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2024 लोकसभा चुनाव के दौरान मोदी सरकार को परेशानी में डाल सकते हैं ये सभी मुद्दे…

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बहुत हुई महंगाई की मार, अबकी बार मोदी सरकार. ‘हम मोदी जी को लाने वाले हैं, अच्छे दिन आने वाले हैं..  2014 के लोकसभा चुनाव में जब ऐसे नारे सामने आए तो कांग्रेस सरकार से नाखुश जनता को एक उम्मीद दिखी. उम्मीद कि मोदी सरकार आने के बाद वाकई उनके ‘अच्छे दिन’ आ जाएंगे. इसी उम्मीद से 17 करोड़ से ज्यादा लोगों ने बीजेपी को वोट दे दिया. बीजेपी ने 282 सीटें जीतीं. ये पहली बार था जब किसी गैर-कांग्रेसी पार्टी ने बहुमत हासिल किया था. 26 मई 2014 को नरेंद्र मोदी ने पहली बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली.  2019 में दूसरी बार 23 करोड़ से ज्यादा लोगों ने बीजेपी को वोट दिया और  बीजेपी ने 303 सीटें जीतीं. नरेंद्र मोदी दूसरी बार प्रधानमंत्री बने.   प्रधानमंत्री मोदी ने 2025 तक भारत की GDP 5 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचाने का टारगेट रखा है. हालांकि, अभी के हालात को देखते हुए ये टारगेट 2025  तक तो पूरा होना बहुत मुश्किल लगता है ।   

 
मोदी सरकार की नीतियों पर कई सवाल- 

मोदी सरकार कुछ समय बाद फिर देश के आम चुनाव में उतरने वाली है तो तीसरी बार सत्ता तक पहुंचने से पहले उनको जनता के कई सवालों के जवाब भी देने होंगे ? मोदी सरकार के इन 9 सालों के कार्यकाल पर नजर डालें तो कई ऐसे तथ्य  सामने आते  है, जो मोदी सरकार की नीतियों पर कई सवाल करती हैं,,, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 के चुनावों में  डॉलर की गिरती कीमत को लेकर कांग्रेस सरकार को खूब घेरा था, कि आखिर भारत का रुपया डॉलर के मुकाबले को लेकर इतना क्यों गिर रहा है, लेकिन 2014 में 72 पर चल रहा डालर मोदी सरकार में आज 82 पर पहुंच गया है।

 
अर्थव्यवस्था का क्या हुआ ? 

मोदी सरकार इन 9 सालों में कई मोर्चों पर विफल नजर आती है, मोदी सरकार में विदेशी कर्ज भी देश पर खूब  बढ़ा है. इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक हर साल औसतन 25 अरब डॉलर का विदेशी कर्ज भारत पर बढ़ा है. मोदी सरकार से पहले देश पर करीब 409 अरब डॉलर का विदेशी कर्ज था, जो अब बढ़कर डेढ़ गुना यानी करीब 613 अरब डॉलर पहुंच गया है ।   

 
मोदी सरकार में बेरोजगारी का आंकड़ा- 

मोदी सरकार में सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा रोजगार को लेकर सामने आता है, मोदी सरकार में बेरोजगारी दर जमकर बढ़ी है. इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक  बेरोजगारी के आंकड़ों पर नजर रखने वाली निजी संस्था सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी यानी CMIE के मुताबिक, अभी देश में करीब 41 करोड़ लोगों के पास रोजगार है. जबकि  मोदी सरकार के आने से पहले 43 करोड़ लोगों के पास रोजगार था. यानी हर साल 2 करोड़ रोजगार देने का वादा करने वाली मोदी सरकार में रोजगार मिलने के बजाय उल्टा २ करोड़ रोजगार कम हो गए।

 
नौकरियों का क्या हुआ ? 

CMIE ने पिछले साल एक रिपोर्ट जारी की थी. इसमें दावा किया गया था कि भारत में अभी 90 करोड़ लोग नौकरी के लिए योग्य हैं. इनमें से 45 करोड़ लोगों ने तो अब  नौकरी की तलाश करना ही छोड़ दिया है. यानी कि इस देश के 45 करोड़ युवा इतने निराश हैं कि वो मान चुके हैं कि अब उनको नौकरी नहीं मिल पायेगी,, ये आंकड़ा निश्चित रूप से इस देश के भविष्य उन युवाओं की हताशा को दर्शाता है,,, 2019 के चुनाव के बाद सरकार के ही एक सर्वे में सामने आया था कि देश में बेरोजगारी दर 6.1% है. ये आंकड़ा 45 साल में सबसे ज्यादा था. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, मोदी सरकार के आने से पहले देश में बेरोजगारी दर 3.4% थी, जो इस समय बढ़कर 8.1% हो गई है. ये आंकड़े बताते हैं कि मोदी सरकार किस तरह रोजगार के मुद्दे पर पूरी तरह विफल साबित हुई और आने वाले चुनावों में देश के युवा सरकार से इस पर जवाब मांगेंगे जो की सरकार की परेशानियां जरुर बढ़ाएगी।

