Category Archive : अपराध

कौन हैं वो 8 भारतीय नेवी अफसर जिन्हे कतर ने सुनाई मौत की सजा, आखिर क्या हैं आरोप.

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कतर के साथ भारत के रिश्ते अच्छे माने जाते हैं. हालांकि, इसके बाद भी कतर ने आठों भारतीयों को मौत की सजा सुना दी है. कतर की अदालत ने भारतीय नौसेना के आठ पूर्व अफसरों को मौत की सजा सुनाई है। इन आठों भारतीयों को पिछले साल जासूसी के कथित आरोप में गिरफ्तार किया गया था. भारत सरकार ने इस फैसले पर हैरानी जताई है। हालांकि, भारत सरकार ने साफ कर दिया है कि वह इस मामले में सभी कानूनी विकल्पों पर विचार कर रहा है। तो आईये जानते हैं क्या है वो मामला और कौन हैं ये आठों नेवी अफसर?

कौन हैं ये 8 नेवी अफसर ?

नौसेना के जिन आठ पूर्व अफसरों को मौत की सजा सुनाई गई है, उनके नाम – कैप्टन सौरभ वशिष्ठ, कमांडर पूर्णेंदु तिवारी, कैप्टन बीरेंद्र कुमार वर्मा, कमांडर सुगुणाकर पकाला, कमांडर संजीव गुप्ता, कमांडर अमित नागपाल और राजेश हैं।

इन सभी पूर्व अफसरों ने भारतीय नौसेना में 20 साल तक सेवा दी थी। नौसेना में रहते हुए उनका कार्यकाल बेदाग रहा है और अहम पदों पर रहे हैं। साल 2019 में, कमांडर पूर्णेंदु तिवारी को प्रवासी भारतीय सम्मान से सम्मानित किया गया था, जो प्रवासी भारतीयों को दिया जाने वाला सर्वोच्च सम्मान है।

कतर में कर क्या रहे थे ये सभी अफसर ?

नौसेना से रिटायर्ड ये सभी अफसर दोहा स्थित अल-दहरा कंपनी में काम करते थे। ये कंपनी टेक्नोलॉजी और कंसल्टेंसी सर्विस प्रोवाइड करती थी। साथ ही कतर की नौसेना को ट्रेनिंग और सामान भी मुहैया कराती थी। इस कंपनी को ओमान की वायुसेना से रिटायर्ड स्क्वाड्रन लीडर खमीस अल आजमी चलाते थे। पिछले साल उन्हें भी इन भारतीयों के साथ गिरफ्तार कर लिया गया था। हालांकि, नवंबर में उन्हें रिहा कर दिया गया था। ये कंपनी इस साल 31 मई को बंद हो गई है। इस कंपनी में लगभग 75 भारतीय नागरिक काम करते थे, जिनमें ज्यादातर नौसेना के पूर्व अफसर थे। कंपनी बंद होने के बाद इन सभी भारतीयों को नौकरी से निकाल दिया गया।

पूरा मामला क्या है?

ये सभी आठ भारतीयों को पिछले साल जासूसी के कथित मामले में हिरासत में ले लिया गया था। हालांकि कतर प्रशासन की ओर से इन लोगों के खिलाफ आरोपों को सार्वजनिक नहीं किया गया है लेकिन माना गया कि गिरफ्तारियां सुरक्षा संबंधी मामले में की गई थीं। वहीं पिछले साल 25 अक्टूबर को मीतू भार्गव नाम की महिला ने ट्वीट कर बताया था कि भारतीय नौसेना के आठ पूर्व अफसर 57 दिन से कतर की राजधानी दोहा में गैर-कानूनी तरीके से हिरासत में हैं। मीतू भार्गव कमांडर पूर्णेदु तिवारी की बहन हैं।उन्होंने भारत सरकार से इस मसले पर जल्द कार्रवाई की मांग की थी।

कब हुआ था ट्रायल?

आठों पूर्व अधिकारियों को पिछले साल 30 अगस्त की रात हिरासत में ले लिया गया था। इन सभी का ट्रायल इसी साल 29 मार्च को शुरू हुआ था। विदेश मंत्रालय ने 6 अप्रैल को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए इस बात जानकारी दी थी कि इन सब लोगों को भारत की ओर से कानूनी मदद मिलनी शुरू हो गई है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने कहा था कि इस मामले की सबसे पहली सुनवाई 29 मार्च को हुई थी। ये सुनवाई उस वकील ने भी अटेंड की थी जिन्हें केस के लिए नियुक्त किया गया है। तीन अक्टूबर को मामले में सातवीं सुनवाई हुई थी और कोर्ट ऑफ फर्स्ट इंस्टेंस ने गुरुवार को उनके खिलाफ फैसला सुनाया।

क्या कर रही है भारत सरकार ?

भारत के विदेश मंत्रालय ने गुरुवार को कहा कि वह इस फैसले से स्तब्ध है और फैसले के विस्तृत ब्योरे की प्रतीक्षा कर रहे हैं। हम हर परिवार के सदस्यों और कानूनी टीम के संपर्क में हैं।‌भारतीय नागरिकों की रिहाई के लिए सभी कानूनी विकल्पों की तलाश की जा रही है। विदेश मंत्रालय ने ये भी कहा कि कतर की जेल में बंद भारतीय नागरिकों को कॉन्सुलर एक्सेस और कानूनी मदद दी जाती रहेगी और फैसले को कतर के अधिकारियों के समक्ष भी उठाएंगे।

Uttarakhand Police: साइबर अपराधियों ने किया उत्तराखंड पुलिस का फेसबुक पेज हैक, मचा हड़कंप, फोटो वायरल.

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साइबर अपराधियों ने उत्तराखंड पुलिस का ऑफिशियल फेसबुक पेज हैक कर चुनौती दे डाली। फेसबुक पेज पर पुलिस के लोगो वाली तस्वीर को हटाकर वहां महिला की अश्लील तस्वीर लगा दी। मामला संज्ञान में आने के बाद पुलिस मुख्यालय की सोशल मीडिया टीम के सदस्य की ओर से साइबर थाने में मुकदमा दर्ज कराया गया है। इसमें एसटीएफ और साइबर पुलिस ने जांच शुरू कर दी है।

उत्तराखंड पुलिस का फेसबुक पेज दोपहर को अचानक बदला हुआ नजर आया। शुरुआत में कोई समझ ही नहीं पाया कि ये पुलिस का ऑफिशियल पेज ही है या फिर किसी ने दूसरा पेज बनाया है। इस पर एक महिला की अश्लील तस्वीर लगी हुई थी। देखते ही देखते इस पर कमेंट की बाढ़ आ गई।

लोगों ने इसे उत्तराखंड पुलिस को साइबर अपराधियों की खुली चुनौती के रूप में बताया। इससे पुलिस मुख्यालय की सोशल मीडिया टीम ने इस पेज पर कंट्रोल लिया और डिस्प्ले पिक्चर के स्थान पर फिर से पुलिस का लोगो वाली तस्वीर लगा दी।

 

