Author: Manisha Rana

ISRO का नया मिशन उठाएगा सूर्य से पर्दा ! जाने मिशन से जुड़ी पूरी जानकारी…

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अब भारत नए मिशन को तैयार-

चंद्रयान की सफलता से भारत की स्पेस एजेंसी इसरो की तारीफ विश्व के हर देश में हो रही है, भारत की इस कामयाबी के पीछे हमारे वैज्ञानिकों का अथक परिश्रम है, तभी जाकर भारत वो कारनामा करने में कामयाब हो पाया जो विश्व का कोई देश नहीं कर पाया, चंद्रयान-3 मिशन की सफलता के बाद ISRO ने अब सूरज के राज खोलने की भी तैयारी कर ली है. और इस मिशन का नाम होगा आदित्य L1 मिशन, सूरज में चल रही उथल-पुथल और स्पेस क्लाइमेट का अध्ययन करने के लिए भारत के आदित्य L1 मिशन 2 सितंबर को सुबह 11 बजकर 50 मिनट पर आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा में सतीश धवन स्पेस सेंटर से मिशन को लॉन्च किया जाएगा. पृथ्वी से सूरज की दूरी 15 करोड़ किलोमीटर है यानी चांद की तुलना में 4 गुना ज्यादा दूर है. पहले भी कई मिशन लॉन्च किए जा चुके हैं. सूरज पर इतनी ज्यादा गर्मी है. इससे ये तो साफ है कि मिशन सन मिशन मून की तुलना में ज्यादा मुश्किल भरा होने वाला है

2 सितंबर को रवाना होगा आदित्य L1 मिशन-
 
 

विज्ञान के साथ ही हमारे और आपके जीवन के लिए भी ये अभियान बेहद महत्व रखता है। सूरज में चल रही उथल-पुथल और स्पेस क्लाइमेट का अध्ययन करने के लिए भारत का आदित्य L-1 मिशन 2 सितंबर को रवाना होगा। आदित्य-एल-1 अंतरिक्ष में एक स्पेस स्टेशन की तरह काम करेगा। भारत में अब तक वैज्ञानिक सूरज का अध्ययन ऑब्सर्वेटरी में लगी दूरबीनों के जरिए कर रहे हैं। इसकी कई सारी सीमाएं हैं। सूरज का आकार इतना बड़ा है कि लाखों पृथ्वी इसमें समा सकती हैं. स्पेस डॉट कॉम की रिपोर्ट के मुताबिक, सूर्य का व्यास पृथ्वी से करीब 109 गुना ज्यादा है. करीब 13 लाख पृथ्वी सूर्य में समा सकती है


नासा ने सूर्य के अध्ययन के लिए किए कई शोध-
 

हमारा ब्रह्मांड असंख्य तारों से बना है. वैज्ञानिक ब्रह्मांड का भविष्य जानने में जुटे हैं. इसी क्रम में जिस सौर मंडल में हम रहते हैं उसे समझने के लिए सूर्य को जानना बेहद जरूरी है.. सूर्य से जितनी मात्रा में ऊर्जा और तापमान निकलता है उसका अध्ययन धरती पर नहीं किया जा सकता. लिहाजा दुनिया भर की अंतरिक्ष एजेंसियां जितना संभव है उतना सूर्य के पास जाकर अध्ययन करना चाहती हैं. नासा और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी ने सूर्य का अध्ययन करने के लिए कई शोध किए हैं. इसरो भी आदित्य एल-1 के जरिए सूर्य का विस्तृत अध्ययन करना चाहता है  

 

 

आदित्य एल-1 को पृथ्वी से सूर्य की ओर क़रीब 15 लाख किलोमीटर पर स्थित लैंग्रेंज-1 पॉइंट तक पहुंचना है. यह वो कक्षा में स्थापित हो जाएगा और वहीं से सूर्य पर नज़र बनाते हुए उसका चक्कर लगाएगा.

4 अरब साल पहले हुआ था सूर्य का जन्म-
 

सूर्य पर तापमान की बात करें तो यह 10 हजार फारेन हाइट यानी 5,500 डिग्री सेल्सियस के लगभग  है. यहां पर हो रही न्यूक्लियर रिएक्शन की वजह से सूर्य के कोर का तापमान 7 मिलियन फारेनहाइट या 15 मिलियन सेल्सियस तक पहुंच जाता है. नासा के मुताबिक, 100 बिलियन टन डायनामाइट के विस्फोट से जितनी गर्मी पैदा होती है, ये तापमान उसके बराबर है. वैज्ञानिकों के मुताबिक, सूर्य का जन्म लगभग 4.6 अरब साल पहले हुआ था. उनका ऐसा मानना है कि सूर्य और सौर मंडल का बाकी हिस्सा गैस और धूल के एक विशाल गोले से बना है, जिसे सोलर नेब्यूला के तौर पर जाना जाता है. रिपोर्ट के मुताबिक, सूर्य के पास इतना न्यूक्लियर फ्युअल है कि वह इसी अवस्था में अगले 50 लाख सालों तक रह सकता है. इसके बाद वह एक लाल गोले में तब्दील हो जाएगा और आखिर में इसका बाहरी सतहें खत्म हो जाएंगी और इसका छोटा सा बस सफेद कोर रह जाएगा. धीरे-धीरे यह कोर फीका पड़ना शुरू होगा और अपने अंतिम चरण की तरफ बढ़ना शुरू होगा

भारत के इस मिशन का सबको इंतजार-

 

ये तो थी सूर्य के बारे में कुछ जानकारियां जो विश्व के वैज्ञानिकों ने अब तक जुटाई  है, अब बात भारत के उस मिशन की जिसका इन्तजार न केवल देश के लोगों बल्कि पूरे विश्व को है. चांद को तो भारत ने मुट्ठी में कर लिया है.. आदित्य L-1 के जरिये अब सूरज की बारी है. ये काफी मुश्किल टास्क है लेकिन जिस तरह भारत ने चंद्रयान मिशन को कामयाब बनाया इससे अब एक बार फिर पूरे विश्व को भारत से उम्मीद जग गई है और  हमारे देश के वैज्ञानिकों का इरादा और दृढ़ संकल्प यही दर्शाता है।

आदित्य L1 को लॉन्च करने का मकसद आखिर है क्या?

आदित्य एल-1 भारत का पहला सूर्य मिशन है। इसे लॉन्च करके भारत सौर वायुमंडल यानी क्रोमोस्फेयर और कोरोना की गतिशीलता का अध्ययन करना चाहता है। इसके साथ ही, वह कोरोना से बड़े पैमाने पर निकलने वाली ऊर्जा के रहस्यों से भी पर्दा उठाना चाहता है। इसके अलावा, आदित्य एल-1 के जरिए इसरो आंशिक रूप से आयनित प्लाज्मा की भौतिकी और अंतरिक्ष के मौसम की गतिशीलता के बारे में जानकारी इकट्ठा करना चाहता है। इसके साथ ही, वह सौर वातावरण से प्लाज्मा और चुंबकीय क्षेत्रों के बड़े पैमाने पर विस्फोट का अध्ययन करना चाहता है।

क्या है मिशन का बजट?

 

आदित्य एल-1 करीब 15 लाख किलोमीटर दूर स्थित सूर्य के रहस्यों से पर्दा उठाएगा। इसे लैंग्रेज बिंदु यानी एल-1 तक पहुंचने में 4 महीने लगेंगे। आदित्य एल-1 को लैंग्रेज बिंदु की पास की कक्षा में स्थापित किया जाएगा। लैंग्रेज बिंदु का मतलब अंतरिक्ष में मौजूद उस प्वाइंट से होता है, जहां दो अंतरिक्ष निकायों जैसे सूर्य और पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण आकर्षण और प्रतिकर्षण का क्षेत्र उत्पन्न होता है। इतालवी-फ्रांसीसी गणितज्ञ जोसेफ-लुइस लैंग्रेंज के नाम पर इसका नामकरण किया गया है। आदित्य एल-1 सात पेलोड लेकर अपनी मंजिल तक पहुंचेगा। इन पेलोड के जरिए इसरो को फोटो स्फेयर यानी प्रकाश मंडल, और क्रोमोस्फेयर यानी सूर्य की दिखाई देने वाली सतह से ठीक ऊपर की सतह और कोरोना यानी सूर्य की सबसे बाहरी परत के अध्ययन में मदद मिलेगी। आदित्य एल-1 को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से PSLV-सी – 57 के जरिए लॉन्च किया जाएगा। इससे पहले चंद्रयान-3 को भी यहां से लॉन्च किया गया था। आदित्य एल-1 मिशन का बजट करीब 400 करोड़ रुपये हैं। आदित्य एल-1 को दिसंबर 2019 से बनाना शुरू किया गया था।

कहां से होगी मिशन सन की लैंडिंग-

 

चंद्रयान-3 को 14 जुलाई को दोपहर दो बजकर 35 मिनट पर श्रीहरिकोटा स्थित स्पेस सेंटर से LVM-3 के जरिए लॉन्च किया गया था। यह 23 अगस्त को शाम 6 बजकर चार मिनट पर चांद की सतह पर लैंड किया। साथ ही भारत चौथा देश बन गया, जिसने चांद पर सॉफ्ट लैंडिंग की हो। इसी के साथ भारत के नाम एक और बड़ी उपलब्धि दर्ज हुई। भारत चांद के दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला दुनिया का पहला देश बन गया है। चंद्रयान-3 जहां चांद के रहस्यों से पर्दा उठाएगा, वहीं आदित्य एल-1 सूर्य के राज को दुनिया के सामने खोलेगा। सूर्य के उन रहस्यों से पर्दा उठेगा, जिससे दुनिया अब तक अनजान है। इसरो के मुताबिक, इस मिशन को सूर्य की तरफ लगभग 15 लाख किलोमीटर तक भेजा जाएगा. जिस जगह पर आदित्य एल-1 अंतरिक्ष यान जाएगा उसे एल-1.. यानी लाग्रेंज प्वाइंट वन कहते हैं. ये दूरी पृथ्वी और सूर्य की दूरी का महज 1 प्रतिशत है  

इन वजह से सूर्य को देखा जा सकता है-

 

धरती और सूर्य के बीच की दूरी लगभग 15 करोड़ किलोमीटर है. इस दूरी के बीच में कई ऐसे बिंदु हैं जहां से सूर्य को स्पष्ट देखा जाता है. धरती और सूर्य के बीच लैग्रेंज प्वाइंट ही वो जगह है जहां से सूर्य को बिना किसी ग्रहण या अवरोध के देखा जा सकता है. धरती और सूर्य के बीच पांच लैग्रेंज प्वाइंट है. इस पर किसी अंतरिक्ष यान का गुरुत्वाकर्षण सेंट्रिपेटल फोर्स के बराबर हो जाता है. जिसकी वजह से यहां कोई भी यान लंबे समय तक रुक कर शोध कर सकता है. इस जगह को ‘अंतरिक्ष का पार्किंग’ भी कहा जाता है, क्योंकि बेहद कम ईंधन के साथ इस जगह पर अंतरिक्ष यान को स्थिर किया जा सकता है. एल 1, एल 2 और एल 3 प्वाइंट स्थिर नहीं है. इसकी स्थिति बदलती रहती है. जबकि एल 4 और एल 5 स्थिर है और अपनी स्थिति नहीं बदलते हैं

आंध्र-प्रदेश के श्रीहरिकोटा से होगा लॉन्च-

 
आदित्य-एल-1 मिशन को इसरो के PSLV-XL रॉकेट में सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र श्रीहरिकोटा से लॉन्च किया जाएगा. शुरुआत में अंतरिक्ष यान को पृथ्वी की लोअर आर्बिट में रखा जाएगा इसके बाद इस कक्षा को कई राउंड में पृथ्वी की कक्षा से बाहर ले जाने के लायक बनाया जाएगा उसके बाद स्पेस क्राफ्ट में ऑनबोर्ड इग्निशन का उपयोग करके लैग्रेंज बिंदु (एल1) की ओर प्रक्षेपित कर दिया जाएगा

ये है आदित्य L1 मिशन का लक्ष्य-

 

सूर्य और उसके अस्तित्व के बारे में मानव मन की जिज्ञासाओं को शांत करने में इसरो इस मिशन पर 400 करोड़ रुपये खर्च कर रहा है, वहीं अगर इस पर लगने वाले समय की बात करें तो आदित्य एल-1 को दिसंबर 2019 से बनाने पर काम चल रहा है. जो कि इसके प्रक्षेपण के बाद ही पूरा होगा. आदित्य-एल1 मिशन का लक्ष्य एल1 के पास की कक्षा से सूर्य का अध्ययन करना है.. यह मिशन सात पेलोड लेकर जाएगा, जो अलग-अलग वेव बैंड में फोटोस्फेयर, क्रोमोस्फेयर और सूर्य की सबसे बाहरी परत पर रिसर्च करने में मदद करेंगे  

 

इसरो के अनुसार, एल1 रिसर्च मिशन में आदित्य-1 यह पता लगाएगा कि सूर्य की बाहरी सतह का तापमान लगभग दस लाख डिग्री तक कैसे पहुंच सकता है, जबकि सूर्य की सतह का तापमान 6000 डिग्री सेंटीग्रेड से थोड़ा अधिक रहता है. आदित्य-एल1 यूवी पेलोड का उपयोग करके कोरोना और सौर क्रोमोस्फीयर पर एक्स-रे पेलोड का उपयोग करके लपटों का अवलोकन कर सकता है. कण संसूचक और मैग्नेटो मीटर पेलोड आवेशित कणों और एल1 के चारों ओर प्रभामंडल कक्षा तक पहुंचने वाले चुंबकीय क्षेत्र के बारे में जानकारी प्रदान कर सकते हैं

