Category Archive : तकनीकी

चमोली जिले में पिछले तीन साल में भूधंसाव की घटनाएं बढ़ी, कर्णप्रयाग, ज्योतिर्मठ के बाद अब नंदानगर

151 Minutes Read -

चमोली जनपद में पिछले तीन साल में भूधंसाव की घटनाएं बढ़ी हैं। सबसे पहले कर्णप्रयाग के बहुगुणा नगर में भूधंसाव की घटना सामने आई। यह क्षेत्र घाटी में होने के बावजूद भूधंसाव हो रहा है। उसके बाद ज्योतिर्मठ के भूधंसाव ने सबको विचलित कर दिया था। यहां सैकड़ों मकान और होटल भूधंसाव की जद में आ गए थे।

Land Subsidence Incidents Increased In Chamoli In Last Three Years After Karnaprayag  Jyotirmath Now Nandanagar - Amar Ujala Hindi News Live - Uttarakhand:चमोली  जिले में पिछले तीन साल में भूधंसाव की घटनाएं

अब नंदानगर के भूधंसाव ने फिर से लोगों को चिंता में डाल दिया है। ज्योतिर्मठ की तरह ही नंदानगर में भी जमीन से पानी का रिसाव हो रहा है। यहां कई घरों से पानी निकलने के बाद लोगों ने मकान छोड़ दिए हैं। भूधंसाव भी लगातार बढ़ रहा है। चमोली जनपद आपदा की दृष्टि से अति संवेदनशील है। यहां बादल फटना, भूस्खलन, भूधंसाव, अतिवृष्टि की आपदाएं चमोलीवासी कई वर्षों से झेल रहे हैं।

Chamoli News Nandanagar Band Bazaar Hit By Landslide 25 Shops In Danger 34  Families Shifted - Amar Ujala Hindi News Live - Chamoli:भूधंसाव की चपेट में  आया नंदानगर का बैंड बाजार, खतरे

पिछले तीन वर्षों में भूधंसाव जैसी आपदा का नया पैटर्न देखने को मिल रहा है। नंदानगर के व्यापार संघ अध्यक्ष नंदन सिंह और कथावाचक शंभू प्रसाद पांडे का कहना है कि भूधंसाव का व्यापार रुप से वैज्ञानिक सर्वे होना चाहिए। नंदानगर क्षेत्र आपदा की दृष्टि से संवेदनशील है। यहां का वैज्ञानिक सर्वेक्षण के बाद यहां की बसावट के लिए योजना तैयार होनी चाहिए।

Chamoli News Nandanagar Band Bazaar Hit By Landslide 25 Shops In Danger 34  Families Shifted - Amar Ujala Hindi News Live - Chamoli:भूधंसाव की चपेट में  आया नंदानगर का बैंड बाजार, खतरे

नंदानगर में हो रहे भूधंसाव से प्रवासी लोग भी चिंतित हैं। वे लगातार अपने परिजनों, रिश्तेदारों और दोस्तों को फोन कर वहां की स्थिति के बारे में जानकारी ले रहे हैं। जो लोग नंदानगर में हैं, वे भी प्रभावित क्षेत्र को देखकर चिंतित हैं। रविवार को बैंड बाजार के अलावा संपूर्ण नंदानगर बाजार बंद रहा। नगर के व्यापारियों ने भी प्रभावितों की दुकानों को खाली करवाने में मदद की।

धराली (उत्तरकाशी) में भीषण तबाही — तथ्य, कारण और ग्राउंड-रिपोर्ट के क्या कहती हैं !

274 Minutes Read -

5–6 अगस्त 2025 को उत्तरकाशी के धाराली (Dharali / Kheer Gad / Harsil के पास) में अचानक हुई भयंकर जल-प्रलय / भूस्खलन-मंडी (flash flood / debris flow / mudslide) ने गांव के कई हिस्से और पर्यटन-व्यवसाय तहस-नहस कर दिए। कई मकान, होटल, दुकानें, एप्पल-ओरचार्ड और सड़क-इन्फ्रास्ट्रक्चर बह गए; दर्जनों लोग घायल या लापता हैं, कुछ की मृत्यु की पुष्टि हुई और बड़ी राहत-और-रेस्क्यू कार्रवाई चल रही है। स्थानीय और केंद्रीय बचाव दलों (आर्मी, NDRF, SDRF, ITBP) ने बचाव कार्य तेज कर दिए हैं और राज्य सरकार ने राहत घोषणाएँ कीं

 

क्या हुआ — ताज़ा तथ्य (फैक्ट्स)

  • घटना का समय और जगह: घटना 5 अगस्त 2025 की दोपहर के आसपास (लगभग 13:30–13:45 स्थानीय समय) खरग (Kheer / Kheer Gad) जल-जल और धाराली गांव के पास हुई।

  • प्रभावित लोग और क्षति: कई घर, होटेल/होमस्टे, दुकानें और बाग (विशेषकर एप्पल-बाग) भारी मलबे में दब गए; शुरुआती रिपोर्टों में कम-से-कम 4 मौतें और दर्जनों (कुछ रिपोर्टों में 40+ या 50+) लापता बताये गए हैं, जबकि सैकड़ों लोग प्रभावित या संतप्त हुए और कई अनेकों का बेघर होना रिपोर्ट हुआ। सरकार और प्रशासन ने कई लोगों को बचाया; आधिकारिक खोज-बचाव और बचाव संख्या समय-समय पर अपडेट हो रही है।

  • बचाव-प्रक्रिया: इंडियन आर्मी (Ibex ब्रिगेड), NDRF, SDRF, ITBP और स्थानीय पुलिस व स्वास्थ्य दल मौके पर हैं; भारी मशीनरी, हेली-लिफ्ट और मैनपावर से रेस्क्यू ऑपरेशन जारी है। राज्य सरकार ने प्रभावित परिवारों के लिए वित्तीय राहत घोषणाएँ की हैं (प्रारम्भिक पैकेज, ब्यौरे स्थानीय घोषणा पर निर्भर)

  • कारण — वैज्ञानिक और मानवीय तीसरे-आयाम

  • (A) तत्काल कारण — क्लाउडबर्स्ट / अचानक तेज वर्षा

    मीडिया और मौसम विभाग (IMD) की पड़ताल के अनुसार घटना की शुरुआत एक तीव्र-वर्षा (cloudburst) / अचानक अत्यधिक स्थानीय downpour से हुई, जिससे Kheer Gad में पानी की अचानक मात्रा बढ़ी और बहाव-ऊर्जा जमीनी मलबे के साथ नीचे उतरते हुए धावा-बोलकर गांव में प्रवेश कर गई। IMD व स्थानीय रिपोर्टों ने कुछ स्थानों पर अल्प-समय में असाधारण बारिश दर्ज़ की — क्लाउडबर्स्ट की परिभाषा से मेल खाती तीव्रता    
  • (B) जियो-हाइड्रोलॉजिक गठन — भू-खण्ड, ग्लेशियल लिंक, डिब्रिस-फ्लो

