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उत्तराखंड-हिमाचल के पहाड़ों से बर्फ हो रही है गायब, हसीन वादियों में सात गुना बढ़ीं आग की घटनाएं.

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सर्दियों में बर्फ से ढकी रहने वाली हिमाचल की हसीन वादियों से बर्फ गायब है और वहां इन दिनों आग की लपटें और धुंआ दिखाई दे रहा है। यही हाल उत्तराखंड के पहाड़ों का भी है। पिछले तीन महीनों से हिमाचल में इस बार न ही तो बारिश हुई है और न ही बर्फबारी देखने को मिली है। जंगलों में नमी न होने से इस बार प्रदेश में वनाग्नि की घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि देखने को मिली है।

आंकड़ों के अनुसार प्रदेश के सभी जिलों में आग की घटनाएं हुईं। पिछले तीन सप्ताह में किन्नौर, मनाली, कुल्लू, चंबा और शिमला जिला में आग की बड़ी घटनाओं में हजारों हैक्टेयर वन भूमि को नुकसान पहुंचा है और रिहायशी मकान भी आग की चपेट में आए हैं। भारतीय वन सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि पिछले एक सप्ताह में देश में वनाग्नि की बड़ी घटनाओं में शीर्ष पांच राज्यों में हिमाचल पहले स्थान पर है। हिमाचल में पिछले एक सप्ताह में 36 बड़ी आग की घटनाएं देखने को मिली हैं। वर्ष 2022-23 में बड़ी आग की घटनाओं में शीर्ष में रहने वाले पांच राज्यों में हिमाचल 123 घटनाओं के साथ पहले स्थान पर था और उत्तराखंड दूसरे, आंध्र प्रदेश तीसरे और जम्मू एवं कश्मीर चौथे स्थान पर था। वहीं 2023-24 में फायर अलर्ट के मामलों में शीर्ष के पांच राज्यों में हिमाचल दूसरे स्थान पर और उत्तराखंड पहले स्थान पर है।

अग्निशमन विभाग के आंकड़ों के अनुसार दिसंबर माह में आग की कुल 369 घटनाएं हुईं। इनमें 275 वनाग्नि की घटनाएं थीं। इन घटनाओं में 10 करोड़ रुपए की संपत्ति का नुकसान हुआ। 1 से 12 जनवरी तक प्रदेश में 149 आग की घटनाएं दर्ज की गई हैं।

अभी तक सामान्य से 100 फीसदी कम बारिश हुई-


मौसम विभाग के अनुसार प्रदेश में जनवरी माह में अभी तक सामान्य से 100 फीसदी कम बारिश हुई है। वनाग्नि की दृष्टि से हिमाचल प्रदेश के 12 जिलों में से 8 जिले संवेदनशील माने जाते हैं। यहां का सबसे अधिक संवेदनशील समय अप्रैल के दूसरे सप्ताह से जून तक है, लेकिन इस बार आग की घटनाएं सर्दियों के दिनों में भी अधिक देखने को मिल रही हैं। इसकी मुख्य वजह बारिश और बर्फबारी न होने की वजह से जंगलों की नमी गायब हो गई है।

प्रदेश के चीड़ वन आग के लिए सबसे ज्यादा संवेदनशील-


अधिकृत आंकड़ों के अनुसार हिमाचल में 37,033 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र है। इनमें से 15 प्रतिशत पर चीड़ वन हैं जो आग के लिए सबसे अधिक संवेदनशील होते हैं। प्रदेश में वन विभाग की कुल 2026 बीटें हैं, इनमें से 339 अति संवेदनशील श्रेणी में आती हैं। इसके अलावा 667 मघ्यम और 1020 बीटें कम संवेदनशील की श्रेणी में आती हैं।