क्या है इन प्वाइंट्स का काम-
 

L-3 प्वाइंट सूर्य के पीछे के हिस्से में है. जबकि एल 1 और एल 2 प्वाइंट सूर्य के सीध में सामने हैं. एल 2 प्वाइंट पृथ्वी के पीछे के हिस्से में हैं, मतलब एल 2 प्वाइंट के सामने पृथ्वी और सूर्य दोनों आते हैं. यह प्वाइंट भी रिसर्च के लिहाज से काफी मुफीद माना जाता है, क्योंकि यह पृथ्वी के नजदीक है और यहां से संचार में काफी आसानी होती है. दरअसल इसरो उन सौर गतिविधियों की स्टडी करना चाहता है जो उसकी सतह से बाहर निकल कर अंतरिक्ष में फैल जाते हैं और कई बार धरती की तरफ भी आ जाते हैं, जैसे कोरोनल मास इजेक्शन, सोलर फ्लेयर्स, सौर तूफान आदि. इसलिए लाग्रेंज प्वाइंट 1  इस लिहाज से खास जगह है, क्योंकि सूर्य से निकलने वाले कोरोनल मास इजेक्शन और सौर तूफान इसी रास्ते से होकर धरती की ओर जाते हैं

 
अगर भारत इस मिशन में कामयाब हुआ तो-
 

सूर्य के वातावरण से निकलकर अंतरिक्ष में फैलने वाले कोरोनल मास इजेक्शन और सौर तूफानों में कई तरह के रेडियोएक्टिव तत्व होते हैं, जो पृथ्वी के लिहाज से नुकसानदेह होते हैं. सौर तूफान और कोरोनल मास इजेक्शन की वजह से पृथ्वी के बाहरी वायुमंडल में चक्कर काट रही सैटेलाइट में खराबी आ सकती है. इसके अलावा अगर कोरोनल मास इजेक्शन और सौर तूफान धरती के वातावरण में दाखिल हो जाए तब पृथ्वी पर शार्ट वेब कम्यूनिकेशन, मोबाइल सिग्नल, इलेक्ट्रिक पॉवर ग्रिड सिस्टम पूरी तरह से ठप पड़ जाएगा

अगर भारत इस मिशन में सक्सेज होता है तो भारत की स्पेस एजेंसी का लोहा पूरा विश्व मानेगा,, जैसा की उम्मीद भी है कि इसरो इस मुश्किल काम में जीत हासिल करेगा,,, सूर्य से मिलने वाली जानकारी से न केवल इसरो और भारत बल्कि पुरे विश्व को काफी फायदा पहुंचेगा, फिलहाल इसरो के इस मिशन की कामयाबी को लेकर सारा देश प्रार्थना कर रहा है

चुनाव से ठीक पहले फिर फंसी मध्य प्रदेश की मामा सरकार…

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एक और नया ताजा घोटाला- 

मध्य प्रदेश में चुनाव हैं और एक बार फिर यहां घोटालों की आवाज सुनाई देने लग गयी है,मध्य प्रदेश में आजकल घोटाले पर घोटाले सामने आ रहे हैं. अभी एक ताजा घोटाला और सामने आया है.. जिसमें दावा किया जा रहा है कि शिवराज सरकार की एक योजना के तहत  बीजेपी नेताओ के करीबी और रिश्तेदारों पर जनता की कमाई का पैसा उड़ाया जा रहा है.. और उनको मौज कराई जा रही है.. लेकिन  इस नए घोटाले का जिक्र करने से पहले थोड़ी सी जानकारी मध्य्प्रदेश के उस घोटाले की भी लेना जरूरी है, जिसे आजाद भारत का सबसे बड़ा घोटाला कहा जाता है।
आजाद भारत के इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला- 

मध्य प्रदेश की राजनीति,और शिवराज सरकार का जिक्र जब भी आएगा एक घोटाले का नाम हमेशा  सामने आएगा. और वो है ‘व्यापम घोटाला ‘  ये वो घोटाला है जिसे आजाद भारत के इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला कहा जाता है. साल था 2013 जब मध्य प्रदेश में व्यापम घोटाले का खुलासा हुआ था। मध्य प्रदेश के बहुचर्चित व्यावसायिक परीक्षा मंडल  यानी व्यापम घोटाले का पर्दाफाश हुए 10 साल हो गए हैं। अगले कुछ महीने में मध्य प्रदेश में विधानसभा के चुनाव हैं। इस वजह से व्यापम घोटाला एक बार फिर से राजनीतिक चर्चा का विषय बना हुआ है। ये इसलिए भी चर्चित है क्योंकि इस घोटाले का पर्दाफाश होने के बाद कई पत्रकार समेत कई लोगों की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई।

 

2013 में हुई थी इस घोटाले से 40 से ज्यादा की मौतें- 

कई मीडिया रिपोर्ट्स के  एक अनुमान के मुताबिक व्यापम घोटाले से जुड़े 40 से ज्यादा लोगों की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो चुकी है। इतना ही नहीं, इस मामले में कई गिरफ्तारियां भी हुई है. साल 2013 में  व्यावसायिक परीक्षा मंडल यानी व्‍यापम की परीक्षाओं में अभ्यर्थियों की जगह किसी दूसरे को बिठाना, नकल कराना और अन्य तरह की धांधलियों की वजह से इस मामले में अब तक 125 से ज्यादा लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है। इस मामले में जब जांच शुरू हुई तो जांचकर्ता और आरोपियों की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत होने लगी। घोटाले के तार मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के अलावा बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, झारखंड, आंध्र प्रदेश समेत कई राज्यों से जुड़े होने की बात सामने आई। आखिरकार सुप्रीम कोर्ट में ये मामला पहुंचने पर इस मामले की जांच केंद्रीय जांच एजेंसी CBI को सौंपी गई।

 

इस घोटाले के तार कई लोगों से जुड़े मिले-

व्यापम में रिश्वत लेकर प्रवेश परीक्षाओं और भर्तियों में नकल करने के मामले में 4 हजार 46 लोगों को आरोपी बनाया गया है। इसमें से 956 आरोपियों की गिरफ्तारी अब तक भी  नहीं हो पाई है। वहीं CBI ने 1242 लोगों को आरोपी बनाया है। गौर करने वाली बात यह है कि इस मामले में मध्य प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल राम नरेश यादव के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज है। इतना ही नहीं व्यापम घोटाले में तत्कालीन शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा की गिरफ्तारी भी हो चुकी है। इस धांधली का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब एंट्रेंस एग्जाम के बाद अभ्यर्थी इंटरव्यू के लिए पहुंचे तो उनका चेहरा और एडमिट कार्ड पर लगी फोटो दोनों अलग होते। इसके बाद भी उन्हें इंटरव्यू में पास करके उन्हें एडमिशन दे दिया जाता। मामला उजागर होने पर इसके तार मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के कार्यालय और तत्कालीन राज्यपाल राम नरेश यादव तक जुड़ते पाए गए।

 

फिर विवादों में क्यों आयी शिवराज सरकार ?

अब बात उस नए घोटाले की जिससे शिवराज सरकार फिर विवादों में आ गयी है,,मध्य प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा  कोई भी मौका नहीं छोड़ना चाह रही है. सूबे के मुखिया शिवराज सिंह चौहान  युवाओं से लेकर बुजुर्गों तक को रिझाने के लिए रोजाना कुछ न कुछ नया कर रहे हैं. लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है.चुनाव से ठीक पहले मुख्यमंत्री शिवराज ने मुख्यमंत्री हवाई तीर्थ यात्रा की शुरुआत की है.लेकिन इस योजना से बुजुर्गों को हवाई यात्रा का दावा करने वाली शिवराज सरकार की अब पोल खुलती हुई नजर आ रही है।

 

चुनाव से ठीक पहले इस योजना की शुरुवात- 

चुनाव से ठीक पहले मुख्यमंत्री शिवराज ने मुख्यमंत्री हवाई तीर्थ यात्रा की शुरुआत की है. लेकिन इस योजना का लाभ बीजेपी के पदाधिकारी उठा रहे हैं. पैसे वाले रसूखदार लोग उठा रहे हैं, मिली जानकारी के अनुसार हवाई सफर रायसेन से पूर्व जिलाध्यक्ष समेत बीजेपी के दिग्गज नेता सहित हेल्थ मिनिस्टर प्रभुराम चौधरी के सबसे करीबी लोग कर रहे हैं. मंत्री विश्वास सारंग के करीबी रसूखदार बीजेपी भोपाल मंडल अध्यक्ष नीरज पचौरी के ब्रजमोहन भी सीएम की मुफ्त रेवड़ी वाली हवाई यात्रा में तीर्थ दर्शन कर आये. कद्दावर मंत्री प्रभुराम चौधरी ने तीर्थ यात्रियों को हवाई यात्रा पर भेजते हुए फेसबुक पर फोटो डाली, प्रभुराम चौधरी के साथ फोटो में रायसेन से पूर्व जिला अध्यक्ष नरेंद्र सिंह कुशवाह हैं, बीजेपी रायसेन के 2003 से 2007 तक जिला अध्यक्ष रहे हैं. इसके अलावा प्रभुराम चौधरी के खासम खास मलखान सिंह, कालूराम विश्वकर्मा भी हवाई जहाज पर सवार हुए. इस लिस्ट में बड़ी संख्या में बीजेपी नेता प्रयागराज डुपकी लगाने गए।

 

करीबियों को हो रहा है योजना का फायदा- 

भोपाल की हवाई तीर्थ दर्शन की सूची में मंत्री विश्वास के विस्वस्थ हवाई सरकार पर खूब उड़े. मंत्री ने मुख्यमंत्री की योजना को पलीता लगा दिया है. पोस्टर में नजर आ रहे है नीरज पचौरी जो की बीजेपी के मंडल अध्यक्ष पोस्टर पर मंत्री विश्वास सारंग का फोटो बताता है की ये उनके बेहद करीबी हैं, करीबी होने की वजह से फायदे भी मिल रहे हैं. मंडल अध्यक्ष नीरज पचौरी के पिता ब्रजमोहन पचौरी इनके पास करोड़ों की सम्पति है पर मंत्री विश्वास के करीबी हैं तो इन्हें गरीबों की योजना का लाभ मिल रहा है. क्योंकि ब्रजमोहन पचौरी मंत्री विश्वास के लिए वोट बटोरने के लिए नरेला में काम आते है . मकसद ये था कि इस यात्रा में निर्धन परिवार के लोग ही यात्रा करें, लेकिन निर्धन बुजुर्गों के हक को बीजेपी नेताओं ने मार लिया है।

 

12 अप्रैल को सर्कुलर किया था जारी- 

पहली बार किसी राज्य में सरकार के खर्च पर हवाई जहाज से तीर्थ यात्रा की शुरुआत हुई ..शिवराज सिंह चौहान के द्वारा काफी धूम-धाम से शुरु की गयी शिवराज सरकार धार्मिक न्यास और धर्मस्व विभाग ने 12 अप्रैल 2023 को यात्रा से जुड़ा सर्कुलर जारी किया था. इसके मुताबिक, यात्रियों को चुनने के दो क्राइटेरिया पहला, यात्री की उम्र 65 साल से ज्यादा होना चाहिए, दूसरा, वो इनकम टैक्स न देता हो. सर्कुलर के हिसाब से यात्रियों के सिलेक्शन की जिम्मेदारी जिला कलेक्टर को दी गई है. ये भी कहा गया है कि तय संख्या से ज्यादा आवेदन आने पर यात्रियों का सिलेक्शन कम्प्यूटराइज्ड लॉटरी सिस्टम से किया जाए।

 

आखिर इन लोगों को क्यों करवाया गया तीर्थाटन- 

21 मई को पहला ग्रुप राजधानी भोपाल से हवाई जहाज से  प्रयागराज भेजा गया था, इसमें कुल 32 यात्री शामिल थें, लेकिन इन यात्रियों में अधिकांश भाजपा के पदाधिकारी और उसके नेताओं के परिजन थें. इसमें दो यात्रियों की पहचान महाराष्ट्र और तमिलनाडु निवासी के रुप में हुई है. अब सवाल है कि मध्य प्रदेश सरकार उन्हें अपने खर्चे से यात्रा कैसे करवा रही थी?  इसके साथ ही तीर्थ योजना का लाभार्थी के लिए जो मापदंड तय किया गया था, उसकी भी धज्जियां उड़ाई गयी है, मापदंड के विपरीत इसमें से अधिकांश बड़े-बड़े हाउसिंग सोसाइटी में रहने वाले लोग हैं, जिनके पास आलीशान गाड़ियां और लग्जरी भरी जिंदगी है, बावजूद इसके इन सभी को गरीब-वचिंत बताकर तीर्थाटन करवाया गया।

 