    वैज्ञानिक और उपग्रह-विश्लेषण (ISRO समेत) ने सुझाव दिया है कि यह केवल बारिश का साधारण प्ले नहीं था — इसमें ग्लेशियर-सम्बन्धी विस्फोट (GLOF), किसी चट्टान/हिमखंड के टूटने से उत्पन्न ढेर या पहले से जमा ढेर का अचानक खुलना, तथा मलबे-भरे फ्लो (debris flow) की भूमिका हो सकती है। ऐसे घटनाओं में पानी के साथ बड़े-बड़े पत्थर, मिट्टी और बढ़ा-चढ़ा मलबा झटके में बहुत दूर तक और तेज़ रफ्तार से आ जाता है। इस पर आगे की तकनीकी जांच जारी है।

  • (C) मानवीय/नियोजन कारण (anthropogenic factors)

    • बस्तियों का नदी-तट/फ़्लड-प्लेन पर बनना: विशेषज्ञों ने कहा कि धाराली और आसपास के कई निर्माण नदी की तरफ़/फ्लड-plain पर हुए हैं — जिनमें कई होटेल, होमस्टे और दुकानें भी शामिल हैं — जो जीवनदायिनी भू-अवसरो में बने हुए थे और रन-ऑफ के मार्ग में आ गए।

    • पर्यटन-बूम और अगणित निर्माण: पर्यटन के बढ़ते दबाव ने खड़ी ढलानों व नदी के किनारे अस्थायी व स्थायी संरचनाओं का निर्माण बढ़ा दिया, जिनमें पर्यावरण नियमों का उल्लंघन भी हो सकता है।

    • जलवायु परिवर्तन का योगदान: हिमालयी क्षेत्र में तापमान व वायुमंडलीय नमी के बदलाव से तीव्र वर्षा-इवेंट्स (extreme precipitation), ग्लेशियर अस्थिरता और अनपेक्षित डिब्रिस-फ्लो के जोखिम बढ़ रहे हैं — इसलिए केवल “एकल घटना” नहीं, बल्कि जोखिम बढ़ने का ढांचा दिखाई देता है।

      3) ग्राउंड-रिपोर्ट — पीड़ितों के अनुभव और स्थानीय हालात

      (नीचे के विवरण विभिन्न स्थानीय अखबारों, स्थानीय फार्म और तस्वीर-वीडियो रिपोर्ट्स और राहत-कर्मियों के बयानों पर आधारित हैं।)

      • स्थानीय किसानों और होस्टल-मालिकों का कहना है कि झट-पटक 30–60 सेकण्ड में मलबा और पानी ने जगह को तबाह कर दिया; कई लोगों ने बस समय रहते भागकर अपनी जान बचाई। कुछ पर्यटक और मजदूर ऐसे थे जो कुछ मिनट पहले ही सुरक्षित स्थान की तरफ़ चले गए और वे लोगों ने लंबी पैदल यात्रा कर कर-कर के बचाव-कहानियाँ सुनाईं।

      • कई छोटे व्यापारी और किसान बड़े आर्थिक घाटे में हैं — एप्पल-बाग, राजमा और सब्ज़ी की फसलों का बड़ा नुकसान बताया जा रहा है; स्थानीय हवाले से लाखों रुपये का प्रारम्भिक आंकलन आ चुका है।

      • मोबाइल नेटवर्क व सड़कों का टूटना बचाव को कठिन बना रहा है; कई इलाकों में भारी मशीनों और हेलीकॉप्टर-सहायता के जरिए ही लोग पहुँच रहे हैं।

        4) बचाव-कार्यों का आकलन और चुनौतियाँ

        • तत्काल-उपलब्धता: आर्मी-ब्रिगेड, NDRF, SDRF, ITBP और स्थानीय प्रशासन सक्रिय हैं — शुरुआती दिनों में 100+ लोगों के रेस्क्यू का दावा और लगातार सर्वे चल रहे हैं। पर मौसम की पुनरावृत्ति, भूस्खलन का जोखिम और सड़कों की क्षति बचाव को सीमित कर रहे हैं।

        • खोज-बचाव-तकनीक: मलबे के नीचे लोगों का पता लगाने के लिए कट्टर-मशीनरी, कुत्ते-टीम, थर्मल स्कैन जैसे साधन इस्तेमाल हो रहे हैं; पर कठिन भू-रचना में हर घंटा महत्वपूर्ण है।


        5) विस्तृत मूल्यांकन — यह घटना अकेली नहीं

        विशेषज्ञों का कहना है कि धाराली जैसी घटनाएँ हिमालय में बढ़ती जा रही अनुक्रमिक आपदाओं का हिस्सा हैं — जहां छोटे-छोटे घाटों, नदी-हेल्थ का बिगड़ना, अनियोजित बस्तियाँ और बढ़ती वर्षा के साथ जोखिमों में वृद्धि हो रही है। धाराली में दिख रहा पैटर्न — नदी-तट पर विकास + अचानक उथल-पुथल करने वाली बारिश/ग्लेशियर-इवेंट — पहले भी अन्य जगहों पर समान रूप से विनाशकारी रहा है। नीति-स्तर पर जमीन की मैपिंग, रिस्क-जोन निर्धारण और निर्माण नियंत्रण की व्यवस्था को मज़बूत करने की तत्काल ज़रूरत बताई जा रही है।

        6) क्या किया जाना चाहिए — नीतिगत और तकनीकी सुझाव

        1. तुरंत (short term): प्रभावितों को पारदर्शी आर्थिक सहायता, अस्थायी आवास, मनो-सामाजिक सहायता और कृषि पुनरुत्थान-पैकेज (बीज, लगातार इनकम सहायता) उपलब्ध कराना। राज्य के द्वारा घोषित सहायता पैकेज का फास्ट-ट्रैक क्रियान्वयन जरूरी है।

        2. मिड-टर्म: प्रभावित इलाकों की विज्ञान आधारित रि-ज़ोनिंग — खतरनाक फ्लड-प्लेन व चैनल-मार्गों पर पुनर्निर्माण प्रतिबंध और वैकल्पिक आजीविका/रिलोकेशन-पैकज। स्थानीय समुदायों के साथ सहमति से कम्पेन्सेशन और स्थायी पुनर्वास।