शिक्षा पर मोदी सरकार के आंकड़े-

किसी भी देश के विकास के लिए अच्छी शिक्षा बहुत जरूरी है. मोदी सरकार में शिक्षा का बजट बढ़ा है,  9 साल में शिक्षा पर खर्च का बजट 30 हजार करोड़ रुपये  बढ़ा है. लेकिन देश में स्कूल भी कम हो गए हैं, शिक्षक भी बढ़े हैं लेकिन छात्र नहीं . मोदी सरकार के आने से पहले देश में 15.18 लाख स्कूल थे, जो अब घटकर 14.89 लाख हो गए हैं. नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 के मुताबिक, देश में अभी भी करीब 30 फीसदी महिलाएं और 15 फीसदी पुरुष अनपढ़ हैं. 10 में से 6 लड़कियां 10वीं से ज्यादा नहीं पढ़ पा रही हैं. वहीं, 10 में से 5 पुरुष ऐसे हैं जो 10वीं के बाद पढ़ाई छोड़ रहे हैं।

 
मोदी सरकार में बेतहाशा बढ़ती महंगाई-

अब बात आती है देश के सबसे बड़े मुद्दे की,,जिस मुद्दे ने मोदी  को सत्ता के सबसे ऊँचे मुकाम पर पहुंचाया और भारतीय जनता पार्टी को अब तक का सबसे प्रचंड जनादेश दिलवाया,,, जी हाँ  ‘बहुत हुई महंगाई की मार, अबकी बार मोदी सरकार’ 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी का ये नारा था. जिसे पूरी भाजपा ने खूब जोर शोर से देश की जनता को सुनाया था लेकिन इसी मुद्दे पर सरकार सबसे ज्यादा मात खा रही है,,,  मोदी सरकार में महंगाई बेतहाशा बढ़ी है, पेट्रोल-डीजल की कीमतों में तो आग लग गई है. 9 साल में पेट्रोल की कीमत 24 रुपये और डीजल की कीमत 34 रुपये प्रति लीटर से ज्यादा बढ़ी है. पेट्रोल-डीजल के अलावा गैस सिलेंडर की कीमत भी तेजी से बढ़ी है. मोदी सरकार से पहले सब्सिडी वाला सिलेंडर 414 रुपये में मिलता था. लेकिन अब सिलेंडर पर नाममात्र की सब्सिडी मिलती है. अभी रसोई गैस सिलेंडर की कीमत 11 सौ रुपये तक पहुंच गई है. इतना ही नहीं, 9 साल में एक किलो आटे की कीमत 52%, एक किलो चावल की कीमत 43%, एक लीटर दूध की कीमत 56% और एक किलो नमक की कीमत 53% तक बढ़ गई है ।   

सभी चीजों पर बढ़ती महंगाई के आंकड़े- 

कुछ समय  पहले टमाटर के साथ सब्जियों के बढ़े दाम ने परेशानी बढ़ाई तो उसके बाद मसालों में आई तेजी ने खाने का स्वाद बिगाड़ दिया। वहीं अब दालों में भी महंगाई ने किचन का पूरा बजट ही गड़बड़ा दिया है। दालों के दाम में 10 से 15 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। बीते तीन महीने में दाल-चावल और आटे के दामों में काफी वृद्धि हुई है। इससे लोग खासे परेशान हैं। किराना स्टोर से मिले दामों को अगर मिलाया जाए तो बीते तीन महीने में दाल-चावल और आटे के दामों में काफी वृद्धि हुई है। तीन माह पूर्व 140 से 150 रुपये में बिकने वाली अरहर की दाल  180 रुपये तक पहुंच गई है। चना दाल भी 150 से 190 रुपये किलो के भाव पर बिक रही है। दालों के साथ-साथ आटा और चावल का रेट भी तीन महीने में करीब 10 से 20 प्रतिशत बढ़ा है। पांच किलो आटे के बैग की कीमत 225 रुपये है।  कुछ ऐसी स्थिति मसालों की भी है। मसालों में जीरे के दाम में सबसे ज्यादा 40 फीसदी वृद्धि हुई है। तीन महीने पहले 100 ग्राम जीरा जहां 45 रुपये का था। वहीं अब ये 360 रुपये प्रति किलो  तक पहुंच गया है।  गैस सिलेंडर पहले से महंगा है। वहीं, तेल, सब्जियों, मसालों के बाद अब दाल भी और महंगी हो गयी है। ऐसे में घर चलाने के लिए हर चीज में बजट कटौती नहीं की जा सकती। जिसका असर मसालों व दालों में भी देखने को मिल रहा है। आटा चावल में भी वृद्धि हुई है। टमाटर, अदरक समेत अन्य हरी सब्जियां महंगी थीं तो लोग दाल व मसालों से काम चला लेते थे, लेकिन अब ये भी महंगे हो गए हैं। ऐसे में आम और गरीब लोगों पर सबसे अधिक असर पड रहा है।

 