10 साल बीत चुके हैं व्यापम घोटाले को-

व्यापम घोटाले का पर्दाफाश हुए 10 साल बीत चुके हैं। लेकिन घोटालों का जिन्न आज भी शिवराज सरकार का पीछा नहीं छोड़ रहा,,  पिछले दिनों पटवारी भर्ती परीक्षा में एक बार फिर से धांधली के आरोप लगे। आरोप ये भी लगे कि ये भी व्यापम की तरह ही एक और घोटाला है, जिससे शिवराज सरकार फिर से निशाने पर आ गयी, ये मामला थोड़ा हल्का पड़ा  ही  था कि अभी हाल ही में एक और घोटाले के आरोपों में शिवराज सरकार घिर गयी है, जिस पर खूब हंगामा मचा हुआ है,और अब विपक्षी भी शिवराज सरकार पर तंज कस रहे हैं कि वो दिन दूर नहीं जब गूगल पर घोटाला सर्च करेंगे  तो शिवराज सिंह चौहान की तस्वीर सामने आएगी।

प्रियंका गांधी के द्वारा मध्य प्रदेश की शिवराज सिंह चौहान को 50 फीसदी कमीशन वाली सरकार बताने पर मुकदमा दर्ज किया गया है,  प्रियंका और दूसरे कांग्रेस नेताओं के खिलाफ करीब 45 थानों में मुकदमा दर्ज किया गया है. साफ है कि जिस प्रकार वहां से भ्रष्टाचार की खबरें आ रही है, और कांग्रेस के आरोपों पर भाजपा जिस गैर जरूरी उग्रता के साथ प्रतिक्रिया दे रही है, मध्यप्रदेश में भी भाजपा कर्नाटक की राह चलती नजर आ रही है।

फिर मुश्किल में मोदी सरकार, पुरानी पेंशन बहाली को लेकर सड़कों पर उतरेंगे देश के करोड़ों कर्मचारी…

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पेंशन से हो सकती है मोदी सरकार में टेंशन-

महंगाई और बेरोजगारी को दूर करने में नाकाम रही नरेंद्र मोदी सरकार अब नई मुसीबत में है. देश सबसे बड़ी हड़ताल की मुहाने पर खड़ा है, रेलगाड़ी, सरकारी दफ्तर, सरकारी बस, सरकारी बैंक, पोस्ट आफिस, मंडियां, कॉलेज, स्कूल, यूनिवर्सिटी सब पर ताला लग सकता है. क्योंकि जिस पुरानी पेंशन योजना ने हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में बीजेपी को सत्ता से बेदखल कर दिया उसकी आवाज अब पूरे भारत से बुलंद होने वाली है, सरकारी कर्मचारियों के संगठन ने भाजपा की ईंट सीट बजाने का ऐलान कर दिया है.. चेतावनी जारी हुई है की अभी भी मोदी के पास समय है या तो वे पुरानी पेंशन योजना लागू कर दें. और नहीं तो अब हम अनिश्चितकाल के लिए धरने पर बैठने को मजबूर होंगे

 
2024 चुनाव में बड़ा मुद्दा बन सकता है ये- 
 

कर्मचारियों ने सरकार को खुली चेतावनी दे डाली है. कि अगर सरकार ने पुरानी पेंशन योजना लागू नहीं की तो 2024 में भाजपा को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा, यानी की अब ये मुद्दा पूरे देश में तूल पकड़ चुका है,,, क्योकि कर्मचारियों को लगता है कि सरकार इस मामले में अड़ियल रवैया अपना रही है. आप जानते ही हैं की कांग्रेस शासित प्रदेशों में OPS यानी  Old Pension Scheme लागू होने के बाद से बीजेपी शासित राज्यों की मुसीबत बढ़ गयी है, इसलिए राजनीति के जानकारों का तो यहां तक दावा है की 2024 लोकसभा चुनावों में ये मुद्दा बड़ा चुनावी मुद्दा जरुर बन सकता है

 
हो सकती है जल्द ही बड़ी हड़ताल-
 

ऐसा इसलिए भी कहा जा रहा है क्योकि OPS के लिए गठित नेशनल ज्वाइंट काउंसिल ऑफ ऐक्शन की संचालन समिति की वरिष्ट सदस्य और AIDEF के महासचिव सी.श्री कुमार ने बताया की सरकार इस मामले पर अडियल रवैया अपना रही है, इसलिए पुरानी पेंशन के लिए कर्मचारी संगठन राष्ट्रीय व्यापी अनिश्चितकालीन हड़ताल कर सकती है

 
देश में स्ट्राइक-
 

इस मामले पर विचार करने के लिए 20 और 21 नवंबर को देशभर में स्ट्राइक बैलेट होगा. इसमें कर्मचारियों की राय ली जाएगी. अगर बहुमत हड़ताल के पक्ष में होता है तो केंद्र और राज्यों में सरकारी कर्मचारी अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले जाएंगे. साथ ही उन्होंने चेतावनी भी दी की अगर ऐसा हुआ तो पूरे देश में रेल के पहिए थम जाएंगे. वही केंद्र एवं राज्यों के कर्मचारी कलम छोड़ देंगे ‘मतलब पूरा देश ठप’

 
 सी.श्री कुमार ने दावा किया की पुरानी पेंशन बहाली के लिए केंद्र एवं राज्यों के कर्मचारी एक साथ आ गए हैं. लगभग देश के सभी कर्मचारी संगठन इस मुद्दे पर एक साथ है.
 

 

केंद्र और राज्यों के विभिन्न निगमों और स्वायत्तता प्राप्त संगठनों ने भी OPS की लड़ाई में शामिल होने की बात कही है. बैंक और इंश्योरेंस कर्मियों से भी बातचीत चल रही है. कर्मचारियों ने हर तरीके से सरकार के सामने पूरानी पेन्शन बहारी की मांग की है. लेकिन उनकी बात सुनी नहीं गई अब उनके पास अनिश्चितकालीन हड़ताल ही एक मात्र रास्ता बचा है. आपको बता दें की 10 अगस्त को दिल्ली के रामलीला मैदान में पूरे देशभर से लाखों सरकारी कर्मचारी आए थे और सबने मिलकर OPS को लेकर हुंकार भरी थी

उठाए जा सकते हैं ये कदम-

 

कर्मचारियों ने दो टूक शब्दों में कहा था की वो किसी भी तरह से पुरानी पेंशन बहाल करा कर दी दम लेंगे सरकार को अपनी जिद्द छोड़नी ही पड़ेगी, कर्मचारियों ने कहा था की वो सरकार को वो फॉर्मूला बताने को तैयार हैं, जिसमें सरकार को OPS लागू करने में कोई नुकसान नहीं होगा, लेकिन अगर इसके बाद भी सरकार पुरानी पेंशन लागू नहीं करती है तो भारत बंद जैसे कई कठोर कदम उठाए जाएंगे

OPS पर सभी विभाग एक साथ-
 
रक्षा कर्मी
सिविल कर्मचारी 
रेलवे 
बैंक 
प्राइमरी स्कूल 
कॉलेज 
यूनिवर्सिटी 
डॉक 
सेकेंडरी स्कूल 
हाई स्कूल 
 
BJP के लिए खड़ी हो सकती है बड़ी परेशानी-
 

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से भी मुलाकात की कोशिश की थी लेकिन वो इसमे कामयाब नहीं हो सके. संचालन समिति के राष्ट्रीय संयोजक ने चुनौती भरे लहजे में कहा था की अगर 2024 लोकसभा चुनाव से पहले पुरानी पेंशन अगर लागू नहीं होती है तो भाजपा को इसकी कीमत चुकाने के लिए तैयार रहना चाहिए, उन्होंने बताया की कर्मियों, पेंशनरों और उनके रिश्तेदारों को मिलाकर ये संख्या 10 करोड़ के पार चली जाती है. चुनावों में बड़ा उलटफेर करने के लिए ये संख्या निर्णायक है. केंद्र के सभी मंत्रालय विभाग, OPS पर एक साथ आ चुके हैं

 
NPS मंजूर नहीं- 
  

सी.श्री कुमार के मुताबिक मोदी सरकार पेंशन पर होशियारी कर रही है. वित्त मंत्रालय ने जो कमेटी बनाई है उसमें OPS का ही जिक्र नहीं है. उसमे तो NPS यानी National Pension System में सुधार की बात की गयी है, इसका मतलब है की केंद्र सरकार OPS को लागू करने के मूड में ही नहीं है. और केंद्र सरकार NPS में चाहे जो भी सुधार कर ले कर्मचारियों को ये मंजूर नहीं है, कर्मियों का केवल एक ही मकसद है बिना गारंटी वाला NPS योजना को खत्म किए जाए और परिभाषित एवं गारंटी वाली पुरानी पेंशन योजना को बहाल किया जाए

NPS में कोई राहत नहीं-
 

AIDEF यानी ऑल इंडिया डिफेंस एम्पलाइज फेडरेशन के महासचिव ने ये भी कहा की NPS में पुरानी पेंशन व्यवस्था की तरह महंगाई राहत का भी कोई प्रावधान नहीं है जो कर्मचारी पुरानी पेंशन व्यवस्था के दायरे में आते हैं उन्हे महंगाई राहत के तौर पर आर्थिक फायदा मिलता है. NPS में सामाजिक सुरक्षा की गारंटी भी नहीं रही, रिटायरमेंट के बाद सरकारी कर्मचारियों को जानबूझकर मुश्किल में धकेला जा रहा है. और हम इसे स्वीकार करने को बिल्कुल भी तैयार नहीं हैं

 
कांग्रेस OPS को अपनी राज्यों की सरकार में कर रही है लागू-
 

इसका मतलब साफ है कि सरकारी कर्मचारियों में अब सरकार के खिलाफ गुस्सा बढ़ता जा रहा है. इसका सीधा असर आने वाले चुनावों चाहे वो विधानसभा चुनाव हो या फिर अगले साल होने वाले आम चुनाव दोनो पर पड़ेगा.. एक तरफ कांग्रेस इस मामले में लीड ले चुकी है, तो बीजेपी बैकफुट पर है. कांग्रेस हर उस राज्य में OPS को लागू कर रही है या लागू करने की घोषणा कर चुकी है जहां-जहां उनकी सरकारे हैं. वहीं बीजेपी अभी तक यही फैला रही है की OPS की तरफ लौटना मतलब देश बर्बाद करना, इज्जत पर अड़े रहना बीजेपी को नुकसान पहुंचा सकता है. क्योकि हिमाचल और कर्नाटक को कहीं ना कहीं इसी मुद्दे की वजह से नुकसान उठाना पड़ा था. अब दोनो राज्यों में कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में इस मुद्दे को शामिल किया और सरकार बनने पर पुरानी पेंशन योजना को लागू करने का वादा किया

 
इन राज्यों में भी भारी पड़ रहा है ये मुद्दा- 
 

इसके साथ ही ये मुद्दा उत्तर प्रदेश, हरिय़ाणा, महाराष्ट्र जैसे बीजेपी शासित राज्यों में भी तेजी से तूल पकड़ने लगा. और अब तो कर्मचारियों ने साफ चेतावनी दे दी है की अगर उनकी मांगे नहीं मानी गय़ी तो वो अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ जाएंगे, ये चेतावनी मोदी सरकार को भारी पड़ सकती है. क्योकि अगर 1 लाख लोगों ने भी दिल्ली में धरना शुरु कर दिया तो एक नया दूसरा अन्ना आंदोलन खड़ा हो सकता है. और फिर OPS ऐसा मुद्दा है जो हर गांव, हर शहर, और हर राज्य में बड़ा आंदोलन खड़ा कर सकता है

 

ऐसे में अब देखना होगा की सरकारी कर्मचारियों की इस चेतावनी पर सरकार ध्यान देती है या नहीं. कर्मचारी सरकार को चेतावनी देने के बाद बेसब्री से उनके जवाब का इंतजार कर रही है. लेकिन अभी जितना ये मामला टलेगा 2024 चुनाव में ये उतना ही बड़ा मुद्दा बनेगा और बीजेपी इसे टालने की हर मुम्किन कोशिश करेगी

जोशीमठ में फिर दहशत में लोग, दोबारा आने लगी घरों के नीचे से पानी बहने की आवाजें…

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उत्तराखंड के जोशीमठ में धंस रही जमीन और दरारों को देखकर हर कोई डरा हुआ है…आज 8 महीने गुजर जाने के बाद भी जोशीमठ में भू-धसाव और पानी रिसाव का सच अभी तक बाहर नहीं आ पाया है. आज भी जोशीमठ के ये हालत किसी से छिप नहीं पाए हैं. जोशीमठ में पानी बहने की आवाजें सुनाई दे रही हैं. जोशीमठ नगर के भू-धसाव वाले क्षेत्रों में फिर से घरों के नीचे से पानी के बहने की आवाजें सुनाई देने लगी है। लेकिन ये पानी कहाँ से आ रहा है और कहां से निकल रहा है. इसका अभी तक कुछ पता नहीं चल रहा है. लोगों में भय की स्थिति बनी हुई है। सुनील वार्ड जो की जोशीमठ में ही है. वहा पर रहने वाले लोग फर्श में कान लगाकर पानी के बहने की आवाजें सुन रहे हैं, ये आवाज ऐसे लग रही हैं, जैसे कि नीचे से कोई गदेरा बह रहा हो।