कुछ लोगों ने इसे साइबर सुरक्षा के लिए भी खतरा बताया। लोगों का कहना था कि जब पुलिस के सोशल मीडिया अकाउंट ही सुरक्षित नहीं तो आम लोगों की साइबर सुरक्षा किस तरह की जा सकती है। इस मामले में सोशल मीडिया टीम के कांस्टेबल हिमांशु डंगवाल की ओर से साइबर थाने में मुकदमा दर्ज कराया गया है। पुलिस के अनुसार किसी ने इस पेज की एक्सेस हासिल कर यह काम किया है।

डीजीपी अशोक कुमार ने बताया कि इस मामले में साइबर थाना पुलिस को तत्काल टीम गठित कर गंभीरता से जांच करने के निर्देश दिए गए हैं। जल्द ही आरोपियों को पकड़ा जाएगा।

Uttarakhand- कोरोना काल में बंद रहा काम, बिजली विभाग ने भेजा लाखों का बिल, हैरान हुआ कारोबारी

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उत्तराखंड में बिजली विभाग के अफसर उपभोक्ताओं को मनमर्जी से बिजली बिल थमा रहे हैं। धरातल पर मीटर नहीं बदलते, लेकिन कागजी खानापूरी करके रीडिंग बढ़ा देते हैं। उपभोक्ता जितना विरोध करते हैं, तो बिजली का बिल उतना हीं बढ़ता जाता है।

उत्तराखंड विद्युत लोकपाल सुभाष कुमार ने ऐसे तीन मामलों में उपभोक्ता फोरम के आदेश को रद्द कर दिया। यूपीसीएल के बिजली बिलों को भी निरस्त करते हुए उपभोक्ताओं को राहत दी है। रुद्रपुर निवासी थान सिंह का छोटा कारोबार है, जिसके लिए 10 किलोवाट का कनेक्शन लिया हुआ है।

मार्च में उन्हें 1,14,969 का बिल आया। साथ ही कहा गया कि कनेक्शन न कटे इसके लिए 75 हजार तत्काल जमा कराएं। इसके बाद उन्हें 28 मार्च को यूपीसीएल से एक पत्र आया, जिसमें कहा गया कि उनका फरवरी 2017 से नवंबर 2022 का 29,35,681 रुपये का बकाया है। 

वह उपभोक्ता फोरम गए, जहां से राहत नहीं मिली। विद्युत लोकपाल सुभाष कुमार ने माना कि यूपीसीएल ने गलत बिल थमाया है। उन्होंने इसे निरस्त करते हुए पिछले छह बिलिंग साइकिल के हिसाब से बिल देने को कहा है। उन्होंने फोरम का आदेश निरस्त कर दिया।

मीटर बदले बिना बिल बढ़ाकर 2 लाख पहुंचाया-


रुड़की के सिकंदरपुर निवासी किसान अय्यूब ने अपनी 30 बीघा जमीन पर निजी ट्यूबवेल लगाया। उन्हें बिजली विभाग ने पिछले साल 15 मार्च को 2,94,499 रुपये का बिल थमाया। जिस पर उन्होंने शिकायत की तो विभाग ने मीटर की गड़बड़ी मानते हुए इसमें से 91,704 रुपये की छूट करते हुए 2,02,795 रुपये जमा कराने को कहा। उपभोक्ता फोरम ने भी इसे सही ठहराया। अपील पर विद्युत लोकपाल सुभाष कुमार ने माना कि यूपीसीएल ने वहां बिजली का नया मीटर लगाया ही नहीं था। मनमाने तरीके से बिल थमा दिया। उस बिल व फोरम के आदेश को रद्द कर दिया। उन्होंने यूपीसीएल को आदेश दिया कि पुराने मीटर की रीडिंग के औसत के हिसाब से नया बिल दिया जाए।

इंजीनियरों की खींचतान में आठ लाख का बिल-


काशीपुर निवासी आशीष कुमार अरोड़ा की बिजली बिल की रीडिंग ठीक नहीं आ रहीं थीं। उन्होंने विभाग को शिकायत की तो चेक मीटर लगाया गया। इसके बावजूद बिजली विभाग ने नवंबर 2022 में आठ लाख 81 हजार 244 रुपये का बिल थमा दिया। उन्होंने विरोध करते हुए उपभोक्ता फोरम का दरवाजा खटखटाया। बिजली कनेक्शन न कटे, इसके लिए उन्होंने दो लाख रुपये एडवांस भी जमा करा दिया। फोरम से राहत न मिलने पर वह विद्युत लोकपाल पहुंचे। लोकपाल सुभाष कुमार ने पाया कि यूपीसीएल के दो इंजीनियरों की आपसी खींचतान से उपभोक्ता को आठ लाख का बिल दिया गया। उन्होंने तत्काल फोरम के आदेश व इस बिल को निरस्त कर दिया। पूर्व से जमा दो लाख की राशि भी उपभोक्ता को लौटाने के आदेश दिए।

निर्वस्त्र मदद के लिए घूमती रही नाबालिग, मणिपुर की तरह मध्य प्रदेश में शर्मसार करने वाली घटना.

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मणिपुर जैसे हालात अब MP में भी-

मणिपुर का मामला अभी शांत भी नहीं हुआ था कि एक बार फिर इस देश को शर्मसार करने वाली तस्वीरें सामने आयी है,इस बार मध्य प्रदेश के उज्जैन जो शिव की नगरी मानी जाती है, वहां से मणिपुर जैसी ही घटना सामने आयी है. मध्य प्रदेश के उज्जैन में 12 साल की मासूम से दरिंदगी हुई. बेसुध और लहूलुहान हालत में मासूम ने 8 किलोमीटर का रास्ता पैदल तय किया. इस दौरान उसने कई लोगों से मदद की गुहार भी लगाई. इस घटना की जो तस्वीर सामने आई उसने उज्जैन शहर ही नहीं पूरे देश के लोगों को झकझोर कर रख दिया है.

बाबा महाकाल की नगरी उज्जैन में इंसानियत को शर्मसार कर देने वाला मामला सामने आया है, जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। यहां एक 12 साल की नाबालिग लड़की का दुष्कर्म किया जाता है। वो लड़की मदद के लिए दर-दर भटकती है, लेकिन कोई उसकी मदद करने के लिए आगे नहीं आया।

 

25 सितंबर को पुलिस को मिली जानकारी-

उज्जैन के एसपी सचिन शर्मा ने बताया कि 25 सितंबर की सुबह 10 बजकर 15 मिनट पर महाकाल पुलिस स्टेशन में सूचना मिली कि एक बच्ची बड़नगर रोड पर मुरलीपुरा से आगे दांडी आश्रम के नजदीक लावरिस और घायल अवस्था में पड़ी मिली। इस सूचना पर जब पुलिस मौके पर पहुंची तो बच्ची के कपड़े खून से सने हुए थे। वह ठीक से बोल भी नहीं पा रही थी।

बच्ची को चरक अस्पताल में कराया गया भर्ती-

एसपी ने बताया कि बच्ची को आनन-फानन में चरक अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां पांच डॉक्टरों ने उसका इलाज किया। इस दौरान जांच में बच्ची के साथ दुष्कर्म होने की पुष्टि हुई।

 