        3. लॉन्ग-टर्म (सिस्टमिक): हिमालयी जल-विज्ञान पर निगरानी (GIS/सैटेलाइट), ग्लेशियर/डिब्रिस-डैम पर रिसर्च, ग्रामीण और पर्यटन-निर्माण के लिए कठोर पर्यावरणीय नियम, तथा दक्षिणी-नैशनल डेटा-बेस जहाँ हर नया निर्माण की पर्यावरणीय स्वीकृति सार्वजनिक हो। ISRO जैसे संस्थानों के सैटेलाइट-डेटा से जोखिम मानचित्र नियमित अपडेट किए जाने चाहिए।

        4. अर्ली वार्निंग और कम्युनिटी-रिजिलिएन्स: स्थानीय-स्तर पर सतर्कता-सिस्टम (रबर-बेल/सार्वजनिक सायरन/वीएचएफ), बाढ़-रन-वे के बारे में नियमित जागरूकता, और पर्यटन/मकान मालिकों के लिए आपदा-तैयारी आवश्यक।


        7) राजनीतिक-प्रशासनिक जिम्मेदारी और पारदर्शिता

        घटना ने सवाल उठाये हैं कि क्यों संवेदनशील नदी-किनारे/फ्लड-प्लेन पर बिखरे निर्माणों पर पैनी निगरानी नहीं थी; स्थानीय नियमन, पर्यावरण स्वीकृति और पर्यटन-पॉलिसी में भ्रष्ट-लापरवाही के संकेत भी जाँच के विषय हैं। राहत और पुनर्वास में पारदर्शिता, कम्पेन्सेशन की तात्कालिकता और भूमि-रिहैबिलिटेशन योजनाओं में जनता की भागीदारी जरूरी होगी। विशेषज्ञों ने कहा है कि सिर्फ राहत बाँटना पर्याप्त नहीं — पुनरावृत्ति रोके जाने वाले कदम लेना अनिवार्य है।

        निष्कर्ष — धराली एक चेतावनी है

        धराली-आपदा केवल एक स्थानीय दुर्घटना नहीं है — यह हिमालयी इलाकों में बढ़ते खतरों, अनियोजित विकास, और बदलते मौसम पैटर्न का मिलाजुला नतीजा है। तत्काल राहत-कार्रवाइयों के साथ-साथ शासन-स्तर पर दीर्घकालिक, विज्ञान-आधारित नीति और स्थानीय समुदायों के अधिकारों-आधार पर पुनर्विकास ही भविष्य में इसी तरह की त्रासदियों की पुनरावृत्ति रोक सकता है। पीड़ितों के लिए त्वरित और मानवीय सहायता, प्रभावित कृषि व आजीविका का बहाल करना तथा भविष्य के लिए जोखिम-कम करने वाले अनुशासनात्मक कदम अब न सिर्फ़ जरुरी बल्कि अनिवार्य हैं।

केदारनाथ में खच्चर चलाने से लेकर देश के शीर्ष संस्थान तक पहुंचने वाला साधारण मेहनती लड़का।

168 Minutes Read -

उत्तराखंड के एक छोटे से गांव से निकलकर देश के शीर्ष संस्थान तक पहुंचने वाला साधारण लेकिन बेहद मेहनती लड़का।

यह कहानी है केदारनाथ में खच्चर से सामान ढोने वाले अतुल कुमार की — उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग ज़िले के छोटे से गांव बीरों देवल से निकलकर IIT मद्रास तक का सफर तय करने वाले उस युवा की, जिसने साबित कर दिया कि हालात चाहे कितने भी कठिन क्यों न हों, मेहनत और हौसला कभी हार नहीं मानते।

अतुल का बचपन बेहद सामान्य रहा। उसके माता-पिता आज भी केदारनाथ धाम में खच्चर और घोड़े चलाकर यात्रियों का सामान ढोते हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी, इसलिए स्कूल की पढ़ाई के साथ-साथ अतुल भी हर साल केदारनाथ में खच्चर से सामान ढोने का काम करता था ताकि अपनी पढ़ाई का खर्च निकाल सके।लेकिन मुश्किलें कभी उसके सपनों के आड़े नहीं आईं।

पहाड़ की चढ़ाई और सपनों की उड़ान

अतुल शुरू से ही पढ़ाई में होशियार था। उसने 10वीं में 94.8%, 12वीं में 92.8% अंक हासिल किए और जिले में टॉप रैंक पाई। आज वह हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय, श्रीनगर से B.Sc. अंतिम वर्ष का छात्र है।

गांव में न कोचिंग थी और न ही अच्छी किताबें। उसने केदारनाथ यात्रा में जो पैसे कमाए, उनसे किताबें और मोबाइल डेटा रिचार्ज किया। नेटवर्क और बिजली की दिक्कतों के बावजूद वह रात-दिन जुटा रहा। सुबह से शाम तक यात्रियों का सामान ढोने के बाद वह रात को टॉर्च और स्टडी लैंप की रोशनी में पढ़ता। कई बार पहाड़ के किसी ऊंचे कोने में खड़े होकर मोबाइल नेटवर्क पकड़कर ऑनलाइन लेक्चर सुनता।

IIT JAM में बड़ी सफलता

इन्हीं संघर्षों के बीच उसने IIT JAM 2025 की परीक्षा दी और All India Rank 649 हासिल की। अब उसे M.Sc. Mathematics के लिए IIT मद्रास में दाख़िला मिल रहा है।

यह उपलब्धि सिर्फ अतुल की नहीं, बल्कि हर उस युवा की है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखने की हिम्मत रखता है।

गांव में जश्न, पूरे प्रदेश को गर्व

अतुल अपने गांव से IIT में चयनित होने वाला पहला छात्र है। गांव वालों ने ढोल-नगाड़ों और फूल-मालाओं से उसका स्वागत किया। उसके शिक्षकों और दोस्तों ने भी उसकी मेहनत को सलाम किया। मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री ने भी सोशल मीडिया पर उसे बधाई दी और कहा कि अतुल उत्तराखंड के युवाओं के लिए प्रेरणा है।

माता-पिता ही सबसे बड़ी प्रेरणा

अतुल ने कहा —
“मेरे माता-पिता ने हमेशा कहा कि कोई काम छोटा नहीं होता, लेकिन पढ़ाई से जिंदगी बदल सकती है। मैंने वही किया। अब मेरा सपना है कि गणित में रिसर्च करूं और पहाड़ के बच्चों के लिए एक कोचिंग सेंटर खोलूं, ताकि वे भी बड़े सपने देख सकें।”

