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केदारनाथ में खच्चर चलाने से लेकर देश के शीर्ष संस्थान तक पहुंचने वाला साधारण मेहनती लड़का।

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उत्तराखंड के एक छोटे से गांव से निकलकर देश के शीर्ष संस्थान तक पहुंचने वाला साधारण लेकिन बेहद मेहनती लड़का।

यह कहानी है केदारनाथ में खच्चर से सामान ढोने वाले अतुल कुमार की — उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग ज़िले के छोटे से गांव बीरों देवल से निकलकर IIT मद्रास तक का सफर तय करने वाले उस युवा की, जिसने साबित कर दिया कि हालात चाहे कितने भी कठिन क्यों न हों, मेहनत और हौसला कभी हार नहीं मानते।

अतुल का बचपन बेहद सामान्य रहा। उसके माता-पिता आज भी केदारनाथ धाम में खच्चर और घोड़े चलाकर यात्रियों का सामान ढोते हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी, इसलिए स्कूल की पढ़ाई के साथ-साथ अतुल भी हर साल केदारनाथ में खच्चर से सामान ढोने का काम करता था ताकि अपनी पढ़ाई का खर्च निकाल सके।लेकिन मुश्किलें कभी उसके सपनों के आड़े नहीं आईं।

पहाड़ की चढ़ाई और सपनों की उड़ान

अतुल शुरू से ही पढ़ाई में होशियार था। उसने 10वीं में 94.8%, 12वीं में 92.8% अंक हासिल किए और जिले में टॉप रैंक पाई। आज वह हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय, श्रीनगर से B.Sc. अंतिम वर्ष का छात्र है।

गांव में न कोचिंग थी और न ही अच्छी किताबें। उसने केदारनाथ यात्रा में जो पैसे कमाए, उनसे किताबें और मोबाइल डेटा रिचार्ज किया। नेटवर्क और बिजली की दिक्कतों के बावजूद वह रात-दिन जुटा रहा। सुबह से शाम तक यात्रियों का सामान ढोने के बाद वह रात को टॉर्च और स्टडी लैंप की रोशनी में पढ़ता। कई बार पहाड़ के किसी ऊंचे कोने में खड़े होकर मोबाइल नेटवर्क पकड़कर ऑनलाइन लेक्चर सुनता।

IIT JAM में बड़ी सफलता

इन्हीं संघर्षों के बीच उसने IIT JAM 2025 की परीक्षा दी और All India Rank 649 हासिल की। अब उसे M.Sc. Mathematics के लिए IIT मद्रास में दाख़िला मिल रहा है।

यह उपलब्धि सिर्फ अतुल की नहीं, बल्कि हर उस युवा की है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखने की हिम्मत रखता है।

गांव में जश्न, पूरे प्रदेश को गर्व

अतुल अपने गांव से IIT में चयनित होने वाला पहला छात्र है। गांव वालों ने ढोल-नगाड़ों और फूल-मालाओं से उसका स्वागत किया। उसके शिक्षकों और दोस्तों ने भी उसकी मेहनत को सलाम किया। मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री ने भी सोशल मीडिया पर उसे बधाई दी और कहा कि अतुल उत्तराखंड के युवाओं के लिए प्रेरणा है।

माता-पिता ही सबसे बड़ी प्रेरणा

अतुल ने कहा —
“मेरे माता-पिता ने हमेशा कहा कि कोई काम छोटा नहीं होता, लेकिन पढ़ाई से जिंदगी बदल सकती है। मैंने वही किया। अब मेरा सपना है कि गणित में रिसर्च करूं और पहाड़ के बच्चों के लिए एक कोचिंग सेंटर खोलूं, ताकि वे भी बड़े सपने देख सकें।”

हाईकोर्ट का बड़ा आदेश: दो जगह वोटर लिस्ट में नाम वालों पर रोक

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नैनीताल। हाईकोर्ट ने राज्य निर्वाचन आयोग को तगड़ा झटका दिया है। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राज्य में होने वाले पंचायत चुनाव को लेकर अहम आदेश दिया है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि जिन उम्मीदवारों के नाम शहर और गाँव — दोनों जगह की वोटर लिस्ट में दर्ज हैं, वे पंचायत चुनाव नहीं लड़ सकेंगे। ऐसे मामलों में तुरंत रोक लगाने के निर्देश देते हुए कोर्ट ने कहा कि यह आदेश चुनाव प्रक्रिया को बाधित नहीं करता, बल्कि चुनावी नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए है।पंचायत चुनाव नाम वापसी के आखिरी दिन हाईकोर्ट के आदेश से  खलबली मची है।

 

गौरतलब है कि 6 जुलाई को राज्य निर्वाचन आयोग के सचिव के आदेश में नगर निकाय क्व मतदाताओं का पंचायत चुनाव लड़ने का रास्ता साफ ही गया था।

हालांकि, बाद में सचिव ने एक और आदेश जारी कर कहा कि पंचायती राज एक्ट के हिसाब से होंगे चुनाव।

इधऱ, इन आदेशों के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने 6 जुलाई के आदेश पर रोक लगा दी।

इधऱ, यह भी काबिलेगौर है कि 11 जुलाई ,शुक्रवार को नाम वापसी का अंतिम दिन है। ऐसे में हाईकोर्ट के स्टे के बाद राज्य निर्वाचन आयोग प्रतिबंधित दावेदारों को अब चुनाव लड़ने से कैसे रोक पायेगा?

नैनीताल के बुडलकोट क्षेत्र में 51 बाहरी लोगों के नाम वोटर लिस्ट में शामिल करने के मामले में भी सरकार से जवाब मांगा गया है। अदालत के इस आदेश से कई प्रत्याशियों की दावेदारी पर असर पड़ सकता है।

पंचायत चुनाव पर फिर मंडराया खतरा ! हाईकोर्ट में बहस 

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नैनीताल। हाईकोर्ट ने पंचायत चुनाव की तारीख को आगे खिसकाने सम्बन्धी याचिका को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए पंचायती राज सचिव व डीजीपी को सुरक्षात्मक उपायों के बाबत कोर्ट के समक्ष तथ्य पेश करने को कहा।

शुक्रवार को हुई सुनवाई में हाईकोर्ट ने कहा कि दोनों अधिकारी इस बाबत सरकार की आकस्मिक योजना पेश करें। संकट के समय कैसे स्थिति को कैसे संभाला जाएगा।

याचिकाकर्ता डॉ बैजनाथ शर्मा ने अपनी याचिका में विभिन्न कारणों का उल्लेख करते हुए पंचायत चुनाव की तिथि आगे खिसकाने की मांग की है।