बच्ची को किया गया रेफर-

एसपी सचिन शर्मा ने बताया कि बच्ची को अंदरूनी चोट आई थी। उसकी गंभीर हालात को देखते हुए उसे इंदौर रेफर कर दिया गया है। हालांकि, इलाज के बाद अब उसकी हालत ठीक है।

 

एसआईटी को सौंपी गई जांच-

एसपी के मुताबिक, दुष्कर्म की पुष्टि के बाद मामले की जांच एसआइटी को सौंपी गई। एसआइटी ने उन तमाम जगहों के सीसीटीवी फुटेज को खंगाला, जहां किशोरी गई हुई थी। आरोपी को पकड़ने के लिए एसआईटी ने करीब एक हजार फुटेज देखे। इस दौरान उसने कई लोगों से पूछताछ भी की।

 

आठ किमी तक पैदल चली बच्ची-

पुलिस ने बताया कि बच्ची सतना ने सोमवार तड़के तीन बजकर 15 मिनट पर उज्जैन पहुंची थी। यहां रेलवे स्टेशन के बाहर देवास गेट पर उसने कुछ ऑटो वालों से बात की। वह कुल छह आटो चालकों के संपर्क में आई थी। इस दौरान एक ऑटो चालक उसे घुमाते रहे। बाद में ऑटो चालक भरत उसे सुनसान जगह पर ले गया और उसके साथ दुष्कर्म किया। दुष्कर्म के बाद नाबालिग लड़की करीब आठ किमी तक पैदल चली। इस दौरान उसने लोगों से मदद की गुहार भी लगाई, लेकिन किसी ने भी उसकी मदद नहीं की। आखिरकार, सुबह 10 बजे बड़नगर रोड पर दांडी आश्रम पर संचालक राहुल शर्मा ने उससे बात की, जिसके बाद उन्होंने मामले की जानकारी महाकाल थाने और डायल 100 को दी।

 

 

आरोपी ऑटो ड्राइवर ने कुबूला अपना जुर्म-

पुलिस को जांच के दौरान पता चला कि नानाखेड़ा क्षेत्र के रहने वाले एक ऑटो चालक भरत सोनी बच्ची को अपने साथ लेकर कहीं गया हुआ था। इस जानकारी पर पुलिस ने गुरुवार को भरत को हिरासत में लेकर कड़ाई से पूछताछ की, जिसमें उसने अपना जुर्म कुबूल कर लिया।

 

 

किशोरी की हालत में पहले से सुधार-

इंदौर के एमटीएच अस्पताल में पीड़िता को भर्ती किया गया था, जहां 26 सितंबर को स्त्री रोग विशेषज्ञ, पीडियाट्रिक सर्जन, सर्जन और निश्चेतना विशेषज्ञ की टीम ने उसका ऑपरेशन किया। ऑपरेशन के दो दिन बाद अब उसकी हालत में सुधार है। डॉक्टरों ने अभी भी पीड़िता को निगरानी के तहत रखा है। उसकी हालत स्थिर है।

 

हाई कोर्ट के निर्देश पर कार्बेट में पेड़ कटान व अवैध निर्माण मामले में सीबीआई ने शुरू की जांच

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सीबीआई ने जिम कार्बेट नेशनल पार्क के पाखरो रेंज में टाइगर सफारी के नाम पर हुए अवैध निर्माण तथा छह हजार पेड़ काटने के मामले की जांच शुरू कर दी है। राज्य सतर्कता निदेशक वी मुर्गेशन के मुताबिक, राज्य सतर्कता ने कार्बेट मामले से संबंधित सभी दस्तावेज सीबीआई को सौंप दिए हैं।नैनीताल हाईकोर्ट के निर्देश पर सीबीआइ कार्बेट पार्क मामले की जांच सीबीआई कर रही है। इस मामले में सबसे पहले पाखरो सफारी मामले से जुड़े तीन सेवानिवृत्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक (पीसीसीएफ) और एक मौजूदा पीसीसीएफ समेत रेंज में काम करने वाले करीब एक दर्जन वन अधिकारियों, कर्मचारियों व ठेकेदारों से सीबीआई पूछताछ करेगी।

 

जांच का प्रमुख केंद्र होंगे तत्कालीन वन मंत्री हरक सिंह रावत

सीबीआई की जांच का मुख्य केंद्र बिंदु तत्कालीन वन मंत्री हरक सिंह रावत होंगे। विजिलेंस और अन्य जांचों से पता चला है कि हरक सिंह के दबाव में कार्बेट टाइगर सफारी में वित्तीय और अन्य स्वीकृतियां लिए बिना ही काम शुरू कर दिया गया था।

बता दें है कि 21 अगस्त को मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति विपिन सांघी व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ में देहरादून के अनु पंत की जनहित याचिका पर सुनवाई हुई थी। इसमें कहा गया था कि  बिना अनुमति के निर्माण कार्य किए गए। छह जनवरी, 2023 को हाई कोर्ट ने मुख्य सचिव से पेड़ों के कटान के प्रकरण पर जांच रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने और यह बताने को कहा था कि किन लोगों की लापरवाही और संलिप्तता से यह अवैध कार्य हुए।

एक साल पूरा ,न्याय अधूरा ! महिला आरक्षण बिल मुबारक हो…

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क्या बिल के बाद सुधरेगी महिलाओं की स्थिति-

 

चुनावी साल में तीन दशकों से लंबित महिला आरक्षण बिल को  मोदी कैबिनेट  ने मंजूरी दे दी, विपक्ष ने भी इस बिल के समर्थन में है. तो अब क्या ये माना जाय कि इस बिल के आने मात्र से  महिलाओं की स्तिथि में सुधार हो जायेगा, महिलाओ की कितनी स्थिति कितनी सुधरती है ये तो आने वाला वक्त बताएगा। बहरहाल  कई सवाल है, जिनका जवाब मिलना अभी बाकी है.

 

महिला आरक्षण से पहले सबसे ज्यादा जरूरी है उनकी सुरक्षा। प्रधानमंत्री मोदी हमेशा ही महिलाओं की बात हर मंच से करते दिखाई देते हैं,बेटी बचाओ,बेटी पढ़ाओ का नारा भी प्रधानमंत्री मोदी ने ही दिया है. लेकिन उन्ही के एक  राज्य जहां की महिलाओं ने उनको वोट के रूप में दिल खोलकर आशीर्वाद दिया हो उस राज्य में  एक बहादुर  बेटी की हत्या कर दी जाती है.

आखिर कब मिलेगा न्याय-

वो लड़की जो अपने दम  पर कुछ काम करके अपने परिवार का सहारा बनना चाहती थी और उस बेटी की बेबस मां न्याय के लिए कोर्ट से लेकर सड़क तक दर-दर भटक कर एड़ियां रगड़ रही हो. एक साल से उस मां के आंसू रुक नहीं रहे हो  और मोदी जी के धाकड़ मुख्यमंत्री उनको न्याय नहीं दिला पा रहे हों.  तो महिला सुरक्षा की बात करना बेमानी प्रतीत होता है,, एक साल से बुजुर्ग माता पिता न्याय के लिए हर दरवाजे और चौखट को खटका रहे हैं लेकिन सरकार उस बदनसीब बेटी के नाम पर एक जगह का नामकरण करके अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होना चाहती है.