मौसमी चुनौतियों से घिरे उत्तराखंड के पहाड़-


9 से 16 जनवरी के बीच उत्तराखंड में 600 से अधिक वनाग्नि के अलर्ट जारी किए जा चुके हैं। देशभर में सबसे ज्यादा फायर अलर्ट उत्तराखंड में आए। 400 से अधिक फायर अलर्ट के साथ हिमाचल प्रदेश दूसरे और तकरीबन 250 अलर्ट के साथ जम्मू-कश्मीर तीसरे स्थान पर है। अरुणाचल प्रदेश में भी 200 के आसपास अलर्ट जारी किए गए हैं। वनअधिकारियों के अनुसार बारिश न होने से सर्दियों में वनों में जगह-जगह आग लगने की सूचनाएं मिल रही हैं। वन विभाग भी इस समय कंट्रोल बर्निंग कर रहा है। मॉनसून के बाद बारिश न होने से जंगल में सूखी पत्तियों का ढेर जमा है जिससे गर्मियों में आग भड़क जाती है। इसलिए विभाग नियंत्रित आग के जरिये जंगल की सफाई करता है। इससे भी लोगों को धुआं दिख रहा है। ग्रामीणों को आग के प्रबंधन के लिए जागरूक किया जा रहा है। वे इस समय खेतों की सफाई या जंगल में आग लगाकर न छोड़ें।

उत्तराखंड में 1 से 16 जनवरी के बीच बारिश और बर्फबारी नहीं-


मौसम विभाग के अनुसार इस वर्ष 1 से 16 जनवरी के बीच उत्तराखंड में बारिश बर्फबारी देखने को नहीं मिली। नैनीताल में नाममात्र 0.8 मिमी बारिश हुई, जबकि सामान्यतः इस दौरान 14 मिमी. तक बारिश होती है। इसी तरह अल्मोड़ा, बागेश्वर में 15 मिमी से अधिक, चमोली में 20 मिमी और रुद्रप्रयाग उत्तरकाशी में इस समय तक 28 और 26 मिमी तक बारिश होनी चाहिए लेकिन चमोली, उत्तरकाशी, पिथौरागढ़ समेत सभी पर्वतीय जिलों में सामान्य से 100 प्रतिशत कम यानी कोई बारिश नहीं हुई। दिसंबर-2023 भी तकरीबन सूखा गया। तीन हिमालयी राज्यों जम्मू कश्मीर और लद्दाख (-79), हिमाचल प्रदेश (-85) और उत्तराखंड (-75) में सामान्य से बेहद कम बारिश दर्ज हुई।

पिछले कुछ वर्षों में बारिश और बर्फवारी में लगातार कमी-


पिछले कुछ वर्षों में मॉनसून के बाद बारिश और बर्फबारी में लगातार कमी दर्ज की जा रही है। नवंबर और दिसंबर में तकरीबन न के बराबर बारिश और बर्फबारी हुई। इससे पहले 2006, 2007, 2008 और 2009 में भी मानसून के बाद काफी कम बारिश हुई थी। तकरीबन 4 साल सूखी सर्दियां रहीं। मानसून के बाद सर्दियों की जलवायु में इस तरह केउतार-चढ़ाव लगातार देखने को मिल रहे हैं।

खेती, किसानी और पर्यटन सब कुछ प्रभावित हो रहा है-


जानकारों का कहना है कि बारिश न होने का असर खेती और बागवानी में भी दिखाई दे रहा है। सर्दियों में लगाए जाने वाले फलदार पौधों को पर्याप्त पानी नहीं मिल पा रहा है। सेब, आडू, प्लम, खुबानी और कीवी समेत सभी फसलें प्रभावित हो रही हैं। बारिश पर निर्भर खेतों में अब तक गेहूं और जौ के बीज भी बाहर नहीं निकले हैं। बर्फबारी न होने के कारण पर्यटन व्यवसाय पर भी इसका खासा असर पड़ा है। पर्यटन व्यवसाय 20 प्रतिशत के आसपास भी नहीं पहुंच पाया।एक तरह से पूरा विंटर टूरिज्म ठप हो गया। बद्रीनाथ में बेहद हलकी बर्फ गिरी है। जलते जंगल से लेकर पेयजल संकट तक पहाड़ मौसमी चुनौतियों से घिरे हैं।

Ram Mandir: 22 जनवरी को उत्तराखंड में सरकारी दफ्तरों में रहेगी आधे दिन की छुट्टी, जानिए कितने बजे खुलेंगे दफ्तर।

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अयोध्या में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह को लेकर उत्तराखंड सरकार ने 22 जनवरी को सरकारी दफ्तरों में आधे दिन की छुट्टी घोषित की है। इस संबंध में आदेश जारी कर दिए गए हैं। आदेश के बाद कर्मचारी नेताओं ने कहा कि सरकार द्वारा सरकारी कार्यों में आधा दिन का अवकाश किया गया है जो की औचित्यहीन है।