गौरतलब है कि प्रदेश के पंचायत चुनाव में 24 व जुलाई को दो चरणों में मत डाले जाएंगे।

याचिका कर्ता ने कहा कि राज्य में गम्भीर आपदा व बरसात के मौसम में पंचायत चुनाव का कार्यक्रम जारी किया गया।

आपदा की वजह से प्रदेश की दर्जनों सड़कें बन्द होने से ग्रामीण इलाकों में आवाजाही ठप हो गयी है। ऐसे में चुनाव प्रचार व मतदान पर विपरीत असर लड़ेगा।

इसी महीने में कांवड़ यात्रा शुरू हो गयी है। लाखों की संख्या में कांवड़िए उत्तराखण्ड की ओर कूच कर रहे हैं। प्रदेश के कई पर्वतीय जिलों में कांवड़िए पहुंच रहे हैं।

यही नहीं, चारधाम यात्रा के चलने से प्रतिदिन हजारों तीर्थयात्री उत्तराखण्ड पहुंच रहे हैं। कुल मिलाकर उत्तराखण्ड के हरिद्वार से लेकर पर्वतीय जिलों में भारी जनसैलाब उमड़ रहा है।

कांवड़ यात्रा, आपदा प्रभावित इलाके और चारधाम यात्रा के लिए आवश्यक सुरक्षा बलों पर भी भारी बोझ देखा जा रहा है।

पुलिस-प्रशासन की सीमित टीम आपदा व पंचायत चुनाव के अलावा कांवड़ियों के लिए व्यवस्था बनाने में जुटी है। इससे अन्य जिलों में सुरक्षा बलों की कमी भी देखी जा रही है।

याचिकाकर्ता ने चारधाम यात्रा,आपदा, पंचायत चुनाव, कांवड़ यात्रा एक ही समय पर हो रही है। ऐसे में सभी मोर्चों पर जूझना काफी कठिन माना जा रहा है। लिहाजा, त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव जुलाई महीने के बजाय अन्य महीने में आयोजित किये जायें।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की लीगल टीम ने अपना पक्ष भी रखा। सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने किसी भी संकट की घड़ी से निपटने के लिए डीजीपी व पंचायत सचिव को आकस्मिक योजना पेश करने को कहा है। मंगलवार को राज्य सरकार समूची व्यवस्था को लेकर कोर्ट में तथ्य पेश करेंगे।

पंचायत चुनाव में महिलाएं: नाम की मुखिया या असली नेता?

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क्या महिलाओं की राजनीति में भूमिका सिर्फ नाम भर की है? क्या महिलाएं सच में राजनीति में आगे बढ़ रही हैं,या फिर उन्हें सिर्फ ‘मोहरा’ बनाकर रखा जा रहा है? 2027 चुनाव से पहले उत्तराखंड में पंचायत चुनाव की सरगर्मी तेज़ हो चुकी है,,,गाँवों में चाय की दुकानों से लेकर चौपालों तक,हर जगह चर्चा का माहौल है। हर पार्टी और निर्दलीय उम्मीदवार प्रचार में जुटे हुए हैं,,,हर जगह बैनर-पोस्टर लग रहे हैं, वादों की बौछार हो रही है,,,और हर चुनाव की तरह, इस बार भी नेता कह रहे हैं,महिलाओं को सशक्त बनाएंगे, महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाएंगे, महिलाओं को सुरक्षा देंगे।” लेकिन क्या हर बार की तरह यह सिर्फ वादा ही रह जाएगा? क्या पंचायत चुनाव में महिलाएं सिर्फ सीट भरने का साधन हैं? या सच में उन्हें नेतृत्व का अवसर दिया जा रहा है?


यहाँ पर हमें दो बातें देखने की ज़रूरत है,,,पहला  प्रतिनिधित्व का आंकड़ा बढ़ा है,,,,दूसरा  असल में सिर्फ आंकड़ा बढ़ा है या फिर फैसले लेने की शक्ति भी बढ़ी है? पंचायतों में महिलाएं सीट पर तो आ गईं,लेकिन क्या वह मुखिया, सरपंच या ग्राम प्रधान बनकर ,सच में अपनी मर्जी से फैसले ले पा रही हैं? कई गाँवों में यह देखा गया है कि महिला प्रधान के नाम पर,उनके पति, भाई या पिता पंचायत चला रहे होते हैं। इसे ‘प्रधान  पति’ कल्चर कहा जाता है, जहाँ महिला नाम की मुखिया होती है,और सत्ता उनके परिवार के पुरुषों के हाथ में रहती है। उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल के कई ब्लॉकों में यह आम बात है।अल्मोड़ा के छेत्र से एक महिला प्रधान चुनी गई,लेकिन पंचायत के हर फैसले में उनके पति और देवर ही बैठकों में आगे दिखाई दिए । पौड़ी के एक गाँव में महिला प्रधान की जगह उनके बेटे ने सरकारी अधिकारियों के साथ बैठकर योजनाओं की फाइल पर निपटारा किया भले हस्ताक्षर महिला प्रधान ने ही किये । 
ऐसे में सवाल उठता है कि   —क्या महिलाओं को ‘नाम की मुखिया’ बनाकर ही रखा जा रहा है? क्या हम सच में महिलाओं को सशक्त कर रहे हैं, या बस दिखावा कर रहे हैं?
आगे बढ़ें उससे पहले थोड़ा आरक्षण की स्थिति स्पष्ट कर दें… भारत में संविधान ने पंचायतों में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण दिया है ,जिसे कई राज्यों ने बढ़ाकर 50% कर दिया।राजस्थान में पंचायतों में 56% महिला प्रतिनिधित्व है, महाराष्ट्र में 54%, बिहार में 50%। उत्तराखंड में भी पंचायत चुनाव में 50% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं,,,जो कागज़ों पर बड़ा सुकून महिलाओं के प्रति देता है , लेकिन असल में क्या महिलाएं खुद फैसले ले रही हैं? भले कोई सीधे तौर पर ये न माने पर सच यही है की मुख्य रूप से प्रधान पति, प्रधान पिता या प्रधान भाई ही फैसला लेते हैं ,,
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अब विधानसभा और संसद में महिलाओं की स्थिति पर आते हैं,,,पंचायतों में 50% आरक्षण है,लेकिन विधानसभा में उत्तराखंड में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 7% है। देशभर में औसतन 10-12% महिलाएं ही विधानसभा में हैं। उत्तर प्रदेश — 11%,,,,,बिहार — 12%,,,,,,मध्यप्रदेश — 10%,,,,,,हरियाणा — 8%,,,,छत्तीसगढ़ सबसे ज़्यादा 18%  …. अब लोकसभा को देख लीजिये,,,,लोकसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व सिर्फ 15% और राज्यसभा में 13% है,,,मतलब महिलाओ की आधी आबादी, लेकिन असल फैसलों में भागीदारी 10-15%… सवाल उठता है क्यों?