हाईकोर्ट का बड़ा आदेश: दो जगह वोटर लिस्ट में नाम वालों पर रोक

282 Minutes Read -

नैनीताल। हाईकोर्ट ने राज्य निर्वाचन आयोग को तगड़ा झटका दिया है। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राज्य में होने वाले पंचायत चुनाव को लेकर अहम आदेश दिया है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि जिन उम्मीदवारों के नाम शहर और गाँव — दोनों जगह की वोटर लिस्ट में दर्ज हैं, वे पंचायत चुनाव नहीं लड़ सकेंगे। ऐसे मामलों में तुरंत रोक लगाने के निर्देश देते हुए कोर्ट ने कहा कि यह आदेश चुनाव प्रक्रिया को बाधित नहीं करता, बल्कि चुनावी नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए है।पंचायत चुनाव नाम वापसी के आखिरी दिन हाईकोर्ट के आदेश से  खलबली मची है।

 

गौरतलब है कि 6 जुलाई को राज्य निर्वाचन आयोग के सचिव के आदेश में नगर निकाय क्व मतदाताओं का पंचायत चुनाव लड़ने का रास्ता साफ ही गया था।

हालांकि, बाद में सचिव ने एक और आदेश जारी कर कहा कि पंचायती राज एक्ट के हिसाब से होंगे चुनाव।

इधऱ, इन आदेशों के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने 6 जुलाई के आदेश पर रोक लगा दी।

इधऱ, यह भी काबिलेगौर है कि 11 जुलाई ,शुक्रवार को नाम वापसी का अंतिम दिन है। ऐसे में हाईकोर्ट के स्टे के बाद राज्य निर्वाचन आयोग प्रतिबंधित दावेदारों को अब चुनाव लड़ने से कैसे रोक पायेगा?

नैनीताल के बुडलकोट क्षेत्र में 51 बाहरी लोगों के नाम वोटर लिस्ट में शामिल करने के मामले में भी सरकार से जवाब मांगा गया है। अदालत के इस आदेश से कई प्रत्याशियों की दावेदारी पर असर पड़ सकता है।

पंचायत चुनाव पर फिर मंडराया खतरा ! हाईकोर्ट में बहस 

139 Minutes Read -

नैनीताल। हाईकोर्ट ने पंचायत चुनाव की तारीख को आगे खिसकाने सम्बन्धी याचिका को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए पंचायती राज सचिव व डीजीपी को सुरक्षात्मक उपायों के बाबत कोर्ट के समक्ष तथ्य पेश करने को कहा।

शुक्रवार को हुई सुनवाई में हाईकोर्ट ने कहा कि दोनों अधिकारी इस बाबत सरकार की आकस्मिक योजना पेश करें। संकट के समय कैसे स्थिति को कैसे संभाला जाएगा।

याचिकाकर्ता डॉ बैजनाथ शर्मा ने अपनी याचिका में विभिन्न कारणों का उल्लेख करते हुए पंचायत चुनाव की तिथि आगे खिसकाने की मांग की है।

गौरतलब है कि प्रदेश के पंचायत चुनाव में 24 व जुलाई को दो चरणों में मत डाले जाएंगे।

याचिका कर्ता ने कहा कि राज्य में गम्भीर आपदा व बरसात के मौसम में पंचायत चुनाव का कार्यक्रम जारी किया गया।

आपदा की वजह से प्रदेश की दर्जनों सड़कें बन्द होने से ग्रामीण इलाकों में आवाजाही ठप हो गयी है। ऐसे में चुनाव प्रचार व मतदान पर विपरीत असर लड़ेगा।

इसी महीने में कांवड़ यात्रा शुरू हो गयी है। लाखों की संख्या में कांवड़िए उत्तराखण्ड की ओर कूच कर रहे हैं। प्रदेश के कई पर्वतीय जिलों में कांवड़िए पहुंच रहे हैं।

यही नहीं, चारधाम यात्रा के चलने से प्रतिदिन हजारों तीर्थयात्री उत्तराखण्ड पहुंच रहे हैं। कुल मिलाकर उत्तराखण्ड के हरिद्वार से लेकर पर्वतीय जिलों में भारी जनसैलाब उमड़ रहा है।

कांवड़ यात्रा, आपदा प्रभावित इलाके और चारधाम यात्रा के लिए आवश्यक सुरक्षा बलों पर भी भारी बोझ देखा जा रहा है।

पुलिस-प्रशासन की सीमित टीम आपदा व पंचायत चुनाव के अलावा कांवड़ियों के लिए व्यवस्था बनाने में जुटी है। इससे अन्य जिलों में सुरक्षा बलों की कमी भी देखी जा रही है।

याचिकाकर्ता ने चारधाम यात्रा,आपदा, पंचायत चुनाव, कांवड़ यात्रा एक ही समय पर हो रही है। ऐसे में सभी मोर्चों पर जूझना काफी कठिन माना जा रहा है। लिहाजा, त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव जुलाई महीने के बजाय अन्य महीने में आयोजित किये जायें।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की लीगल टीम ने अपना पक्ष भी रखा। सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने किसी भी संकट की घड़ी से निपटने के लिए डीजीपी व पंचायत सचिव को आकस्मिक योजना पेश करने को कहा है। मंगलवार को राज्य सरकार समूची व्यवस्था को लेकर कोर्ट में तथ्य पेश करेंगे।

पंचायत चुनाव में महिलाएं: नाम की मुखिया या असली नेता?

191 Minutes Read -

क्या महिलाओं की राजनीति में भूमिका सिर्फ नाम भर की है? क्या महिलाएं सच में राजनीति में आगे बढ़ रही हैं,या फिर उन्हें सिर्फ ‘मोहरा’ बनाकर रखा जा रहा है? 2027 चुनाव से पहले उत्तराखंड में पंचायत चुनाव की सरगर्मी तेज़ हो चुकी है,,,गाँवों में चाय की दुकानों से लेकर चौपालों तक,हर जगह चर्चा का माहौल है। हर पार्टी और निर्दलीय उम्मीदवार प्रचार में जुटे हुए हैं,,,हर जगह बैनर-पोस्टर लग रहे हैं, वादों की बौछार हो रही है,,,और हर चुनाव की तरह, इस बार भी नेता कह रहे हैं,महिलाओं को सशक्त बनाएंगे, महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाएंगे, महिलाओं को सुरक्षा देंगे।” लेकिन क्या हर बार की तरह यह सिर्फ वादा ही रह जाएगा? क्या पंचायत चुनाव में महिलाएं सिर्फ सीट भरने का साधन हैं? या सच में उन्हें नेतृत्व का अवसर दिया जा रहा है?