एक साल बाद भी इंसाफ नहीं-

उत्तराखंड के बहुचर्चित अंकिता भंडारी हत्याकांड को  एक साल पूरा हो गया है। इस मर्डर केस की गूंज पूरे उत्तराखंड में सुनाई दी थी। 19 साल की अंकिता के साथ युवकों की हैवानियत की कहानी ने लोगों को हिलाकर रख दिया था। अंकिता एक रिजॉर्ट मे रिसेप्शनिस्ट थी। उसकी हत्या सिर्फ इसलिए कर दी गई थी, क्योंकि उस पर रिजॉट में आने वाले VIP गेस्ट को स्पेशल सर्विस देने का दबाव बनाया गया था.. जिसे उसने मना कर दिया,,ये रिजॉर्ट भी बीजेपी नेता के बेटे का था और अपराधी भी खुद बीजेपी नेता का बेटा,,,,केस में भाजपा नेता विनोद आर्य के बेटे पुलकित आर्य पर रेप और हत्या के आरोप लगे, जिसमें सौरभ भास्कर और अंकित गुप्ता ने उसकी मदद की।पुलिस ने आरोपियों को दबोच कर सख्ती से पूछताछ की तो उन्होंने गुनाह कबूल लिया था।

आखिर इतनी देरी क्यों-

सवाल ये खड़ा होता है कि जब अपराधी अपना गुनाह कबूल कर चुके हैं, जांच टीम  दावा कर रही थी  कि टीम के पास पुरे सबूत मौजूद हैं,तो फिर अंकिता को एक साल बाद भी न्याय क्यों नहीं मिल पाया,न्याय मिलने में इतनी देरी क्यों ? अंकिता के माता -पिता ये दावा करते हैं कि स्थानीय विधायक ने रातो रात रिजॉर्ट पर बुलडोजर चला कर सबूत नष्ट किये लेकिन आज भी धाकड़ मुख़्यमंत्री ने अपनी विधायक से इसको लेकर कोई स्पष्टीकरण नहीं मांगा,ऐसे में ये भी संशय पैदा होता है कि क्या बीजेपी नेता का बेटा होने की वजह से अंकिता को न्याय मिलने में देरी हो रही है,,पूरा प्रदेश उस VIP का नाम जानना चाहती है जिसको स्पेशल सर्विस के नाम पर अंकिता पर दबाव बनाया जा रहा था,आखिर क्यों सरकार उस VIP का नाम सार्वजनिक नहीं करना चाह रही.

कई बयानों में खुलासा फिर भी न्याय नहीं-

हत्या से पहले अंकिता पर जो बीती उसका खुलासा गवाहों के बयान में हुआ है। एक  रिपोर्ट के मुताबिक अंकिता भंडारी का लगातार सेक्सुअल हरासमेंट हो रहा था। इतना ही नहीं हत्या से पहले उसके साथ रेप भी हुआ। गवाहों के बयान के मुताबिक पुलकित आर्य की बर्थडे पार्टी के दिन अंकिता को कोल्ड ड्रिंक में शराब मिलाकर पिलाई गई। जब वो बेहोश हो गई तो उसके साथ दुष्कर्म किया गया। सौरभ भास्कर इस करतूत में शामिल था। 108 नंबर कमरे में अंकिता के साथ दुष्कर्म हुआ था, पुलकित ने भी उसके साथ गलत हरकते की। ये लोग उसका यौन शोषण कर रहे थे, बाद में उसे वीआईपी को सौंपने की भी प्लानिंग कर रहे थे।

क्या ये है सरकार का न्याय-

अब जब हत्याकांड को एक साल हो गया है तो मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अंकिता भंडारी के नाम पर डोभ श्रीकोट स्थित राजकीय नर्सिंग कॉलेज का नाम रखने की घोषणा कर दी, लेकिन आरोपियों को अभी तक सजा नहीं हुई।

 

अभी कुछ दिन पहले ही उत्तराखंड में एक सूचना सामने आयी है कि किस तरह बीजेपी की डबल इंजन की सरकार में 2021 से 2023 तक 38 सौ  से अधिक महिलाएं गायब हो गयी है, क्या इस तरह  मोदी सरकार के धाकड़ मुख़्यमंत्री बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ का नारा सफल बनाएंगे,ऐसे हालातों को देख तो लगता है कि जब बेटी बचेगी ही नहीं तो पढ़ने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता.

पूरे प्रदेश में आक्रोश- 

अंकिता भंडारी हत्याकांड से पुरे प्रदेश के लोगों में रोष व्याप्त है,पहाड़ की इस बेटी से यहां के सभी लोगों की भावनाएं जुड़ी हुई हैं,लोगों का गुस्सा सड़कों पर भी फूटता दिखाई देता है, लोग सरकार की मंशा पर ही सवाल उठा रहे हैं, विपक्ष भी लगातार इस मुद्दे पर सरकार को घेरता आ रहा है,लेकिन भाजपा उन पर राजनीति करने का आरोप जरूर लगाती है.

2024 में भाजपा के लिए बड़ी दिक्कत-

लेकिन ये तय है कि जितनी देर अंकिता को न्याय मिलने में हो रही है,उससे सरकार की छवि को धीरे धीरे नुकसान हो रहा है,क्योकि जब हत्याकांड सामने आया था तब भी किसी भाजपा नेता ने इस पर खुल कर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, जिससे जनता में पहले ही एक मेसेज जा चुका है,,,अभी भी अंकिता को न्याय न मिलना 2024 में भाजपा के सामने एक बड़ा मुद्दा बनकर उठेगा,,,जो कम से कम भाजपा के सबसे मजबूत गढ़ माने जाने वाली पौड़ी लोकसभा सीट पर बड़ा असर डालेगा,क्योकि अंकिता इसी सीट से आती है,जहां के लोग इस घटना से आज भी बेहद आक्रोशित हैं.

उत्तराखंड में लापता हुई 3854 महिलाएं और 1134 लड़कियां, RTI का बड़ा खुलासा…

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  • देवभूमि में महिलाएँ के अपराध के बढ़ते मामले.
  • महिलाओं के गुमशुदगी के बढ़ते आंकड़ों पर सवाल.
  • 2021 से 2023 तक 3854 महिलाओं की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज.
  • RTI ने किया बड़ा खुलासा.
  • आखिर कहाँ गायब हो रही हैं इतनी महिलाएँ ? 
महिलाओं की गुमशुदगी को लेकर RTI का बड़ा खुलासा-

देवभूमि उत्तराखंड को शांत औऱ अपराध मुक्त प्रदेश के रूप में माना जाता है, लेकिन अब उत्तराखंड को मानो किसी की नजर लग गयी है, सवाल उठने लगे हैं कि क्या उत्तराखंड अब महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं रह गया है,ऐसा हम नहीं कुछ चिंताजनक आंकड़े बता रहा रहे हैं, पुलिस मुख्यालय से मिली जानकारी में कुछ ऐसे आंकड़े महिलाओं और बेटियों के गायब होने के सामने आए हैं जो आपके होश उड़ा सकती है, ये आंकड़े प्रदेश में कानून व्यवस्था से लेकर बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ के नारे पर भी सवाल उठाती है।