2022 विधानसभा चुनाव में उत्तराखंड में महिला मतदाता पुरुषों से अधिक थीं। फिर भी तीनों बड़ी पार्टियों ने 10% से भी कम टिकट महिलाओं को दिए।बीजेपी ने 8, कांग्रेस ने 5, आम आदमी पार्टी ने 7 महिलाओं को टिकट दिए, यानि 210 सीटों में सिर्फ 20 महिलाएं मैदान में उतरीं। इनमें से भी आधी महिलाएं किसी नेता की बेटी, पत्नी या बहू थीं। जिनको अपने परिवार की राजनीतिक विरासत संभालने के लिए टिकट मिला,,,,लेकिन आम घर की महिलाओं को टिकट क्यों नहीं? इस पर राजनीतिक दल कहते हैं,,,,“चुनाव जीतने के लिए जिताऊ उम्मीदवार चाहिए,,,जबकि राजनीतिक जानकार  मानते हैं कि हमारी राजनीति धनबल और बाहुबल पर चलती है। शराब, पैसे और माफिया का खेल चलता है।ऐसे माहौल में महिलाएं चुनाव लड़ने में खुद को असहज पाती हैं।
 
 

जानकारों की माने तो उत्तराखंड की राजनीति में खनन और शराब माफिया का भी प्रभाव है,,,,राजनीति एक सिंडिकेट की तरह काम करती है, जिसमें सत्ता पक्ष, विपक्ष, अफसर, माफिया और मीडिया का गठजोड़ है। यही 5-7 हज़ार लोग, सवा करोड़ की आबादी की राजनीति तय कर रहे हैं।,,,,,
लेकिन दोष केवल सिस्टम का ही नहीं है,राजनीतिक दलों का रवैया भी दोषी है। हर बार चुनाव में कहते हैं, “महिलाओं को टिकट देंगे,”लेकिन देने में कंजूसी करते हैं और मज़े की बात देखिए…जो महिलाएं चुनाव लड़ती हैं, उनका जीतने का प्रतिशत भी पुरुषों से अधिक होता है। महिलाओं के जीतने की दर 16.5% है,जबकि पुरुषों की 11.8%। यानी महिलाएं बेहतर परफॉर्म कर रही हैं.. फिर टिकट देने में कंजूसी क्यों? सवाल ये  नहीं है कि महिलाएं राजनीति में क्यों नहीं हैं,सवाल यह है कि उन्हें आने से रोका क्यों जा रहा है? देश आधा उनका है,तो फैसलों में हिस्सा आधा क्यों नहीं?
 

 

एक बात और ,,,महिलाओं की सुरक्षा हर चुनाव में मुद्दा बनती है।‘महिला हेल्पलाइन’, ‘पिंक पेट्रोलिंग’, ‘महिला सुरक्षा ऐप’ जैसे नाम गिनाए जाते हैं।लेकिन क्या महिलाएं सच में सुरक्षित हैं?उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में महिलाओं को रोज़ 5-10 किलोमीटर पैदल चलकर पानी और लकड़ी लानी पड़ती है।रास्ते में छेड़छाड़ और यौन हिंसा की घटनाएं होती हैं।कई मामलों में शिकायत करने पर पुलिस भी गंभीरता से नहीं लेती।जब महिलाओं की सुरक्षा ही नहीं हो पा रही,तो राजनीति में आने पर भी वह कैसे सुरक्षित महसूस करेंगी?क्योंकि राजनीती में तो इससे बढ़कर  उन्हें ट्रोलिंग, गाली-गलौज, चरित्र हनन का सामना करना पड़ता है जो आम महिला नेता के लिए किसी यातना से कम नहीं



महिलाओं के नाम पर कई योजनाएं भी बनी हैं।महिला उद्यमिता योजना’, ‘महिला स्टार्टअप फंड’, ‘मुख्यमंत्री महिला सशक्तिकरण योजना’…लेकिन 2024 में केवल 18% सरकारी फंडिंग महिला उद्यमियों को मिली।महिला स्टार्टअप में 60% प्रोजेक्ट फंड की कमी से बंद हो गए।ज्यादातर योजनाएं कागज तक सीमित रह गईं।सरकारी आंकड़ों में जो महिला आत्मनिर्भर दिखाई जाती है,ज़मीन पर हालात अलग हैं।हमारे समाज में महिलाओं को देवी का दर्जा दिया गया है।लेकिन क्या राजनीति में उन्हें वही दर्जा दिया गया? क्या हम महिलाओं को सिर्फ त्योहारों में पूजने के लिए देवी मानते हैं,या उन्हें फैसलों की मेज़ पर भी बराबरी का दर्जा देना चाहते हैं?
अगर हम एक सशक्त और निष्पक्ष लोकतंत्र चाहते हैं,तो पंचायतों में उन्हें फैसले लेने का अधिकार देना होगा न की उनके पति ,पिता या भाई को  ,,, विधानसभा और संसद में भी महिलाओं की भागीदारी बढ़ानी होगी।वो भी नाम मात्र की नहीं, असल नेतृत्व के साथ। महिलाओं को सिर्फ घोषणा पत्रों और पोस्टरों की शोभा नहीं बल्कि उन्हें असली सत्ता और फैसलों में बराबरी का हिस्सा देना होगा ।
जब महिलाएं असलियत में आगे आएंगी,तो राजनीति में भी ईमानदारी, संवेदनशीलता और पारदर्शिता आएगी। उत्तराखंड की महिलाएं पहाड़ की चट्टानों सी मजबूत हैं। वो खेत संभाल सकती हैं, जंगल से लकड़ी ला सकती हैं, बच्चों की परवरिश कर सकती हैं,तो राजनीति भी संभाल सकती हैं,जरूरत है, उन्हें सिर्फ मौका देने की।

‘यह सिर्फ एक सीन था’ कहकर फंसे राठौर, कांग्रेस ने पूछा– कारवां लुटा कैसे?

