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Uttarakhand: प्रदेश में बिजली की मांग में उछाल, बाजार में भारी किल्लत से संकट शुरू, कई जगह हुई बिजली की कटौती.

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प्रदेश में बिजली की मांग में भारी बढ़ोतरी, बाजार में भारी किल्लत की वजह से बिजली संकट शुरू हो गया है। पिछले दो दिनों में न केवल ग्रामीण बल्कि छोटे कस्बों और फर्नेश इंडस्ट्री में भी यूपीसीएल ने कटौती शुरू कर दी है। हालात ये हैं कि बाजार में भी यूपीसीएल को बिजली 10 रुपये प्रति यूनिट से कम नहीं मिल रही।

प्रदेश में एक मार्च को बिजली की मांग 3.8 करोड़ यूनिट थी। जैसे-जैसे गर्मी बढ़ रही है, मांग भी तेजी से उछल रही है। बृहस्पतिवार को बिजली की मांग बढ़कर 4.5 करोड़ यूनिट पर पहुंच गई। इसके सापेक्ष यूजेवीएनएल की बिजली केवल 90 लाख यूनिट मिल रही है, जबकि केंद्रीय पूल से 1.3 करोड़ यूनिट। कुल मिलाकर बिजली की उपलब्धता करीब 2.3 करोड़ यूनिट है। यूपीसीएल बाजार से करीब 70 लाख यूनिट खरीदने को मजबूर है।

बिजली की किल्लत की वजह से पिछले दो दिनों में हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर के ग्रामीण इलाकों में करीब दो से ढाई घंटे, छोटे कस्बों में करीब एक से डेढ़ घंटे और स्टील फर्नेश इंडस्ट्री में भी करीब दो घंटे की कटौती की जा रही है। यूपीसीएल प्रबंधन के मुताबिक, बाजार में बिजली की भारी किल्लत है। इंडियन एनर्जी एक्सचेंज में भी 10 रुपये प्रति यूनिट पर भी बिजली उपलब्ध नहीं हो पा रही है।

गैस किल्लत से बिजली उत्पादन प्रभावित-

इस्राइल-ईरान युद्ध के कारण गैस की कमी होने से गैस आधारित पावर प्लांट भी संकट में हैं। इस कारण यूपीसीएल के काशीपुर स्थित 214 मेगावाट का श्रावंती, गामा कंपनी का बिजली उत्पादन भी बंद है। इन्हें उत्पादन के लिए बाजार से गैस खरीदनी होगी, जो कि इस वक्त या तो उपलब्ध नहीं है या फिर महंगे दामों में मिल रही है। महंगी गैस से उत्पादन करने की सूरत में यूपीसीएल को इनकी बिजली 10 रुपये यूनिट से भी अधिक पैसे में मिलेगी। यूपीसीएल के एमडी अनिल कुमार का कहना है कि बाजार से मांग के सापेक्ष आपूर्ति पूरी करने का प्रयास किया जा रहा है।

 

नियामक आयोग ने 150 मेगावाट पीपीए रोका-

यूपीसीएल ने 500 मेगावाट बिजली खरीद का पीपीए नियामक आयोग की अनुमति के बाद किया था। इसमें से 350 मेगावाट बिजली तो तकनीकी दिक्कतों के कारण नहीं मिल पाई। 150 मेगावाट बिजली पर भी नियामक आयोग ने रोक लगा दी है। जानकारी के मुताबिक, इसका पीपीए करने के लिए नियामक आयोग से अनुमति लेनी होगी।

एसआईआर…2003 की मतदाता सूची जारी, 18 विधानसभा सीटें आज अस्तित्व में नहीं, नाम खोजना चुनौती

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चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के लिए उत्तराखंड की वर्ष 2003 की मतदाता सूची तो जारी हो गई लेकिन इसमें नाम खोजना आसान नहीं है। प्रदेशभर में उस वक्त 18 विधानसभा सीटें ऐसी थीं, जो आज अस्तित्व में ही नहीं हैं। परिसीमन के बाद इनके नाम और क्षेत्र बदल गए थे।