आदेश से नाखुश कर्मचारियों ने कहा कि क्या कर्मचारी शिक्षक पहले प्राण प्रतिष्ठा में भाग लेंगे और 2:30 बजे बाद अपने कार्यालय में आएंगे जोकि असंभव है। सरकार अवकाश पर पुनर्विचार करके 22 जनवरी 2024 को पूरे दिन का अवकाश घोषित करें।

पूरा देश इस समय राममय

भाजपा के राष्ट्रीय सह-कोषाध्यक्ष व राज्यसभा सांसद नरेश बंसल ने भी मुख्यमंत्री से सार्वजनिक अवकाश घोषित करने का अनुरोध किया था। उन्होंने इस संबंध में मुख्यमंत्री को एक पत्र भी लिखा था।बंसल ने अपने पत्र में कहा कि 22 जनवरी को श्रीराम जन्मभूमि मंदिर प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम है। इसकी उत्तराखंड समेत पूरे विश्व में भव्य आयोजन की तैयारी चल रही है। पूरा देश इस समय राममय है। आस्था और विश्वास का यह महापर्व धूमधाम से मनाया जा रहा है।

हर व्यक्ति 22 जनवरी का कार्यक्रम देखने को उत्सुक है। प्रत्येक रामभक्त इस प्राण प्रतिष्ठा समारोह का साक्षी बनना चाहता है। उत्तर प्रदेश, हरियाणा आदि प्रदेशों में 22 जनवरी को सार्वजनिक अवकाश घोषित किया गया है, ताकि लोग धूमधाम से यह उत्सव मना सकें।

जोशीमठ के बाद अब नैनीताल शहर पर मंडराया खतरा, जानिए क्यों जोशीमठ बनने की राह पर है नैनीताल।

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जोशीमठ भू-धंसाव के बाद खतरे की जद में नजर आ रहे नैनीताल शहर को बचाने और भविष्य की निर्माण योजनाओं को तैयार करने के लिए इसका भू-तकनीकी एवं भू-भौतिकीय सर्वेक्षण होगा। इसके अलावा नैनीताल में स्लोप स्थायित्व का भी सर्वेक्षण होगा। इसके लिए भूस्खलन न्यूनीकरण एवं प्रबंधन केंद्र ने प्रक्रिया शुरू कर दी है। साथ ही शहर का लाइडर मैप भी तैयार किया जाएगा।

 

दरअसल, जोशीमठ भू-धंसाव के बाद सरकार ने तय किया था कि सभी पर्वतीय शहरों की धारण क्षमता का आकलन कराया जाएगा। इस कड़ी में पहले चरण में 15 शहरों का चयन किया गया था। सबसे पहले नैनीताल की धारण क्षमता के आकलन के साथ ही इसे भू-धंसाव से बचाने के लिए सर्वेक्षण होगा। इसके तहत नैनीताल का लाइडर (लाइट डिटेक्शन एंड रेंजिंग) मैप तैयार किया जाएगा। इस तकनीक का उपयोग उच्च-रिजॉल्यूशन वाले मानचित्र बनाने में किया जाता है।

यहां पैदा हो रहा है खतरा-

नैनीताल की बुनियाद समझा जाने वाला बलिया नाला लगातार भू-स्खलन की जद में आ रहा है, इसका ट्रीटमेंट भी शुरू किया गया है। वहीं, नैनीताल का शीर्ष नैना पीक, भुजा टिफ्फन टॉप व स्नो व्यू की रमणीक पहाड़ी में भूस्खलन सक्रिय है।

यह होगा फायदा-

भू-सर्वेक्षण के बाद लाइडर मैप बनने से यह स्पष्ट हो सकेगा कि शहर में कितनी ऊंचाई तक के भवन सुरक्षित हैं। पहले से जो भवन बने हुए हैं, उनका शहर पर कितना बोझ है। कितने ढलान पर कितनी मंजिल के ऐसे भवन हैं, जो आपदा के लिहाज से खतरे में हैं। कितने डिग्री ढलान पर कितनी मंजिल के भवन बनाए जाने चाहिए। पर्वतीय शहरों में वह कौन सी भूमि व स्थान हैं, जहां भवन बनाना खतरनाक हो सकता है। भविष्य में नए निर्माण से लेकर सीवर, पेयजल तक का पूरा काम उसी मैप के हिसाब से होगा। इसके लिए मास्टर प्लान भी उसी के अनुसार बनाया जाएगा।