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 उत्तराखंड की सियासत इन दिनों एक अनोखे ‘प्रेम प्रसंग’ को लेकर गर्म है, जिसमें अभिनय, सियासत, महिला सम्मान और नैतिकता के तमाम आयाम एक साथ उलझे हुए हैं। चर्चित भाजपा नेता और हरिद्वार जिले के ज्वालापुर से पूर्व विधायक सुरेश राठौर हाल ही में उर्मिला सनावर (फिल्म अभिनेत्री) के साथ मंच साझा करते हुए उसे “अपने जीवन की साथी” बता बैठे। कैमरे और माइक के सामने रिश्तों का यह सार्वजनिक ऐलान कुछ ही घंटों में सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।

लेकिन हंगामा बढ़ते ही राठौर पलट गए। सफाई दी कि “यह तो बस एक फिल्म का सीन था”। इस सफाई ने आग में घी डालने का काम किया। सवाल उठने लगे कि क्या अब भाजपा नेताओं की सार्वजनिक घोषणाएं भी किसी स्क्रिप्ट का हिस्सा हैं? और अगर यह अभिनय था तो मंच, माला और सार्वजनिक संवाद किसलिए?

 

 

प्रकरण गरमाया तो भाजपा ने भी पैंतरा बदला। पहले चुप्पी साधे रही, फिर जनदबाव बढ़ने पर राठौर को पार्टी की छवि धूमिल करने और अनुशासनहीनता के आरोप में नोटिस थमा दिया गया। राठौर ने प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट से भेंट कर अपना पक्ष रखा है, जिस पर पार्टी विचार कर रही है।

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने कांग्रेस को हमलावर होने का मौका दे दिया।
पार्टी की मुख्य प्रवक्ता गरिमा मेहरा दसौनी ने भाजपा पर हमला बोलते हुए कहा, “नाटक, झूठ और पाखंड की शैली से जनता को भ्रमित नहीं किया जा सकता।” उन्होंने तंज कसते हुए पूछा, “तू इधर-उधर की बात न कर, ये बता कारवां लुटा कैसे?”

गरिमा ने भाजपा से पूछा कि क्या यह पहला मामला है जब पार्टी के नेता महिलाओं से जुड़े विवादों में फंसे हों? क्या हर बार कार्रवाई तब होती है जब जनता का गुस्सा उबाल पर आ जाता है? और क्या UCC जैसे कानूनों का हवाला सिर्फ जनता को उलझाने के लिए दिया जाता है?

भाजपा की ओर से प्रदेश मीडिया प्रभारी मनवीर चौहान ने स्पष्ट किया कि पार्टी किसी भी प्रकार के अमर्यादित आचरण को स्वीकार नहीं करती। उन्होंने बताया कि अनुशासन समिति में राठौर के मामले पर गंभीरता से विचार किया जाएगा।

सियासत और व्यक्तिगत जीवन की यह जटिल गाथा एक ओर राजनीति के चरित्र पर सवाल खड़े कर रही है, तो दूसरी ओर दर्शा रही है कि अब जनता केवल भाषणों से नहीं, आचरण से भी जवाब मांगती है।

सांविधानिक संकट; पंचायती राज एक्ट में संशोधन के अध्यादेश को नहीं मिली मंजूरी, राजभवन ने लौटाया

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प्रदेश की पंचायतों में प्रशासकों की पुनर्नियुक्ति संबंधी अध्यादेश को राजभवन ने बिना मंजूरी लौटा दिया है। इस कारण 10760 त्रिस्तरीय पंचायतें अभी खाली रहेंगी। इससे पंचायतों में सांविधानिक संकट पैदा हो गया है।त्रिस्तरीय पंचायतों में प्रशासकों का छह महीने का कार्यकाल खत्म होने के बाद प्रशासकों की पुनर्नियुक्ति के लिए पंचायती राज विभाग ने आनन-फानन में प्रस्ताव तैयार किया। जिसे पहले विधायी विभाग यह कहते हुए लौटा चुका था कि कोई अध्यादेश यदि एक बार वापस आ गया तो उसे फिर से उसी रूप में नहीं लाया जाएगा। ऐसा किया जाना संविधान के साथ कपट होगा। विधायी विभाग की इस आपत्ति के बावजूद अध्यादेश को राजभवन भेज दिया गया।

 

राज्यपाल के सचिव रविनाथ रामन के मुताबिक विधायी विभाग की आपत्ति का निपटारा किए बिना इसे राजभवन भेजा गया। जिसे विधायी को वापस भेज दिया गया है। इसमें कुछ चीजें स्पष्ट नहीं हो रही थीं, इसके बारे में पूछा गया है। इसमें विधायी ने कुछ मसलों को उठाया था। राजभवन ने इसका विधिक परीक्षण किए जाने के बाद इसे लौटाया है।

10760 त्रिस्तरीय पंचायतें हुईं मुखिया विहीन

प्रदेश में हरिद्वार की 318 ग्राम पंचायतों को छोड़कर 7478 ग्राम पंचायतें, 2941 क्षेत्र पंचायतें और 341 जिला पंचायतें मुखिया विहीन हो गई हैं। राज्य में पहली बार इस तरह की स्थिति बनी है।उत्तराखंड पंचायती राज अधिनियम 2016 में संशोधन के लिए 2021 में अध्यादेश लाया गया था। राजभवन से मंजूरी के बाद इसे विधानसभा से पास होना था, लेकिन तब विधेयक को विधानसभा से पास नहीं किया गया। क्योंकि हरिद्वार में अध्यादेश जारी होने के बाद त्रिस्तरीय चुनाव करा दिए गए थे

जोशीमठ-औली रोपवे परियोजना के लिए डीपीआर तैयार,राज्य में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए महत्वपूर्ण

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उत्तराखंड में जोशीमठ-औली रोपवे परियोजना आगे बढ़ रही है। राज्य की निर्माण एजेंसी ब्रिडकुल ने नए रोपवे के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) का मसौदा तैयार कर लिया है, जो 3.917 किलोमीटर की दूरी तय करेगी। अंतिम डीपीआर जल्द ही सरकार को भेजी जाएगी। मंजूरी मिलते ही निर्माण शुरू हो जाएगा। रोपवे से क्षेत्र में पर्यटन को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। सुरक्षा चिंताओं के कारण पुराने रोपवे को जनवरी 2023 से बंद कर दिया गया है।

ब्रिडकुल ने मसौदा योजना तैयार की

ब्रिडकुल के प्रबंध निदेशक एनपी सिंह ने पुष्टि की कि रोपवे के लिए डीपीआर लगभग पूरी हो चुकी है। पुराने रोपवे के असुरक्षित हो जाने के बाद इस परियोजना को पूरी तरह से ब्रिडकुल द्वारा ही संभाला जा रहा है।

उन्होंने कहा कि पहले रोपवे के पहले और दूसरे टावर की नींव में कुछ समस्या थी, जिसके कारण इसे बंद करना पड़ा। तब से, BRIDCUL नए सर्वेक्षण करने और नए रोपवे की योजना बनाने का काम संभाल रहा है।

