भाजपा के खिलाफ एकजुट हुए विपक्षी दलों के गठबंधन इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इन्क्लूसिव अलायंस (इंडिया) की छह दिसंबर को होने वाली बैठक टल गई है। बताया गया है कि गठबंधन की कुछ पार्टियों के प्रमुख नेताओं के बैठक में न आ पाने के चलते बैठक को फिलहाल स्थगित करने का फैसला किया गया।
कांग्रेस के सूत्रों के मुताबिक, अब छह दिसंबर को शाम छह बजे इंडिया गठबंधन में शामिल पार्टियों के सांसदों की बैठक आयोजित की जाएगी। बाद में दिसंबर के तीसरे हफ्ते में मल्लिकार्जुन खरगे के आवास पर इस गठबंधन के प्रमुख नेताओं की औपचारिक समन्वय बैठक होगी।
गौरतलब है कि सपा नेता अखिलेश यादव और तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी ने पहले ही इंडिया की बैठक में जाने में असमर्थता जताई थी। इसके बाद तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और द्रमुक के नेता एमके स्टालिन ने चक्रवात के कारण पैदा हुए हालात के चलते बैठक में शामिल नहीं हो सकते थे। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अस्वस्थ हैं तथा पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के परिवार में वैवाहिक कार्यक्रम है। ऐसे में आगे की तिथि के लिए बैठक को स्थगित किया गया है।’’
यह बैठक ऐसे समय होने वाली थी जब मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के हालिया विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा है। कांग्रेस ने तेलंगाना में जीत दर्ज की है।
राजस्थान में चुनाव नतीजे आने के बाद सीएम पद को लेकर लगातार सस्पेंस बढ़ता जा रहा है आज वसुंधरा राजे के घर पर करीब 20 से ज्यादा BJP के विधायक पहुंच चुके हैं. ऐसे में चर्चा गरम है कि क्या वसुंधरा को हाईकमान से ग्रीन सिग्नल मिल गया है सीएम पद की ताजपोशी का या राजस्थान की इस पूर्व सीएम ने आग से खेलने की तैयारी कर ली है? क्योंकि बीजेपी में किसी भी नेता की इतनी हिम्मत नहीं है कि केंद्रीय नेतृत्व के बिना ग्रीन सिग्नल के अपने घर पर विधायकों को परेड कराने लगे. दूसरी ओर सीएम पद के एक और दावेदार माने जा रहे बालकनाथ दिल्ली पहुंच गए हैं. इस बीच सवाल यह उठ रहे हैं कि क्या वसुंधरा बीजेपी में सचिन पायलट की राह पर हैं? सचिन पायलट को लगता था कि उनके नेतृत्व में चुनाव लड़ा गया है और कांग्रेस की जीत के कारण वो ही हैं. हालांकि कभी भी उनको 20 से अधिक विधायकों का समर्थन खुलकर नहीं मिला.
जिस तरह वसुंधरा के घर विधायक पहुंच रहे हैं और प्रेस के सामने आकर वसुंधरा को सीएम बनाने की बात कर रहे हैं उसे देखकर कोई भी कह सकता है कि वसुंधरा राजे ने प्रेशर पॉलिटिक्स शुरू कर दी है. BJP के नवनिर्वाचित जहाजपुर से आने वाले विधायक गोपीचंद मीणा ने वसुंधरा राजे से मुलाकात की और कहा कि लोग वसुंधरा राजे को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं. ब्यावर से आने वाले विधायक सुरेश रावत भी वसुंधरा राजे से मिलने पहुंचे. उन्होंने कहा कि वसुंधरा ने पहले बहुत अच्छा काम किया है, लेकिन सीएम आलाकमान जिसे बनाए हम पार्टी के साथ हैं.इसके पहले बीजेपी विधायक बहादुर सिंह कोली जयपुर में वसुंधरा राजे के आवास में एंट्री करते हुए बोले थे कि वसुंधरा राजे को ही सीएम बनना चाहिए.हालांकि उन्होंने भी कहा कि वह पार्टी के फैसले के साथ हैं. हालांकि पार्टी के फैसले के समर्थन की बात तभी तक की जाती है जब तक उम्मीद रहती है कि आलाकमान हमारी बातें सुन रहा है.
चौंका सकता है बीजेपी हाईकमान का फैसला –
अगर वसुंधरा पार्टी पर प्रेशर बनाने के लेवल तक खुद को ले जाती हैं तो इसका अंजाम उनके पक्ष में जाएगा इसकी उम्मीद न के बराबर है.वर्तमान में राजस्थान की राजनीति में कांग्रेस भी इतनी ताकतवर नहीं है कि उसका सपोर्ट उन्हें मिल सके. अभी उनके घर पर कहा जा रहा है कि करीब 20 विधायक पहुंचे हुए हैं. यह सही है कि जिन विधायकों ने उनके घर पहुंचने की हिम्मत दिखाई है वास्तव में वसुंधरा के कट्टर समर्थक होंगे. हो सकता है कि एक दो विधायक और उनके पास हों. पर कांग्रेस के 69 एमएलए मिलकर भी उनका भला नहीं कर सकते. भारतीय जनता पार्टी की जो कार्यशैली है उससे तो यही लगता है कि कांग्रेस पार्टी के उन 69 विधायकों का भी भरोसा नहीं है कि वो कब तक अपनी पार्टी का दामन थामे रहेंगे.वसुंधरा के समर्थन की बात तो दूर की हो जाएगी.सचिन पायलट की तरह वो 20-22 विधायकों का साथ लेकर कभी भी क्रांति नहीं कर सकेंगी. बस पायलट की तरह असंतुष्ट बनकर राजनीति करनी होगी.
इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि वसुंधरा के पास राजस्थान में आज भी जबरदस्त जनसमर्थन है. उनकी रैलियों में जनता की भीड़ यह बताती थी कि राजस्थान के लोकल नेताओं में सबसे अधिक वो लोकप्रिय हैं. राजपूत की बेटी, जाटों की बहू और गुर्जरों की समधन की छवि के चलते उनकी पैठ हर वर्ग में रही है. यही कारण रहा कि बीजेपी आलाकमान ने उनको कमान तो नहीं दी पर उन्हें अलग-थलग भी नहीं होने दिया. हालांकि वसुंधरा इस बार के चुनावों में अपने होम डिस्ट्रिक्ट में ही कुछ नहीं कर पाईं. धौलपुर जिले की चारों सीटों में से एक भी बीजेपी नहीं जीत सकी है. इसी तरह वसुंधरा के कई खास लोग अभी अपना चुनाव नहीं जीत सके हैं. फिर भी अगर वसुंधरा प्रेशर बनाती हैं,,तो हो सकता है कि 2024 में होने वाले लोकसभा चुनावों तक पार्टी उन्हें राजस्थान की कमान सौंप दे. क्योंकि भारतीय जनता पार्टी का फोकस अभी पूरी तरह 2024 के लोकसभा चुनाव हैं. पार्टी नहीं चाहेगी कि जिस तरह अशोक गहलोत और सचिन पायलट की लड़ाई में राजस्थान में कांग्रेस का बंटाधार हो गया उसी तरह वसुंधरा राजे के चलते बीजेपी भी कमजोर हो.
राजस्थान विधानसभा चुनाव 2023 के परिणामों में कांग्रेस चारों खाने चित्त हो गई। प्रदेश की जनता ने राज बदल दिया, लेकिन रिवाज नहीं बदला। कांग्रेस की हार को लेकर सीएम अशोक गहलोत के ओएसडी लोकेश शर्मा का बड़ा बयान सामने आया है। उन्होंने हार का जिम्मेदार गहलोत को ही बता दिया। उन्होंने गहलोत पर फरेबी बताते हुए 25 सितंबर 2022 की घटना का जिक्र किया। उन्होंने कहा पूरी घटना प्रायोजित थी। आलाकमान के खिलाफ विद्रोह कर अवमानना की गई। उसी दिन से ये खेल शुरू हो गया था।
लोकेश शर्मा ने एक्स कर लिखा- लोकतंत्र में जनता ही माई-बाप है और जनादेश शिरोधार्य है, विनम्रता से स्वीकार है। मैं नतीजों से आहत जरूर हूं, लेकिन अचंभित नहीं। कांग्रेस राजस्थान में निःसंदेह रिवाज बदल सकती थी। लेकिन, अशोक गहलोत कभी कोई बदलाव नहीं चाहते थे। यह कांग्रेस की नहीं बल्कि अशोक गहलोत की शिकस्त है।गहलोत के चेहरे पर उनको फ्री हैंड देकर उनके नेतृत्व में पार्टी ने चुनाव लड़ा और उनके मुताबिक प्रत्येक सीट पर वे स्वयं चुनाव लड़ रहे थे। न उनका अनुभव चला, न जादू। हर बार की तरह कांग्रेस को उनकी योजनाओं के सहारे जीत नहीं मिली और न ही अथाह पिंक प्रचार काम आया। तीसरी बार लगातार सीएम रहते हुए गहलोत ने पार्टी को फिर हाशिये पर लाकर खड़ा कर दिया। आज तक पार्टी से सिर्फ लिया ही लिया है, लेकिन कभी अपने रहते पार्टी की सत्ता में वापसी नहीं करवा पाए गहलोत।
आलाकमान के साथ फरेब, ऊपर सही फीडबैक न पहुंचने देना, किसी को विकल्प तक न बनने देना, अपरिपक्व और अपने फायदे के लिए जुड़े लोगों से घिरे रहकर आत्ममुग्धता में लगातार गलत निर्णय और आपाधापी में फैसले लेते रहना, तमाम फीडबैक और सर्वे को दरकिनार कर अपनी मनमर्जी और अपने पसंदीदा प्रत्याशियों को उनकी स्पष्ट हार को देखते हुए भी टिकट दिलवाने की जिद हार का कारण रही। आज के ये नतीजे तय थे। मैं स्वयं मुख्यमंत्री को यह पहले बता चुका था, कई बार आगाह कर चुका था। लेकिन, उन्हें कोई ऐसी सलाह या ऐसा व्यक्ति अपने साथ नहीं चाहिए था जो सच बताए।
क्या कहा अशोक गहलोत के OSD ने-
एक टीवी चैनल को दिए अपने इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि मैं छः महीने लगातार घूम-घूम कर राजस्थान के कस्बों-गांव-ढाणी में गया, लोगों से मिला, हजारों युवाओं के साथ संवाद कार्यक्रम आयोजित किए। लगभग 127 विधानसभा क्षेत्रों को कवर करते हुए ग्राउंड रिपोर्ट सीएम को लाकर दी। जमीनी हकीकत को बिना लाग-लपेट सामने रखा। ताकि, समय पर सुधारात्मक कदम उठाते हुए फैसले किए जा सकें, जिससे पार्टी की वापसी सुनिश्चित हो।