2021 से 2023 तक महिलाओं की गुमशुदगी के आंकड़े-

देश के अलग-अलग राज्यों में महिलाओं के खिलाफ अपराध की खबरें आती रहती हैं। इसी तरह उत्तराखंड में लम्बे समय से महिलाओं के लापता होने की घटनाओं के बीच सनसनीखेज खुलासा हुआ है।ये जानकारी एक RTI के जवाब में  काशीपुर निवासी नदीम उद्दीन को पुलिस मुख्यालय द्वारा उपलब्ध कराई गयी है कि जनवरी 2021 से मई, 2023 के बीच मात्र 29 महीने में 3854 महिलायें और 1134 लड़कियां लापता हो गईं। ला महिलाओं और लड़कियों की गुमशुदगी पुलिस विभाग में पंजीकृत हुई है। इन मामलों में पुलिस और स्थानीय जनता की सक्रियता से इनमें से 2961 महिला तथा 1042 लड़कियां बरामद भी की जा चुकी हैं।

RTI का बड़ा खुलासा- 

पुलिस मुख्यालय द्वारा आरटीआई एक्टिविस्ट नदीम उद्दीन को उपलब्ध कराई सूचना के अनुसार, राज्य के 13 जिलों तथा रेलवे सुरक्षा पुलिस (जी.आर.पी.) के अंतर्गत, जनवरी 2021 से मई 2023 तक कुल 3854 महिलाएं गुमशुदा दर्ज की गई है। इनमें 2021 में 1494, वर्ष 2022 में 1632 तथा वर्ष 2023 में मई तक 728 महिलाएं शामिल हैं। इसी अवधि में कुल 1132 लड़कियां गुमशुदा दर्ज हुई हैं। जिसमें 2021 में 404, साल 2022 में 425 और 2023 में मई तक 305 लड़कियां शामिल हैं।

5 महीने में 414 मामले-

बीते पांच महीनों में राज्य के विभिन्न थानों में 305 बालिकाओं के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज हुई। वहीं इस अवधि में 109 किशोरों के लापता होने की शिकायतें भी आई हैं। 

RTI में मिली जानकारी के अनुसार वर्ष 2023 के जनवरी से मई माह के बीच लापता 300 से अधिक बालिकाओं में से 59 का अब तक पता नहीं चल पाया है। सभी की उम्र 18 वर्ष से कम है। बेटियां कहां और किस हाल में हैं, यह सोचकर परिजन परेशान हैं।

इन जिलों में इतने मामले-

हरिद्वार जिले से सबसे ज्यादा 95 और देहरादून से 80 बालिकाएं लापता हुई हैं। वहीं कुमाऊं की बात करें तो ऊधमसिंह नगर से 49 और नैनीताल से 17 नाबालिग बेटियां लापता हुई हैं। पहाड़ों में पिथौरागढ़ से सबसे अधिक 15 बेटियां लापता हैं।

सबसे ज्यादा गुमशुदगी के मामले इस जिले में- 

राज्य में सबसे ज्यादा किशोर भी हरिद्वार जिले से लापता हो रहे हैं। बीते पांच माह में हरिद्वार से 47 किशोर लापता हुए हैं। देहरादून से 16 और ऊधमसिंह नगर से 11 किशोर लापता हुए। कुल लापता हुए 109 किशोरों में से 94 को पुलिस ने बरामद कर लिया है। 

 
क़ानून व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती-

इन आंकड़ों से ये भी सवाल उठते हैं क्या देवभूमि में महिलाओं की गुमशुदगी के पीछे कोई सोची समझी साजिश तो नहीं, इतनी बड़ी संख्या तो कुछ इसी तरफ इशारा करती है, कानून व्यवस्था के लिए भी ये एक चुनौती है कि इस तरह महिलाओं और बेटियों के गायब होने के पीछे आखिर क्या राज छिपा है, राज्य सरकार पर भी इस पर सवाल उठते हैं। ये सवाल और भी गहरा जाते हैं जब ग्रह मंत्रालय का प्रभार भी प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के अधीन है 

ऐसे में पहाड़ से महिलाओं, बेटियों और बच्चों के गायब होने की घटना चिंता जाहिर करती है. खासकर तब जब मात्र ढाई  वर्ष के अंतराल में हज़ारों की संख्या में बेटियां गायब होने लगें 

मणिपुर की आग से 24 तबाह, दक्षिण में ढहता भाजपा का किला…   

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मणिपुर हिंसा का भाजपा की दक्षिण की राजनीति पर असर दिखना शुरू हो गया है, वो लोग, जिन्हें उनके समुदाय के नेताओं के ये कहने से कोई आपत्ति नहीं थी कि बीजेपी से अल्पसंख्यकों को कोई दिक्कत नहीं है, उनके  सुर भी अब पूरी तरह से बदलते हुए दिखाई देते हैं,  पिछले कुछ हफ्तों से इस समुदाय के लोग मणिपुर में हो रहे हमलों, हत्याओं और चर्चों को जलाए जाने के खिलाफ धरना प्रदर्शन कर रहे हैं जिनमें से कुछ प्रदर्शन ऐसे हैं जिनकी अगुवाई खुद वहां के पादरियों ने की है और लगातार कर भी रहे हैं. राज्य में चर्चों का प्रशासन देखने वाली संस्था केरल कैथोलिक बिशप काउंसिल (केसीबीसी) ने तो यहां तक कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इतने समय तक क्यों चुप्पी साधे रखी,, कुल मिलाकर केरल में जो समुदाय भाजपा के साथ दिखाई देता था अब वो उनसे दूरी बनाने लगा है। केरल ही नहीं, अब के हालात में मणिपुर में रहने वाले अधिकतर नागरिक जो या तो कुकी समुदाय से हैं या फिर मैतई से, कहीं न कहीं ये दूरी उनके मन में भी होगी, ऐसा वहां के हालात को देखकर महसूस किया जा सकता है

 