एसआईआर के लिए वर्ष 2003 की मतदाता सूची से मिलान किया जाना है। आपका वोट 2003 में था या नहीं, इसके लिए मुख्य निर्वाचन अधिकारी देहरादून कार्यालय ने वेबसाइट ceo.uk.gov.in पर वर्ष 2003 की मतदाता सूची जारी कर दी है। नई पीढ़ी के मतदाता जब यहां देहरादून की धर्मपुर व रायपुर, चमोली की थराली, पौड़ी की चौबट्टाखाल, नैनीताल की लालकुआं व भीमताल, ऊधमसिंह नगर की कालाढूंगी सीट की तलाश करेंगे तो उन्हें नहीं मिलेगी। वर्ष 2003 में ये विधानसभा सीटें थी ही नहीं।

राज्य गठन के बाद पहला परिसीमन वर्ष 2002 में हुआ था, जिसमें राज्य में विधानसभा की 70 और लोकसभा की पांच सीटें तय हुई थीं। 2003 की मतदाता सूची में भी इन्हीं सीटों का जिक्र है। इसके बाद राष्ट्रीय स्तर पर जब वर्ष 2008 में परिसीमन हुआ तो उत्तराखंड की विधानसभा, लोकसभा सीटों की संख्या तो नहीं बदली लेकिन 18 सीटों का वजूद खत्म हो गया था। इसके बजाय नए नाम से सीटें आ गई थीं। वर्तमान मतदाता जब नए नाम को सर्च करेंगे तो उन्हें 2003 की मतदाता सूची में इन 18 सीटों के नाम नहीं मिलेंगे।

2003 और 2025 में ये हुआ बदलाव

चमोली जिले में नंद्रप्रयाग व पिंडर के नाम से विस सीट थीं, जिनकी जगह अब थराली नाम से सीट है। देहरादून जिले में लक्ष्मणचौक व देहरादून के नाम से सीट थी, अब धर्मपुर, रायपुर व देहरादून कैंट के नाम से है। हरिद्वार जिले में इकबालपुर, लंढौरा, बहादराबाद, लालढांग के नाम से सीट थीं, अब इनकी जगह भेल रानीपुर, ज्वालापुर, झबरेड़ा, पिरान कलियर, खानपुर व हरिद्वार ग्रामीण के नाम से है। पौड़ी जिले में धूमाकोट, बीरोंखाल, थलीसैंण के नाम से सीट थीं, अब इनकी जगह चौबट्टाखाल नाम से है। पिथौरागढ़ में कनालीछीना और अल्मोड़ा में भिकियासैंण के नाम से सीट थीं, जो अब नहीं हैं। नैनीताल में मुकतेश्वर व धारी के नाम से सीट थीं, अब लालकुआं, भीमताल व कालाढूंगी के नाम से हैं। यूएसनगर में पंतनगर-गदरपुर, रुद्रपुर-किच्छा के नाम से सीट थीं, जो खत्म हो गईं और इनकी जगह गदरपुर, रुद्रपुर, किच्छा व नानकमत्ता के नाम से सीट है।

वेबसाइट पर पुराने वोटर आईडी या एडवांस सर्च करें

निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट पर आप 2003 की वोटर लिस्ट में अपना नाम पुराने वोटर आईडी कार्ड के इपिक नंबर से सर्च कर सकते हैं। अगर वो नहीं है तो आप एडवांस सर्च में जाकर अपना नाम, पिता का नाम, पोलिंग स्टेशन का नाम, उम्र आदि की जानकारी देकर निकाल सकते हैं।

उत्तराखंड में 3.30 लाख स्मार्ट मीटर लगने के बाद लगी रोक

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भारी प्रचार प्रसार के बावजूद खराब स्मार्ट मीटर विभाग के गले की हड्डी बनते जा रहे हैं। स्मार्ट मीटर में तमाम प्रकार की गड़बड़ी पकड़ में आने के बाद सम्बंधित विभाग यूपीसीएल कठघरे में खड़ा है।