पहले चरण में इन 15 शहरों का होगा अध्ययन-

गोपेश्वर, पौड़ी, श्रीनगर, कर्णप्रयाग, नई टिहरी, उत्तरकाशी, लैंसडौन, रानीखेत, नैनीताल, कपकोट, धारचूला, चंपावत, पिथौरागढ़, अल्मोड़ा, भवाली।

हमने नैनीताल के भू-सर्वेक्षण व लाइडर मैपिंग की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके लिए जल्द एजेंसी का चयन कर लिया जाएगा। इसके बाद बाकी अन्य शहरों के लिए भी यह प्रक्रिया शुरू की जाएगी।
-डॉ. रंजीत सिन्हा, सचिव, आपदा प्रबंधन 

 

Uttarakhand: 51 वाइब्रेंट विलेज में अब पहुंच हो सकेगी आसान, सड़कों के लिए पहली किस्त जारी.

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उत्तराखंड के 51 वाइब्रेंट विलेज के बीच पांच सड़कों के लिए केंद्र ने 119.44 करोड़ को मंजूरी देते हुए इसकी 26.06 करोड़ की पहली किस्त जारी कर दी है। राज्य सरकार वाइब्रेंट विलेज से संबंधित सभी योजनाओं की डीपीआर केंद्र को भेज चुकी है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल पर भारत-चीन सीमा पर स्थित उत्तरकाशी जिले के 10, चमोली जिले के जोशीमठ के 14, पिथौरागढ़ जिले के धारचूला के 17, कनालीछीना के 2, मुनस्यारी के 8 गांवों को वाइब्रेंट विलेज घोषित किया गया था। इन गांवों में विकास कार्यों के लिए संबंधित जिलों के डीएम से प्रस्ताव मांगे गए थे। इन प्रस्तावों पर पिछले साल 26 सितंबर को हुई बैठक में कुछ संशोधन के साथ मुख्य सचिव ने अनुमोदन दे दिया था। इसके लिए सभी डीपीआर केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेज दी गई हैं।

कुल 506 में से 66 परियोजनाएं वाइब्रेंट विलेज योजना के तहत और 440 अन्य योजनाओं से कंवर्जेंस के तहत पूरी होनी हैं। गृह मंत्रालय ने वाइब्रेंट विलेज योजना के तहत 43.96 किमी लंबाई की पांच सड़कों के लिए 119.443 करोड़ की स्वीकृति दी है, जिसमें से 26.06 करोड़ की पहली किश्त जारी कर दी है। सचिव ग्राम्य विकास राधिका झा ने बताया कि वाइब्रेंट विलेज संबंधी प्रस्ताव गृह मंत्रालय को ऑनलाइन माध्यम से भेजे जा चुके हैं। इसी के तहत पांच सड़कों को मंजूरी मिली है।

ग्रामीणों का जीवन स्तर सुधरेगा-

 
पिछले आम बजट में सरकार ने वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम की घोषणा की थी। इसके तहत सीमांत गांवों के निवासी लोगों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने के लिए विभिन्न योजनाएं बनाई गई हैं। चूंकि उत्तराखंड में करीब छह माह तक लोग सीमांत गांव में रहते हैं और छह माह तक पलायन करके दूसरे स्थानों पर रहते हैं। इसलिए राज्य सरकार ने उनके लिए दोनों स्थानों पर पीएम आवास योजना के तहत आवास बनाने का प्रस्ताव भी गृह मंत्रालय को भेजा हुआ है।

Uttarakhand: जानिए उत्तराखंड के इन 4 गांवों में अचानक क्यों लगा लॉकडाउन।

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Uttarakhand: 3 घंटे से ज्यादा देरी से चली ट्रेन तो टिकट की रकम होगी वापस, जानिए रेलवे ने क्यों लिया ये फैसला.

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देहरादून रेलवे स्टेशन के मुख्य वाणिज्य निरीक्षक ने कहा कि कोहरे के चलते सुबह के समय ही ट्रेन का संचालन प्रभावित हो रहा है। ऐसे में अगर किसी यात्री को ट्रेन का तीन घंटे तक इंतजार करना पड़ा और वह यात्रा नहीं करता तो उसके टिकट की पूरी रकम उसे लौटाई जाएगी।

अगर यात्रियों को तीन घंटे से अधिक समय तक ट्रेन का इंतजार करना पड़ा तो उनके टिकट की पूरी रकम उन्हें लौटाई जाएगी। मैदानी इलाकों में सुबह के समय कोहरा छाने से ट्रेन की रफ्तार धीरे होने लगी है। दून में ट्रेन देरी से पहुंचने के कारण यात्रियों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