फिर से आने लगी घरों के नीचे से पानी बहने की आवाजें- 

जनवरी माह के शुरुआत से ही जोशीमठ में भू-धसाव शुरू हो गया था। तब जोशीमठ की तलहटी में बसी जेपी कॉलोनी में एक जलधारा फूट गई थी। उस समय से ही  कई घरों के नीचे पानी बहने की आवाजें आ रही थी। तब कई एजेंसियों ने इसका अध्ययन किया था। मार्च के माह में भू-धसाव थम गया। लेकिन फिर से वही शुरू हो गया. क्योंकि बरसात के समय रोज बारिश के कारण फिर से घरों के नीचे पानी बहने की आवाजें आने लगी हैं। 13 अगस्त को फिर से रात को हुई अतिवृष्टि के बाद विनोद सकलानी के घर के अंदर पानी बहने की आवाज आने लगी।

विनोद सकलानी कहते हैं कि पहले दिन घर के अंदर खड़े होने पर ही ऐसा लग रहा था कि नीचे कोई बड़ी सी नदी बह रही है। अब पानी की आवाज कुछ कम हो गई है। लेकिन हैरत की बात ये है कि न तो मकान के ऊपर और न ही मकान के नीचे कहीं भी पानी बहता हुआ नहीं दिखाई देता है केवल आवाज ही सुनाई देती है। यदि ये  पानी है तो कहां से आ रहा है और ये पानी कहां जा रहा है। उन्होंने कहा कि वार्ड में कई जगहों पर फिर से भू-धसाव हो रहा है। पैदल रास्तों में भी धसाव हो रहा है।

यहाँ 13 अगस्त के बाद आयी दरार- 

उसी वार्ड के दूसरे मोहल्ले में रह रहे भारत सिंह पंवार का कहना है कि उनके घर में तो पहले दरारें नहीं आई थी. लेकिन 13 अगस्त की बारिश के बाद यहाँ भू-धसाव शुरू हो गया है. और रास्ता ध्वस्त हो गया, खेतों में भी दरार पड़ गई है। उन्होंने कहा कि उनका मकान तो अभी सही है, लेकिन उनके आंगन तक दरार आ चुकी है। पूरे क्षेत्र में जगह-जगह भू धसाव हो रहा है। इससे लोगों में भय बना हुआ है। उनका कहना है कि घर के दो कमरे अभी फिलहाल ठीक हैं, परिवार के लोग भी अभी उन्ही कमरों में रह रहे हैं। लेकिन अधिक बारिश होने पर सभी होटल में बने राहत शिविर में चले जाते हैं।

बरसात के कारण रास्तों और खेतों में आयी दरार-  

बरसात ने आपदा प्रभावित जोशीमठ वासियों के जख्मों को फिर से हरा कर दिया है। बरसात शुरू होने के बाद से ही अलग-अलग जगह पर गड्ढे होने, जमीन में दरार आने, घरों की दरार अधिक चौड़ी होने के मामले सामने आए हैं। मनोहर बाग वार्ड में औली रोड पर हाल ही में 22 मीटर लंबी और दो फीट गहरी पड़ी। सिंहधार वार्ड में भी कई जगह पर रास्तों और खेतों में दरार आई है।

ये है जोशीमठ भू-धसाव की स्थिति-

जोशीमठ भू-धसाव के कारण 868 भवनों में दरारें आई थी, जिनमें से प्रशासन ने 181 भवनों को असुरक्षित श्रेणी में रख दिया था। प्रशासन की ओर से 145 प्रभावित परिवारों को पुनर्वास पैकेज के तहत 31 करोड़ रुपये मुआवजा वितरित कर दिया गया है। नगर पालिका जोशीमठ के अंतर्गत अभी भी 57 परिवार ऐसे हैं जो कि राहत शिविरों में रह रहे हैं। जबकि 239 परिवार अपने रिश्तेदारों या फिर वे लोग किराए के घरों में रह रहे हैं।सुनील वार्ड में भी कुछ जगहों पर भू-धसाव हुआ है। यहां प्रभावित सभी परिवारों को राहत शिविर में जाने के लिए कहा गया है। क्षेत्र में अन्य जगहों पर स्थिति सामान्य है। लोगों से विस्थापन के लिए विकल्प मांगे गए हैं। अभी तक किसी की ओर से कोई भी लिखित रूप में विकल्प नहीं दिए हैं। जल्द ही अब मानसून सीजन के बाद फिर से लोगों से विस्थापन को लेकर विकल्प मांगे जाएंगे।

क्या कहा जल विज्ञान वैज्ञानिक गोपाल कृष्ण ने-

डॉ गोपाल कृष्ण ने कहा कि अधिकारिक रूप से हमारे पास ऐसी कोई सूचना नहीं है। जमीन के भीतर मिट्टी के सेटलमेंट के चलते भीतर रुका हुआ पानी कहीं न कहीं अपना रास्ता बना लेता है।जमीन के भीतर पानी बहने की आवाज के पीछे इस तरह के कारण हो सकते हैं। इस बारे में जांच के बाद ही कुछ कहा जा सकता है।

जमीन के भीतर पानी का अपना एक चैनल काम करता है। जोशीमठ के मामले में पूर्व में हुए अध्ययनों में ये बात सामने आ चुकी है, वहां भी पानी का चैनल काम कर रहा है। बरसात में इसमें वृद्धि हो सकती है। बाकी मौके की क्या स्थिति है, ये जब जांच होगी उसके बाद ही स्पष्ट हो सकती है।

 

चंद्रयान-3 ने रचा इतिहास, चंद्रमा के दक्षिण ध्रुव पर कदम…

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चांद के साउथ पोल पर चंद्रयान-3 की सॉफ्ट लैंडिंग के साथ ही भारत ने अंतरिक्ष में इतिहास रच दिया है. इसरो (ISRO) के मुताबिक तय समय पर ये मिशन पूरा हुआ है. चंद्रयान-3 की सफल लैंडिंग के साथ ही देश भर में खुशी का माहौल है. चंद्रयान-3 के चांद के पास पहुंचने के साथ ही भारत का नाम भी इतिहास के पन्नों में कैद हो गया है. इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन (ISRO) का सपना भी इसी के साथ पूरा हो गया. 14 जुलाई को चंद्रयान-3 के लॉन्च होने के बाद से ही ये यात्रा जारी थी. पूरी दुनिया को इस दिन का बेसब्री से इंतजार था.

40 दिन का भारत का इंतजार आखिरकार खत्म हुआ। पृथ्वी से चंद्रमा तक 3.84 लाख किलोमीटर का सफर तय करने के बाद चंद्रयान-3 का लैंडर विक्रम चंद्रमा की धरती पर कामयाबी के साथ उतर गया। इसी के साथ भारत चांद पर सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला रूस, अमेरिका और चीन के बाद दुनिया का तीसरा देश बन गया है। वहीं, चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला दुनिया का पहला देश बन गया है।

अब नजरें प्रज्ञान रोवर पर है, जो स्थितियां सामान्य होने के बाद चांद की सतह पर चलेगा। इसके एक पहिये पर इसरो का चिह्न और दूसरे पहिये पर अशोक स्तंभ उकेरा हुआ है। जैसे ही प्रज्ञान रोवर चलना शुरू करेगा, इसरो का चिह्न और अशोक स्तंभ चंद्रमा की सतह पर अंकित हो जाएगा।

चंद्रयान-3 ने कैसे रच दिया इतिहास?

इसरो के अधिकारियों के मुताबिक, चंद्रयान-3 मिशन चंद्रयान-2 का ही अगला चरण है, जो चंद्रमा की सतह पर उतरेगा और परीक्षण करेगा। यह चंद्रयान-2 की तरह ही दिखता है, जिसमें एक लैंडर और एक रोवर शामिल किए गए हैं। चंद्रयान-3 का फोकस चंद्रमा की सतह पर सुरक्षित लैंड करने पर है। मिशन की सफलता के लिए नए उपकरण बनाए गए हैं। एल्गोरिदम को बेहतर किया गया है। जिन वजहों से चंद्रयान-2 मिशन चंद्रमा की सतह नहीं उतर पाया था, उन पर फोकस किया गया है।

मिशन ने 14 जुलाई को दोपहर 2:35 बजे श्रीहरिकोटा केन्द्र से उड़ान भरी और योजना के अनुसार आज चंद्रमा पर उतरा। यह मिशन भारत को अमेरिका, रूस और चीन के बाद चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला दुनिया का चौथा देश बन गया।

 

पिछले दो मिशन-

चंद्रयान-1
यह अक्तूबर 2008 में भेजा गया था। चंद्रमा पर पानी की संभावना की खोज कर यह इतिहास रच चुका है। इसी के बाद विश्व की तमाम अंतरिक्ष एजेंसियों की चंद्रमा को लेकर उत्सुकता बढ़ गई।

चंद्रयान-2
जुलाई 2019: यह यान आज भी चंद्रमा की सौ किलोमीटर की कक्षा में घूम रहा है। इसे एक साल तक ही चलना था, लेकिन अब तक यह हमें जानकारी भेज रहा है। इसमें विश्व का सबसे बेहतरीन कैमरा लगा है, जो चंद्रमा के लगभग हर हिस्से की तस्वीरें ले चुका है।

INDIA गठबंधन में जाने को तैयार मोदी के सहयोगी दल…

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2024 के लिए राजनीतिक मैदान सज रहा है NDA VS INDIA में कौन बाजी मारेगा,अभी ये कहना मुश्किल है,लेकिन जिस तरह सत्ताधारी पार्टी भाजपा ने 38 दल अपने साथ जोड़े है उसको देख भले वो आज खुश दिखाई दें लेकिन अंदर ही अंदर एक सबसे बड़ी चिंता उनको 24 तक साथ रखने की भी है,इतने दलों को साथ लाने का मतलब ये तो साफ़ है कि भाजपा 2024 में एकतरफा मुकाबला मानकर तो नहीं चल रही है,, क्योकि जिस तरह इंडिया गठबंधन खेमे में महाजुटान हुआ है उससे कहीं न कहीं मोदी सरकार चिंतित प्रतीत होती है,और यही कारण है कि भाजपा लगातार अपने साथी कुनबे को बढ़ाने में लगी है,लेकिन इतने दलों को साथ रख पाने के लिए भाजपा को कई समझौते भी करने पड़ेंगे,मगर,,, क्या प्रचंड बहुमत की मोदी सरकार ऐसा कर पायेगी ? आज के वीडियो में बात भाजपा की आने वाले दिनों की उस सबसे बड़ी चिंता की और उन दलों की जो मोदी के साथ हैं,, साथ ही विपक्षी खेमें में कांग्रेस की परेशानी और विपक्षी एकता की बात भी… विस्तार से समझने के लिए इस वीडियो को अंत तक देखिए…अगर सर चक्कराना जाए तो कहना.

PM के नेतृत्व में 38 दल- 

एनडीए आज अपनी बढ़ी हुई ताकत दिखा रहा है. गौर कीजिए जहां अटल बिहारी वाजपेयी के समय एनडीए में 24 दल हुआ करते थे, वहीं आज नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए में 38 दल शामिल हुए हैं. आने वाले समय में यह संख्या और बढ़ सकती है, लेकिन लोकसभा चुनाव 2024 में बीजेपी के लिए इन सहयोगी दलों में सीटों का बंटवारा करना इतना आसान भी नहीं होगा. खासतौर से बिहार और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में.. जहां पर यूपी को छोड़ दें तो सीटों की संख्या अधिक है.

 
 
सबसे पहले बात बिहार की- 

 

सबसे पहले बात बिहार की जहां से विपक्षी गठबंधन इंडिया की शुरुआत हुई,,, 2019 में बीजेपी ने जेडीयू और लोक जनशक्ति पार्टी के साथ मिल कर चुनाव लड़ा था. समझौते के तहत बीजेपी और जेडीयू ने 17-17 और लोक जनशक्ति पार्टी ने 6 सीटों पर चुनाव लड़ा. लोक जनशक्ति पार्टी को एक राज्य सभा सीट भी एनडीए की तरफ से दी गई थी, जिससे रामविलास पासवान संसद में पहुंचे थे. तब एनडीए ने राज्य की 40 में से 39 सीटों पर जीत हासिल की थी. इनमें बीजेपी ने 17, जेडीयू ने 16 और एलजेपी ने 6 सीटों पर जीत हासिल की थी. ऐसा माना जाता है कि बाद में जेडीयू के दबाव में लोक जनशक्ति पार्टी में विभाजन हुआ और चिराग पासवान अलग कर दिए गए. अब बीजेपी चाहती है कि पशुपति पारस और चिराग पासवान अपनी विभाजित पार्टियों का विलय कर दें, लेकिन पशुपति इसके लिए तैयार नहीं. उधर चिराग चाहते हैं कि 2019 के फार्मूले के तहत उनकी पार्टी को छह लोक सभा सीटें और एक राज्य सभा सीट दी जाए. इस विवाद को सुलझाना बीजेपी के लिए यकीनन बड़ी चुनौती होगी. उधर, उपेंद्र कुशवाहा और जीतन राम मांझी भी चाहेंगे कि उनकी पार्टियों को अधिक संख्या में लोकसभा सीटें दी जाएं, जबकि बीजेपी चाहेगी कि इस बार वह पिछली बार से अधिक संख्या पर सीटों पर चुनाव लड़े क्योंकि जेडीयू उसके साथ अब नहीं है.