विभाग से जुड़े कई उच्च पदस्थ अधिकारी उपभोक्ताओं की शिकायतों को लगातार अनसुनी करते हुए अपने मन की कर रहे थे। इस शर्मनाक गड़बड़ एपिसोड के ‘अलंबरदारों’ ने भाजपा सरकार की भी फजीहत करवा दी। समय रहते कारगर कदम उठा लिए जाते तो आज किरकिरी का सामना नहीं करना पड़ता।
ऊर्जा विभाग में पदस्थ अधिकारियों की ताजपोशी को लेकर शुरू से ही सवाल उठते रहे हैं।

उत्तराखंड में बिजली उपभोक्ताओं की लगातार बढ़ती नाराजगी और सोशल मीडिया से सड़क तक उठते विरोध के बाद आखिरकार प्रदेश सरकार और यूपीसीएल हरकत में आ गए हैं। ऊर्जा निगम ने राज्यभर में स्मार्ट मीटर लगाने की प्रक्रिया पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है।

हैरानी की बात यह है कि यह निर्णय तब लिया, जब प्रदेश में 3.30 लाख से अधिक स्मार्ट मीटर पहले ही इंस्टॉल किए जा चुके हैं। निगम के नए आदेश ने साफ कर दिया है कि उपभोक्ताओं की शिकायतें झूठी या बढ़ा-चढ़ाकर पेश की गई नहीं थीं, बल्कि स्मार्ट मीटरों की गुणवत्ता, रीडिंग और बिलिंग को लेकर गंभीर खामियां मौजूद थीं।

स्मार्ट मीटरों को लेकर महीनों से उठ रहे सवाल आखिरकार सही साबित हुए हैं। यूपीसीएल ने आधिकारिक आदेश जारी करते हुए राज्य में स्मार्ट मीटर इंस्टॉलेशन पर रोक लगा दी है। प्रबंध निदेशक अनिल यादव के निर्देश के अनुसार जहां भी गलत रीडिंग, तकनीकी त्रुटि या उपभोक्ता की आपत्ति मिलेगी, वहां मौजूदा स्मार्ट मीटर हटाकर नया तकनीकी रूप से उपयुक्त मीटर लगाया जाएगा।

मुख्य अभियंता बीएमएस परमार ने स्पष्ट किया है कि सभी शिकायतों की गंभीर समीक्षा की जाएगी और फील्ड अधिकारी खुद मौके पर जाकर निस्तारण करेंगे। अब उपभोक्ताओं को बिल सही है, मीटर ठीक है जैसे औपचारिक जवाब नहीं मिलेंगे।
आदेश में पहली बार यह स्वीकार किया है कि दोष उपभोक्ता का नहीं, बल्कि मीटर और सिस्टम का भी हो सकता है। इससे लाखों उपभोक्ताओं के उन सवालों को मजबूती मिली है, जो लंबे समय से नजरअंदाज किए जा रहे थे।

आखिर इतनी देर क्यों जागा निगम?

ऊर्जा निगम के भीतर सूत्र बताते हैं कि बीते कुछ महीनों में स्मार्ट मीटरों को लेकर शिकायतों का अंबार लग गया था। कई उपभोक्ता तीन-चार गुना बढ़े हुए बिल के खिलाफ लगातार विरोध कर रहे थे।

विधायक, पार्षद, जनप्रतिनिधि लगातार मीटरों की खराबी की बात उठा रहे थे, लेकिन निगम ने अब तक मीटर में गलती नहीं का रटा-रटाया जवाब ही दिया। बताया जा रहा है कि विभिन्न जिलों से मिली रिपोर्टों में मीटरों की तकनीकी कमियां उजागर हुईं—कहीं गलत रीडिंग, कहीं बैकएंड डेटा सिंकिंग खराब, तो कई स्थानों पर पूरे सिस्टम की त्रुटियां सामने आईं।

इन बढ़ती शिकायतों ने दबाव बनाया, जिसके बाद निगम को आदेश जारी करने पड़े। विशेषज्ञों का कहना है कि परियोजना को जल्दबाजी में लागू किया गया, फील्ड टेस्टिंग कमजोर थी और ठेकेदारों की मॉनिटरिंग भी सवालों में है। अब 3.30 लाख मीटर लगने के बाद रोक लगाना इस बात का संकेत है कि सिस्टम शुरू से ही मजबूत नहीं था। इससे उन हजारों उपभोक्ताओं को राहत मिलने की संभावना है, जो अब तक बढ़े हुए बिलों के सामने बेबस थे।