मैंने खुद भी चुनाव लड़ने की इच्छा जाहिर की थी, पहले बीकानेर से फिर सीएम के कहने पर भीलवाड़ा से, जिस सीट को हम 20 साल से हार रहे थे। लेकिन, ये नया प्रयोग नहीं कर पाए। बीडी कल्ला के लिए मैंने 6 महीने पहले ही बता दिया था कि वे 20 हजार से ज्यादा मत से चुनाव हारेंगे और वही हुआ। अशोक गहलोत ने इस तरह फैसले लिए गए कि विकल्प तैयार ही नहीं हो पाए। 25 सितंबर की घटना भी पूरी तरह से प्रायोजित थी, जब आलाकमान के खिलाफ विद्रोह कर अवमानना की गई थी उसी दिन से खेल शुरू हो गया था।
क्या ये थी राजस्थान में कांग्रेस की हार की बड़ी वजह-
आपको बता दें कि राजस्थान विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को छोड़कर उनके 25 मंत्री चुनावी मैदान में उतरे थे। इनमें से 17 मंत्रियों को हार का सामना करना पड़ा। मंत्री प्रताप सिंह खाचरिया वास और बीडी कल्ला समेत कई बड़े चेहरों को जनता ने सिरे से खारिज कर दिया।मतलब जो गहलोत के osd कह रहे हैं वो सही साबित हुआ ,गहलोत हवा का रुख समझने में नाकाम साबित हुए. राजस्थान में कांग्रेस की हार की एक बड़ी वजह पार्टी की आपसी कलह रही. कई नेता नाराज हुए लेकिन गहलोत ने उन्हें सही तरीके से हैंडल नहीं किया. पार्टी के अंदर गुटबाजी और कई बागी नेताओं ने पार्टी का खेल बिगाड़ा. यहां तक कि कई नेताओं ने निर्दलीय चुनाव लड़ा तो कुछ को बीजेपी ने अपने पाले में कर लिया.
सचिन पायलट और अशोक गहलोत की लड़ाई तो पूरे देश में चर्चा का मुद्दा रही, दोनों नेता काम छोड़कर आपसी लड़ाई पर ज्यादा फोकस करते दिखे. सरकार बनते ही दोनों के बीच खींचतान शुरू हुई तो खत्म होने का नाम नहीं लिया. कई बार आलाकमान ने दोनों को मनाने की कोशिश की, यहां तक कि राहुल गांधी ने खुद चुनाव प्रचार के दौरान दोनों को एक साथ मंच पर लाकर ये संदेश देने की कोशिश की कि पार्टी में सबकुछ ठीक है, लेकिन दोनों के दिल नहीं मिले.राजस्थान में कांग्रेस की हार की वजह सीएम अशोक गहलोत का अहंकार भी रहा, उनका अति आत्म विश्वास और अहंकार उन्हें ले डूबा. गहलोत के साथियों ने उन पर अहंकारी होने का आरोप लगाया. खुद उनकी पार्टी के कई विधायकों ने अपनी बात न सुनने का आरोप लगाया, वहीं सचिन पायलट से उनकी लड़ाई तो पिछले साल सरकार बनने के बाद से ही चल रही है. कई बार मीडिया के सामने आकर गहलोत ने सचिन पायलट को निकम्मा और गद्दार तक कह दिया.
राजस्थान में भर्ती परीक्षाओं का पेपर लीक मामला गहलोत सरकार पर भारी पड़ा, बीजेपी ने चुनाव के दौरान इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस को खूब घेरा. पेपर लीक को लेकर गहलोत को युवाओं के गुस्से का शिकार होना पड़ा. पिछले पांच साल के गहलोत कार्यकाल में कई परीक्षाओं के पेपर लीक के मामले सामने आए, जिसको लेकर बीजेपी ने गहलोत पर एक्शन ना लेने का आरोप भी लगाया. ये मुद्दा गहलोत सरकार के लिए भारी पड़ा. कुल मिलाकर राजस्थान में गहलोत का रवैया राहुल गांधी की मेहनत पर पानी फेर गया.
भारत के पूर्वोत्तर राज्य मिजोरम में विधानसभा चुनाव के वोटों के गिनती जारी है। अब तक के नतीजों में जोराम पीपुल्स मूवमेंट (जेडपीएम) ने 25 सीटें जीतकर बहुमत हासिल कर लिया है। 40 सीटों वाले मिजोरम विधानसभा में बहुमत के लिए 21 सीटों की जरूरत थी। एक पूर्व आईपीएस अधिकारी, विधायक और पूर्व सांसद लालडुहोमा द्वारा स्थापित पार्टी जेडपीएम के मिजोरम में सत्ता के शिखर तक पहुंचने की कहानी बहुत दिलचस्प रही है। आइए जानते हैं इस पार्टी के बारे में सब कुछ।
कैसे हुआ जोरम पीपुल्स मूवमेंट का गठन?