उत्तराखंड के पलायन और बेरोजगारी को लेकर मील का पत्थर साबित हो रही ये योजना 

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उत्तराखंड में होता पलायन जिसकी सबसे बड़ी वजह है बेरोजगारी, उत्तराखंड में कई योजनाओं को लागू कर पहाड़ों में रोजगार पैदा करने की कोशिश की जा रही है, जिससे पलायन को रोका जा सके, आज के वीडियो में बात एक ऐसी ही योजना की करेंगे जो उत्तराखंड के कई बेरोजगार युवाओं के लिए वरदान साबित हुई, इस योजना के कारण कई युवाओं ने न केवल रिवर्स पलायन किया बल्कि आज खुद के साथ कई अन्य के रोजगार का माध्यम बने हैं,,,, उत्तराखंड के खाली होते गावों और छोटे शहरों में रहने वाली युवा पीढ़ी रोजगार की चाह में लगातार महानगरों की तरफ रुख करने को मजबूर हैं, जिस कारण पहाड़ और छोटे शहरों में लगातार पलायन होता जा रहा है,खासतौर पर युवाओं का प्रदेश छोड़कर जाना एक अच्छा संकेत नहीं है,,,

 

उत्तराखंड की सरकारों ने समय-समय पर कई योजनाओ को लागू किया है जिससे युवाओं को प्रदेश में ही रोजगार मिल पाए और पलायन थम सके, इन योजनाओ में सबसे कामयाब योजना रही होम स्टे योजना, जिसका असर आज धरातल पर दिख रहा है, इस योजना से जुड़े कई युवा न केवल वापस अपने गांव या शहर लौटे बल्कि आज खुद के रोजगार के साथ अन्य को भी रोजगार दे रहे हैं साथ ही उत्तराखंड पर्यटन उद्योग को भी खूब पंख लगा रहे हैं, उत्तराखंड में होमस्टे योजना का श्रेय पूर्व की त्रिवेंद्र रावत सरकार को जाता है,

उत्तराखंड में होमस्टे योजना की शुरुआत 20 अप्रैल 2018 को सीमावर्ती जनपद पिथौरागढ़ से पूर्व मुख़्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने की थी, इस योजना का मुख्य मकसद युवाओं को रोजगार देना और पलायन को रोकना था लेकिन देश में कोरोना काल के बाद अपने घर वापस लौटे बेरोजगार युवाओं के लिए ये रोजगार का एक अहम कदम साबित हुआ,कई युवाओं ने इस योजना के जरिये रोजगार शुरू किया,और अब तो ये योजना प्रदेश के युवाओं के लिए एक वरदान साबित हो रही है,इस योजना के लिए हर साल बड़ी संख्या में आवेदन हो रहे हैं,जबकि अब तक प्रदेश में हजारों होमस्टे संचालित हो रहे हैं,,,

पर्वतीय जिलों में होम स्टे से जुड़कर यहां के स्थानीय युवा स्वरोजगार को अपनाने के साथ ही पर्यटकों को उचित सेवा भी दे रहे हैं, जिससे उत्तराखंड के दुर्गम इलाकों के लोगों की आजीविका पर सुधार आया है और सीजन में स्थानीय लोग अच्छा रोजगार कमा रहे हैं. युवाओं को स्वरोजगार से जोड़ने और पहाड़ के गांवों से हो रहे पलायन को थामने के लिए उत्तराखंड सरकार द्वारा होम स्टे योजना की शुरुआत की गयी थी, जिसमें पर्यटक स्थलों में स्थानीय लोग अपने ही घरों में देश-विदेश के पर्यटकों के लिए ग्रामीण परिवेश में साफ व किफायती आवास की सुविधा उपलब्ध करा सकते हैं. यहां पर पर्यटकों को स्थानीय व्यंजन परोसने के साथ ही उन्हें यहां की सभ्यता व संस्कृति से भी परिचित कराया जा रहा है, जो पर्यटक खूब पसंद कर रहे हैं.

 

होम स्टे योजना की अब तक की तस्वीर देखें, तो वित्तीय वर्ष 2018-19 में प्रदेश के सभी जिलों में 965 होम स्टे पंजीकृत हुए. आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, वर्ष 2021-22 में यह आंकड़ा बढ़कर 3 हजार 964 पहुंच गया. पर्वतीय जिलों में भी ये आंकड़ा बढ़ा है, बात अगर पिथौरागढ़ जिले की करें जहां इस योजना की शुरुआत हुई थी , तो 2021-22 में 608 लोगों ने और 2022-23 में 103 लोगों ने अपने घरों को होम स्टे में बदलने के लिए पर्यटन विभाग में पंजीकृत किया, जिसमें सबसे ज्यादा धारचूला में 423 लोग अपना पंजीकरण करा चुके हैं. धारचूला सीमांत जिले का उच्च हिमालयी क्षेत्र भी है, जहां की खूबसूरती का दीदार करने पर्यटक पहुंच रहे हैं. उनके रुकने की सुविधा यहां के गांवों में होम स्टे के रूप में विकसित हो रही है. इस योजना के माध्यम से सिर्फ साल 2020 में ही 5 हजार होमस्टे विकसित किए गए थे। इससे प्रदेश में रोजगार के अवसर को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है और लोगों को कामकाज या कारोबार के लिए दूसरे राज्य में पलायन करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।