इन दिनों हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर, दिल्ली समेत पंजाब, उत्तर प्रदेश के कई जिलों में घना कोहरा छा रहा है। देहरादून रेलवे स्टेशन के मुख्य वाणिज्य निरीक्षक सुभाष अग्रवाल ने कहा कोहरे के चलते सुबह के समय ही ट्रेन का संचालन प्रभावित हो रहा है।

धीमी गति होने की वजह से ट्रेन देरी से पहुंच रही है। ऐसे में अगर किसी यात्री को ट्रेन का तीन घंटे तक इंतजार करना पड़ा और वह यात्रा नहीं करता तो उसके टिकट की पूरी रकम उसे लौटाई जाएगी। हालांकि दिन के समय मौसम साफ होने से संचालन किया जा रहा है।

कड़ाके की ठंड से कांप रहा “उत्तराखंड”; मौसम विभाग ने सभी जिलों के लिए जारी किया अलर्ट, जानिए कहां क्या है मौसम का हाल.

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उत्तराखंड के कुमाऊं के मैदानी इलाकों में कोहरे और सर्द लहरों से तापमान में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। इससे गलन बढ़ने लगी है। वहीं, आज भी सुबह से खटीमा, रुद्रपुर, हल्द्वानी में कोहरा छाया हुआ है। 

मौसम विज्ञान केंद्र देहरादून के अनुसार, आज उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग, देहरादून, पौड़ी, टिहरी, अल्मोड़ा, बागेश्वर, पिथौरागढ़, नैनीताल, ऊधमसिंह नगर, चंपावत और हरिद्वार में पाले को लेकर यलो अलर्ट जारी किया है।

वहीं, बुधवार मौसम का सबसे ठंडा दिन रहा। दिन का तापमान 11 डिग्री रहा तो रात में पारा आठ डिग्री सेल्सियस पहुंच गया। शहर सुबह घने कोहरे के आगोश में रहा तो दिनभर बादल और ठंडी हवाओं से जनजीवन प्रभावित रहा। कड़ाके की सर्दी से बचने के लिए घरों और दफ्तरों में लोगों ने अलाव, हीटर का सहारा लिया। सड़कों पर भी जहां कहीं अलाव जलता दिखा, लोग वहीं ठिठक गए।
मौसम विभाग ने मैदानी क्षेत्रों में शीतलहर के साथ घना कोहरा छाने और पर्वतीय क्षेत्रों में पाले को लेकर यलो अलर्ट जारी किया है। उधर, नैनीताल में मंगलवार शाम सवा सात बजे बारिश और ओलावृष्टि के बाद बुधवार को चटक धूप खिली रही। मौसम साफ रहने से लोगों को ठंड से काफी राहत मिली। अमर उजाला टीम ने सर्द मौसम में शहर के अलग-अलग जगहों के हालात का जायजा लिया। महिला और बेस अस्पताल में ठिठुरते मरीजों का हाल जाना। वहीं सरकारी दफ्तरों में अधिकारियों, कर्मचारियों ने हीटर की ताप में खुद को गर्म रखा।

क्यों एक 100 साल की बुजुर्ग महिला कड़ाके की ठंड में 15 दिनों से दे रही है धरना, जानिए क्या है इसकी वजह.

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उत्तराखंड में विकास किस तेजी के साथ हो रहा है कि प्रदेश बनने के इतने साल बाद भी लोगों को बुनियादी सुविधाओं के लिए आंदोलन करना पड़ता है सरकार के लिए शर्म की बात तो तब हो जाती है जब  बुनियादी जरूरत के लिए 100 साल की बुजुर्ग महिला को धरने पर बैठना पड़े।

एक तरफ सरकार 2024 की चुनाव की तैयारी में लगी हुई है तो वहीं दूसरी तरफ आजादी के 73 वर्षों बाद भी 100 वर्ष की बुजुर्ग महिला सड़क मार्ग की लड़ाई लड़ रही है।सड़क न होने के कारण ग्रामीणों को परेशानी हो रही है और अब ये ग्रामीण चुनाव बहिष्कार का ऐलान कर पिछले 15 दिनों से धरने पर है. आजादी के 73 साल बाद भी दूरस्थ सीमावर्ती गांव सड़क मार्ग से अछूते हैं ग्रामीण 25 से 50 किलोमीटर प्रतिदिन पैदल चलने के लिए मजबूर हैं आलम यह है कि लगभग 10 साल पहले स्वीकृत हो चुका सड़क मार्ग अब तक बनकर तैयार नहीं हो सका है।