गौरतलब है कि रुद्रपुर से कांग्रेस विधायक तिलकराज बेहड़ ने स्मार्ट मीटर को खुलेआम तोड़ कर सम्बंधित कंपनी को भगा दिया था। कांग्रेस का आरोप है कि देश के प्रसिद्ध उद्योगपति को फायदा पहुंचाने के लिए जबरदस्ती स्मार्ट मीटर लगाए जा रहे हैं।

नए आदेश के बाद उपभोक्ताओं को यह अधिकार मिला है कि—

  • गलत बिल आने पर तकनीकी जांच की मांग कर सकें।
  • स्मार्ट मीटर की खराबी साबित होने पर मीटर बदलवाएं।
  • फील्ड अधिकारी मौके पर जांच करेंगे, केवल कागजी जवाब नहीं दिया जाएगा।
  • उपभोक्ता आदेश की कॉपी दिखाकर अधिकारियों से जवाबदारी तय कर सकेंगे।

बड़े सवाल जो अभी भी अनुत्तरित हैं-

  • गलत मीटर लगाने की जिम्मेदारी किसकी?
  • क्या ठेकेदारों की जांच होगी?
  • क्या पहले से लगे 3.30 लाख मीटरों का ऑडिट होगा?
  • उपभोक्ताओं को गलत बिलों का क्या मुआवजा मिलेगा?
  • मीटरों से हुए अधिक बिल का समायोजन कैसे होगा?

देखें रोक का आदेश

 

चुनाव आयोग के एसआईआर के नाम पर ठगी शुरू, उत्तराखंड में कई लोगों के पास आ चुके हैं OTP

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चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के नाम पर कई राज्यों में ठगी शुरू हो गई है। उत्तराखंड में भी इसे लेकर सतर्क रहने की अपील की गई है। साइबर पुलिस और चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि एसआईआर के लिए बीएलओ को ओटीपी की जरूरत नहीं होती है।

प्रदेश में जल्द ही एसआईआर शुरू होने वाला है। वर्तमान में पड़ोसी राज्य यूपी समेत देश के 12 राज्यों में एसआईआर की प्रक्रिया चल रही है। इस बीच यूपी में कई ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जब ठग बीएलओ या चुनाव आयोग के नाम पर फोन करके ओटीपी पूछकर खाते खाली कर रहे हैं। इससे एसआईआर को लेकर लोगों के बीच भ्रम भी बढ़ाया जा रहा है।

साइबर पुलिस भी ठगी के इस नए ट्रेंड पर नजर बनाए हुए
उत्तराखंड के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय के मुताबिक, पहली बात तो ये है कि उत्तराखंड में अभी एसआईआर शुरू नहीं हुआ है। दूसरा बीएलओ को मोबाइल ओटीपी की जरूरत नहीं होती। बीएलओ आपको जो एन्म्यूरेशन फॉर्म देंगे, उसे भरकर वापस जमा कराना है। अगर आप ऑनलाइन एसआईआर भर रहे हैं तो इसमें ओटीपी की जरूरत पड़ सकती है लेकिन यह आपको खुद भरना होता है। आयोग ने स्पष्ट किया है कि एसआईआर के नाम पर किसी तरह के ठगों के जाल में न आएं। उत्तराखंड की साइबर पुलिस भी ठगी के इस नए ट्रेंड पर नजर बनाए हुए हैं।

एसआईआर की जानकारी टोलफ्री नंबर से लें
अगर आपके मन में एसआईआर को लेकर कोई सवाल है। आप सीधे चुनाव आयोग के टोल फ्री नंबर 1950 पर संपर्क कर सकते हैं। आपको यहां सभी तरह की जानकारी, जरूरी दस्तावेज, एसआईआर की प्रक्रिया की पूरी जानकारी मिलेगी।

दूसरे राज्यों से शादी कर उत्तराखंड आईं बेटियों को लाने होंगे कागज, जल्द शुरू होने जा रहा है एसआईआर