नींव और सर्वेक्षण सहित सभी औपचारिकताएं पूरी कर ली गई हैं।

परियोजना का निर्माण 2 चरणों में किया जाएगा

रोपवे का निर्माण दो चरणों में किया जाएगा।

  • प्रथम चरण : 11 टावरों और 21 केबिनों के साथ 2.76 किलोमीटर की दूरी तय करेगा।
  • द्वितीय चरण : 1.157 किलोमीटर, गौरसौ बुग्याल तक विस्तारित, 7 टावर और 9 केबिन।

परियोजना की कुल लागत 426 करोड़ रुपये आंकी गई है। सिंह ने बताया कि डीपीआर का अंतिम संस्करण एक सप्ताह के भीतर सरकार को सौंप दिया जाएगा।

ऐसे तैयार होगा रोपवे

प्रतिदिन 500 यात्रियों की क्षमता

एक बार चालू होने के बाद, रोपवे प्रति घंटे प्रति दिशा (पीपीएचपीडी) लगभग 500 यात्रियों को ले जाने में सक्षम होगा। प्रत्येक ट्रॉली 10 लोगों को ले जा सकेगी।

कुल मिलाकर, 3.917 किलोमीटर लंबे मार्ग में दोनों चरणों में 18 टावर और 30 केबिन शामिल होंगे।

 

इंदिरा गांधी ने रखी थी पुराने रोपवे की नींव

मूल रोपवे परियोजना 1983 में शुरू हुई थी जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इसकी आधारशिला रखी थी। इसे 1984-85 में ज़िगज़ैग तकनीक का उपयोग करके पूरा किया गया था। तब से, जोशीमठ और औली के बीच पर्यटकों की यात्रा के लिए रोपवे का उपयोग किया जाता रहा है, जब तक कि इसे सुरक्षा चिंताओं के कारण जनवरी 2023 में बंद नहीं कर दिया गया।

अब, राज्य इस क्षेत्र में पर्यटन को एक बार फिर बढ़ावा देने के लिए एक सुरक्षित और उन्नत संस्करण बनाने की योजना बना रहा है।

1983 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने रखी थी आधारशिला

 

‘सिंधु जल समझौता’ रद्द होने से पाकिस्तान पर क्या असर पड़ेगा,क्या भारत सच में रोक सकता है पानी ?

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पहलगाम आतंकी हमला निश्चित रूप से सुरक्षा व्यवस्था में कुछ कमियों को उजागर करता है, और यह सरकार के लिए एक चेतावनी है कि खुफिया तंत्र, सीमा सुरक्षा, और पर्यटन स्थलों की निगरानी को और मजबूत करने की जरूरत है। लेकिन इसे केवल सरकार की नाकामी का सबूत कहना अतिशयोक्ति होगी,क्योंकि  आतंकी हमले जटिल सुरक्षा चुनौतियाँ हैं, जिनके पीछे कई कारक होते हैं, जैसे सीमा पार से आतंकवाद का समर्थन, स्थानीय परिस्थितियाँ, और वैश्विक आतंकी नेटवर्क। सरकार की नीतियों और सुरक्षा व्यवस्थाओं में कमियाँ हो सकती हैं, लेकिन इस तरह की घटनाओं को पूरी तरह से एक पक्ष की विफलता के रूप में देखना सही नहीं है।भारत सरकार ने त्वरित प्रतिक्रिया दी, जिसमें सर्च ऑपरेशन, सुरक्षा समीक्षा बैठकें, और पाकिस्तान के खिलाफ कड़े कदम जैसे सिंधु जल संधि को स्थगित करना और अटारी बॉर्डर बंद करना शामिल हैं। इसके अलावा, जम्मू-कश्मीर सरकार ने पीड़ितों के लिए मुआवजे की घोषणा की,,,इससे पहले भी सरकार ने कई ऐसे एक्शन लिए हैं जो आतंकवादियों की कमर तोड़ने में कारगर साबित हुए हैं,,,कई बार आतंकी हमले होने से पहले ही उन पर एक्शन भी हुआ है,,,क्योंकि आतंकवाद एक बहुआयामी चुनौती है, जिसमें बाहरी ताकतों की बड़ी भूमिका है,,, सिर्फ ये कहना कि सरकार की नाकामी से ये घटना हुई ये भी सही नहीं होगा,,,हाँ चूक जरूर कुछ मामलों में सरकार से हो चुकी है,,,लेकिन भारत ने भी कूटनीतिक तरिके से पाकिस्तान को जवाब देना शुरू कर दिया है,,,,इनमें सबसे प्रमुख है सिंधु  जल समझौता रद्द करना,,,
 
 
यहां ये जानना भी जरूरी  हो जाता है कि आखिर  सिंधु  जल   समझौता रद्द होने से पाकिस्तान पर क्या प्रभाव पड़ सकते हैं,,,भारत द्वारा पाकिस्तान के साथ सिंधु जल समझौता  रद्द करने या निलंबित करने के कई दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। यह समझौता 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता से हुआ था, जिसके तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह नदियों—सिंधु, झेलम, चिनाब जो पश्चिमी नदियाँ हैं  और रावी, ब्यास, सतलुज जो पूर्वी नदियाँ हैं उनके  पानी का बँटवारा किया गया था । पाकिस्तान को पश्चिमी नदियों का 80% पानी मिलता है, जबकि भारत को पूर्वी नदियों का नियंत्रण और पश्चिमी नदियों पर सीमित उपयोग  का अधिकार है।अब ये समझौता रद्द होने से पाकितान पर इसके प्रभाव बहुत घातक साबित हो सकते हैं,,,पाकिस्तान की लगभग 80% कृषि भूमि और 21 करोड़ से अधिक आबादी सिंधु और उसकी सहायक नदियों पर निर्भर है। यदि भारत पानी का प्रवाह रोकता या कम करता है, तो पाकिस्तान में पीने के पानी और स्वच्छता के लिए गंभीर संकट उत्पन्न हो सकता है,,,पाकिस्तान की 16 मिलियन हेक्टेयर कृषि भूमि सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर है, जो 90% सिंचाई के लिए इसका उपयोग करती है। पानी की कमी से गेहूं, चावल, और कपास जैसी प्रमुख फसलों की पैदावार घट सकती है, जिससे खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है,,,गेहूं की बुवाई जैसे महत्वपूर्ण समय पर पानी की कमी से फसल चक्र बाधित हो सकता है, जिससे खाद्य कीमतों में वृद्धि और किसानों की आजीविका पर असर पड़ेगा,,कृषि पाकिस्तान की जीडीपी में 25% योगदान देती है। पानी की कमी से खाद्य उत्पादन में कमी, बेरोजगारी, और आर्थिक अस्थिरता बढ़ सकती है।जलविद्युत परियोजनाएँ जैसे तरबेला और मंगला बाँध प्रभावित होंगी, जिससे ऊर्जा संकट गहरा सकता है,,,समझौते को निलंबित करना भारत के लिए एक रणनीतिक कदम है, विशेष रूप से आतंकवाद के खिलाफ जवाबी कार्रवाई के रूप में। यह पाकिस्तान पर दबाव डालने का एक प्रभावी तरीका हो सकता है,,,
 
What is the Indus Waters Treaty put on hold by India after Pahalgam attack?
 