जोरम पीपुल्स मूवमेंट का गठन छह क्षेत्रीय दलों के गठबंधन के रूप में किया गया था। यह छह क्षेत्रीय दल थे- मिजोरम पीपुल्स कॉन्फ्रेंस, जोरम नेशनलिस्ट पार्टी, जोरम एक्सोडस मूवमेंट, जोरम डिसेंट्रेलाइजेशन फ्रंट, जोरम रिफॉर्मेशन फ्रंट और मिजोरम पीपुल्स पार्टी। इन दलों ने आगे चलकर एक एकीकृत इकाई के रूप में विलय कर दिया, इसके बाद आधिकारिक तौर पर 2018 में जोरम पीपुल्स मूवमेंट यानी आज के जेडपीएम का गठन हुआ। हालांकि चुनाव आयोग में पंजीकृत होने के लिए जेडपीएम को और इंतजार करना पड़ा।
2018 के विधानसभा चुनावों में निर्दलीय लड़े जेडपीएम प्रत्याशी
2018 के मिजोरम विधान सभा चुनावों में जेडपीएम पहली बार मैदान में उतरा। पार्टी ने खुद को मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आईएनसी) के राजनीतिक विकल्प के रूप में पेश किया। पार्टी ने शराबबंदी की वकालत की। पार्टी ने 36 में से 40 सीटों पर चुनाव लड़ा। उस वक्त लालडुहोमा की गठित पार्टी को चुनाव आयोग से मान्यता नहीं मिल सकी थी, जिसके कारण उनके उम्मीदवारों को निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनावी मैदान में उतरना पड़ा था। निर्दलीय उम्मीदवारों के रूप में जेडपीएम ने 8 सीटों पर जीत हासिल की। यह अपेक्षाकृत नए ज़ोरम पीपुल्स मूवमेंट के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। चुनाव में लालडुहोमा ने तत्कालीन मुख्यमंत्री लालथनहलवा को करारी शिकस्त दी, जिसके बाद से वे राजनीतिक गलियारों में सुर्खियां बन गए।
2019 में जेडपीएम को चुनाव आयोग से मान्यता मिली
जेडपीएम का उद्देश्य मिजोरम के लोगों से जुड़े विभिन्न मुद्दों को उठाना था। इसका गठन सामाजिक चिंताओं और सामुदायिक कल्याण पर ध्यान देने के लिए एक गैर-राजनीतिक इकाई के रूप में किया गया था। भारत के चुनाव आयोग (ईसीआई) ने आधिकारिक तौर पर जुलाई 2019 में पार्टी को पंजीकृत किया। हालांकि इस खुशी खबर के बीच एक बुरी खबर भी आई। एक तरफ जेडपीएम को राजनीतिक पार्टी का दर्जा मिला दूसरी ओर इसकी सबसे बड़ी संस्थापक पार्टी, मिजोरम पीपुल्स कॉन्फ्रेंस, 2019 में ही गठबंधन से बाहर हो गई।
2023 के मिजोरम विधानसभा चुनाव में जेडपीएम को बहुमत
2023 के मिजोरम विधानसभा चुनावों में, जेडपीएम ने सभी 40 सीटों पर चुनाव लड़ा। सात नवंबर को हुए चुनाव में 80 प्रतिशत से अधिक मतदान हुआ। चार दिसंबर को शुरू हुए वोटों की गिनती में जेडपीएम ने मिनट तक 40 में से 25 सीटें जीतकर बहुमत हासिल कर ली है। ऐसे में प्रदेश में जेडपीएम की सरकार बननी और लालडुहोमा का मुख्यमंत्री बनना तय हो गया है।
कभी पीएम के सुरक्षा प्रभारी रहे हैं जेडपीएम के संस्थापक लालडुहोमा?
मिज़ोरम में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी जेडपीएम के अध्यक्ष लालडुहोमा मिज़ोरम के एक पूर्व आईपीएस अधिकारी हैं। एक स्थानीय रिपोर्ट के मुताबिक, 1972 से 1977 तक लालडुहोमा ने मिजोरम के मुख्यमंत्री के प्रधान सहायक के तौर पर काम किया था। अपनी स्नातक की पढ़ाई के बाद उन्होंने भारतीय सिविल सेवा परीक्षा दी। 1977 में आईपीएस बनने के बाद उन्होंने गोवा में एक स्क्वाड लीडर के तौर पर काम किया। तैनाती के दौरान उन्होंने तस्करों पर बड़ी कार्रवाई की। पुलिस अधिकारी के तौर पर उनकी उपलब्धियां सामाचार पत्रों की सुर्खियां बनने लगी थीं। 1982 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें अपना सुरक्षा प्रभारी नियुक्त किया था। पुलिस उपायुक्त के रूप में विशेष पदोन्नति दी गई थी। राजीव गांधी की अध्यक्षता में 1982 एशियाई खेलों की आयोजन समिति के सचिव भी थे।
कैसे हुई लालडुहोमा की राजनीति में ‘एंट्री’?