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दूसरे राज्यों से विवाह कर उत्तराखंड आईं बेटियों को मतदाता सूची में अपना वोट बचाए रखने के लिए मायके से कागज लाने होंगे। दूसरी ओर उत्तराखंड की मतदाता सूची अभी फ्रीज नहीं होने के कारण वोटर लिस्ट में नाम, पता आदि बदलाव कराए जा सकते हैं। चुनाव आयोग का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) दिसंबर या जनवरी में उत्तराखंड में भी शुरू होने जा रहा है।

 

इससे पहले मुख्य निर्वाचन अधिकारी उत्तराखंड ने वर्ष 2003 की मतदाता सूची वेबसाइट पर जारी कर दी है। अन्य राज्यों ने भी अपनी पुरानी मतदाता सूची वेबसाइट पर जारी की हुई हैं। दूसरे राज्यों से उत्तराखंड में 2003 के बाद विवाह कर आईं बेटियों को एसआईआर के लिए अपने मायके से कागज लाने होंगे।

 

निर्वाचन विभाग के मुताबिक, यूपी समेत कई राज्यों ने 2003 की वोटर लिस्ट जारी की हुई है। उस वक्त जिनका वोट वहां था, उन्हें अपनी वोटर लिस्ट की जानकारी यहां एसआईआर में देनी होगी। जिनका वोट नहीं था, उन्हें अपने माता-पिता के संबंधित राज्य के 2003 के वोट की जानकारी यहां एसआईआर फॉर्म में देनी होगी। चूंकि यहां सभी एसआईआर शुरू होने वाला है, इसलिए पहले से ही कागज तैयार रखे जा सकते हैं।

अध्ययन में खुलासा…बादल या झील फटने से नहीं, इस वजह से धराली में मची थी तबाही

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धराली आपदा का कारण बादल या कोई कृत्रिम झील फटना नहीं था बल्कि लगातार बारिश और तेज गति से आए मलबे के कारण तबाही मची थी। 4600 मीटर की ऊंचाई से धराली में एक सेकेंड में आठ मीटर की रफ्तार से मलबा पहुंचा था। यहां पर आसपास के क्षेत्र की तुलना में सबसे अधिक तेजी से मलबा आया था।

इसका उल्लेख नेचुरल हेजर्ड रिसर्च जर्नल में द धराली कैटास्ट्रॉफिक डिजास्टर : ए वॉकअप कॉल फ्राम द खीर गंगा शीर्षक से पेपर में प्रकाशित किया गया। जिसको वाडिया हिमालय भू विज्ञानसंस्थान के वैज्ञानिक संदीप कुमार, तारिक अनवर, मो. शाहवेज, हरितभ राणा, देवांशु गोदियाल ने तैयार किया। वैज्ञानिक संदीप कुमार और तारिक अनवर ने बताया कि धराली क्षेत्र सिस्मिक और एमसीटी जोन है। छोटे भूकंप से पहाड़ अस्थिर होते हैं, इसके अलावा पहाड़ों की संरचना भी दरार वाली है। दिन और रात में तापमान के अंतर से भी चट्टानों पर असर पड़ता है। ग्लेशियर के पीछे जाने के कारण मोरेन (मलबा) रहता है, वह लगातार बारिश के कारण पानी के साथ मिलकर नीचे की तरफ तीखे ढलान होने के कारण तेजी से पहुंचा और काफी नुकसान हुआ। वैज्ञानिकों के अनुसार नदी, गदेरों के आसपास निर्माण नहीं होना चाहिए। इसके अलावा यहां पर लगातार निगरानी और अध्ययन किया जाना चाहिए।

सड़क भी अधूरी, रिश्ते भी अधर में…बनते-बनते बिगड़ जा रही बारकोट गांव में युवाओं की शादी की बात

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चमोली जिले के नारायणबगड़ ब्लॉक के ग्राम पंचायत किमोली का बारकोट तोक राज्य बनने के 25 साल बाद भी सड़क सुविधा से नहीं जुड़ पाया है। सड़क की असुविधा युवाओं के रिश्ते में रुकावट बन रही है। गांव के सात से आठ युवा कुंवारे है। रिश्ते के लिए यदि बात हो भी जाए तो सड़क असुविधा की बात किए कराए पर पानी फेर दे रही है।