हालाँकि भारत ये करने में कितना कामयाब हो पायेगा ये देखना होगा क्योंकि समझौते को एकतरफा निलंबित करना अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत विवादास्पद हो सकता है। वियना संधि  की धारा 62 के तहत, भारत यह तर्क दे सकता है कि पाकिस्तान द्वारा समर्थित आतंकवाद मूलभूत परिस्थितियों में बदलाव है, लेकिन विश्व बैंक या अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता न्यायालय में चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है,,,पाकिस्तान विश्व बैंक या संयुक्त राष्ट्र में इस मुद्दे को उठा सकता है, जिससे भारत पर कूटनीतिक दबाव बढ़ सकता है,,,पाकिस्तान हेग के मध्यस्थता न्यायालय में भारत के फैसले को चुनौती दे सकता है, जैसा कि उसने किशनगंगा परियोजना के मामले में किया था,,,
Pak writes to Ind for dialogue on water issues next month - sources
 
 
यहां सवाल ये भी है कि क्या भारत पाकिस्तान का पानी सच में रोक सकता है,,,तो जवाब है हाँ, भारत तकनीकी और भौगोलिक दृष्टि से पाकिस्तान को जाने वाली कुछ नदियों का पानी रोक सकता है, लेकिन यह प्रक्रिया जटिल है और इसके कई कानूनी, राजनीतिक, और व्यावहारिक पहलू हैं,,,रावी, ब्यास, सतलज इन पर भारत का पूरा नियंत्रण है, और भारत इनका पानी बिना किसी प्रतिबंध के उपयोग कर सकता है,,,भारत पहले से ही रावी नदी का पानी रोकने के लिए कदम उठा चुका है। उदाहरण के लिए, 2024 में शाहपुर कंडी बैराज के पूरा होने के बाद रावी का पानी पाकिस्तान की ओर जाने के बजाय जम्मू-कश्मीर और पंजाब में उपयोग हो रहा है। इससे जम्मू-कश्मीर को 1150 क्यूसेक अतिरिक्त पानी मिल रहा है,,,सिंधु, झेलम, और चिनाब नदियाँ भारत से होकर पाकिस्तान जाती हैं। भारत इन नदियों पर बांध बनाकर या जलाशयों का निर्माण करके पानी के प्रवाह को नियंत्रित कर सकता है। हालांकि, पूरी तरह रोकना मुश्किल है क्योंकि भारत के पास अभी इतनी बड़ी जल भंडारण क्षमता नहीं है कि वह इन नदियों के पूरे प्रवाह को रोक सके। बड़े बांध बनाने में समय और संसाधन लगते हैं,,इन नदियों का प्रवाह इतना विशाल है कि इसे पूरी तरह रोकना तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण है,,,
 
 
 
कुल मिलाकर सिंधु जल समझौते का निलंबन पाकिस्तान के लिए तत्काल और दीर्घकालिक संकट पैदा कर सकता है, विशेष रूप से जल, कृषि, और आर्थिक क्षेत्रों में। भारत के लिए यह एक शक्तिशाली रणनीतिक कदम है, लेकिन इसके साथ अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय जोखिम भी जुड़े हैं। दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ने की संभावना है,,सरकार को अपना काम करना है लेकिन इस त्रासदी में जान गंवाने वाले 26 लोगों की याद में और कश्मीर की शांति के लिए,राजनैतिक दलों को  राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर एकजुटता दिखानी होगी। आतंकियों को करारा जवाब देना और कश्मीर को फिर से स्वर्ग बनाना सिर्फ सरकार की ही नहीं बल्कि सभी पार्टियों के साथ साथ हम  सभी की भी  साझा जिम्मेदारी है।

Kedarnath: पहली बार केदारनाथ धाम में मिलेगी आधुनिक चिकित्सा सुविधा, स्क्रीनिंग प्वाॅइंट सहित पढ़ें ये सभी अपडेट.

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चारधाम यात्रा में आने वाले तीर्थ यात्रियों की सेहत का विशेष ख्याल रखा जाएगा। इसके लिए चारधाम के अलावा यात्रा मार्गों पर चिकित्सा सुविधाओं का रोडमैप तैयार कर स्वास्थ्य विभाग तैयारियों में जुट गया है। पहली बार केदारधाम में 17 बेड का अस्पताल संचालित होगा। जिसमें तीर्थ यात्रियों को आधुनिक चिकित्सा सुविधा मिलेगी।

स्क्रीनिंग प्वाइंट पर 50 वर्ष से ऊपर के यात्रियों की अनिवार्य रूप से स्वास्थ्य जांच की जाएगी। बुधवार को सचिवालय में स्वास्थ्य सचिव डाॅ. आर. राजेश कुमार ने चारधाम यात्रा की तैयारियों के लिए मुख्य चिकित्सा अधिकारियों के साथ बैठक की। उन्होंने कहा कि श्रद्धालुओं की सुरक्षित यात्रा के लिए आधुनिक और सुलभ स्वास्थ्य ढांचा तैयार किया जा रहा है।

केदारनाथ धाम में 17 बेड के अस्पताल का निर्माण कार्य अंतिम चरण में है। कार्यदायी संस्था ने यात्रा शुरू होने से पहले दो मंजिला भवन पूरी तरह संचालित करने का भरोसा दिया है। अस्पताल में एक्सरे, रक्त जांच, ईसीजी, मल्टी पैरामॉनीटर और ऑर्थो विशेषज्ञ की सेवाएं उपलब्ध होगी। अधिकांश चिकित्सा उपकरणों को पहुंचाया जा चुका है।

श्रद्धालुओं के लिए बहुभाषी हेल्थ एडवाइजरी और होर्डिंग्स-

श्रद्धालुओं को सहज व स्पष्ट स्वास्थ्य जानकारी प्रदान करने के लिए बहुभाषी हेल्थ एडवाइजरी तैयार की गई। जो 13 भाषाओं में उपलब्ध है। यह एडवाइजरी यात्रा मार्ग पर होटलों, रेस्टोरेंट, पार्किंग स्थलों में यूआर कोड के माध्यम से श्रद्धालुओं को प्रदान की जाएगी। साथ ही जाम संभावित क्षेत्रों व ठहराव स्थलों पर बड़े होर्डिंग्स के माध्यम से भी स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता का प्रचार किया जाएगा।