मणिपुर मामले जब फिर कुछ नहीं बोले PM-  
 
100 दिन से अधिक समय तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार 36 सेकंड और दूसरी बार तकरीबन 3 मिनट से कम समय ही निकाला है मणिपुर के मुद्दे पर बोलने के लिए, ये माना जा रहा था की संसद में अविश्वास प्रस्ताव के दौरान जब  प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी बोलेंगे तो न केवल मणिपुर के लिए ज्यादा से ज्यादा केंद्रित होकर अपना भाषण देंगे बल्कि उम्मीद ये भी की जा रही थी कि तुरंत कोई बड़ा कदम उठाकर मणिपुर की जनता के जख्मों पर मरहम भी रखेंगे, पर न तो वहां हुई मौत के आंकड़ों पर और न ही नग्न अवस्था में परेड करवाई गयी महिलाओं के प्रति कोई गंभीर संवेदना दिखाई दी. अपने भाषण के दौरान उन्होंने ये जरुर कहा की अमित भाई यानी देश के गृहमंत्री अमित शाह इस मुद्दे पर सब कुछ पहले ही बोल चुके हैं
 2024 चुनाव में डाल सकता है असर- 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लगभग पूरा भाषण हंसी-ठट्टे, कांग्रेस को कोसने, विपक्षी दलों की असफलता, इंडिया को घमंडिया कहने में ही गुजर गया. सत्ता पक्ष का ये रवैया 2024 के लोकसभा चुनाव में खासा असर डाल सकता है. खासकर पूर्वोत्तर राज्यों में जहां पर अल्पसंख्यकों की यानी ईसाइयों की संख्या थोड़ी ज्यादा है.  गौरतलब है की इन अल्पसंख्यकों के वोट बैंक पर बहुत पहले से भाजपा की नजर रही है, और इस वोट बैंक को हासिल करने में पूर्व में भाजपा कामयाब भी हुई है, मगर हालात अब थोड़े जुदा हैं. याद कीजिए जब एक वक्त ऐसा भी था की प्रधानमंत्री ने पूर्वोत्तर के तीन राज्यों पर जीत के बाद अपनी सरकार बनाने के बाद कहा था, पूर्वोत्तर न दिल्ली से दूर है ना मेरे दिल से… पर 100 दिन से भी अधिक समय तक मणिपुर से दूरी बनाना ये संकेत जरुर देता है की दिल और दिल्ली दोनो से कम से कम मणिपुर से तो दूर ही है ।   


क्या कहती है BBC की रिपोर्ट- 

बीबीसी की एक  रिपोर्ट के अनुसार केरल के लोगों का कहना है कि “मणिपुर के लोग इसी भारत के सम्मानित नागरिक हैं. उनके घर जला दिए गए हैं और अब दिखाने के लिए उनके पास कोई रिकॉर्ड भी नहीं बचा है हालात ये हैं कि वो भारतीय हैं. ये साबित करना भी अब उनके लिए मुश्किल हो सकता है, आखिर वो अपनी पहचान कैसे साबित करेंगे बिना कागजों के, अपनी ही ज़मीन पर बाहरी होते ये लोग दोनो तरफ से हैं चाहे फिर वो कुकी समुदाय हो या फिर मैतई… ”राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ईसाई समुदाय में कांग्रेस नीत यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट  के मजबूत आधार में सेंध लगाने के लिए बीजेपी के मेलजोल कार्यक्रम को केरल में ‘तगड़ा झटका’ लगा है.आपको बता दें कि राज्य में अल्पसंख्यकों की आबादी लगभग 46% है, जिसमें 26.56% मुसलमान और 18.38% ईसाई हैं

एक ऐसा भी समय रहा है, जब सीपीएम नीत लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ़) इन दोनों समुदायों से वोट हासिल करने में सफल रहा. लेकिन आम तौर पर अल्पसंख्यकों का वोट यूडीएफ के साथ ही रहा है. बीजेपी इसी में सेंध लगाने की कोशिश में थी, जिसमे वो काफी हद तक कामयाब होती भी दिखाई दे रही थी,लेकिन मणिपुर की हिंसा ने इन कोशिशों पर मानो पानी फेर दिया है।


क्या कहते हैं राजनीतिक विश्लेषक- 

राजनीतिक विश्लेषक एमजी राधाकृष्णन के अनुसार, “मणिपुर निश्चित रूप से बीजेपी के लिए एक झटका है, जो कि ईसाई वोटरों को रिझाने की कोशिश करती रही है. पिछले कुछ समय से वे इस ओर अच्छी खासी सफलता भी हासिल करती दिखाई दे रही थी. ”एमजी राधाकृष्णन कहते हैं, “अभी पिछले ईस्टर में ही कार्डिनल जॉर्ज एलेनचेरी ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि बीजेपी बहुत अच्छी है और अल्पसंख्यकों को इस पार्टी से कोई दिक्कत नहीं है. इससे पहले एक और बिशप ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि अगर केंद्र सरकार रबर की सही कीमत दिलाए तो केरल से एक बीजेपी सांसद भेजा जा सकता है


2024 चुनाव में बीजेपी को लग सकता है झटका-

पूर्वोत्तर राज्यों में अल्पसंख्यक वोट कितने महत्वपूर्ण हैं उसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ईसाई समुदाय को अपनी तरफ लाने के अभियान की बागडोर खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने हाथ में ले रखी थी. चाहे वो पोप फ़्रांसिस को भारत आमंत्रित करना हो या मलंकारा चर्च में 400 साल पुराने विवाद को हल करने की कोशिश हो या इसी साल अप्रैल में केरल में आठ प्रमुख चर्चों के प्रमुखों के साथ डिनर हो.  इसी डिनर में भारत के सबसे बड़े सायरो मालाबार चर्च के प्रमुख कार्डिनल एलेनचेरी ने प्रधानमंत्री की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी. इसके बाद ही एक के बाद एक बिशप ने विवादास्पद बयान दिए थे. एक बिशप ने ईसाइयों को ‘नार्को टेररिज़्म’ के भ्रम में फंसने को लेकर चेताया था जबकि दूसरे ने लव जिहाद को लेकर सावधानी बरतने की बात कही थी.लेकिन लगता है मणिपुर हिंसा ने इन सब कोशिशों पर एक झटके में पानी फेर दिया है।


मणिपुर की घटना से बीजेपी को झटका- 

एमजी राधाकृष्णन ने कहा कि समुदाय में बीजेपी समर्थक रवैया दिखाई देता रहा है. समुदाय के ख़ासकर संपन्न लोगों में सोशल मीडिया पर इस्लामोफोबिया अभियान चल रहा है और समाज में बीजेपी के प्रति नरम रुख साफ़ दिखता है.. वो कहते हैं, “कुल मिलाकर बीजेपी बहुत आरामदायक स्थिति में थी. लेकिन अब मणिपुर की घटना ने उन्हें झटका दिया है, चर्च सत्तारूढ़ पार्टी के ख़िलाफ़ खुलकर सामने आ गए हैं.और अब  इस रिश्ते में अब बड़ी बाधा खड़ी हो गई है.”  राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि “इस हालात में ईसाई समुदाय में बीजेपी का प्रचार ठप पड़ सकता है क्योंकि ईसाई नेतृत्व सार्वजनिक रूप से बीजेपी का समर्थन करने का बहाना नहीं ढूंढ पाएंगे.”“मणिपुर की घटनाओं से अब एक जटिल स्थिति पैदा हो गई है. एक छोटा समूह था जो बीजेपी की ओर झुकाव रख रखा था. अब उन्हें फिर से अपना मन बनाना पड़ेगा कि वो बीजेपी के साथ हैं या नहीं

क्या कहते हैं लेखक राधाकृष्णन-

लेखक और एकेडमिक केएस राधाकृष्णन कहते हैं कि “ईसाई समुदाय के पास किसी भी संगठन या विचारधारा के साथ स्थायी राजनीतिक वफादारी नहीं है. वे अपने हित देखते हैं. अगर वे सोचते हैं कि बीजेपी उनका शुभचिंतक है तो वे उसका समर्थन कर देंगे. अगर ये उनके लिए फायदेमंद होगा तो वो बीजेपी के साथ चले जाएंगे.” उनके मुताबिक, “ईसाई समुदाय कांग्रेस और एलडीएफ दोनों का समर्थन कर चुका है. इन सबके बीच कांग्रेस परिस्थितियों पर बारीक नज़र बनाए हुए है. एर्नाकुलम से कांग्रेस के सांसद हिबी इडेन ने कहा, “मणिपुर के बाद, बीजेपी का समर्थन करने वाले कुछ ईसाई नेता समझ गए कि उस पार्टी का अल्पसंख्यकों के प्रति यही बुनियादी बर्ताव है.”