यहाँ पर हमें दो बातें देखने की ज़रूरत है,,,पहला  प्रतिनिधित्व का आंकड़ा बढ़ा है,,,,दूसरा  असल में सिर्फ आंकड़ा बढ़ा है या फिर फैसले लेने की शक्ति भी बढ़ी है? पंचायतों में महिलाएं सीट पर तो आ गईं,लेकिन क्या वह मुखिया, सरपंच या ग्राम प्रधान बनकर ,सच में अपनी मर्जी से फैसले ले पा रही हैं? कई गाँवों में यह देखा गया है कि महिला प्रधान के नाम पर,उनके पति, भाई या पिता पंचायत चला रहे होते हैं। इसे ‘प्रधान  पति’ कल्चर कहा जाता है, जहाँ महिला नाम की मुखिया होती है,और सत्ता उनके परिवार के पुरुषों के हाथ में रहती है। उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल के कई ब्लॉकों में यह आम बात है।अल्मोड़ा के छेत्र से एक महिला प्रधान चुनी गई,लेकिन पंचायत के हर फैसले में उनके पति और देवर ही बैठकों में आगे दिखाई दिए । पौड़ी के एक गाँव में महिला प्रधान की जगह उनके बेटे ने सरकारी अधिकारियों के साथ बैठकर योजनाओं की फाइल पर निपटारा किया भले हस्ताक्षर महिला प्रधान ने ही किये । 
ऐसे में सवाल उठता है कि   —क्या महिलाओं को ‘नाम की मुखिया’ बनाकर ही रखा जा रहा है? क्या हम सच में महिलाओं को सशक्त कर रहे हैं, या बस दिखावा कर रहे हैं?
आगे बढ़ें उससे पहले थोड़ा आरक्षण की स्थिति स्पष्ट कर दें… भारत में संविधान ने पंचायतों में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण दिया है ,जिसे कई राज्यों ने बढ़ाकर 50% कर दिया।राजस्थान में पंचायतों में 56% महिला प्रतिनिधित्व है, महाराष्ट्र में 54%, बिहार में 50%। उत्तराखंड में भी पंचायत चुनाव में 50% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं,,,जो कागज़ों पर बड़ा सुकून महिलाओं के प्रति देता है , लेकिन असल में क्या महिलाएं खुद फैसले ले रही हैं? भले कोई सीधे तौर पर ये न माने पर सच यही है की मुख्य रूप से प्रधान पति, प्रधान पिता या प्रधान भाई ही फैसला लेते हैं ,,
`

अब विधानसभा और संसद में महिलाओं की स्थिति पर आते हैं,,,पंचायतों में 50% आरक्षण है,लेकिन विधानसभा में उत्तराखंड में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 7% है। देशभर में औसतन 10-12% महिलाएं ही विधानसभा में हैं। उत्तर प्रदेश — 11%,,,,,बिहार — 12%,,,,,,मध्यप्रदेश — 10%,,,,,,हरियाणा — 8%,,,,छत्तीसगढ़ सबसे ज़्यादा 18%  …. अब लोकसभा को देख लीजिये,,,,लोकसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व सिर्फ 15% और राज्यसभा में 13% है,,,मतलब महिलाओ की आधी आबादी, लेकिन असल फैसलों में भागीदारी 10-15%… सवाल उठता है क्यों?

2022 विधानसभा चुनाव में उत्तराखंड में महिला मतदाता पुरुषों से अधिक थीं। फिर भी तीनों बड़ी पार्टियों ने 10% से भी कम टिकट महिलाओं को दिए।बीजेपी ने 8, कांग्रेस ने 5, आम आदमी पार्टी ने 7 महिलाओं को टिकट दिए, यानि 210 सीटों में सिर्फ 20 महिलाएं मैदान में उतरीं। इनमें से भी आधी महिलाएं किसी नेता की बेटी, पत्नी या बहू थीं। जिनको अपने परिवार की राजनीतिक विरासत संभालने के लिए टिकट मिला,,,,लेकिन आम घर की महिलाओं को टिकट क्यों नहीं? इस पर राजनीतिक दल कहते हैं,,,,“चुनाव जीतने के लिए जिताऊ उम्मीदवार चाहिए,,,जबकि राजनीतिक जानकार  मानते हैं कि हमारी राजनीति धनबल और बाहुबल पर चलती है। शराब, पैसे और माफिया का खेल चलता है।ऐसे माहौल में महिलाएं चुनाव लड़ने में खुद को असहज पाती हैं।
 
 

जानकारों की माने तो उत्तराखंड की राजनीति में खनन और शराब माफिया का भी प्रभाव है,,,,राजनीति एक सिंडिकेट की तरह काम करती है, जिसमें सत्ता पक्ष, विपक्ष, अफसर, माफिया और मीडिया का गठजोड़ है। यही 5-7 हज़ार लोग, सवा करोड़ की आबादी की राजनीति तय कर रहे हैं।,,,,,
लेकिन दोष केवल सिस्टम का ही नहीं है,राजनीतिक दलों का रवैया भी दोषी है। हर बार चुनाव में कहते हैं, “महिलाओं को टिकट देंगे,”लेकिन देने में कंजूसी करते हैं और मज़े की बात देखिए…जो महिलाएं चुनाव लड़ती हैं, उनका जीतने का प्रतिशत भी पुरुषों से अधिक होता है। महिलाओं के जीतने की दर 16.5% है,जबकि पुरुषों की 11.8%। यानी महिलाएं बेहतर परफॉर्म कर रही हैं.. फिर टिकट देने में कंजूसी क्यों? सवाल ये  नहीं है कि महिलाएं राजनीति में क्यों नहीं हैं,सवाल यह है कि उन्हें आने से रोका क्यों जा रहा है? देश आधा उनका है,तो फैसलों में हिस्सा आधा क्यों नहीं?
 

 

एक बात और ,,,महिलाओं की सुरक्षा हर चुनाव में मुद्दा बनती है।‘महिला हेल्पलाइन’, ‘पिंक पेट्रोलिंग’, ‘महिला सुरक्षा ऐप’ जैसे नाम गिनाए जाते हैं।लेकिन क्या महिलाएं सच में सुरक्षित हैं?उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में महिलाओं को रोज़ 5-10 किलोमीटर पैदल चलकर पानी और लकड़ी लानी पड़ती है।रास्ते में छेड़छाड़ और यौन हिंसा की घटनाएं होती हैं।कई मामलों में शिकायत करने पर पुलिस भी गंभीरता से नहीं लेती।जब महिलाओं की सुरक्षा ही नहीं हो पा रही,तो राजनीति में आने पर भी वह कैसे सुरक्षित महसूस करेंगी?क्योंकि राजनीती में तो इससे बढ़कर  उन्हें ट्रोलिंग, गाली-गलौज, चरित्र हनन का सामना करना पड़ता है जो आम महिला नेता के लिए किसी यातना से कम नहीं