 

ऐसे में युवाओं को सड़क और रिश्ते का इंतजार बरकरार है।बारकोट गांव में वर्तमान में 25 परिवार निवास करते है। ग्रामीण पिछले कई वर्षों से लगातार सड़क की मांग करते आ रहे हैं लेकिन ग्रामीणों को सड़क सुविधा का लाभ नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में ग्रामीणों को गांव से मुख्य सड़क आगर तक पहुंचने के लिए चार से पांच किमी की पैदल खड़ी चढ़ाई पार करनी पड़ती हैं।

Road inconvenience is becoming a hindrance in youth relationship Karnaprayag Barkot Village Chamoli News

जिला पंचायत सदस्य सुरेंद्र सिंह कनेरी ने कहा कि सड़क के मामले को जिले के सर्वाेच्च सदन में भी उठाया गया है। ग्रामीण पंचम सिंह भंडारी बताते हैं कि उनके बेटे के लिए कई रिश्ते ढूंढ़ लिए हैं लेकिन लड़की पक्ष को सड़क न होने का पता लगने पर वे शादी से इन्कार कर रहे हैं। ऐसे में सड़क के साथ-साथ बेटे की शादी का इंतजार भी करना पड़ रहा है।

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गुड़गांव में नौकरी करने वाले 26 वर्षीय युवक अनिल सिंह के अनुसार पिछले दो साल से लगातार परिवार वाले रिश्ते देख रहे हैं। थराली, नौटी आदि जगह रिश्ता देखने भी गए थे। लड़की पक्ष के लोग पूछते है कि गांव से कितनी दूर है सड़क, जब उनको गांव तक सड़क न होने का पता लगता है। तो वे रिश्ता करने से मुकर जाते हैं।

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27 वर्षीय राकेश सिंह दिल्ली में जॉब करते हैं। वह बताते हैं कि गौचर, कर्णप्रयाग, गैरसैंण कई जगह लड़की देखने गया हूं लेकिन हर बार सड़क न होने की वजह से रिश्ता नहीं हो पाता है। पिछले दो साल से परिवार वाले कई रिश्ते ढूंढ़ते थक गए हैं। पता नहीं कब सड़क बनेगी और कब रिश्ता होगा।

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बारकोट गांव की सड़क को पीजीएजीएसवाई के चौथे चरण के लिए भेजा गया है। जिसकी स्वीकृति प्राप्त हो गई है। सड़क के लिए डीपीआर बनने के बाद आगे की कार्यवाही शुरू की जाएगी। जल्द ही अन्य सड़कों के लिए भी तेजी से काम हो रहा है। -भूपाल राम टम्टा, विधायक थराली।

उत्तराखण्ड में लागू होगा “ग्रीन सेस” CM धामी ने दे दिए निर्देश; रेवेन्यू में आएगा उछाल.

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राज्य सरकार को करोड़ों का ग्रीन सेस मिलने की उम्मीद

 

Dehradun- उत्तराखण्ड राज्य के गठन के 25 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर राज्य सरकार ने पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए “ग्रीन सेस” लागू करने की घोषणा की है।
यह सेस अन्य राज्यों से आने वाले वाहनों पर वसूला जाएगा, जिससे प्राप्त धनराशि वायु प्रदूषण नियंत्रण, हरित अवसंरचना और स्मार्ट ट्रैफिक प्रबंधन पर खर्च की जाएगी।
ग्रीन सेस फ़ास्ट टैग से कटेगा। राज्य सरकार को 100 करोड़ की आमदनी होने की उम्मीद है।

 

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि “उत्तराखण्ड के 25 वर्ष पूरे होने पर यह हमारी प्रतिबद्धता है कि हम राज्य को स्वच्छ, हरित और प्रदूषण-मुक्त बनाएँ। ‘ग्रीन सेस’ से प्राप्त राजस्व का उपयोग वायु गुणवत्ता सुधार, हरित अवसंरचना और स्मार्ट यातायात प्रबंधन में किया जाएगा।”