1984 में पुलिस सेवा से इस्तीफा देने के बाद वे कांग्रेस में शामिल हो गए थे। उसी वर्ष दिसंबर माह में लोकसभा चुनाव में जीत दर्ज कर लालडुहोमा संसद पहुंचे थे। 1988 में कांग्रेस की सदस्यता से इस्तीफा देने के बाद उन्हें दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्य घोषित किया गया था, जिसके कारण उन्हें लोकसभा की सदस्यता गंवानी पड़ी थी।
मध्यप्रदेश की सत्ता पर एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी काबिज होते दिखाई दे रही है। प्रदेश से शिवराज सिंह चौहान का विदाई का रास्ता देख रहे विरोधियों को भी करारा जवाब मिला है। चौहान एक बार फिर प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में वापसी कर रहे हैं। चुनाव में भले ही केंद्रीय नेतृत्व ने शिवराज को चेहरा न बनाया हो, बावजूद इसके शिवराज ही केंद्र में नजर आए। 230 विधानसभा सीटों में से 160 सीटों पर उन्होंने ताबड़तोड़ रैलियां और सभाएं कीं। शिवराज सिंह चौहान की लाड़ली बहन योजना चुनाव में गेम चेंजर साबित हुई। इस बंपर जीत के पीछे महिला वोटरों की भूमिका बेहद अहम मानी जा रही है। आइये जानते है किस तरह से शिवराज ने सत्ता विरोधी लहर को दूर किया और एमपी का मैदान अपने नाम कर लिया।
महिलाओं के लिए शिवराज ही लोकप्रिय-
शिवराज की वापसी में सबसे अहम रोल लाडली बहन योजना ने निभाया। इस योजना ने चौहान की राजनीतिक किस्मत बदल कर रख दी है। लाड़ली बहना योजना के तहत मध्यप्रदेश की 1.31 करोड़ महिलाओं को 1250 रुपये हर महीने दिए जा रहे हैं। एमपी की 7 करोड़ आबादी में लाडली बहना योजना की लाभार्थियों ने शिवराज को भर भर कर वोट दिया है। महिलाओं और लड़कियों के लिए शिवराज का नाम एक भरोसा था, इस पर उन्होंने यकीन किया। इस चुनाव में शिवराज ने न सिर्फ अपने इस स्कीम को प्रचारित किया बल्कि अपने पुराने रिकॉर्ड का भी हवाला दिया और अपने 18 साल के शासन की दुहाई दी। मध्यप्रदेश में भाजपा ने सीएम चेहरा किसी को घोषित नहीं किया था, लेकिन शिवराज सिंह चौहान चुनाव को लीड कर रहे थे। शिवराज बनाम कमलनाथ के बीच यह जंग मानी जा रही थी। ऐसे में शिवराज की लोकप्रियता कमलनाथ पर भारी पड़ी है। एग्जिट पोल सर्वे में भी शिवराज पहली पसंद बनकर उभरे हैं। इसी का भाजपा को चुनाव में फायदा मिला, महिलाओं के बीच शिवराज की अपनी एक लोकप्रियता है, जबकि कमलनाथ की उस तरह से पकड़ नहीं मानी जाती है।
मामा का इमोशनल कार्ड-
इस चुनाव में भाजपा ने मध्यप्रदेश में शिवराज को बतौर सीएम उम्मीदवार नहीं उतारा। चुनाव प्रचार के दौरान इस बात के कयास लगाये जा रहे हैं कि अगर एमपी में भाजपा जीतती भी है, तो शिवराज सीएम नहीं बनेंगे। इससे ये संदेश गया कि शिवराज की स्थिति कमजोर है। लेकिन इस मुद्दे पर शिवराज इमोशनल कार्ड खेल गए। शिवराज ने प्रचार के दौरान साफ साफ मतदाताओं-महिलाओं से पूछा कि क्या आप नहीं चाहते हैं कि आपका मामा, आपका भाई मुख्यमंत्री बने? शिवराज के इस सवाल पर वोटर्स ने भारी शोर के साथ उनके पक्ष में जवाब दिया। अब तो आंकड़े ये भी बता रहे हैं कि न सिर्फ मतदाताओं ने जवाब दिया, बल्कि शिवराज को भारी वोट भी दिया।
मध्यप्रदेश में 18 साल तक मुख्यमंत्री रहने वाले शिवराज वोटर के सामने खुद भी ब्रांड बन गए। इस दौरान उन्होंने एमपी को बीमारू राज्यों की कैटेगरी से बाहर निकला है। कई शहरों का कायाकल्प किया। लोगों ने काम करने के इस तरीके को पसंद किया, उन्हें ब्रांड शिवराज पर भरोसा नजर आया, इसलिए लोगों ने शिवराज को वोट दिया। यहां भाजपा का डायरेक्ट बेनीफिट ट्रांसफर का सिद्धांत शिवराज के काम आया। जब योजनाओं का फायदा सीधे जनता के हाथ में पहुंचता है, तो सरकार और सिस्टम पर उनका यकीन बढ़ जाता है। यही वजह रही कि जनता उन्हें बार – बार वोट दे रही है।
हिन्दुत्तव का ब्रांड और बुलडोजर फैक्टर-