सड़क मार्ग की मांग को लेकर जोशीमठ के  सेंजी डुमक के ग्रामीण लगभग पिछले 15 दिनों से आंदोलन कर रहे है इन लोगों ने चुनाव बहिष्कार की भी चेतावनी दी है आंदोलनकारियों में 100 साल की बुजुर्ग महिला बच्ची देवी भी शामिल हैं, जो लगातार 15 दिनों से कड़कड़ाती सर्दी के बीच इस उम्मीद में धरने पर बैठी हैं कि उनकी गुहार शासन स्तर तक पहुंचेगी और उनके जीते जी गांव सड़क मार्ग से जुड़ सकेगा लेकिन सरकार शायद 2024 चुनाव की तैयारी में इतना व्यस्त है कि उसको इन ग्रामीणों की सुध लेने का भी समय नहीं है।

ग्रामीणों और अपने बड़े बुजुर्गों की परेशानी को देख विद्यालय में पढ़ने वाले छोटे-छोटे बच्चों को भी तरस आ गया लेकिन सरकार को नहीं छोटे स्कूली बच्चों  ने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखी है इसमें बच्चों ने लिखा है कि उनके गांव को सड़क मार्ग से जोड़ा जाए गांव में सड़क न होने के कारण उन्हें प्रतिदिन 25 से 50 किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ता है विद्यालय बहुत दूर है और बर्फबारी और बरसात के दिनों में यहां पहुंचना कठिन होता है।

 इस आंदोलन में 100 साल की बच्ची देवी ही नहीं बल्कि 5 और 7 साल के  कई छोटे बच्चे भी शामिल हैं सिर्फ 100 साल की महिला ही नहीं इस आंदोलन में  90 साल के बुजुर्ग  भी कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे हैं जिस उम्र में पीठ पर स्कूल  बैग  और हाथों में कलम थामना था उस उम्र में नैनिहाल हाथ में माइक और पीठ पर इस आंदोलन को ढो रहे हैं और हमारी सरकार सिर्फ नारों में ही विकास समझ रही है। एक ओर देश के सीमांत गांवों को विकसित करने के लिए केंद्र सरकार ने वाइब्रेंट विलेज योजना चला रही है जिसमें   उत्तराखंड के तीन जिलों के 51 गांवों को भी शामिल किया है लेकिन ये गांव आज भी भगवान भरोसे चल रहे हैं।

युवाओं के लिए खुशखबरी, समूह-ग के 136 पदों पर निकली भर्ती, 12वीं पास युवाओं को मिलेगा मौका, जानें कब से करें अप्लाई.

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उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग ने सोमवार को इंटरमीडिएट स्तरीय भर्ती का विज्ञापन जारी किया। इसके तहत पशुधन प्रसार अधिकारी, सहायक प्रशिक्षण अधिकारी, प्रदर्शक और निरीक्षक के 136 पदों पर भर्ती का मौका मिलेगा। इसके लिए 10 जनवरी से आवेदन शुरू होने जा रहे हैं।

आयोग के सचिव सुरेंद्र सिंह रावत ने बताया कि इस भर्ती के तहत पशुपालन विभाग में पशुधन प्रसार अधिकारी के 120, उद्यान विभाग में सहायक प्रशिक्षण अधिकारी के तीन, रेशम विभाग में प्रदर्शक रेशम के 10 और निरीक्षक रेशम के तीन पदों पर मौका मिलेगा।

उन्होंने बताया कि इसके लिए 10 से 30 जनवरी तक ऑनलाइन आवेदन होंगे। एक से तीन फरवरी तक आवेदन में संशोधन का मौका मिलेगा। परीक्षा 11 फरवरी को प्रस्तावित की गई है। परीक्षा आवेदन में जनरल, ओबीसी को 300 रुपये, एससी, एसटी, ईडब्ल्यूएस व दिव्यांग अभ्यर्थियों को 150 रुपये शुल्क देय होगा। आयोग ने विज्ञापन के साथ ही सिलेबस भी जारी कर दिया है।

कर्मशाला अनुदेशकों की चयन सूची भेजी-

आयोग सचिव रावत ने बताया कि कर्मशाला अनुदेश भर्ती की परीक्षा 12 जून 2022 में हुई थी। इसके अभिलेख सत्यापन पिछले साल 27 अप्रैल से दो मई तक किए गए। इस आधार पर सोमवार को आयोग ने 120 अभ्यर्थियों की चयन संस्तुति विभाग को भेज दी है। अब चुने गए युवाओं को अपने विभाग में ज्वाइन करना है।

Uttarakhand: शिक्षा मंत्री के खुद के ही गृह क्षेत्र में स्कूलों की हालत जर्जर, खतरे में छात्रों का भविष्य.