महिलाओं के नाम पर कई योजनाएं भी बनी हैं।महिला उद्यमिता योजना’, ‘महिला स्टार्टअप फंड’, ‘मुख्यमंत्री महिला सशक्तिकरण योजना’…लेकिन 2024 में केवल 18% सरकारी फंडिंग महिला उद्यमियों को मिली।महिला स्टार्टअप में 60% प्रोजेक्ट फंड की कमी से बंद हो गए।ज्यादातर योजनाएं कागज तक सीमित रह गईं।सरकारी आंकड़ों में जो महिला आत्मनिर्भर दिखाई जाती है,ज़मीन पर हालात अलग हैं।हमारे समाज में महिलाओं को देवी का दर्जा दिया गया है।लेकिन क्या राजनीति में उन्हें वही दर्जा दिया गया? क्या हम महिलाओं को सिर्फ त्योहारों में पूजने के लिए देवी मानते हैं,या उन्हें फैसलों की मेज़ पर भी बराबरी का दर्जा देना चाहते हैं?
अगर हम एक सशक्त और निष्पक्ष लोकतंत्र चाहते हैं,तो पंचायतों में उन्हें फैसले लेने का अधिकार देना होगा न की उनके पति ,पिता या भाई को  ,,, विधानसभा और संसद में भी महिलाओं की भागीदारी बढ़ानी होगी।वो भी नाम मात्र की नहीं, असल नेतृत्व के साथ। महिलाओं को सिर्फ घोषणा पत्रों और पोस्टरों की शोभा नहीं बल्कि उन्हें असली सत्ता और फैसलों में बराबरी का हिस्सा देना होगा ।
जब महिलाएं असलियत में आगे आएंगी,तो राजनीति में भी ईमानदारी, संवेदनशीलता और पारदर्शिता आएगी। उत्तराखंड की महिलाएं पहाड़ की चट्टानों सी मजबूत हैं। वो खेत संभाल सकती हैं, जंगल से लकड़ी ला सकती हैं, बच्चों की परवरिश कर सकती हैं,तो राजनीति भी संभाल सकती हैं,जरूरत है, उन्हें सिर्फ मौका देने की।

‘यह सिर्फ एक सीन था’ कहकर फंसे राठौर, कांग्रेस ने पूछा– कारवां लुटा कैसे?

289 Minutes Read -

 उत्तराखंड की सियासत इन दिनों एक अनोखे ‘प्रेम प्रसंग’ को लेकर गर्म है, जिसमें अभिनय, सियासत, महिला सम्मान और नैतिकता के तमाम आयाम एक साथ उलझे हुए हैं। चर्चित भाजपा नेता और हरिद्वार जिले के ज्वालापुर से पूर्व विधायक सुरेश राठौर हाल ही में उर्मिला सनावर (फिल्म अभिनेत्री) के साथ मंच साझा करते हुए उसे “अपने जीवन की साथी” बता बैठे। कैमरे और माइक के सामने रिश्तों का यह सार्वजनिक ऐलान कुछ ही घंटों में सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।

लेकिन हंगामा बढ़ते ही राठौर पलट गए। सफाई दी कि “यह तो बस एक फिल्म का सीन था”। इस सफाई ने आग में घी डालने का काम किया। सवाल उठने लगे कि क्या अब भाजपा नेताओं की सार्वजनिक घोषणाएं भी किसी स्क्रिप्ट का हिस्सा हैं? और अगर यह अभिनय था तो मंच, माला और सार्वजनिक संवाद किसलिए?

 

 

प्रकरण गरमाया तो भाजपा ने भी पैंतरा बदला। पहले चुप्पी साधे रही, फिर जनदबाव बढ़ने पर राठौर को पार्टी की छवि धूमिल करने और अनुशासनहीनता के आरोप में नोटिस थमा दिया गया। राठौर ने प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट से भेंट कर अपना पक्ष रखा है, जिस पर पार्टी विचार कर रही है।

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने कांग्रेस को हमलावर होने का मौका दे दिया।
पार्टी की मुख्य प्रवक्ता गरिमा मेहरा दसौनी ने भाजपा पर हमला बोलते हुए कहा, “नाटक, झूठ और पाखंड की शैली से जनता को भ्रमित नहीं किया जा सकता।” उन्होंने तंज कसते हुए पूछा, “तू इधर-उधर की बात न कर, ये बता कारवां लुटा कैसे?”

गरिमा ने भाजपा से पूछा कि क्या यह पहला मामला है जब पार्टी के नेता महिलाओं से जुड़े विवादों में फंसे हों? क्या हर बार कार्रवाई तब होती है जब जनता का गुस्सा उबाल पर आ जाता है? और क्या UCC जैसे कानूनों का हवाला सिर्फ जनता को उलझाने के लिए दिया जाता है?

भाजपा की ओर से प्रदेश मीडिया प्रभारी मनवीर चौहान ने स्पष्ट किया कि पार्टी किसी भी प्रकार के अमर्यादित आचरण को स्वीकार नहीं करती। उन्होंने बताया कि अनुशासन समिति में राठौर के मामले पर गंभीरता से विचार किया जाएगा।

सियासत और व्यक्तिगत जीवन की यह जटिल गाथा एक ओर राजनीति के चरित्र पर सवाल खड़े कर रही है, तो दूसरी ओर दर्शा रही है कि अब जनता केवल भाषणों से नहीं, आचरण से भी जवाब मांगती है।

सांविधानिक संकट; पंचायती राज एक्ट में संशोधन के अध्यादेश को नहीं मिली मंजूरी, राजभवन ने लौटाया

154 Minutes Read -

प्रदेश की पंचायतों में प्रशासकों की पुनर्नियुक्ति संबंधी अध्यादेश को राजभवन ने बिना मंजूरी लौटा दिया है। इस कारण 10760 त्रिस्तरीय पंचायतें अभी खाली रहेंगी। इससे पंचायतों में सांविधानिक संकट पैदा हो गया है।त्रिस्तरीय पंचायतों में प्रशासकों का छह महीने का कार्यकाल खत्म होने के बाद प्रशासकों की पुनर्नियुक्ति के लिए पंचायती राज विभाग ने आनन-फानन में प्रस्ताव तैयार किया। जिसे पहले विधायी विभाग यह कहते हुए लौटा चुका था कि कोई अध्यादेश यदि एक बार वापस आ गया तो उसे फिर से उसी रूप में नहीं लाया जाएगा। ऐसा किया जाना संविधान के साथ कपट होगा। विधायी विभाग की इस आपत्ति के बावजूद अध्यादेश को राजभवन भेज दिया गया।

 

राज्यपाल के सचिव रविनाथ रामन के मुताबिक विधायी विभाग की आपत्ति का निपटारा किए बिना इसे राजभवन भेजा गया। जिसे विधायी को वापस भेज दिया गया है। इसमें कुछ चीजें स्पष्ट नहीं हो रही थीं, इसके बारे में पूछा गया है। इसमें विधायी ने कुछ मसलों को उठाया था। राजभवन ने इसका विधिक परीक्षण किए जाने के बाद इसे लौटाया है।

