 करोड़ 27 लाख

कोरोना काल में सबसे ज्यादा अनियमितताएं
सबसे अधिक अनियमितताएं कोरोना काल (2020-21) में दर्ज की गईं— जब पूरा राज्य स्वास्थ्य संसाधनों के लिए जूझ रहा था, उसी समय पेयजल निगम में 829.90 करोड़ का हिसाब संदिग्ध पाया गया।

शिकायत और रिपोर्ट के अनुसार—

  • बिना गारंटी ठेकेदारों को करोड़ों का भुगतान
  • अधूरे कामों पर बिल पास
  • कई ठेकेदारों ने जीएसटी जमा नहीं किया, फिर भी भुगतान
  • निर्माण गुणवत्ता पर सवाल, जगह-जगह अधूरी परियोजनाएं
  • रॉयल्टी और ब्याज वसूली नहीं
  • अधिकारियों और ठेकेदारों की मिलीभगत का स्पष्ट संकेत

अधिवक्ता नेगी का कहना है—
यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि योजनाबद्ध आर्थिक नुकसान है। दोषियों पर आपराधिक मामला दर्ज होना चाहिए।

घोटाले के मुख्य बिंदु

  • कैग रिपोर्ट 3 साल तक छिपाए जाने का आरोप
  • कई वर्षों में ऑडिट नहीं हुआ
  • कोविड अवधि में सबसे अधिक अनियमितता
  • परियोजनाएं अधूरी, भुगतान पूरा
  • भ्रष्टाचार में विभागीय अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध

जनता और विपक्ष में चर्चा तेज
मामले के सामने आने के बाद राजनीतिक हलकों, जनता और सोशल मीडिया में इसे लेकर बहस शुरू हो गई है। कई लोग इसे राज्य का अब तक का सबसे बड़ा जल-संबंधी वित्तीय घोटाला बता रहे हैं। अब निगाहें सरकार और जांच एजेंसियों की अगली कार्रवाई पर हैं।

पासपोर्ट कार्यालय पर सांसद के बयान पर कांग्रेस की चुटकी,शर्म की बात अपनी ही पार्टी की सरकार में हाथ जोड़ने पड़ रहे हैं

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कोटद्वार के पासपोर्ट कार्यालय को  लेकर भाजपा सांसद अनिल बलूनी के बयान को लपकते हुए कांग्रेस ने तीखा हमला किया है।कांग्रेस ने कहा है कि भाजपा सांसद बलूनी का बयान पार्टी के अंदरूनी झगड़े की तस्वीर बयां करने के लिए काफी है।कांग्रेस प्रवक्ता प्रतिमा सिंह ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी के सांसद अनिल बलूनी का एक वीडियो सामने आया है जिसमें वो बहुत ही असहाय और असमर्थ नज़र आ रहे हैं ।

 

पासपोर्ट कार्यालय के लिए 12.5  लाख की धनराशि देने के बाद भी फ़ाइल कहां अटकी है, इस पर खुद ही सवाल कर रहे हैं। कहते हैं कि एक हस्ताक्षर की वजह से काम नहीं हो पाया। बलूनी स्वंय व मीडिया को भी इस देरी का पता लगाने की बात भी कहते हैं। उनके साथ वीडियो में स्पीकर ऋतु खण्डूड़ी भी नजर आ रही हैं। गौरतलब है कि हालिया गढ़वाल दौरे के समय ही भाजपा सांसद अनिल बलूनी ने पासपोर्ट कार्यालय नहीं खुलने पर यह बातें कही।

कांग्रेस का कहना है कि डबल इंजन की सरकार होने के बावजूद भी सांसद बलूनी को बड़ी मुश्किल होती है केंद्र सरकार में जाकर विदेश मंत्री से मुलाक़ात करने में।  सांसद निधि  से धनराशि भी दी लेकिन  पासपोर्ट ऑफिस जो वो गढ़वाल में स्थापित करना चाहते थे, वो फाइल अब तक कहाँ अटकी है उन्हें पता नहीं ।
बलूनी मीडिया से कहते भी हैं कि एक हस्ताक्षर के लिए इतने समय से रुका है। बड़े दुख की बात है। अब तक पासपोर्ट कार्यालय खुल जाना चाहिए था। यह भी कहते हैं कि आप भी पता कीजिये ,मैं भी पता करता हूँ।

कांग्रेस प्रवक्ता प्रतिमा सिंह ने कहा कि बड़े शर्म की बात है कि अपनी ही पार्टी की सरकार में उन्हें मंत्रियों और अधिकारियों के हाथ जोड़ने पड़ रहे हैं । फिर  भी वो अपना काम नहीं करवा पा रहे हैं । ऐसे में  विपक्ष के सांसदों को अपने क्षेत्र में काम करवाने में कितनी दिक्कतों का सामना करना पड़ता होगा।

कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा कि अनिल बलूनी का यह बयान इस बात की पुष्टि करता है कि भारतीय जनता पार्टी में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है।  और ये ख़ुद खंड खंड में बँटे हुए हैं ।

उन्होंने कहा कि भाजपा के विधायक अपनी सरकार  के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतर जाते हैं । भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री अपनी सरकार पर सवाल उठाते हैं।  ये सारी बातें दर्शाती हैं कि भाजपा में सब कुछ ठीक नहीं है।
अपने आपको अनुशासित कहने वाली पार्टी अब खुलकर पार्टी के ख़िलाफ़ अनुशासनहीनता को नज़रअंदाज़ कर रही है ।
कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा कि डबल इंजन सरकार में कोटद्वार के पासपोर्ट कार्यालय को कौन रोक रहा है,यह जांच का विषय है।

दूसरे राज्यों से शादी कर उत्तराखंड आईं बेटियों को लाने होंगे कागज, जल्द शुरू होने जा रहा है एसआईआर

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दूसरे राज्यों से विवाह कर उत्तराखंड आईं बेटियों को मतदाता सूची में अपना वोट बचाए रखने के लिए मायके से कागज लाने होंगे। दूसरी ओर उत्तराखंड की मतदाता सूची अभी फ्रीज नहीं होने के कारण वोटर लिस्ट में नाम, पता आदि बदलाव कराए जा सकते हैं। चुनाव आयोग का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) दिसंबर या जनवरी में उत्तराखंड में भी शुरू होने जा रहा है।

 

इससे पहले मुख्य निर्वाचन अधिकारी उत्तराखंड ने वर्ष 2003 की मतदाता सूची वेबसाइट पर जारी कर दी है। अन्य राज्यों ने भी अपनी पुरानी मतदाता सूची वेबसाइट पर जारी की हुई हैं। दूसरे राज्यों से उत्तराखंड में 2003 के बाद विवाह कर आईं बेटियों को एसआईआर के लिए अपने मायके से कागज लाने होंगे।

 

निर्वाचन विभाग के मुताबिक, यूपी समेत कई राज्यों ने 2003 की वोटर लिस्ट जारी की हुई है। उस वक्त जिनका वोट वहां था, उन्हें अपनी वोटर लिस्ट की जानकारी यहां एसआईआर में देनी होगी। जिनका वोट नहीं था, उन्हें अपने माता-पिता के संबंधित राज्य के 2003 के वोट की जानकारी यहां एसआईआर फॉर्म में देनी होगी। चूंकि यहां सभी एसआईआर शुरू होने वाला है, इसलिए पहले से ही कागज तैयार रखे जा सकते हैं।