मध्यप्रदेश में संघ और हिंदुत्व की जड़ें काफी गहरी हैं। यही वजह है कि खुद को सेकुलर बताने वाली कांग्रेस को भी एमपी में सॉफ्ट हिंदुत्व के सहारे चलना पड़ा। लेकिन मतदाताओं को जब चुनने की जरूरत हुई, तो उन्होंने भाजपा के ब्रांड वाले हिंदुत्व को चुना। शिवराज से लेकर अमित शाह और योगी आदित्यनाथ सहित भाजपा के तमाम दिग्गज नेताओं ने हिंदुत्व का एजेंडा सेट किया। यही वजह थी कि भाजपा ने इस बार एमपी में एक भी मुस्लिम को प्रत्याशी नहीं बनाया। सीएम योगी और अमित शाह अपनी हर एक रैली में अयोध्या में बन रहे राम मंदिर का जिक्र करते हुए नजर आए। इसके अलावा अयोध्या में राम मंदिर के दर्शन करने का न्योता भी लोगों को दिया।
भाजपा के लिए सियासी मुफीद साबित हुआ है। इसके अलावा शिवराज ने राज्य के चार मंदिरों- सलकनपुर में देवीलोक, ओरछा में रामलोक, सागर में रविदास स्मारक और चित्रकूट में दिव्य वनवासी लोक के विस्तार और स्थापना के लिए 358 करोड़ रुपये का बजट दिया है। शिवराज ने उत्तर प्रदेश की तरह अपने यहां भी बुलडोजर ब्रांड की राजनीति का जमकर इस्तेमाल किया।लेकिन शिवराज की एक परीक्षा अभी होनी बाकी है कि क्या शिवराज गद्दी पर भी काबिज हो पाएंगे,,, इस समय मध्य प्रदेश की गद्द्दी पाना शिवराज के लिए आसान हो पायेगा क्योकि जिस तरफ से शिवराज के चेहरे के बिना भाजपा चुनाव जीती है,,उससे ये आसान तो नहीं होने वाला क्योकि इस बार मुख़्यमंत्री के कई दावेदार हैं जिससे शिवराज की मुश्किलें बढ़ भी सकती हैं, अब देखना होगा कि शिवराज की इस जीत के बाद क्या पार्टी उनको फिर से सत्ता की चाबी देगी ? अगले कुछ दिन अब मुख़्यमंत्री पद को लेकर खींचतान तेज होती दिखाई देगी।
चाचा विधायक हैं हमारे, ये कहते हुए कई भतीजों को आपने सुना होगा, लेकिन राजस्थान विधानसभा चुनाव 2023 के सियासी मैदान में भतीजे और भतीजियों ने चाचा से मुकाबला किया। इसके अलावा पति-पत्नी, जीजा-साली, देवर-भाभी और भाई-भाई, पिता-पुत्री ने भी एक दूसरे को टक्कर दी। करीब 47 दिन चले इस सियासी गृहयुद्ध के परिणाम सामने आ रहे हैं।जिसमें एक बार फिर जनता मोदी के चेहरे पर मोहर लगाती दिखाई दे रही है,,, आइये हम आपको बताते हैं कि किन सीटों पर रिश्तेदार ही रिश्तेदारों को हराने जा रहे हैं.
इसमें पहली सीट है राजस्थान के दातारामगढ़ की सीट, जिसमे पति-पत्नी एक ही सीट पर लड़े, सीकर जिले की दातांरामगढ़ सीट पर कांग्रेस से मौजूदा विधायक वीरेंद्र सिंह चुनाव लड़े। वहीं, जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) से उनकी पत्नी डॉ. रीटा सिंह ने उन्हें टक्कर दी थी। वह जेजेपी की महिला मोर्चा की अध्यक्ष भी हैं। दूसरी सीट है अलवर ग्रामीण जहां बेटी ने पिता को ही चुनौती दी थी, अलवर जिले की इस सीट से भाजपा से जयराम जाटव चुनावी मैदान में उतरे थे। उनकी बेटी मीना कुमारी ने निर्दलीय चुनाव लड़ा। जयराम इस सीट से दो बार विधायक रह चुके हैं। तीसरी सीट आती है,धौलपुर,जहां साली और जीजा में मुकाबला चल रहा है,,धौलपुर जिले की इस सीट से कांग्रेस के टिकट पर शोभारानी कुशवाह ने चुनाव लड़ा।
शिवचरण कुशवाह भाजपा के टिकट पर मैदान में उतरे। ये दोनों रिश्ते में जीजा साली लगते हैं। चौथी सीट आती है भादरा जहां भतीजे चाचा को टक्कर देते दिखाई दे रहे हैं,,चूरू जिले की इस सीट पर भाजपा से संजीव बेनीवाल ने चुनाव लड़ा। वहीं, कांग्रेस से उनके भतीजे अजीत बेनीवाल मैदान में उतरे थे। संजीव भाजपा से दो बार विधायक रह चुके हैं।पांचवी सीट आती है खेतड़ी जहां चाचा या भतीजी कौन पड़ेगा भारी इस पर फैसला आने वाला है,,, झुंझुनू जिले की इस सीट पर भाजपा से धर्मपाल गुर्जर ने चुनाव लड़ा। कांग्रेस से मनीषा गुर्जर ने उन्हें टक्कर दी है । दोनों रिश्ते में चाचा और भतीजी लगते हैं। एक और सीट है नागौर जहां चाचा-भतीजी में कांटे की टक्कर चल रही है,,नागौर जिले की इस सीट पर मिर्धा परिवार के दो सदस्यों में मुकाबला हुआ था। पूर्व सांसद ज्योति मिर्धा ने भाजपा से चुनाव लड़ा। वहीं, उनके चाचा हरेंद्र मिर्धा कांग्रेस से चुनावी मैदान में थे। अब कुछ ही देर में ये भी साफ़ हो जायेगा कि कौन अपना किस अपने पर भारी पड़ता है.