10760 त्रिस्तरीय पंचायतें हुईं मुखिया विहीन

प्रदेश में हरिद्वार की 318 ग्राम पंचायतों को छोड़कर 7478 ग्राम पंचायतें, 2941 क्षेत्र पंचायतें और 341 जिला पंचायतें मुखिया विहीन हो गई हैं। राज्य में पहली बार इस तरह की स्थिति बनी है।उत्तराखंड पंचायती राज अधिनियम 2016 में संशोधन के लिए 2021 में अध्यादेश लाया गया था। राजभवन से मंजूरी के बाद इसे विधानसभा से पास होना था, लेकिन तब विधेयक को विधानसभा से पास नहीं किया गया। क्योंकि हरिद्वार में अध्यादेश जारी होने के बाद त्रिस्तरीय चुनाव करा दिए गए थे

जोशीमठ-औली रोपवे परियोजना के लिए डीपीआर तैयार,राज्य में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए महत्वपूर्ण

204 Minutes Read -

उत्तराखंड में जोशीमठ-औली रोपवे परियोजना आगे बढ़ रही है। राज्य की निर्माण एजेंसी ब्रिडकुल ने नए रोपवे के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) का मसौदा तैयार कर लिया है, जो 3.917 किलोमीटर की दूरी तय करेगी। अंतिम डीपीआर जल्द ही सरकार को भेजी जाएगी। मंजूरी मिलते ही निर्माण शुरू हो जाएगा। रोपवे से क्षेत्र में पर्यटन को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। सुरक्षा चिंताओं के कारण पुराने रोपवे को जनवरी 2023 से बंद कर दिया गया है।

ब्रिडकुल ने मसौदा योजना तैयार की

ब्रिडकुल के प्रबंध निदेशक एनपी सिंह ने पुष्टि की कि रोपवे के लिए डीपीआर लगभग पूरी हो चुकी है। पुराने रोपवे के असुरक्षित हो जाने के बाद इस परियोजना को पूरी तरह से ब्रिडकुल द्वारा ही संभाला जा रहा है।

उन्होंने कहा कि पहले रोपवे के पहले और दूसरे टावर की नींव में कुछ समस्या थी, जिसके कारण इसे बंद करना पड़ा। तब से, BRIDCUL नए सर्वेक्षण करने और नए रोपवे की योजना बनाने का काम संभाल रहा है।

नींव और सर्वेक्षण सहित सभी औपचारिकताएं पूरी कर ली गई हैं।

परियोजना का निर्माण 2 चरणों में किया जाएगा

रोपवे का निर्माण दो चरणों में किया जाएगा।

  • प्रथम चरण : 11 टावरों और 21 केबिनों के साथ 2.76 किलोमीटर की दूरी तय करेगा।
  • द्वितीय चरण : 1.157 किलोमीटर, गौरसौ बुग्याल तक विस्तारित, 7 टावर और 9 केबिन।

परियोजना की कुल लागत 426 करोड़ रुपये आंकी गई है। सिंह ने बताया कि डीपीआर का अंतिम संस्करण एक सप्ताह के भीतर सरकार को सौंप दिया जाएगा।

ऐसे तैयार होगा रोपवे

प्रतिदिन 500 यात्रियों की क्षमता

एक बार चालू होने के बाद, रोपवे प्रति घंटे प्रति दिशा (पीपीएचपीडी) लगभग 500 यात्रियों को ले जाने में सक्षम होगा। प्रत्येक ट्रॉली 10 लोगों को ले जा सकेगी।

कुल मिलाकर, 3.917 किलोमीटर लंबे मार्ग में दोनों चरणों में 18 टावर और 30 केबिन शामिल होंगे।

 

इंदिरा गांधी ने रखी थी पुराने रोपवे की नींव

मूल रोपवे परियोजना 1983 में शुरू हुई थी जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इसकी आधारशिला रखी थी। इसे 1984-85 में ज़िगज़ैग तकनीक का उपयोग करके पूरा किया गया था। तब से, जोशीमठ और औली के बीच पर्यटकों की यात्रा के लिए रोपवे का उपयोग किया जाता रहा है, जब तक कि इसे सुरक्षा चिंताओं के कारण जनवरी 2023 में बंद नहीं कर दिया गया।

अब, राज्य इस क्षेत्र में पर्यटन को एक बार फिर बढ़ावा देने के लिए एक सुरक्षित और उन्नत संस्करण बनाने की योजना बना रहा है।

1983 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने रखी थी आधारशिला

 

‘सिंधु जल समझौता’ रद्द होने से पाकिस्तान पर क्या असर पड़ेगा,क्या भारत सच में रोक सकता है पानी ?

286 Minutes Read -
पहलगाम आतंकी हमला निश्चित रूप से सुरक्षा व्यवस्था में कुछ कमियों को उजागर करता है, और यह सरकार के लिए एक चेतावनी है कि खुफिया तंत्र, सीमा सुरक्षा, और पर्यटन स्थलों की निगरानी को और मजबूत करने की जरूरत है। लेकिन इसे केवल सरकार की नाकामी का सबूत कहना अतिशयोक्ति होगी,क्योंकि  आतंकी हमले जटिल सुरक्षा चुनौतियाँ हैं, जिनके पीछे कई कारक होते हैं, जैसे सीमा पार से आतंकवाद का समर्थन, स्थानीय परिस्थितियाँ, और वैश्विक आतंकी नेटवर्क। सरकार की नीतियों और सुरक्षा व्यवस्थाओं में कमियाँ हो सकती हैं, लेकिन इस तरह की घटनाओं को पूरी तरह से एक पक्ष की विफलता के रूप में देखना सही नहीं है।भारत सरकार ने त्वरित प्रतिक्रिया दी, जिसमें सर्च ऑपरेशन, सुरक्षा समीक्षा बैठकें, और पाकिस्तान के खिलाफ कड़े कदम जैसे सिंधु जल संधि को स्थगित करना और अटारी बॉर्डर बंद करना शामिल हैं। इसके अलावा, जम्मू-कश्मीर सरकार ने पीड़ितों के लिए मुआवजे की घोषणा की,,,इससे पहले भी सरकार ने कई ऐसे एक्शन लिए हैं जो आतंकवादियों की कमर तोड़ने में कारगर साबित हुए हैं,,,कई बार आतंकी हमले होने से पहले ही उन पर एक्शन भी हुआ है,,,क्योंकि आतंकवाद एक बहुआयामी चुनौती है, जिसमें बाहरी ताकतों की बड़ी भूमिका है,,, सिर्फ ये कहना कि सरकार की नाकामी से ये घटना हुई ये भी सही नहीं होगा,,,हाँ चूक जरूर कुछ मामलों में सरकार से हो चुकी है,,,लेकिन भारत ने भी कूटनीतिक तरिके से पाकिस्तान को जवाब देना शुरू कर दिया है,,,,इनमें सबसे प्रमुख है सिंधु  जल समझौता रद्द करना,,,
 