 

फाटा और पैदल मार्ग की चिकित्सा इकाइयों को किया सशक्त-

फाटा स्थित अस्पताल में हड्डी रोग विशेषज्ञ की तैनाती की जा रही है। यहां पर एक्सरे की सुविधा भी उपलब्ध होगी। वहीं, पैदल मार्ग पर 12 चिकित्सा इकाइयों में प्रशिक्षित चिकित्सक व फार्मेसी अधिकारी तैनात किए जा रहे हैं। इसके अतिरिक्त, 12 चिह्नित हेलिपैड और पार्किंग स्थलों पर स्क्रीनिंग टीमों की जाएगी।

गंगोत्री व यमुनोत्री धाम के स्क्रीनिंग प्वाइंट पर 28 अप्रैल से डॉक्टरों की तैनाती-

गंगोत्री व यमुनोत्री धाम के स्क्रीनिंग प्वाइंट पर डॉक्टरों व सहायक कर्मचारियों की तैनाती 28 अप्रैल से रोस्टर वार की जाएगी। गंगोत्री धाम व जानकीचट्टी में फिजिशियन की विशेष तैनाती की जा रही है। इसके अलावा यात्रा मार्गों पर 108 एंबुलेंस की व्यवस्था रहेगी।

 

यात्रा मार्गों पर 70 डॉक्टर तैनात-

चारधाम यात्रा मार्ग पर 70 डॉक्टर तैनात हैं। अलावा अन्य जिलों से 15 दिन में रोटेशनल आधार पर विशेषज्ञ डॉक्टरों की तैनाती की जाएगी। इनमें ऑर्थो सर्जन, फिजिशियन, एनेस्थेटिस्ट, जनरल सर्जन, 121 स्टाफ नर्स, 26 फार्मासिस्ट, 309 ऑक्सीजन बेड, छह आईसीयू बेड, एक ब्लड बैंक और दो ब्लड स्टोरेज यूनिट तैनाती की जा रही है।

पांच नए स्थानों में खुलेंगे मेडिकल रिलीफ पोस्ट-

बदरीनाथ, गोविंदगढ़ और पालना भंडार में मेडिकल रिलीफ पोस्ट इस बार भी संचालित रहेंगे। इसके अलावा पांच नए स्थान गौचर, लांगसू, मंडल, कटोरा और हनुमान चट्टी में एमआरपी खोले जाएंगे। बदरीनाथ धाम में स्वामी विवेकानंद संस्था के माध्यम से एक अलग स्क्रीनिंग सेंटर भी संचालित किया जाएगा।

 

बिना पंजीकरण खाद्य उत्पाद बेचने पर होगी कार्रवाई-

खाद्य संरक्षा एवं औषधि प्रशासन विभाग की ओर से यात्रा मार्ग पर खाद्य सामग्री की गुणवत्ता की नियमित जांच की जाएगी। बिना पंजीकरण वाले खाद्य विक्रेताओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। विभाग ने एक खाद्य सुरक्षा मोबाइल वैन भी तैनात की है, जो यात्रा मार्ग पर निरीक्षण कर सैंपलों की मौके पर जांच करेगी।

उत्तराखंड का नया रेल नेटवर्क: हिमालय की चुनौतियों पर विजय,भविष्य में होने वाले साइड इफेक्ट !

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हिमालय की दुर्गम चट्टानों और भूस्खलन के खतरों को पार करते हुए उत्तराखंड में एक आधुनिक रेल नेटवर्क का निर्माण तेजी से हो रहा है। ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना इस दिशा में मील का पत्थर साबित हो रही है, जो न केवल कनेक्टिविटी बढ़ाएगी, बल्कि चार धाम यात्रा और पर्यटन को भी नई ऊंचाइयों तक ले जाएगी।

 इस महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत अब तक 11 मुख्य सुरंगों और 8 बड़े पुलों का निर्माण पूरा हो चुका है,,,इस महत्वाकांक्षी परियोजना की शुरुआत 1996 में तत्कालीन रेल मंत्री सतपाल महाराज द्वारा सर्वेक्षण के साथ हुई थी,,, 2011 में यूपीए सरकार के दौरान  अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा आधारशिला रखी गई थी,,, लेकिन राजनीतिक मतभेदों के कारण कार्य में देरी हुई,,,जिसके बाद NDA सरकार में इसका काम शुरू किया गया था,,,

इस 125 किलोमीटर लंबी रेल लाइन में 105 किलोमीटर हिस्सा सुरंगों से होकर गुजरता है, जिसमें हाल ही में जानसू सुरंग जो लगभग 15 किलोमीटर है उसका  ब्रेकथ्रू हुआ है, जो हिमालय में बोरिंग मशीन से बनी सबसे लंबी परिवहन सुरंग है,,,,इस रेल लाइन में 17 सुरंगें और कई पुल शामिल हैं,,,

Rishikesh Karnaprayag Rail: Status, Route Map & Stations [2024]

परियोजना की मुख्य विशेषताएं

  • लंबाई और संरचना: 125 किमी की यह रेल लाइन, जिसमें 105 किमी हिस्सा 17 सुरंगों से होकर गुजरता है, हिमालय की जटिल भौगोलिक चुनौतियों का सामना कर रही है।

  • जानसू सुरंग: हाल ही में 15 किमी लंबी जानसू सुरंग का ब्रेकथ्रू हुआ, जो हिमालय में बोरिंग मशीन से बनी सबसे लंबी परिवहन सुरंग है।

  • हिमालयन टनलिंग तकनीक: यह तकनीक भूस्खलन और नई चट्टानों जैसी समस्याओं से निपटने में कारगर है और भविष्य की परियोजनाओं के लिए मॉडल बनेगी।

उत्तराखंड के लिए लाभ

  • बेहतर कनेक्टिविटी: गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्रों को जोड़कर यात्रा समय में कमी आएगी।

  • आर्थिक विकास: स्थानीय व्यवसायों और पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा।

  • चार धाम यात्रा: यह परियोजना तीर्थयात्रियों के लिए सुगम और सुरक्षित यात्रा सुनिश्चित करेगी।

अन्य महत्वपूर्ण परियोजनाएं

टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन (170 किमी, लागत 49,000 करोड़ रुपये) का अंतिम सर्वे पूरा हो चुका है। यह परियोजना उत्तराखंड के सुदूर क्षेत्रों को रेल नेटवर्क से जोड़ेगी, जिससे आर्थिक और सामाजिक विकास को गति मिलेगी।

rishikesh-karnprayag railway line line project tunnel built in record 26 days जल्‍द पूरा होगा ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेलवे लाइन का सपना, रेकॉर्ड 26 दिन में बनी सुरंग