 
 
 
BJP के ये बड़ी चुनौती- 
 

अब बात दूसरे राज्य महाराष्ट्र की,,जहां यूपी के बाद सबसे अधिक लोकसभा सीट है पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी, शिवसेना गठबंधन था. राज्य की 48 में से 25 पर बीजेपी ने और 23 पर शिवसेना ने चुनाव लड़ा था. बीजेपी ने 23 और शिवसेना ने 18 सीटों पर जीत हासिल की थी. अब शिवसेना के बीच विभाजन होने के बाद भाजपा के गुट में आए. एकनाथ शिंदे का गुट उन सभी 18 सीटों पर दावेदारी कर रहा है, जो 2019 में शिवसेना ने लड़ी थीं. इस बीच, एनसीपी में भी विभाजन हुआ. और अजीत पवार का गुट बीजेपी के साथ है. लिहाजा अजित पवार भी उम्मीद पाले हुए हैं की वो एनसीपी कोटे की सभी सीटों पर चुनाव लड़े…याद रहे की 2019 में एनसीपी ने चार सीटें जीती थीं. बीजेपी के सामने इन 48 सीटों के बंटवारे की भी चुनौती रहेगी.

 
अब बात यूपी की-
 

वो राज्य जिसने मोदी को देश की सत्ता सौंपने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई अब बात उस राज्य यूपी की करना बेहद जरुरी है क्योकि सत्ता की चाभी यूपी से ही होकर निकलती है… 2019 में बीजेपी ने अपना दल के साथ मिल कर लोक सभा चुनाव लड़ा था. तब अपना दल को दो सीटें दी गई थीं जो उसने जीत ली थी. इस बार ओमप्रकाश राजभर और निषाद पार्टी भी बीजेपी के साथ है. बीजेपी को सीट बंटवारे में भी उन्हें भी साथ रखना होगा. गाजीपुर लोक सभा सीट पर उपचुनाव में राजभर के बेटे खड़े हो सकते हैं. इसके अलावा जयंत चौधरी की राष्ट्रीय लोक दल से भी बीजेपी की बातचीत चल रही है. ऐसा राजनीतिक जानकारों का मानना भी है… भाजपा चाहती है कि आरएलडी का बीजेपी में विलय हो जाए जिसके लिए जयंत तैयार नहीं. अगर भविष्य में आरएलडी साथ आए तो बीजेपी को उसे भी सीटें देनी होगी…यानी बीजेपी के लिए उत्तर प्रदेश का सीटों को लेकर बंटवारा मुश्किल तो पैदा जरुर करेगा.

 
 
यहाँ से चुनाव लड़ सकते हैं पीएम मोदी-

 

 

तमिलनाडु में  बीजेपी और AIADMK के बीच 2024 चुनाव मिलकर लड़ने पर सहमति है. कुछ अन्य सहयोगी दल भी साथ लड़ेंगे. 2019 में भी इन दलों ने मिल कर चुनाव लड़ा था. राज्य की 39 लोकसभा सीटों में  AIADMK ने 20, PMK  ने 7, बीजेपी ने 5, DMDK ने 4, पीटी ने 1, तामिल मनीला कांग्रेस एक और PNK ने 1 सीट पर चुनाव लड़ा था.. इस बार कुछ नई पार्टियां भी साथ आईं हैं और बीजेपी तमिलनाडु पर खासतौर से ध्यान दे रही है. पीएम मोदी के भी यहां से लोकसभा चुनाव लड़ने की चर्चा है.. इसका इशारा कई बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषणों में भी दिखाई देता है,, जहां वो साउथ को दिल्ली के करीब और दिल्ली के दिल में बसे होने की बात करते हुए भी दिखाई देते हैं.. ऐसे में सीटों के बंटवारे पर सबकी नजरें रहेंगी.

 
हरियाणा में भी यही हाल-
 

हरियाणा में बीजेपी और दुष्यंत चौटाला की जननायक जनता पार्टी राज्य में मिल कर सरकार चला रहे हैं, लेकिन बीजेपी साफ कर चुकी है कि वह सभी दस लोक सभा सीटों पर अकेले ही चुनाव लड़ेगी और जेजीपी के साथ समझौता नहीं होगा. अटकल यह भी है कि लोक सभा चुनाव से पहले बीजेपी और जेजीपी का गठबंधन टूट जाए और दोनों पार्टियां अलग-अलग चुनाव लड़ें.

दोनों पार्टियों की  चुनाव लड़ने की संभावना-

झारखण्ड में भी बीजेपी ने 2019 में पहली बार आजसू के साथ लोक सभा चुनाव गठबंधन में लड़ा था. राज्य की 14 में से 11 सीटें बीजेपी और एक सीट आजसू ने जीती थी. इस बार भी दोनों पार्टियों के मिल कर चुनाव लड़ने की संभावना है. 2019 में असम में  बीजेपी ने एजीपी और बीपीएफ के साथ मिल कर चुनाव लड़ा था. बीजेपी ने राज्य की 14 में से 10 सीटों पर चुनाव लड़ा, जबकि एजीपी को 3 और बीपीएफ को एक सीट दी गई थी. तब बीजेपी ने 10 में से नौ सीटों पर जीत हासिल की थी, जबकि एजीपी और बीपीएफ कोई सीट नहीं जीत सके थे. बदली परिस्थितियों में बीजेपी अधिक सीटों पर लड़ना चाहेगी. अन्य राज्यों जैसे केरल और पूर्वोत्तर में सहयोगी दलों की जमीनी ताकत इतनी अधिक नहीं कि वे लोकसभा चुनाव में बीजेपी से मोल-भाव कर सकें. इसलिए बीजेपी को वहां अपनी शर्तों के हिसाब से चुनाव लड़ने में कोई भी परेशानी नहीं आएगी.
भाजपा को इन राज्यों में लग सकता है झटका-

कुल मिलाकर बीजेपी 38 दलों को साथ लेकर तो चल रही है,लेकिन इन सब के साथ टिकट बंटवारा कितना आसान होगा ये आने वाला समय बताएगा, राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर टिकट बंटवारे में सहयोगी दलों को भाजपा संतुष्ट नहीं कर पाई तो कई दल ऍन चुनाव के वक्त पर भाजपा का साथ छोड़ कर इंडिया गठबंधन या अकेले चुनाव मैदान में उतर सकते हैं.. जिससे भाजपा की कई राज्यों में न केवल मुश्किलें बढ़ेंगी बल्कि 2024 की जीत का सपना देख रही भाजपा को इन राज्यों में झटका भी लग सकता है,,
क्या ममता लेफ्ट के साथ चुनाव लड़ पाएंगी? 

ऐसा नहीं है कि ऐसी परेशानी विपक्षी दलों की एकता में नहीं हो सकती है,, आज की कांग्रेस इस स्थिति में नहीं है कि ज्यादा मोल भाव कर सकती है. हालांकि कर्नाटक और हिमाचल जीत से कांग्रेस का दावा गठबंधन में मजबूत जरूर हुआ है. लेकिन कई राज्यों में कांग्रेस की सीटों को लेकर सहयोगी दलों के साथ कॉम्प्रोमाईज़ करना पड़ेगा,जैसे बंगाल,बिहार,महाराष्ट्र,और यूपी. ऐसे में परेशानी विपक्षी खेमे में भी आ सकती है. पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को TMC प्रमुख और ममता बनर्जी को सबसे ज्यादा सीट देनी पड़ेगी, साथ ही लेफ्ट भी गठबंधन का साथी है तो उनकी बात भी रखनी पड़ेगी,यहां कांग्रेस की स्थिति ये नहीं है कि वो इनसे मोल भाव कर सके खासतौर पर ममता से,, एक सवाल और भी खड़ा होता है,,, क्या ममता लेफ्ट के साथ चुनाव लड़ पाएंगी ? ऐसी ही स्थिति बिहार में भी देखने को मिल सकती है,जहां एक तरफ नीतीश कुमार होंगे और दूसरी तरफ तेजस्वी यादव,,यहां भी कांग्रेस को समझौता करना पड़ेगा,, दिल्ली में भी आम आदमी पार्टी सत्ता में होने के कारण सबसे अधिक सीटों पर चुनाव लड़ना चाहेगी,, ऐसा ही कांग्रेस के साथ महाराष्ट्र में भी परेशानी सामने आएगी,जहां उद्धव  और शरद पवार जैसे नेता गठबंधन के साथी हैं, ऐसे में कांग्रेस कितनी जगह कितना समझौता करेगी INDIA गठबंधन की एकता इस पर काफी हद तक निर्भर करेगी.


ऐसे हालात कई राज्यों में-
कुल मिलाकर कमोबेश ऐसे हालात कई राज्यों में भाजपा और कांग्रेस जैसे मुख्य दलों के सामने आने वाले हैं. बहरहाल पक्ष और विपक्ष की एकता मुख्य रूप से टिकट बंटवारे पर निर्भर करेगी, और यहीं से 2024 की दिशा भी तय होगी, जो भी इस फॉर्मूले को सही ढंग से साध लेगा उसको 2024 में निश्चित रूप से फायदा मिलेगा? यानी सत्ता पर काबिज होने का मौका मिलेगा.

मोदी सरकार की घोटालों की लिस्ट बाहर, गोदी मीडिया में पसरा सन्नाटा…

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देश की मुख्यधारा की मीडिया ने मोदी सरकार के इन 10 सालों में जो भूमिका निभाई, वो कहीं न कहीं बदली हुई नजर आती  है, जिस तरह से मीडिया ने UPA के दौर में गलत फैसलों और घोटालों को लेकर मनमोहन सरकार  की खूब आलोचना की थी , फिर चाहे वो अखबारों के पन्ने से रंगे घोटालों की आवाज़ हों या फिर टीवी डिबेटों से कटघरे में खड़ा करते पत्रकार हों. मनमोहन सरकार को कटघरे में खड़ा करने का एक भी मौका मीडिया ने चूका नहीं, लेकिन अब मोदी सरकार में इसी मेन स्ट्रीम  मीडिया ने अपना पुराना रुख बदल दिया है, अब मोदी सरकार के गलत कार्यों की आलोचना करने के बजाय ये मीडिया समूह कई बार सरकार का बचाव करते दिखाई देते हैं, यही कारण है कि मोदी सरकार में मीडिया की भूमिका पर सबसे ज्यादा सवाल उठते हैं और कई लोग अब इसी मीडिया को गोदी मीडिया भी कहते हैं। उस मीडिया को .जिसको कभी खोजी मीडिया का नाम देश की जनता जनार्दन दिया करती थी।

जब मनमोहन सिंह की सरकार थी-


UPA  की सरकार के दौरान  आयी C. A.G यानी कैग की रिपोर्ट के आधार पर उस समय की मनमोहन सरकार पर कई बड़े-बड़े घोटालों के आरोप लगे,कोयला घोटाला, 2G घोटाला और साथ ही कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला जैसे बड़े घोटाले सामने आने के बाद मनमोहन सरकार की पुरे देश में में खूब आलोचना हुई, उस समय विपक्ष में बैठी भाजपा ने  सरकार को हर जगह घेरना शुरू कर दिया था,कैग की रिपोर्ट का ही असर था कि ये घोटाले सामने आये और इसका एक बड़ा असर देश में ये पड़ा कि 2014 में UPA सरकार की विदाई हो गयी और प्रचंड बहुमत से भाजपा की नरेंद्र मोदी की सरकार सत्ता में आ गई। 


क्या है 
CAG रिपोर्ट-

वक्त बदला ,हालात बदले और एक बार फिर  कैग की रिपोर्ट  सामने आई है. मगर अब UPA नहीं बल्कि NDA की मोदी सरकार का युग है. और मोदी सरकार के घिरने पर भी हर तरफ निल बटा सन्नाटा है. कैग की रिपोर्ट में दो बड़ी गड़बड़ियां सामने आयी हैं,, दिल्ली में बनाए जा रहे द्वारका एक्सप्रेसवे पर CAG की रिपोर्ट ने कई अहम सवाल उठाए हैं. CAG रिपोर्ट में कहा गया है कि इस सड़क की लागत कई गुना ज्यादा है. रिपोर्ट के मुताबिक, जो लागत प्रति किलोमीटर 18 करोड़ रुपये होनी थी, वहीं पर 250 करोड़ रुपये तक खर्च हुए हैं. सीएजी की ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया है कि कैबिनेट ने इस सड़क के लिए प्रति किलोमीटर का बजट 18.20 करोड़ रुपये प्रस्तावित किया था लेकिन इसके लिए प्रति किलोमीटर 251 करोड़ रुपये का बजट पास किया गया. अब इस लागत में इतना ज्यादा अंतर आने पर सवाल खड़े हो रहे है। 

 

दिल्ली-वडोदरा एक्सप्रेसवे पर भी सवाल खड़े-

भारतमाला परियोजना-1 के तहत बनाया जा रहा यह द्वारका-एक्सप्रेसवे दिल्ली और गुरुग्राम में आता है. दिल्ली को गुरुग्राम से जोड़ने वाली ये सड़क 29 किलोमीटर लंबी है. यह सड़क दिल्ली के महिपालपुर में शिव मूर्ति के पास से शुरू होती है और गुरुग्राम में खेरकी टोल प्लाजा तक जाती है . यह एक्सप्रेसवे 14 लेन का बनाया जा रहा है. अब इसकी लागत को लेकर हंगामा खड़ा हो गया है और विपक्षी नेताओं ने भी इस पर सवाल पूछने शुरू कर दिए हैं। 