एमजी राधाकृष्णन का कहना है कि ईसाई समुदाय में बीजेपी समर्थक कूटनीतिक रूप से कम मुखर रहेंगे. जब मणिपुर मुद्दा खत्म हो जाएगा, वे बीजेपी के साथ जाने का कोई और बहाना ढूंढ लेंगे. लेकिन 2024 के लिए तो ये मुश्किल होगा क्योंकि अब बहुत समय बचा नहीं है. इसलिए सार्वजनिक रूप से वो कोई पक्ष नहीं लेंगे.  फ़ादर जैकब पालाकाप्पिल्ली कहते हैं, “मणिपुर के हालात के बारे में हम बहुत दुखी और सदमे में हैं. प्रधानमंत्री ने पीड़ितों को ढांढस तक नहीं बंधाया. शांति के लिए हम किस से कहेंगे


पूरे देश में मणिपुर हिंसा का असर- 

ये वो तमाम घटनाक्रम और बयान है जो बताते हैं कि मणिपुर में हिंसा का असर अब राजनीतिक रूप से भी दिखना शुरू हो गया है,  और साथ ही  2024 में बीजेपी को यहां झटका लग सकता है। भाजपा दक्षिणी राज्यों में अपना आधार पहले ही खोती दिखाई दे रही है. और मणिपुर की घटना से पूर्वोत्तर में भी वोट बैंक पर असर पड़ना तय माना जा रहा है.सिर्फ दक्षिण ही नहीं बल्कि देश के कई ऐसे राज्य जहां पर अल्पसंख्यक बहुतायत में हैं याद रहे ये अल्पसंख्यक कहने से मतलब सिर्फ मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र ही नहीं बल्कि अन्य अल्पसंख्यक समुदाय पर भी असर पड़ना तय माना जा रहा है.. क्योकिं मणिपुर हिंसा से सरकार की छवि न केवल आसपास के राज्यों में खराब हुई है बल्कि पूरे देश मे इसका असर पड़ा है, जैसे केरल में ये असर देखने को मिल रहा रहा है. मोदी सरकार से पहले ही किसान, बेरोजगार, महंगाई से त्रस्त लोग नाराज हैं

 

हत्या, बलात्कार, सजा और फिर रिहाई, अब कोर्ट में फिर सुनवाई…

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पिछले  साल स्वतंत्रता दिवस के भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत के लोगों से महिलाओं के प्रति अपना रवैया बदलने की गुज़ारिश की. उन्होंने कहा था कि महिला सशक्तिकरण के लिए महिलाओं को इज्जत देना बहुत ज़रूरी है. उन्होंने कहा था कि , “नारी का गौरव राष्ट्र के सपने पूरे करने में बहुत बड़ी पूंजी बनने वाला है. पीएम मोदी के इस बयान की बहुत तारीफ की गई और महिला अधिकारों के लिए इसे एक ठोस बयान बताया गया. लेकिन इस बयान के कुछ ही देर बाद, उसी दिन बिलकिस बानो गैंगरेप मामले के 11 दोषियों को गुजरात सरकार की एक कमेटी ने गोधरा जेल से रिहा कर दिया. साल 2002 में गोधरा ट्रेन जलाए जाने के बाद ये केस काफ़ी चर्चा में था.

 

क्या था बिलकिस बानो केस-

2002 के गुजरात  दंगों के दौरान बिलकिस बानो के साथ गैंगरेप करने और उनके परिवार के सात सदस्यों की हत्या करने के लिए 11 दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी. लेकिन गुजरात सरकार ने बीते साल 15 अगस्त को उन्हें रिहा कर दिया था. 27 फरवरी 2002 को भीड़ ने बिलकिस बानो और उनके परिवार पर तब हमला किया था जब वो भाग रहे थे. उन्होंने बिलकिस का गैंगरेप किया और उनकी तीन साल की बेटी समेत परिवार के 14 लोगों की हत्या कर दी थी ,, उस वक्त राज्य में बीजेपी की सरकार थी, अभी भी बीजेपी सत्ता में है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तब गुजरात के मुख्यमंत्री थे. विपक्षी पार्टियों ने दोषियों की रिहाई को लेकर सरकार की काफ़ी आलोचना की थी, लेकिन बीजेपी ने इस पर  कुछ नहीं कहा, न गुजरात में और न ही केंद्र में।

 

11 दोषियों को किया गया था रिहा-

उम्रकैद की सजा काट रहे 11 दोषियों को छोड़ने के गुजरात सरकार के फैसले की देशभर में आलोचना हुई थी .सज़ायाफ्ता दोषियों के जेल से बाहर आने के बाद माला और मिठाइयों से उनके स्वागत के वीडियो वायरल हुए थे , जिसके बाद कानूनी, सामाजिक और राजनीतिक दृष्टिकोण से भी इस फैसले की व्यापक रूप से निंदा आज भी की जा रही है. सालों तक न्याय के लिए संघर्ष करने वाली बिलकिस गुजरात दंगों में अल्पसंख्यकों और महिलाओं के साथ होने वाले अत्याचारों का चेहरा बन गई थीं। 

 

दोषियों को रिहा कर दिया गया था- 

जब आनंदीबेन पटेल 2014 में गुजरात की मुख्यमंत्री थीं तो उन्होंने महिलाओं से जुड़े किसी भी अपराध में रियायत नहीं देने का फ़ैसला किया था. उसके बाद ऐसे अपराधों में दोषी पाए गए वो लोग जो 20 साल से अधिक जेल में बिता चुके थे, उन्हें नहीं छोड़ा गया. लेकिन बिलकिस बानो मामले में, 1992 और 2014 दोनों के सर्कुलर को नजरअंदाज करते हुए दोषियों को रिहा कर दिया गया. गुजरात की जेलों में आज महिला संबंधित अपराधों में लगभग 450 दोषी बंद हैं. उन सभी को रिहा किया जा सकता था. लेकिन ऐसा नहीं हुआ, सिर्फ़ इन 11 लोगों को छोड़ा गया। 

सुप्रीम कोर्ट की पीठ कर रही है मामले की सुनवाई-

बिलकिस बानो ने सीपीआई नेता सुभाषिनी अली, तृणमूल सांसद महुआ मोइत्रा के साथ मिल कर इस फ़ैसले को चुनौती दी थी, जिस पर सुप्रीम कोर्ट की पीठ अब सुनवाई कर रही है.. बिलकिस बानो ने कोर्ट को बताया कि इन दोषियों ने उनका कई बार बलात्कार किया और उनके पूरे परिवार की हत्या कर दी थी, इसलिए सज़ा से पहले रिहाई के गुजरात सरकार के फैसले को पलटा जाए.  बिलकिस बानो की वकील शोभा गुप्ता ने कहा, “घटना इतनी दर्दनाक थी कि बिलकिस आज भी पुरुषों का सामना करने से डरती हैं. भीड़ में या अजनबियों के आसपास नहीं रह सकतीं. वो अब तक उस ट्रॉमा से उबर नहीं पाए हैं. हमें लगा था कि न्याय मिल गया है, लेकिन फिर ये हो गया। 