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“अंधेर नगरी चौपट राजा, टका सेर भाजी टका सेर खाजा”   ये एक प्रसिद्ध हिंदी कहावत है जिसका अर्थ है कि एक अयोग्य शासक के नेतृत्व में  कमी और अव्यवस्था के कारण परिस्थितियां खराब हो जाती हैं। ये कहावत  उत्तराखंड के शिक्षा मंत्री पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं एक स्कूल की छत इतनी जर्जर हो चुकी है जो कि कभी भी गिर सकती है। ये छत कहीं और की नहीं बल्कि उत्तराखंड के शिक्षा हब कहे जाने वाले और खुद शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत का गृह क्षेत्र श्रीनगर शहर के बालिका इंटर कॉलेज की है।

श्रीनगर बाजार के ऐतिहासिक बालिका इंटर कॉलेज के जर्जर भवन में बालिकाएं बिना शिक्षक के पढ़ रहीं हैं। ऐसे में सरकार के ‘पढ़ेगी बेटियां तो बढ़ेगी बेटियां’ का नारा जुमला साबित होता दिखाई दे रहा है कई क्षेत्रों से करीब 300  से अधिक  छात्राएं यहां पढ़ती हैं अन्य सरकारी विद्यालयों की अपेक्षा यहां सबसे अधिक छात्र संख्या है बावजूद इसके  80 के दशक में बना विद्यालय भवन जर्जर हो चुका है आए दिन छत का प्लास्टर गिरने से छात्राओं के लिए खतरा बना हुआ है शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत का क्षेत्र होने के कारण वो कई चक्कर यहां लगाते हैं लेकिन उनकी नजर इस पर कभी गयी नहीं।

कई वर्षो से हैं अध्यापिकाओं के कई पद खाली- 

इतना ही नहीं इसके अलावा विद्यालय में वर्षों से अध्यापिकाओं के कई पद रिक्त हैं. एक तरफ शिक्षा मंत्री अध्यापकों का वेतन बढ़ाने की बात कर रहे हैं तो दूसरी तरफ अध्यापक ही नहीं है और बच्चे खुद ही अपने अध्यापक बन कर पढ़ाई करने को मजबूर हैं ऊपर से छत कब सर पर गिर जाए उसका अलग डर रहता है।विद्यालय में समाजशास्त्र व अर्थशास्त्र के प्रवक्ता का पद 2016-17 से खाली है, 2020 से जीव विज्ञान का पद खाली है, इसके अलावा गणित विषय का पद रिक्त होने से अन्य विद्यालय से अध्यापक की व्यवस्था की गई है भूगोल के प्रवक्ता अवैतनिक अवकाश पर जाने से इस विषय में अतिथि शिक्षक तैनात है वहीं अंग्रेजी विषय भी व्यवस्था के सहारे संचालित हो रहा है।

अभी हाल ही में उत्तराखंड के शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने वैश्विक निवेशक सम्मेलन में निवेशकों को संबोधित करते हुए कहा कि उत्तराखंड में 10 नए निजी विश्वविद्यालय और तीन नए मेडिकल कॉलेज खोले जाएंगे ये एक अच्छा कदम भी है लेकिन बुनियादी शिक्षा का क्या जब बुनियाद ही सही नहीं पड़ेगी तो इन महाविद्यालयों और मेडिकल कालेज का क्या फायदा। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार का लक्ष्य है कि उत्तराखंड में 2024 तक पाँच लाख बच्चे अन्य राज्यों से पढ़ने आए, जबकि एक लाख विदेशी बच्चे यहाँ आकर पढ़ें, लेकिन खुद के बच्चे जब अध्यापकों और एक अच्छे भवन के लिए तरस रहे हो तो फिर इस तरह की आशा करना बेमानी है