चुनौतियां और प्रगति

आजादी के बाद उत्तराखंड में रेल नेटवर्क का विस्तार केवल 344.9 किमी तक सीमित रहा, जो मुख्य रूप से हरिद्वार, देहरादून और कुमाऊं क्षेत्रों तक है। हिमालय का जटिल भूगोल और पर्यावरणीय संवेदनशीलता इस विस्तार में बड़ी बाधाएं रही हैं। फिर भी, नई तकनीकों और समर्पित प्रयासों से ये परियोजनाएं दिसंबर 2026 तक पूर्ण होने की दिशा में अग्रसर हैं।

RVNL Rıshıkesh Package-4 - ALTINOK Consulting Engineering

इसके अलावा अन्य रेल परियोजना टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन जो 170 किमी की है और इसकी लागत  49,000 करोड़ रुपये की अनुमानित है,,उसका भी   अंतिम सर्वे पूरा हो चुका है, चूँकि उत्तराखंड में रेल नेटवर्क का विस्तार आजादी के बाद सीमित रहा है, और वर्तमान में केवल 344.9 किमी रेल लाइनें हैं, जो मुख्य रूप से हरिद्वार, देहरादून, और कुमाऊं क्षेत्र तक सीमित हैं। इन नई परियोजनाओं से राज्य में रेल कनेक्टिविटी और आर्थिक विकास को नई दिशा मिलेगी,,,

 

निर्माण से पहाड़ों में भविष्य में होने वाले साइड इफेक्ट

 

1. पर्यावरणीय प्रभाव

  • भूस्खलन का खतरा: हिमालय का भूगोल पहले से ही भूस्खलन-प्रवण है। सुरंग निर्माण और पहाड़ों की कटाई से मिट्टी और चट्टानों की स्थिरता प्रभावित हो सकती है, जिससे भूस्खलन की घटनाएं बढ़ सकती हैं।
  • जंगल और जैव-विविधता पर असर: परियोजना के लिए वन क्षेत्रों की कटाई और भूमि अधिग्रहण से स्थानीय वनस्पतियों और जीव-जंतुओं का आवास नष्ट हो सकता है। हिमालय में कई दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती हैं, जिन पर खतरा मंडरा सकता है।
  • जल स्रोतों पर प्रभाव: सुरंग निर्माण से भूजल स्तर और प्राकृतिक जल स्रोत (जैसे झरने) प्रभावित हो सकते हैं, जिसका असर स्थानीय समुदायों और कृषि पर पड़ सकता है।
  • मलबे का निपटान: निर्माण के दौरान निकलने वाला मलबा नदियों और घाटियों में प्रदूषण का कारण बन सकता है, खासकर गंगा और उसकी सहायक नदियों के लिए।

India's longest transport tunnel takes shape in Rishikesh-Karnaprayag rail project - India Today

2. सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव

  • स्थानीय समुदायों का विस्थापन: परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण से कई गांवों के लोग विस्थापित हो सकते हैं। इससे उनकी आजीविका और सांस्कृतिक पहचान पर असर पड़ सकता है।
  • पर्यटन का दबाव: बेहतर कनेक्टिविटी से चार धाम यात्रा और पर्यटन बढ़ेगा, लेकिन अनियंत्रित पर्यटन से स्थानीय संस्कृति और पर्यावरण पर दबाव बढ़ सकता है।
  • शहरीकरण और जनसंख्या दबाव: रेल लाइन के साथ नए शहरों और बाजारों का विकास हो सकता है, जिससे पहाड़ी क्षेत्रों में अनियोजित शहरीकरण और संसाधनों पर दबाव बढ़ेगा।

3. आर्थिक और बुनियादी ढांचे पर प्रभाव

  • रखरखाव की चुनौतियां: हिमालय में बारिश, बर्फबारी और भूकंपीय गतिविधियों के कारण रेल लाइन और सुरंगों का रखरखाव महंगा और जटिल हो सकता है।
  • आर्थिक असंतुलन: रेल नेटवर्क से कुछ क्षेत्रों को अधिक लाभ होगा, जबकि दूरस्थ गांव उपेक्षित रह सकते हैं, जिससे क्षेत्रीय असमानता बढ़ सकती है।

4. जलवायु परिवर्तन और दीर्घकालिक जोखिम

  • हिमनदों पर प्रभाव: हिमालय में ग्लेशियर पहले से ही जलवायु परिवर्तन के कारण पिघल रहे हैं। निर्माण कार्य और बढ़ता मानवीय हस्तक्षेप इस प्रक्रिया को तेज कर सकता है।
  • प्राकृतिक आपदाओं का जोखिम: हिमालय में भूकंप और बाढ़ जैसी आपदाएं आम हैं। रेल लाइन और सुरंगों को इन जोखिमों के लिए डिज़ाइन किया गया है, लेकिन दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करना चुनौतीपूर्ण होगा।

L&T Begins TBM Shakti's Assembly for Rishikesh – Karnaprayag Rail - The Metro Rail Guy

5. सकारात्मक प्रभावों के साथ संतुलन की आवश्यकता

  • हालांकि परियोजना से कनेक्टिविटी, पर्यटन और आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलेगा, लेकिन इन साइड इफेक्ट्स को कम करने के लिए सख्त पर्यावरणीय नियम, टिकाऊ निर्माण प्रथाएं, और स्थानीय समुदायों की भागीदारी जरूरी है।
  • उपाय: मलबे का उचित निपटान, वनरोपण, भूस्खलन रोकथाम के लिए इंजीनियरिंग समाधान, और स्थानीय लोगों के लिए पुनर्वास और रोजगार के अवसर जैसे कदम प्रभावों को कम कर सकते हैं।

निष्कर्ष

ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना उत्तराखंड के विकास के लिए महत्वपूर्ण है,उत्तराखंड का नया रेल नेटवर्क न केवल हिमालय की चुनौतियों पर विजय का प्रतीक है, बल्कि यह राज्य के आर्थिक और सामाजिक विकास का आधार भी बनेगा। यह परियोजना उत्तराखंड को आधुनिक भारत के नक्शे पर और मजबूती से स्थापित करेगी, लेकिन इसके दीर्घकालिक साइड इफेक्ट्स को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पर्यावरण, सामाजिक और आर्थिक प्रभावों को कम करने के लिए टिकाऊ और समावेशी दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है, ताकि हिमालय की नाजुक पारिस्थितिकी और स्थानीय समुदायों की सुरक्षा सुनिश्चित हो।