 

राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (UKPCB) के मेंबर सेक्रेटरी डॉ. पराग मधुकर धकाते ने बताया कि बोर्ड के अध्ययन के अनुसार देहरादून में वायु प्रदूषण का सबसे बड़ा स्रोत सड़क की धूल (55%) है, जबकि वाहन उत्सर्जन (7%) भी एक प्रमुख कारण है।
ग्रीन सेस के माध्यम से सड़क धूल नियंत्रण और स्वच्छ वाहन नीति अपनाना शहर की वायु गुणवत्ता सुधारने का सबसे प्रभावी कदम होगा।

 

भारत सरकार के “स्वच्छ वायु सर्वेक्षण –

2024” में उत्तराखण्ड के शहरों ने शानदार प्रदर्शन किया है — ऋषिकेश को 14वाँ और देहरादून को 19वाँ स्थान प्राप्त हुआ है। राज्य सरकार इस उपलब्धि को और सुदृढ़ करने के लिए ग्रीन सेस से मिलने वाली आय का उपयोग करेगी।

मुख्य उद्देश्य
• वायु प्रदूषण में कमी और एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) में सुधार
• पुराने प्रदूषणकारी वाहनों पर नियंत्रण
• स्वच्छ ईंधन आधारित वाहनों को प्रोत्साहन
• सड़क धूल, वृक्षारोपण और वायु निगरानी नेटवर्क में सुधार

 

मुख्य विशेषताएँ

•   बाहरी राज्यों से आने वाले वाहनों से “ग्रीन सेस” वसूला जाएगा
•   इलेक्ट्रिक, हाइड्रोजन, सोलर और बैटरी वाहनों को छूट दी जाएगी
•   इससे राज्य को लगभग ₹100 करोड़ प्रतिवर्ष की आय होने का अनुमान
•   यह राशि वायु निगरानी, रोड डस्ट नियंत्रण, हरित क्षेत्र विस्तार और स्मार्ट ट्रैफिक सिस्टम पर व्यय होगी

राज्य सरकार ने कहा कि यह पहल उत्तराखण्ड को “स्वच्छ वायु – स्वस्थ जीवन” की दिशा में एक नई पहचान देगी।

जल्द शुरू होगा केदारनाथ व हेमकुंड साहिब रोपवे का निर्माण, NHLML व पर्यटन विभाग के बीच एमओयू हुआ

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मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा, उत्तराखंड में रोपवे कनेक्टिविटी नए आयाम स्थापित करने के साथ ही राज्य की अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने में में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। जल्द ही सोनप्रयाग से केदारनाथ और गोविंदघाट से हेमकुंड साहिब रोपवे का निर्माण कार्य शुरू किया जाएगा।

समझौते के अनुसार रोपवे के निर्माण में एनएचएलएमएल की 51 प्रतिशत व राज्य सरकार की 49 प्रतिशत हिस्सेदारी होगी। राजस्व साझेदारी में 90 प्रतिशत धनराशि पर्यटन, परिवहन व गतिशीलता के क्षेत्र में व्यय की जाएगी।मुख्यमंत्री ने कहा, यह समझौता प्रदेश की धार्मिक व सांस्कृतिक धरोहर को वैश्विक पटल पर नई पहचान दिलाने के साथ ही पर्यटन, रोजगार, पर्यावरण संरक्षण और बुनियादी ढांचे में नई संभावनाओं का मार्ग प्रशस्त करेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पर्वतमाला परियोजना के तहत सोनप्रयाग से केदारनाथ के बीच लगभग 4100 करोड की लागत से 12.9 किलोमीटर लंबाई का रोपवे व गोविंदघाट से हेमकुंड साहिब के बीच 2700 करोड़ की लागत की 12.4 किलोमीटर लंबे रोपवे का निर्माण किया जाएगा।