सभी को कोर्ट के फैसले का इंतजार- 

बिलकिस की वकील ने कोर्ट से कहा, “अपराध की प्रकृति इतनी भयावह और क्रूर थी, गर्भवती होने पर बिलकिस के साथ गैंगरेप किया गया. बिलकिस की पहली बेटी को चट्टान पर पटक-पटक कर मार डाला गया. बिलकिस की माँ के साथ गैंगरेप किया गया और उनकी हत्या कर दी गई. चचेरी बहन के साथ भी गैंगरेप किया गया. याचिकाकर्ता के चार नाबालिग भाई-बहनों की हत्या कर दी गई थी.. ”शोभा गुप्ता ने कहा कि CRPC  की धारा 432 के तहत सीबीआई ने ट्रायल कोर्ट के जज से इस रिहाई पर उनकी राय पूछी थी. जज ने एक विस्तृत राय देते हुए कहा कि दोषी किसी भी उदारता या रिहाई के हकदार नहीं हैं. यहां तक कि सीबीआई ने ये भी कहा कि वे किसी भी तरह की नरमी के हकदार नहीं हैं. इसके बावजूद उन्हें रिहा किया गया.

अभी कोर्ट में इस मामले की सुनवाई चल रही है देखना होगा की कोर्ट इस पर क्या फैसला देती है ? लेकिन कुल मिलाकर इस मामले में एक बार फिर नया मोड़ आ गया है,, अगर कोर्ट दोबारा बिलकिस के पक्ष में फैसला सुनाती है तो गुजरात सरकार के उनके रिहाई देने के फैसले पर फिर कई सवाल उठने शुरू हो जायेंगे और कहीं न कहीं विपक्ष को एक बार फिर सरकार को घेरने का मुद्दा मिल जायेगा।

 

मणिपुर मामले में CJI ने सरकार से किए सख्त सवाल, कहा- 14 दिन तक पुलिस ने कुछ क्यों नहीं किया…

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मणिपुर में वायरल वीडियो में जिसमें दो महिलाओं का यौन उत्पीड़न हुआ था. और उन्हें निर्वस्त्र कर घुमाया गया था.  दो महिलाओं के साथ हुई उस दरिंदगी से देश को शर्मसार करने वाले मामले में सुप्रीम कोर्ट में आज यानी 31 जुलाई को सुनवाई हुई. जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कई सवाल किए।

CJI चंद्रचूड़ ने सरकार से पूछे कई सख्त सवाल- 

सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने सरकार से पूछा की 4 मई की घटना पर पुलिस ने 18 मई को जाकर FIR दर्ज की, आखिर 14 दिन तक पुलिस ने कुछ क्यों नहीं किया? वायरल वीडियों में महिलाओं को जब निर्वस्त्र कर घुमाया जा रहा था,, तब पुलिस कहां थी और कुछ क्यों नहीं कर पाई?

1 अगस्त को ही होगी मामले की अगली सुनवाई- CJI

डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा की यदि महिलाओं पर अपराध के 1000 मामले दर्ज होते हैं, तो क्या सभी जांच सीबीआई कर पाएगी ? साथ ही इस पर सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि जांच टीम में सीबीआई की एक जॉइंट डायरेक्टर रैंक की महिला अधिकारी को रखा जाएगा. इस पर वहीं, सरकार की ओर से पेश हुए अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमन ने कहा कि वो मंगलवार यानी, 1 अगस्त को हर केस पर तथ्यों के साथ जानकारी देंगे।

SC ने सभी FIR की जानकारी मांगी- 

 

CJI चंद्रचूड़ ने कहा की हमें जानना है कि 6000 FIR का वर्गीकरण क्या है, और इसमें कितने जीरो FIR है. कितनी अभी तक गिरफ्तारी हुई, और अभी तक क्या-क्या कार्रवाई हुई है, डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा की हम कल फिर सुनवाई करेंगे. क्योंकि परसों से अनुच्छेद 370 पर सुनवाई शुरु हो रही है. इसलिए इस मामले पर कल ही सुनवाई होगी.. वहीं सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर तुषार मेहता ने कहा, “कल सुबह तक FIR का वर्गीकरण उपलब्ध करवा पाना मुश्किल होगा।

CJI ने कहा कि पीड़ित महिलाओं की शिकायत कौन दर्ज करेगा. एक महिला जो राहत शिविर में रह रही है और अपने पिता या भाई की हत्या से डरी हुई है.  क्या ऐसा हो पाएगा कि न्यायिक प्रक्रिया उस तक पहुंच सके?”  चंद्रचूड़ ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने SIT के लिए भी नाम दिए हैं. आप इस पर भी जवाब दीजिए. अपनी तरफ से नाम का सुझाव दीजिए. या तो हम अपनी तरफ से कमिटी बनाएंगे, जिसमें पूर्व महिला जज भी होंगी।

 

CJI ने निर्भया कांड का भी किया जिक्र- 
सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि पीड़ितों के बयान हैं कि उन्हें पुलिस ने भीड़ को सौंपा था. ये निर्भया जैसी स्थिति नहीं है, जिसमें एक बलात्कार हुआ था, वो भी काफी भयावह था लेकिन इससे अलग था. यहां हम प्रणालीगत हिंसा से निपट रहे हैं, जिसे आईपीसी (IPC) एक अलग अपराध मानता है।

क्या कहा मैतेई समुदाय के वकील ने- 

वहीं, सीजेआई ने मैतेई समुदाय के वकील से कहा कि इस बात पर आश्वस्त रहें कि किसी भी समुदाय के प्रति हिंसा हुई हो, हम उसे गंभीरता से लेंगे यह सही है कि ज़्यादातर याचिकाकर्ता पक्ष कुकी समुदाय की तरफ से हैं. उनके वकील अपनी बात रख रहे हैं लेकिन हम पूरी तस्वीर देख रहे हैं. ” सीजेआई ने आगे कहा, “निश्चित रूप से मैतेई समुदाय के लोग भी पीड़ित होंगे. हिंसा दोतरफा होती है इसलिए भी हम एफआईआर के वर्गीकरण को देखना चाहते हैं. इस पर मैतेई समुदाय के एक वकील ने कहा, “वहां लोगों से हथियार जब्त किए जाने की जरूरत है. कोर्ट इस पर भी विचार करे।

सीजेआई ने मैतेई समुदाय के वकील की बात पर कहा, “हां, ये भी जरूरी है. इस बात पर भी पूरा ध्यान दिया जाएगा. उन्होंने कहा कि मामले की सुनवाई अब 1 अगस्त को दोपहर 2 बजे होगी।