CAG ने द्वारका एक्सप्रेसवे के इस प्रोजेक्ट की 2017 से 2021 तक की रिपोर्ट का ऑडिट किया है. द्वारका एक्सप्रेसवे  के साथ-साथ दिल्ली-वडोदरा एक्सप्रेसवे पर भी सवाल खड़े हुए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, यह पूरा प्रोजेक्ट CCEA की ओर से अप्रूव्ड प्रोजेक्ट की लिस्ट में ही.. नहीं था  और  और उस  पर भी NHAI ने अपने स्तर पर 33 हजार करोड़ रुपये खर्च कर लिए. CAG की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतमाला परियोजना-1 के तहत लगभग 76,999 किलोमीटर की सड़कें बनाई जा रही है. इसमें से 70,950 किलोमीटर सड़क NHAI बना रहा है. NHAI के कई फैसलों पर अब सवाल उठ रहे हैं. ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक, NHAI ने CCEA की ओर से तय की गई नियमावली का भी सही से पालन नहीं किया. 50 में से 35 प्रोजेक्ट ऐसे हैं जहां टेंडर से जुड़ी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया है।

CAG रिपोर्ट में एक और बड़ा खुलासा-


कैग की रिपोर्ट में एक और बड़ा और हैरान करने वाला खुलासा हुआ है,आयुष्मान भारत योजना  को लेकर..
भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) की एक और चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है. जिसमें बताया गया है कि आयुष्मान भारत योजना के तहत 6.9 करोड़ रूपये उन लोगों के इलाज पर खर्च किये गए जो इस दुनिया में ही नहीं हैं,मतलब पहले ही मर चुके लोगों के नाम पर ये खर्च किया गया, आयुष्मान भारत- प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना  को साल 2018 में शुरू किया गया था. इसका मकसद गरीबों को मुफ्त इलाज देना था, जिसे ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में शुरू किया गया. इस रिपोर्ट के मुताबिक कुल 3,446 ऐसे मरीजों के इलाज पर कुल 6.97 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया, जो पहले ही मर चुके थे. डेटाबेस में इन सभी मरीजों को मृत दिखाया गया है. ये पहला मौका नहीं है जब आयुष्मान भारत योजना को लेकर ऐसी रिपोर्ट सामने आई हो, इससे पहले भी सीएजी की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि करीब 7.5 लाख से ज्यादा लोगों को एक ही मोबाइल नंबर पर रजिस्टर कर दिया गया और जिस पर रजिस्ट्रेशन हुआ वो नंबर भी अमान्य था। 

 
 
क्या कहती है इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट- 


इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक केरल में ऐसे मरीजों की संख्या सबसे ज्यादा थी. यहां कुल 966 ऐसे मरीज पाए गए, जिन्हें मृत घोषित करने के बावजूद उनका इलाज जारी था. इनके इलाज पर  करोडों रुपये का भुगतान अस्पतालों को किया गया. इसके बाद मध्य प्रदेश में 403 और छत्तीसगढ़ में 365 ऐसे मरीज मिले. जिनके इलाज पर लाखों रुपये खर्च हुए. फिलहाल योजना के तहत जो गाइडलाइन बनाई गई हैं, उनके मुताबिक अगर किसी मरीज की अस्पताल में भर्ती होने और डिस्चार्ज होने के बीच मौत हो जाती है तो ऑडिट के बाद अस्पताल को इसका भुगतान किया जाता है।

 
स्वदेश दर्शन योजना पर भी उठे सवाल- 

अयोध्या विकास को लेकर बनाए जा रहे स्वदेश दर्शन योजना पर भी कैग ने सवाल उठाया है. कैग के मुताबिक इस परियोजना में ठेकेदारों को 19.73 करोड़ रुपये का अनुचित लाभ दिया गया है. इस मामले का खुलासा होने के बाद से सियासी गलियारों में हंगामा मचा है. इस बीच दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा है कि मोदी सरकार ने भ्रष्टाचार के 75 वर्ष के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए।वरिष्ट नेता  जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री से पूरे मामले में चुप्पी तोड़ने के लिए कहा है. यह पहली बार नहीं है, जब कैग की रिपोर्ट ने सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. पूर्व में कैग रिपोर्ट की वजह से मुख्यमंत्री और मंत्रियों की कुर्सी तक जा चुकी है. इतना ही नहीं, कैग की रिपोर्ट से बने भ्रष्टाचार के माहौल में UPA की पूरी मनमोहन सरकार ही चली गई थी

CAG रिपोर्ट में कई और खुलासे-


आपको बताते चलें कि संविधान में सरकारी खर्च की पड़ताल के लिए एक सरकारी एजेंसी बनाने का प्रावधान है. अनुच्छेद 148 के मुताबिक इस एजेंसी के प्रमुख की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, इसके  प्रमुख को उसी तरह से हटाया  जा सकता है, जिस तरह सुप्रीम कोर्ट के एक जज को संविधान के अनुच्छेद 149, 150 और 151 में कैग के कामकाज और शक्तियों के बारे में जिक्र किया गया है जिसको चाहें तो विस्तार से वहां पर भी पढ़ा जा सकता  है. कैग का काम सभी सरकारी संस्थाओं का ऑडिट करना और उसकी रिपोर्ट संसद या विधानसभा के पटल पर रखना होता है. वर्तमान में कैग 2 तरह से ऑडिट करता है. पहला-रेग्युलेरिटी ऑडिट और दूसरा -परफॉर्मेंस ऑडिट.रेग्युलेरिटी ऑडिट को कम्पलायंस ऑडिट भी कहते हैं. इसमें सभी सरकारी दफ्तरों के वित्तीय ब्यौरे का विश्लेषण किया जाता है. विश्लेषण में मुख्यत: यह देखा जाता है कि सभी नियम-कानून का पालन किया गया है या नहीं? 2जी स्पैक्ट्रम की नीलामी का मामला रेग्युलेरिटी ऑडिट की वजह से ही उठा था. इसी तरह परफॉर्मेंस ऑडिट में कैग के द्वारा यह पता लगाया जाता है कि क्या सरकारी योजना शुरू करने का जो मकसद था, उसे कम खर्च पर सही तरीके से किया गया है या नहीं? इस दौरान योजनाओं का बिंदुवार विश्लेषण किया जाता है।

कैग रिपोर्ट से देश में क्या पड़ा-

सितंबर 2001 में कैग ने गुजरात को लेकर एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी. रिपोर्ट में कहा गया कि गुजरात के तत्कालीन  मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल बिना वजह 2 बार विदेश यात्रा पर गए. इस दौरान वो अपने 2 करीबी अधिकारियों को भी साथ ले गए, जो वहां मनोरंजन के नाम पर लाखों खर्च कर आए. कैग ने मुख्यमंत्री के 2 करीबी अधिकारियों को सरकारी मद से खर्च रुपयों का भुगतान करने के लिए भी कहा.
रिपोर्ट आने के बाद गुजरात की सरकार हरकत में आ गई. केशुभाई पटेल की मीडिया टीम ने कैग के खिलाफ ही एक विज्ञापन निकलवा दिया. इसमें कहा गया कि मुख्यमंत्री निवेश लाने गए थे मगर कैग ने लोगों को गुमराह किया है। 


इस बीच कैग और सरकार की लड़ाई में विपक्ष भी कूद गया. केंद्र में अटल बिहारी वाजपेई की सरकार थी. राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री रहे छविदास मेहता ने प्रधानमंत्री को पत्र लिख पूरे मामले में एक्शन लेने के लिए कहा. गुजरात में इस प्रकरण के एक साल बाद ही विधानसभा का चुनाव प्रस्तावित था. चिंतित बीजेपी ने आनन-फानन में गुजरात के नेताओं की बैठक बुलाई. इसी बैठक में केशुभाई पटेल के हटाने पर सबके बीच सहमति बनी। 


6 अक्टूबर 2001 को केशुभाई पटेल को अपना इस्तीफा देना पड़ा था  और फिर पटेल की जगह पर नरेंद्र मोदी को विधायक दल का नेता चुना गया. यानी गुजरात प्रदेश का मुख्यमंत्री


जब रामविलास पासवान पहली बार केंद्रीय मंत्री बनाए गए-


1989 में वीपी सिंह की सरकार में रामविलास पासवान पहली बार केंद्रीय मंत्री बनाए गए. मंत्री के रूप में उन्हें 12 जनपथ का बंगला दिया गया. 1991 में कैग की रिपोर्ट ने राम विलास पासवान के बंगले को लेकर एक रिपोर्ट जारी कर दी. रिपोर्ट के मुताबिक पासवान ने घर सजवाने के लिए तय रकम से ज्यादा रुपए खर्च कर दिए. रिपोर्ट में कहा गया कि पासवान को जब बंगला मिला तो EPFO ने अपने मद से साज-सज्जा के लिए लाखों रुपए खर्च कर दिए. EPFO की ओर से डबल बेड के लिए 10,945 रुपए, रंगीन टीवी के लिए 13,500 रुपए, पर्दे के लिए 52,300 रुपए दिए गए, जो गलत निर्णय था. कैग रिपोर्ट पर हंगामा मच गया और विपक्ष ने ईमानदार राजनीति की बात करने वाले पूर्व पीएम वीपी सिंह को निशाने पर ले लिया. जानकारों का कहना है कि रामविलास पासवान के मामले में सिंह बैकफुट पर आ गए, क्योंकि पासवान उनके काफी करीबी थे. 1991 में वीपी सिंह की पार्टी को चुनाव में करारी हार मिली. सिंह ने इसके बाद 10 साल तक कोई भी पद नहीं लेने का अघोषित वादा कर लिया।

2014 के चुनाव में क्यों हारी थी मनमोहन सरकार-


2010 में कैग ने एक रिपोर्ट जारी की, जिसने तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी. कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि 2G स्पैक्ट्रम के आवंटन में धांधली की गई है. यह आवंटन साल 2008 में किया गया था.  कैग के मुताबिक 2G आवंटन में धांधली की वजह से सरकार को 1.76 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ.  उस वक्त दूरसंचार विभाग डीएमके के सांसद ए. राजा के पास था. कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि ए. राजा ने स्पैक्ट्रम आवंटन में प्रधानमंत्री कार्यालय, वित्त मंत्री कार्यालय की सलाहों को नजरअंदाज कर दिया था . मामला सामने आने के बाद बीजेपी ने संसद में मनमोहन सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. आनन-फानन में मनमोहन सिंह ने सीबीआई से जांच कराने की बात कही. सीबीआई ने शुरुआती जांच के बाद ए.राजा को गिरफ्तार कर लिया, जिसके बाद उन्हें कैबिनेट से भी हटा दिया गया. हालांकि, बाद में सीबीआई मामले को साबित नहीं कर पाई और कोर्ट से ए.राजा को क्लीन चिट मिल गई.2-जी स्पैक्ट्रम के बाद कैग ने कोल आवंटन पर भी सवाल उठा दिया. लगातार घपले-घोटाले सामने आने के बाद सरकार बैकफुट पर चली गई.  इसी बीच अन्ना हजारे के नेतृत्व में लोकपाल बनाने की मांग शुरू हो गई . इसने भी कांग्रेस सरकार को काफी डेमेज किया, दूसरी तरफ सीएजी रिपोर्ट के बाद बीजेपी अटैकिंग मोड में और कांग्रेस डिफेंसिव मोड में चली गई, जिसका असर 2014 के चुनाव पर हुआ और मनमोहन सरकार बुरी तरह हार गई। 


अब मोदी सरकार भी कटघरे में-

ये तमाम चीजें हैं जो मनमोहन सरकार की तरह मोदी सरकार को भी कटघरे में खड़ा करती हैं, लेकिन मेन स्ट्रीम मीडिया ने इस पर एक हल्की सी रिपोर्ट दिखाकर और चार लाइनों की खबर लिख कर इस मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया,यही कारण है कि मीडिया की भूमिका को लेकर सवाल खड़े होते हैं, सरकार का पक्ष लेने और सरकार से सवाल न पूछने के कारण अब ऐसे मीडिया समूह को कई जगहों पर बायकॉट किया  जाता है, और उसके उलट सोशल मीडिया और यू ट्यूब के जरिये कई स्वतंत्र पत्रकार लगातार सरकार से सवाल कर रहे हैं जिससे उनकी एक अलग पहचान भी बन रही है। 

 

मणिपुर में बीते कई दिनों की शांति के बाद एक बार फिर भड़की हिंसा, गोलीबारी में 3 लोगों की मौत…

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मणिपुर में पिछले तीन महीनो से जारी हिंसा रुकने का नाम नहीं ले रही है. आए दिन वहां पर हिंसा की घटनाएं सामने आती रहती हैं.  कुछ दिनों की शांति के बाद एक बार फिर तनावग्रस्त मणिपुर में शुक्रवार सुबह फिर से हिंसा भड़क गई। सूत्रों के मुताबिक, सुबह करीब 5.30 बजे उखरुल जिले के लिटन पुलिस स्टेशन के अंतर्गत थवई कुकी गांव में संदिग्ध मैतेई सशस्त्र बदमाशों और कुकी स्वयंसेवकों के बीच गोलीबारी हुई। जिसमे सूत्रों के मुताबिक तीन कुकी लोगों के मारे जाने की खबर है। इस घटना के बाद सुरक्षाबलों ने पूरे इलाके को घेर कर तलाशी अभियान शुरू कर दिया है। क्षेत्र में स्थिति तनावपूर्ण बताई गई है।