चारधाम ऑलवेदर रोड, दिल्ली-देहरादून एलिवेटेड रोड, सितारगंज से टनकपुर मोटर मार्ग, पौंटा साहिब-देहरादून, बनबसा से कंचनपुर, भानियावाला से ऋषिकेश, काठगोदाम से लालकुंआ, हल्द्वानी बाईपास और सीमांत क्षेत्रों में रोड कनेक्टिविटी विस्तार किया जा रहा है।

केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग राज्य मंत्री अजय टम्टा ने कहा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में राज्य में हर क्षेत्र में तेजी से विकास कार्य हो रहे हैं। इन रोपवे के निर्माण के बाद श्रद्धालुओं को केदारनाथ व हेमकुंड साहिब के दर्शन करने में काफी सुगमता होगी। पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने कहा, यह समझौता राज्य में पर्यटन के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। रोपवे के निर्माण के बाद स्थानीय स्तर पर लोगों की आर्थिकी व रोजगार में वृद्धि होगी।

चमोली जिले में पिछले तीन साल में भूधंसाव की घटनाएं बढ़ी, कर्णप्रयाग, ज्योतिर्मठ के बाद अब नंदानगर

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चमोली जनपद में पिछले तीन साल में भूधंसाव की घटनाएं बढ़ी हैं। सबसे पहले कर्णप्रयाग के बहुगुणा नगर में भूधंसाव की घटना सामने आई। यह क्षेत्र घाटी में होने के बावजूद भूधंसाव हो रहा है। उसके बाद ज्योतिर्मठ के भूधंसाव ने सबको विचलित कर दिया था। यहां सैकड़ों मकान और होटल भूधंसाव की जद में आ गए थे।

Land Subsidence Incidents Increased In Chamoli In Last Three Years After Karnaprayag  Jyotirmath Now Nandanagar - Amar Ujala Hindi News Live - Uttarakhand:चमोली  जिले में पिछले तीन साल में भूधंसाव की घटनाएं

अब नंदानगर के भूधंसाव ने फिर से लोगों को चिंता में डाल दिया है। ज्योतिर्मठ की तरह ही नंदानगर में भी जमीन से पानी का रिसाव हो रहा है। यहां कई घरों से पानी निकलने के बाद लोगों ने मकान छोड़ दिए हैं। भूधंसाव भी लगातार बढ़ रहा है। चमोली जनपद आपदा की दृष्टि से अति संवेदनशील है। यहां बादल फटना, भूस्खलन, भूधंसाव, अतिवृष्टि की आपदाएं चमोलीवासी कई वर्षों से झेल रहे हैं।

Chamoli News Nandanagar Band Bazaar Hit By Landslide 25 Shops In Danger 34  Families Shifted - Amar Ujala Hindi News Live - Chamoli:भूधंसाव की चपेट में  आया नंदानगर का बैंड बाजार, खतरे

पिछले तीन वर्षों में भूधंसाव जैसी आपदा का नया पैटर्न देखने को मिल रहा है। नंदानगर के व्यापार संघ अध्यक्ष नंदन सिंह और कथावाचक शंभू प्रसाद पांडे का कहना है कि भूधंसाव का व्यापार रुप से वैज्ञानिक सर्वे होना चाहिए। नंदानगर क्षेत्र आपदा की दृष्टि से संवेदनशील है। यहां का वैज्ञानिक सर्वेक्षण के बाद यहां की बसावट के लिए योजना तैयार होनी चाहिए।

Chamoli News Nandanagar Band Bazaar Hit By Landslide 25 Shops In Danger 34  Families Shifted - Amar Ujala Hindi News Live - Chamoli:भूधंसाव की चपेट में  आया नंदानगर का बैंड बाजार, खतरे

नंदानगर में हो रहे भूधंसाव से प्रवासी लोग भी चिंतित हैं। वे लगातार अपने परिजनों, रिश्तेदारों और दोस्तों को फोन कर वहां की स्थिति के बारे में जानकारी ले रहे हैं। जो लोग नंदानगर में हैं, वे भी प्रभावित क्षेत्र को देखकर चिंतित हैं। रविवार को बैंड बाजार के अलावा संपूर्ण नंदानगर बाजार बंद रहा। नगर के व्यापारियों ने भी प्रभावितों की दुकानों को खाली करवाने में मदद की।