Vidhan Sabha Election Results 2023: मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में मतगणना जारी है। अब तक के रुझानों में मध्य प्रदेश और राजस्थान में भाजपा ने बहुमत के आंकड़े को पार कर लिया है। छत्तीसगढ़ में भाजपा-कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर है और तेलंगाना में कांग्रेस भारी बहुमत के साथ जीतती दिख रही है।
मध्य प्रदेश, राजस्थान में भाजपा आगे-
चुनाव आयोग के सुबह साढ़े 11 बजे तक के आंकड़ों के अनुसार मध्य प्रदेश में भाजपा 156 सीटों पर आगे चल रही है। वहीं कांग्रेस 71 सीटों पर आगे है।
राजस्थान में भाजपा 116 सीटों पर आगे है। कांग्रेस 67 सीटों पर और बसपा 3 सीटों पर आगे है।
छत्तीसगढ़ में भाजपा 44 सीटों पर और कांग्रेस 41 सीटों पर आगे चल रही हैं।
तेलंगाना में कांग्रेस 61 सीटों पर और बीआरएस 36 सीटों पर आगे है। वहीं भाजपा 10 सीटों पर आगे चल रही है। वहीं एआईएमआईएम एक सीट पर आगे चल रही है।
MP Election Result Live: नरोत्तम मिश्रा पिछड़े, सीएम शिवराज आगे
चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, मध्य प्रदेश में राज्य के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा दो हजार वोटों से पिछड़ रहे हैं। वहीं सीएम शिवराज सिंह चौहान बड़े अंतर से अपने प्रतिद्वंदी से आगे चल रहे हैं। वहीं राजस्थान में सीएम अशोक गहलोत सरदारपुरा सीट से आठ हजार वोटों से आगे चल रहे हैं।
तेलंगाना विधानसभा चुनावों के लिए हर किसी ने जोर-शोर से प्रचार किया। इसी क्रम में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी पार्टी के लिए वोट जुटाने के लिए पूरी ताकत लगा दी। हालांकि, चुनावी अभियानों के दौरान आने वाली चुनौतियों को लेकर उन्होंने एक मजाकिया वाक्य साझा किया। केरल में एक कार्यक्रम के दौरान राहुल ने बताया कि कैसे एक रैली के दौरान उनके एक भाषण के अनुवादक को कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ा।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी यहां एक पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में पहुंचे थे, जहां आईयूएमएल सांसद अब्दुस्समद समदानी उनके भाषण का अनुवाद करने के लिए मौजूद थे। इस दौरान वायनाड के सांसद ने समदानी से मजाकिया लहजे में कहा कि उनका अनुवादक होना एक खतरनाक काम हो सकता है।
शब्दों को भी गिनना शुरू किया-
उन्होंने बताया कि किस तरह तेलंगाना में एक चुनावी रैली के दौरान अनुवादक बहुत परेशानी में पड़ गया। राहुल ने कहा, ‘मैं कुछ कह रहा था और वह (अनुवादक) कुछ और बोल रहे थे। फिर कुछ समय बाद, मैंने अपने शब्दों को गिनना शुरू कर दिया। जैसा आप जानते हैं कि वह तेलुगु में बोल रहे थे। इसलिए, मैंने सोचा कि अगर मैं हिंदी में पांच शब्द कहूंगा तो तेलुगु में पांच या सात शब्द लगेंगे। लेकिन वह 20, 25, 30 शब्द बोल रहे थे।’
उन्होंने कहा, ‘जब मैं कुछ उदास भरी बात कहता तो भीड़ उत्साहित हो जाती थी। फिर मैं कुछ दिलचस्प बात कहता तो भीड़ चुप हो जाती। मुझे समझ आ गया था कि जो मैं बोल रहा हूं, वो नहीं बताया जा रहा है, लेकिन मैं गुस्सा नहीं कर सकता था। इसलिए मुझे मुस्कराते रहना पड़ा।’
कांग्रेस नेता ने कहा, ‘हालांकि मुझे यकीन है कि मेरे सहयोगी समदानी को पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में मेरे भाषण का अनुवाद करते समय ऐसी कोई समस्या नहीं होगी।’
गौरतलब है, तेलंगाना विधानसभा चुनाव के लिए हाई-वोल्टेज प्रचार मंगलवार को समाप्त हो गया। चुनाव 30 नवंबर को होंगे।
चीन में फैल रही बीमारी को लेकर अलर्ट हुई कर्नाटक सरकार।
कर्नाटक सरकार ने अस्पतालों को अलर्ट मोड पर रखा।
चीन में फैलती नई बीमारी को लेकर अब कर्नाटक सरकार ने राज्य में एडवाइजरी जारी कर दी है। कर्नाटक सरकार के स्वास्थ्य विभाग ने चीन में बच्चों में सांस संबंधी बीमारियों में वृद्धि की खबरों के बाद पूरे राज्य में अपने स्वास्थ्य संबंधी बुनियादी ढांचे को अलर्ट पर रखा है।
सरकार ने दिए अस्पताल में तैयारियों की तत्काल समीक्षा के निर्देश
कर्नाटक सरकार ने यह फैसला केंद्र सरकार द्वारा जारी दिशा निर्देशों के बाद लिया है। केंद्र सरकार ने राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों को एडवाइजरी जारी की थी, जिसमें उनसे कहा गया था कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और अस्पताल की तैयारियों की तत्काल समीक्षा करें।
कर्नाटक सरकार ने जारी किए निर्देश
इसके अलावा कर्नाटक सरकार के स्वास्थ्य विभाग ने नागरिकों को मौसमी फ्लू वायरस से सावधान रहने के लिए एक सलाह जारी की है। एडवाइजरी में मौसमी फ्लू को लेकर चिंता जताई गई है। बता दें कि मौसमी फ्लू एक संक्रामक बीमारी है, जो आमतौर पर पांच से सात दिनों तक रहती है।
हालांकि, यह बीमारी शिशुओं, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और कमजोर इम्युनिटी वाले लोगों के लिए अधिक जोखिम पैदा करती है, जिन्हें इस बीमारी के कारण अस्पताल में भर्ती होने की आवश्यकता हो सकती है।
हालांकि, यह बीमारी शिशुओं, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और कमजोर इम्युनिटी वाले लोगों के लिए अधिक जोखिम पैदा करती है, जिन्हें इस बीमारी के कारण अस्पताल में भर्ती होने की आवश्यकता हो सकती है।
क्या है लक्षण?