 

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो कुछ अराजकतत्वों ने सबसे पहले गांव के ड्यूटी पोस्ट पर हमला किया, जहां कई स्वयंसेवक गांव की सुरक्षा के लिए ड्यूटी कर रहे थे। इस गोलीबारी में कुकी स्वयंसेवकों के तीन लोगों के मारे जाने की खबर सामने आयी है। मारे गए लोगों की पहचान जामखोगिन हाओकिप, थांग खोकाई हाओकिप और होलेनसोन बाइते के रूप में हुई है।इस घटना के बाद एक बार फिर से तनाव की स्थिति बन गयी है।

उल्लेखनीय है कि ये गांव मैतेई आबादी क्षेत्र से काफी दूर स्थित है। निकटतम मेइतेइ निवास यिंगांगपोकपी में है जो घटना स्थल से 10 किलोमीटर से अधिक दूर है। बताया जा रहा है कि घटनास्थल से 37 बीएन बीएसएफ करीब 5 से 6 किलोमीटर दूर है। घटना के बाद बीएसएफ सहित अन्य सुरक्षा बल मौके पर पहुंच गए हैं। सुरक्षाबलों ने पूरे क्षेत्र को घेरकर तलाशी अभियान शुरू कर दिया है। 
 
 
आखिर क्या मांग कर रहा है मैतई समुदाय-


आपको बता दें कि मणिपुर में बहुसंख्यक मैतई समुदाय जनजातीय आरक्षण देने की मांग कर रहा है। इसकी वजह ये है कि मैतई समुदाय की आबादी करीब 53 प्रतिशत है लेकिन ये लोग राज्य के सिर्फ 10 प्रतिशत मैदानी इलाके में रहते हैं। वहीं कुकी और नगा समुदाय राज्य के पहाड़ी इलाकों में रहते हैं जो की राज्य का करीब 90 फीसदी है। जमीन सुधार कानून के तहत मैतई समुदाय के लोग पहाड़ों पर जमीन नहीं खरीद सकते, जबकि कुकी और नगा समुदाय पर ऐसी कोई पाबंदी नहीं है। यही वजह है, जिसकी वजह से हिंसा शुरू हुई और अब तक इस हिंसा में 100 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है।  

 

सीबीआई कर रही है मणिपुर हिंसा की जांच-


केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई ने मणिपुर हिंसा की जांच शुरू कर दी है। इसके लिए 53 अफसरों की टीम बनाई गई है, जिसमें 29 महिला अफसरों को शामिल किया गया है। सीबीआई की टीम में तीन डीआईजी लवली कटियार, निर्मला देवी और मोहित गुप्ता और सुपरीटेंडेंट ऑफ पुलिस राजवीर सिंह भी शामिल हैं। ये अधिकारी सीबीआई के जॉइंट डायरेक्टर घनश्याम उपाध्याय को अपनी रिपोर्ट देंगे। बता दें कि यह पहली बार है कि इतनी बड़ी संख्या में महिला जांच अधिकारियों को जांच टीम में शामिल किया गया है।  

नरेंद्र मोदी का गिरता और योगी आदित्यनाथ का बढ़ता ग्राफ…

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भारतीय जनता पार्टी को साल 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बहुमत मिला. करीब 15 साल बाद बीजेपी ने सत्ता में वापसी की थी.. सरकार का मुखिया कौन होगा यानी मुख्यमंत्री कौन बनेगा,, इस सवाल के जवाब में कई नाम सामने थे. लेकिन, फ़ाइनल मुहर लगी योगी आदित्यनाथ के नाम पर.. बहुत से लोगों के लिए ये फैसला एक ‘सरप्राइज़’ था. योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री पद की रेस कैसे जीती,, ये सवाल आज तक पूछा जाता है,,,  तब बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे अमित शाह ने भी कुछ साल पहले इसका ज़िक्र किया था, अमित शाह ने तब कहा था कि “जब योगी जी को मुख्यमंत्री बनाया तो किसी ने कल्पना नहीं की थी कि योगी जी मुख्यमंत्री बनेंगे. कई सारे लोगों के फोन आए कि योगी जी ने कभी म्युनिसिपलिटी भी नहीं चलाई. वास्तविकता भी यही थी. कि नहीं चलाई थी. योगी जी कभी किसी सरकार में मंत्री तक नहीं रहे.” अमित शाह के मुताबिक उस वक्त उनसे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कुछ अलग सलाह दी गई थी, “योगी जी संन्यासी हैं, पीठाधीश हैं और इतने बड़े प्रदेश का आप उनको मुख्यमंत्री बना रहे हो.

क्या कहती हैं राधिका रामाशेषन- 

7 साल बाद स्थिति पूरी तरह बदल गई है. अब योगी आदित्यनाथ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उत्तराधिकारी तलाशने वालों की संख्या बढ़ती नज़र आ रही है,, ऐसे लोगों में सिर्फ़ योगी आदित्यनाथ के उत्साही समर्थक नहीं हैं. बीजेपी के कई कार्यकर्ता और राजनीतिक विश्लेषक भी दावा करते हैं कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का कद पार्टी में अपने समकालीन नेताओं से काफी ऊंचा हो गया है… भारतीय जनता पार्टी की राजनीति पर वर्षों से करीबी नज़र रखने वाली वरिष्ठ पत्रकार राधिका रामा शेषन कहती हैं, “दिल्ली में अक्सर हमें दोनों का पोस्टर देखने को मिलता है, मोदी और योगी. योगी जी का स्टेटस  पार्टी में दूसरे नंबर का हो गया है. उन्होंने सबको पीछे छोड़ दिया है.

सवाल ये भी-


ऐसे में ये भी सवाल उठता है कि क्या योगी आदित्यनाथ को अब नरेंद्र मोदी की ज़रूरत नहीं है? इस सवाल का जवाब कई बातों से भी मिलता दिखाई देता है, योगी आदित्यनाथ का  असर ज़मीन पर भी दिखता है. मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के पहले योगी आदित्यनाथ पांच बार लोकसभा के सांसद चुने जा चुके थे लेकिन कई विश्लेषक ये भी मानते हैं कि तब उनका प्रभाव क्षेत्र सीमित था… मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ के कामकाज ने जिस यूपी मॉडल को खड़ा किया, उसकी चर्चा अब उसी तरह होती है जैसे साल 2014 के पहले बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्री और पार्टी के कार्यकर्ता नरेंद्र मोदी के गुजरात मॉडल का ज़िक्र करते थे.. योगी आदित्यनाथ ने अपना काफी प्रभाव छोड़ा है. मध्य प्रदेश और कर्नाटक में जब बीजेपी की सरकार थी तब वहां के नेता भी यूपी मॉडल का काफी ज़िक्र करते रहते थे.”

क्या कहते हैं ये राजनीतिक विश्लेषक-

राजनीतिक विश्लेषकों की राय है कि उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी को चुनाव दर चुनाव मिलने वाली कामयाबी की वजह से हर तरफ योगी आदित्यनाथ के ‘यूपी मॉडल’ की बात हो रही है… उत्तर प्रदेश की राजनीति पर करीबी नजर रखने वाले कहते हैं कि योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में प्रदेश में बीजेपी को मिले चुनाव नतीजों के जरिए उनका मूल्यांकन हो रहा है,, किसी भी व्यक्ति का मूल्यांकन रिजल्ट से होता है. योगी आदित्यनाथ के साथ भी यही बात है. वो 2017 में सत्ता में आए. साल 2019 के लोकसभा चुनाव में अच्छा रिजल्ट दिया. तब सपा, बसपा और आरएलडी का गठबंधन था… उस गठबंधन के मुक़ाबले 64 सीट जीतना  बड़ी उपलब्धि थी.. जबकि तब लोगों को लग रहा था कि बीजेपी का सफाया हो जाएगा. उसके बाद आया 2022 का विधानसभा चुनाव… दूसरी बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाना निश्चित तौर पर एक बड़ी बात थी… फिर अभी निकाय चुनाव हुए,, बीजेपी ने सारे बड़े शहरों में क्लीन स्वीप किया. ये रिपोर्ट कार्ड है योगी आदित्यनाथ का, जिसने उनको राष्ट्रीय नेताओं की कतार में मोदी के समकक्ष खड़ा कर दिया।
काबिले तारीफ़ हैं योगी-


‘योगी आदित्यनाथ. रिलीजन, राजनीतिक और पावर, द अनटोल्ड स्टोरी ‘ किताब के लेखक और उत्तर प्रदेश की राजनीति को कई दशक से कवर कर रहे वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान दावा करते हैं कि आज की तारीख में प्रदेश में योगी आदित्यनाथ दूसरे सभी नेताओं से आगे हैं.. वो कहते हैं, “जहां तक यूपी का सवाल है यहां नरेंद्र मोदी से भी ज्यादा योगी आदित्यनाथ का असर है. नरेंद्र मोदी 2024 में जहां फिर से पहुंचना चाहते हैं, उसके लिए यूपी ज़रूरी है और योगी भी. इसमें कोई शक नहीं है कि योगी आदित्यनाथ ने अपने आपको जिस तरह से आगे बढ़ाया है, वो काबिले तारीफ है.”

गुजरात मॉडल  की तर्ज पर है यूपी मॉडल-


योगी आदित्यनाथ और यूपी मॉडल एक दूसरे के पर्याय बन चुके हैं.. लेकिन ‘यूपी मॉडल’ है क्या ? योगी जी का यूपी मॉडल है कानून व्यवस्था और विकास.. साथ में हिंदुत्व का तड़का. यानी हिंदुत्व के तड़के के साथ विकास और कानून व्यवस्था पर फोकस करना… नरेंद्र मोदी के ‘गुजरात मॉडल’ की ही तरह योगी आदित्यनाथ के ‘यूपी मॉडल’ में भी सबसे मुख्य बात हिंदुत्व है… जैसे गुजरात मॉडल का मेन फ़ीचर विकास, इन्फ्रा स्ट्रक्चर और आर्थिक उन्नति थी, तो यहां यूपी मॉडल में कानून व्यवस्था मुख्य स्तंभ है… विकास की बात उसके बाद आती है.. कानून  व्यवस्था के मामले में योगी  ने काफी प्रभाव छोड़ा है. मध्य प्रदेश और कर्नाटक भी यूपी मॉडल का काफी ज़िक्र कर रहे थे… वो कह रहे थे कि कोई क़ानून हाथ में ले या उल्लंघन करे तो एक ही उपाय है, ‘बुलडोजर चलना’…  बुलडोज़र योगी आदित्यनाथ की सरकार का एक सिंबल बन गया है. हालांकि, योगी आदित्यनाथ के इस ‘यूपी मॉडल’ को लेकर आलोचक लगातार सवाल उठाते रहे हैं.. योगी आदित्यनाथ की अभी मेन USP  क्या है, जिसे दूसरे लोग भी कॉपी कर रहे हैं, खासकर बीजेपी शासित राज्य चाहे मध्य प्रदेश हो या असम वाले मुख्यमंत्री,, किसी ने कुछ गड़बड़ की, भले ही वो प्रूफ नहीं हुआ हो, केस चल रहा हो, ये कहते हैं कि उसे बुलडोज़ कर दो. बकायदा ऐसी भाषा बोलते हैं. ये क़ानून के मुताबिक नहीं है.. अगर आप देश के कानून को ताक पर रखकर अपना क़ानून चलाएंगे तो कुछ दिन तो अच्छा लगेगा लेकिन जब गाज आम आदमी पर गिरने लगेगी तो फिर लोग इस पर भी सवाल उठाने शुरू करेंगे। योगी आदित्यनाथ ने अपना एक प्रोफ़ाइल बना लिया है कि भई ये है सॉलिड आदमी, ये तुरंत तय करता है,  योगी आदित्यनाथ ने प्रचार के जरिए तरक्की की है. मोदी का मॉडल फोलो किया है,

अपने तौर पर ही करेंगे काम- योगी 


वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र सिंह कहते हैं कि आलोचक भले ही कुछ भी कहें. योगी आदित्यनाथ का मॉडल एक ख़ास तरह से ही काम करता है.. राधिका रामाशेषन कहती हैं कि योगी आदित्यनाथ के यूपी मॉडल में एक और ख़ास बात है जो बीजेपी शासित किसी और राज्य में दिखाई नहीं देती… और वो है कि योगी आदित्यनाथ अन्य बीजेपी नेताओं की तरह केंद्र  की हर बात आंख मूंदकर नहीं मानते.. 2017 में मुख्यमंत्री पद के लिए मोदी जी की पहली पसंद मनोज सिन्हा माने जाते  थे. केशव प्रसाद मौर्य जैसे कुछ और नाम चल रहे थे.. लेकिन अंत में योगी सबसे बड़े नेता के रूप में उभरे.. नोट करने वाली बात है कि पहले दिन से उन्होंने ये सिग्नल भेजा कि वो दिल्ली से निर्देश और आदेश नहीं लेने वाले हैं.. वो खुद अपने तौर पर ही राज चलाएंगे.. भले ही ये दिल्ली को पसंद न आया हो.. कई ऐसे उदाहरण हैं जब दिल्ली और लखनऊ के बीच में टेंशन हुई है.. ” उसका नजारा इस बात से दिखाई देता है, जब  “अरविंद शर्मा गुजरात में मोदी जी के पसंदीदा अधिकारी थे. उन्होंने इस्तीफा दिया और उन्हें MLC बनाया गया.. बहुत प्रयास हुआ कि 2022 विधानसभा चुनाव के पहले उन्हें मंत्री बनाया जाए.. ख़बर यहाँ तक आयी  कि उनके लिए एक बंग्ला भी कालिदास मार्ग पर देखा गया था, लेकिन योगी जी अड़े रहे और उन्हें अपने मंत्रिमंडल में नहीं लिया. अभी वो मंत्री हैं लेकिन उनकी ज़्यादा चर्चा नहीं है. केशव प्रसाद मौर्या भी समानांतर खड़ा करने का प्रयास हुआ लेकिन वो भी सफल नहीं हो पाए हैं. “