 
यहां ये जानना भी जरूरी  हो जाता है कि आखिर  सिंधु  जल   समझौता रद्द होने से पाकिस्तान पर क्या प्रभाव पड़ सकते हैं,,,भारत द्वारा पाकिस्तान के साथ सिंधु जल समझौता  रद्द करने या निलंबित करने के कई दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। यह समझौता 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता से हुआ था, जिसके तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह नदियों—सिंधु, झेलम, चिनाब जो पश्चिमी नदियाँ हैं  और रावी, ब्यास, सतलुज जो पूर्वी नदियाँ हैं उनके  पानी का बँटवारा किया गया था । पाकिस्तान को पश्चिमी नदियों का 80% पानी मिलता है, जबकि भारत को पूर्वी नदियों का नियंत्रण और पश्चिमी नदियों पर सीमित उपयोग  का अधिकार है।अब ये समझौता रद्द होने से पाकितान पर इसके प्रभाव बहुत घातक साबित हो सकते हैं,,,पाकिस्तान की लगभग 80% कृषि भूमि और 21 करोड़ से अधिक आबादी सिंधु और उसकी सहायक नदियों पर निर्भर है। यदि भारत पानी का प्रवाह रोकता या कम करता है, तो पाकिस्तान में पीने के पानी और स्वच्छता के लिए गंभीर संकट उत्पन्न हो सकता है,,,पाकिस्तान की 16 मिलियन हेक्टेयर कृषि भूमि सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर है, जो 90% सिंचाई के लिए इसका उपयोग करती है। पानी की कमी से गेहूं, चावल, और कपास जैसी प्रमुख फसलों की पैदावार घट सकती है, जिससे खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है,,,गेहूं की बुवाई जैसे महत्वपूर्ण समय पर पानी की कमी से फसल चक्र बाधित हो सकता है, जिससे खाद्य कीमतों में वृद्धि और किसानों की आजीविका पर असर पड़ेगा,,कृषि पाकिस्तान की जीडीपी में 25% योगदान देती है। पानी की कमी से खाद्य उत्पादन में कमी, बेरोजगारी, और आर्थिक अस्थिरता बढ़ सकती है।जलविद्युत परियोजनाएँ जैसे तरबेला और मंगला बाँध प्रभावित होंगी, जिससे ऊर्जा संकट गहरा सकता है,,,समझौते को निलंबित करना भारत के लिए एक रणनीतिक कदम है, विशेष रूप से आतंकवाद के खिलाफ जवाबी कार्रवाई के रूप में। यह पाकिस्तान पर दबाव डालने का एक प्रभावी तरीका हो सकता है,,,
 
What is the Indus Waters Treaty put on hold by India after Pahalgam attack?
 
हालाँकि भारत ये करने में कितना कामयाब हो पायेगा ये देखना होगा क्योंकि समझौते को एकतरफा निलंबित करना अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत विवादास्पद हो सकता है। वियना संधि  की धारा 62 के तहत, भारत यह तर्क दे सकता है कि पाकिस्तान द्वारा समर्थित आतंकवाद मूलभूत परिस्थितियों में बदलाव है, लेकिन विश्व बैंक या अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता न्यायालय में चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है,,,पाकिस्तान विश्व बैंक या संयुक्त राष्ट्र में इस मुद्दे को उठा सकता है, जिससे भारत पर कूटनीतिक दबाव बढ़ सकता है,,,पाकिस्तान हेग के मध्यस्थता न्यायालय में भारत के फैसले को चुनौती दे सकता है, जैसा कि उसने किशनगंगा परियोजना के मामले में किया था,,,
Pak writes to Ind for dialogue on water issues next month - sources
 
 
यहां सवाल ये भी है कि क्या भारत पाकिस्तान का पानी सच में रोक सकता है,,,तो जवाब है हाँ, भारत तकनीकी और भौगोलिक दृष्टि से पाकिस्तान को जाने वाली कुछ नदियों का पानी रोक सकता है, लेकिन यह प्रक्रिया जटिल है और इसके कई कानूनी, राजनीतिक, और व्यावहारिक पहलू हैं,,,रावी, ब्यास, सतलज इन पर भारत का पूरा नियंत्रण है, और भारत इनका पानी बिना किसी प्रतिबंध के उपयोग कर सकता है,,,भारत पहले से ही रावी नदी का पानी रोकने के लिए कदम उठा चुका है। उदाहरण के लिए, 2024 में शाहपुर कंडी बैराज के पूरा होने के बाद रावी का पानी पाकिस्तान की ओर जाने के बजाय जम्मू-कश्मीर और पंजाब में उपयोग हो रहा है। इससे जम्मू-कश्मीर को 1150 क्यूसेक अतिरिक्त पानी मिल रहा है,,,सिंधु, झेलम, और चिनाब नदियाँ भारत से होकर पाकिस्तान जाती हैं। भारत इन नदियों पर बांध बनाकर या जलाशयों का निर्माण करके पानी के प्रवाह को नियंत्रित कर सकता है। हालांकि, पूरी तरह रोकना मुश्किल है क्योंकि भारत के पास अभी इतनी बड़ी जल भंडारण क्षमता नहीं है कि वह इन नदियों के पूरे प्रवाह को रोक सके। बड़े बांध बनाने में समय और संसाधन लगते हैं,,इन नदियों का प्रवाह इतना विशाल है कि इसे पूरी तरह रोकना तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण है,,,
 
 
 
कुल मिलाकर सिंधु जल समझौते का निलंबन पाकिस्तान के लिए तत्काल और दीर्घकालिक संकट पैदा कर सकता है, विशेष रूप से जल, कृषि, और आर्थिक क्षेत्रों में। भारत के लिए यह एक शक्तिशाली रणनीतिक कदम है, लेकिन इसके साथ अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय जोखिम भी जुड़े हैं। दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ने की संभावना है,,सरकार को अपना काम करना है लेकिन इस त्रासदी में जान गंवाने वाले 26 लोगों की याद में और कश्मीर की शांति के लिए,राजनैतिक दलों को  राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर एकजुटता दिखानी होगी। आतंकियों को करारा जवाब देना और कश्मीर को फिर से स्वर्ग बनाना सिर्फ सरकार की ही नहीं बल्कि सभी पार्टियों के साथ साथ हम  सभी की भी  साझा जिम्मेदारी है।