दरअसल, इसके लक्षण बुखार, ठंड लगना, अस्वस्थता, भूख न लगना, उल्टी होना, छींक आना और सूखी खांसी शामिल हैं, जिसके लक्षण इंसान में करीब तीन सप्ताह तक रहते हैं।
कैसे करें बचाव?
एडवाइजरी में बताया गया है कि किसी भी तरह के संक्रमण से बचने के लिए क्या करना है और क्या नहीं करना है। एडवाइजरी के अनुसार, खांसते या छींकते समय मुंह और नाक को ढंकें, बार-बार हाथ धोएं, चेहरे को अनावश्यक छूने से बचें। साथ ही भीड़-भाड़ वाली जगहों पर फेस मास्क का उपयोग करें।
उत्तराखंड के उत्तरकाशी में सिल्क्यारा सुरंग से 17 दिन बाद निकाले गए मजदूरों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज फोन पर बात की। एक बचाए गए शख्स ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बताया कि 41 मजदूरों ने सुबह की सैर और योग का अभ्यास करके अपना उत्साह बनाए रखा।
वहीं, एक अन्य ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और बचाव टीमों की सराहना की। उनमें से एक ने कहा कि उन्हें चिंता करने की कोई बात नहीं है, क्योंकि जब सरकार विदेशों में भारतीयों को बचा सकती है, तो हम देश के भीतर ही थे।
मंगलवार देर रात बचाए गए मजदूरों के साथ अपनी फोन पर बातचीत में पीएम मोदी ने कहा कि इतने दिनों तक खतरे में रहने के बाद सुरक्षित बाहर आने पर मैं आपको बधाई देता हूं। यह मेरे लिए खुशी की बात है। मैं इसे शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकता। ईश्वर की कृपा है कि आप सभी सुरक्षित हैं।
प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा जारी बातचीत के एक वीडियो के अनुसार, मोदी ने बचाए गए लोगों से कहा कि 17 दिन का कम समय नहीं है। आप सभी ने बहुत साहस दिखाया और एक-दूसरे को प्रोत्साहित किया। पीएम मोदी ने कहा कि वह ऑपरेशन के बारे में जानकारी लेते रहते थे और लगातार मुख्यमंत्री के संपर्क में थे।
पीएम मोदी ने कहा कि मेरे पीएमओ के अधिकारी भी वहां बैठे थे। लेकिन सिर्फ सूचना मिलने से चिंता कम नहीं होती। इस दौरान बिहार के रहने वाले युवा इंजीनियरिंग कंपनी लिमिटेड के सबा अहमद ने प्रधानमंत्री को बताया कि वो कई दिनों तक सुरंग में फंसे रहे, लेकिन उन्हें कोई डर या घबराहट महसूस नहीं हुई।
‘जानिये श्रमिकों ने कैसे सुरंग के अंदर काटा समय’
सबा अहमद ने बताया कि हम भाइयों की तरह थे, हम एक साथ थे। हम रात के खाने के बाद सुरंग में टहलते थे। मैं उन्हें सुबह की सैर और योग करने के लिए कहता था। सबा अहमद ने पीएम को बताया कि जिस सुरंग में वे फंसे थे, उसके दो किमी से अधिक हिस्से में मजदूर सुबह की सैर करते थे और योग भी करते थे। हम उत्तराखंड सरकार, विशेष रूप से सीएम और मंत्री वीके सिंह को धन्यवाद देना चाहते हैं।
आप सभी ने हौसला बढ़ाया: गब्बर सिंह
इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी से उत्तराखंड के एक फोरमैन गब्बर सिंह नेगी ने बात की। पीएम मोदी ने कहा कि गब्बर सिंह मैं आपको विशेष रूप से बधाई देता हूं। मुझे मुख्यमंत्री धामी रोजाना बताते थे। आप दोनों लोगों ने अच्छी लीडरशिप दिखाई है। इस पर गब्बर सिंह ने प्रधानमंत्री मोदी से कहा कि आप सभी लोगों ने हौसला बढ़ाया। सीएम धामी लगातार हमारे संपर्क में बने रहते थे। इस दौरान गब्बर सिंह ने कहा कि कंपनी ने भी कहीं कोई कसर नहीं छोड़ी।
मोदी ने दोनों कार्यकर्ताओं के नेतृत्व और साहस की भी सराहना की। साथ ही पीएम मोदी ने भारत के सड़क परिवहन और राजमार्ग राज्य मंत्री जनरल (सेवानिवृत्त) वी के सिंह की भी सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने एक सैनिक के रूप में अपना प्रशिक्षण दिखाया है।