 

एक बड़ा वर्ग बीजेपी के साथ जुड़ा है-

 

वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान दावा करते हैं कि योगी आदित्यनाथ ने आज “ऐसी पोजिशनिंग कर ली है कि वो अपनी ही पार्टी में कई लोगों की आंख का कांटा बन गए हैं.. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि योगी आदित्यनाथ के मॉडल में एक और बात है जो उन्हें मौजूदा दौर के दूसरे नेताओं से अलग करती है…योगी आदित्यनाथ के आलोचक उन्हें एक ख़ास जाति का समर्थक बताते हैं लेकिन ये आरोप का उनके राजनीतिक ग्राफ पर असर होता नहीं दिखता.. इसकी वजह है,, उनका भगवा परिधान.. वो गोरक्षनाथ पीठ के पीठाधीश्वर हैं. वो भले ही सवर्ण हैं लेकिन उस पीठ की Following पिछड़ों में काफी है. दूसरे भगवा वेश की वजह से पिछड़े नेतृत्व की बात डाइल्यूट हो जाती है.. फिर यूपी में अब मुलायम सिंह यादव और कल्याण सिंह के कद का कोई पिछड़ा नेता भी नहीं है. मायावती का दलितों में आधार घट रहा है.”यूपी में राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान से ही ओबीसी और पिछड़ों का एक बड़ा वर्ग बीजेपी के साथ जुड़ा हुआ है. बीजेपी उन्हें पद भी देती है, जैसे केशव मौर्या उपमुख्यमंत्री हैं. वो योगी आदित्यनाथ के भी साथ है.

योगी की अगली परीक्षा 2024 चुनाव में-


उत्तर प्रदेश के निकाय चुनाव में विपक्ष को हाशिए पर धकेलने वाले योगी आदित्यनाथ की अगली परीक्षा साल 2024 में लोकसभा के आम चुनाव के दौरान होगी.. तब नरेंद्र मोदी और बीजेपी के साथ विपक्षी दलों के लिए बहुत कुछ दांव पर होगा.. उस वक्त योगी आदित्यनाथ और उनका मॉडल बीजेपी के लिए कितना अहम होगा? इस सवाल पर पत्रकार शरत प्रधान कहते हैं, “कि योगी आदित्यनाथ ने  support base सॉलिड बना लिया है. विपक्ष बिल्कुल कमज़ोर है.. अखिलेश यादव सॉफ्ट हिंदुत्व प्ले करने लगे हैं. ये भी योगी के हक में जाता है, जब आप दूसरे की पिच पर खेलेंगे तो कैसे जीतेंगे.”

योगी का सबसे बड़ा एडवांटेज

 

वहीं, राजेंद्र सिंह कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में आगे भी बीजेपी मौजूदा रास्ते पर ही चलेगी… यूपी में कोई बड़ी चुनौती बीजेपी के सामने नहीं है..  2019 का आपको ध्यान है, तब सपा बसपा और आरएलडी का गठबंधन था लेकिन बीजेपी बहुत आगे रही.” राजेंद्र सिंह कहते हैं, “सरकार बनी तो मोदी पीएम होंगे. योगी आदित्यनाथ भी उनका गुणगान करते हैं. जब कभी मोदी हटेंगे तब सवाल भले उठ सकता है..
यूपी के अंदर विधानसभा में योगी नंबर वन हैं, लेकिन लोकसभा के लिहाज से अभी भी शायद मोदी नंबर वन हैं.. 2024 में अगर बीजेपी को पहले से ज्यादा सीटें मिली तो मोदी ही प्रधानमंत्री होंगे, थोड़ा कम भी हो तो भी मोदी होंगे. योगी आदित्यनाथ अगर अपना दावा पेश भी करते हैं तो किन परिस्थितियों में करेंगे,, ये देखना होगा,, योगी आदित्यनाथ अभी सिर्फ़ 51 साल के हैं और ये उनका एडवांटेज है.

 

प्रधानमंत्री मोदी ने सुप्रीम कोर्ट के लिए आखिर ऐसा क्या कहा की मुख्य न्यायाधीश ने दिया ऐसा रिएक्शन…

285 Minutes Read -
 
 
भारत आज 77 वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को लाल किले की प्राचीर से दसवां स्वतंत्रता दिवस पर भाषण दिया। आज सभी न्यूज़ चैनल से लेकर सभी स्वतंत्र पत्रकार और मीडिया प्रधानमंत्री के भाषण की व्याख्या की किसी ने प्रधानमंत्री के भाषण को अच्छा और किसी ने निराशाजनक बताया। लेकिन आज हम इस भाषण को न ही सही और न ही गलत बता रहे हैं ,बल्कि हम आज आपको प्रधानमंत्री के भाषण की मुख्य बातों को बताएंगे, आपको इस खबर में ये बताएँगे कि प्रधानमंत्री के भाषण में किस चीज को कितनी बार दोहराया गया.
 
प्रधानमंत्री मोदी ने की सुप्रीम कोर्ट की सराहना- 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज लाल किले की प्राचीर से देश की जनता को 10 वीं बार सम्बोधित किया,  इस दौरान उन्होंने मणिपुर से लेकर परिवारवाद तक का अपने भाषण में जिक्र किया। वहीं पीएम ने अदालती फैसलों को क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध कराने को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सराहना की। स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम में भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ भी मौजूद थे, उन्होंने प्रधानमंत्री की टिप्पणी को हाथ जोड़कर स्वीकार किया और अभिवादन किया। पीएम मोदी ने कहा कि मैं सुप्रीम कोर्ट को भी धन्यवाद देता हूं। सीजेआई चंद्रचूड़ ने अक्सर अदालतों द्वारा क्षेत्रीय भाषाओं में फैसले देने की आवश्यकता पर जोर दिया है। गणतंत्र दिवस और अपने स्थापना दिवस को और यादगार बनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 26 जनवरी को एक हजार से ज्यादा फैसलों का दस भाषाओं में अनुवाद जारी कर इसकी शुरुआत की थी,
 
 
PM ने कई बार किया इन विषयों का जिक्र- 
 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से देश को 10वीं बार संबोधित किया. 90 मिनट के अपने संबोधन में पीएम मोदी  ने 48 बार परिवारजन, 43 बार सामर्थ्य का इस्तेमाल किया. वहीं, महिलाएं/नारी शब्द का इस्तेमाल 35 बार किया.. इसके अलावा पीएम मोदी ने अपने संबोधन में 19 बार संकल्प शब्द बोला,,जबकि आजादी 16 बार,, पीएम मोदी के भाषण में युवाओं का 12 बार जिक्र आया.. जबकि 5 बार उन्होंने सामाजिक न्याय की बात कही.  90 मिनट के अपने संबोधन में पीएम मोदी ने 12 बार परिवारवाद, 11 बार भ्रष्टाचार और 8 बार तुष्टिकरण का जिक्र किया. पीएम ने मणिपुर मुद्दे का जिक्र करते हुए कहा कि पूरा देश मणिपुर के साथ खड़ा है. पिछले कुछ दिनों से जो शांति बनाकर रखी है, मणिपुर के लोग उसे आगे बढ़ाएं। ‘अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने कहा कि इस बार प्राकृतिक आपदा ने देश के अनेक हिस्सों में अकल्पनीय संकट पैदा किए है। जिन्होंने इसे सहा, उनके प्रति मैं गहरी संवेदना प्रकट करता हूं। 
 
 
क्या कहा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने-
 
प्रधानमंत्री ने कहा कि ‘इस कालखंड में हम जो करेंगे, जो कदम उठाएंगे, त्याग करेंगे, तपस्या करेंगे, आने वाले एक हजार साल का देश का स्वर्णिम इतिहास उससे अंकुरित होने वाला है। पीएम मोदी ने आगे कहा कि अगली बार 15 अगस्त को इसी लाल किले से मैं आपके सामने देश की उपलब्धियां, आपके सामर्थ्य, उसमें हुई प्रगति और सफलता के गौरव गान को इससे भी अधिक आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत करूंगा। उन्होंने कहा कि अगली बार इसी लाल किले पर और अधिक आत्मविश्वास के साथ आऊंगा। उन्होंने कहा कि मैं साल 2014 में परिवर्तन का वादा लेकर आया था। देश के 140 करोड़ लोगों ने मुझ पर भरोसा किया। रिफॉर्म, परफॉर्म, ट्रांसफर का वादा विश्वास में बदल गया। मैंने इस वादे को विश्वास में बदल दिया है। 
 
 
विपक्ष ने किया पलटवार-
 
इस मौके पर पक्ष-विपक्ष के नेता और सांसद लाल किले पर पहुंचे थे, वहीं एक कुर्सी भी खाली दिखाई दी। ये कुर्सी कांग्रेस के एक बड़े नेता की थी। ये सीट राज्यसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की थी। वो पीएम मोदी का भाषण सुनने नहीं पहुंचे, जिससे राजनीतिक गलियारों में चर्चा शुरू हो गई। हालांकि, कांग्रेस ने इस पर सफाई भी दी। उन्होंने कहा कि खरगे को ठीक महसूस नहीं हो रहा था, इसलिए वो लाल किले पर नहीं पहुंचे। 90 मिनट के अपने संबोधन में पीएम मोदी ने ऐलान किया कि वे 2024 में भी लाल किले पर तिरंगा फहराएंगे. पीएम मोदी के इस बयान पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राजद चीफ लालू यादव ने पलटवार किया है. खड़गे ने कहा कि मोदी झंडा तो फहराएंगे, लेकिन अपने घर पर. लालू ने कहा कि ये आखिरी बार है. 
 पीएम मोदी ने अगले 5 साल की दी गारंटी-
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर बार स्वतंत्रता दिवस पर अपने परिधान और वेशभूषा को लेकर चर्चा में रहते हैं। इसके अलावा उनके साफा बांधने का अंदाज सबसे ज्यादा आकर्षक होता है। हर ध्वजारोहण में प्रधानमंत्री अलग-अलग रंगों की पगड़ी पहन कर ध्वजारोहण कर चुके हैं,, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लालकिले की प्राचीर से देश के सामने अपनी सरकार के नौ साल का बही खाता रखा। 2024′ से पहले ही मोदी ने अगले पांच साल की गारंटी भी दे दी। उन्होंने कहा, हम आज जो शिलान्यास कर रहे हैं, उनका उद्घाटन भी मेरे नसीब में है। बतौर मोदी, अगले स्वतंत्रता दिवस पर मैं आपके सामने अपनी सरकार की सफलता का रिपोर्ट कार्ड पेश करूंगा।
 प्रधानमंत्री मोदी ने 10वीं बार किया सम्बोधित- 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब तक कुल 10 बार लाल किले से देश को संबोधित कर चुके हैं। केवल एक बार उन्होंने देश को एक घंटे से कम समय के लिए संबोधित किया। 2017 के स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री का भाषण केवल 56 मिनट का रहा था। ये उनका अब तक का सबसे छोटा भाषण है। प्रधानमंत्री ने जब साल 2014 में देश को पहली बार लाल किले से संबोधित किया तो उन्होंने कुल 65 मिनट तक भाषण दिया। इसके बाद, साल 2015 में उन्होंने 86 मिनट तक देश को संबोधित किया। देश जब आजादी की 70वीं वर्षगांठ मना रहा था, उस दौरान पीएम मोदी ने देश को लाल किले से 94 मिनट तक संबोधित किया। यह उनके प्रधानमंत्री के रूप में रहने के दौरान लाल किले से दिया गया सबसे लंबा भाषण है। पीएम मोदी ने 2017 के स्वतंत्रता दिवस के मौके पर 57 मिनट, 2018 में 82 मिनट और 2019 में 92 मिनट तक देश को संबोधित किया।  इसके बाद 2020 में 86 मिनट, 2021 में 88 मिनट, 2022 में 83 मिनट और 2023 में 90 मिनट तक पीएम मोदी ने लाल किले से भाषण दिया।
 
सबसे ज्यादा बार किस ने फहराया तिरंगा-
 
जवाहरलाल नेहरू आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री थे। लाल किले की प्राचीर से सबसे ज्यादा बार तिरंगा झंडा लहराने का अवसर उन्हें ही मिला था। नेहरू 1947 से लेकर 1964 तक भारत के प्रधानमंत्री रहे। इस दौरान उन्होंने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले पर रिकॉर्ड 17 बार झंडा फहराया। इस मामले में दूसरे नंबर पर भारत की एकमात्र महिला प्रधानमंत्री और जवाहरलाल नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी हैं। उन्होंने लाल किले पर 16 बार राष्ट्रीय ध्वज फहराया है।