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मै कहीं जाने वाली नहीं हूं- वसुंधरा राजे

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राजस्थान चुनाव से पहले एक तस्वीर सामने आयी है. जिसने वहां की राजनीतिक हलचल बढ़ा दी है. एक कार्यक्रम के मौके पर सीएम गहलोत और बीजेपी नेता वसुंधरा राजे दोनों एक साथ दिखे. तस्वीर सामने आने के बाद वहां अटकलों का दौर भी शुरू हो गया है. आपको बता दें कि वसुंधरा राजे इस बार बीजेपी के चुनाव प्रचार से भी दूर हैं और उन्होंने परिवर्तन यात्रा में भी हिस्सा नहीं लिया…

क्या बीजेपी को भारी पड़ सकती है वसुंधरा की बेरुखी-


 
क्या वसुंधरा और बीजेपी हाईकमान के बीच की दूरी लगातार बढ़ रही है, वसुंधरा के एक ऐलान के बाद प्रधानमन्त्री को आनन -फानन में चार साल से अधिक समय बाद जयपुर जाना पड़ा. और तो और बीजेपी आलाकमान ये भी फैसला कर चुका है कि राजस्थान चुनाव में वसुंधरा का करना क्या है ? और इस फैसले का ऐलान प्रधानमंत्री के राजस्थान दौरे के बाद किया जा सकता है. आखिर क्यों राजस्थान में बीजेपी के अंदर सियासी पारा चढ़ा हुआ है और क्या प्रधानमंत्री मोदी जयपुर वसुंधरा राजे को मनाने गए थे.
राजस्थान में चुनाव से पहले वसुंधरा बीजेपी के लिए एक बड़ी मुसीबत बन गयी है. कुल मिलाकर राजस्थान को लेकर बीजेपी और हाईकमान में रार जारी है, इसकी एक वजह है वसुंधरा राजे का एक वीडियो जो की खूब वायरल हो रहा है. कुल मिलाकर वसुंधरा राजे ने राजस्थान में बीजेपी की मुश्किलें बढ़ा दी है. पहले वो बयान सुनिए जिसमें वसुंधरा बीजेपी हाईकमान को सीधा संदेश देती दिखाई दे रही है.

 

क्यों कहा वसुंधरा ने ऐसा ?

अब ये सवाल उठ रहे हैं कि आखिर वसुंधरा राजे ऐसा क्यों कह रही हैं कि वो राजस्थान छोड़ कर नहीं जाएगी. दरअसल  जिस तरह से वसुंधरा राजे को चुनाव समिति में जगह नहीं दी गयी उसके बाद ये खबरें सामने आयी कि वसुंधरा की राजनीतिक पारी समाप्त हो चुकी है, उनको भाजपा ने साइडलाइन कर दिया है. लेकिन राजे राजस्थान में अच्छी खासी पकड़ और मजबूत जनाधार रखने वाली नेता है,,और वो ये भी अच्छे से  जानती हैं कि जिसको साइड लाइन कर दिया गया है उसको लाइमलाइट में कैसे लाना है ? तो वसुंधरा ने कैसे खेल किया उसके लिए आपको हम कुछ तस्वीरें दिखाते हैं.


कल हुई पीएम की रैली में वसुंधरा राजे मौजूद रही. लेकिन गहलोत सरकार के खिलाफ परिवर्तन रैली से वसुंधरा राजे गायब रहीं.  जिसका साफ़ संदेश था कि वसुंधरा चुनाव समिति में न रखे जाने से काफी नाराज थी.
एक तरफ अशोक  गहलोत के खिलाफ परिवर्तन रैली से वसुंधरा लगातार गायब रहीं तो दूसरी तरफ अशोक गहलोत के साथ उनकी तस्वीरें निकल कर सामने आ गयी.  21 सितंबर को ये तस्वीरें सामने आयीं और वायरल हो गयी, उसके बाद कहा जाने लगा कि राजस्थान में बीजेपी की मुश्किलें बढ़ने जा रही हैं,,वसुंधरा राजे भारतीय जनता पार्टी से इस्तीफा देने जा रही हैं,, बस इन तस्वीरों के तुरंत बाद प्रधानमंत्री मोदी का जयपुर का प्लान सामने आ गया..

 

क्या बीजेपी ने खुद मार दी अपने पैर पर कुल्हाड़ी-

 

खबरें चल रही हैं कि वसुंधरा राजे ने बीजेपी आलाकमान को अपनी ताकत दिखाई है, वसुंधरा ये दिखाना चाहती है कि किस तरह से बीजेपी ने उनको चुनाव समिति से बाहर करके कथित तौर पर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार दी है,,आप देख सकते हैं कि किस तरह वसुंधरा महिलाओं के हुजूम के बीच कह रही हैं कि राजस्थान में 60 प्रतिशत महिलाएं हैं,,मतलब जो महिलाएं है वो वोटर भी हैं,,,दूसरी तरफ वसुंधरा कहती हैं कि वो राजस्थान छोड़ कर कहीं नहीं जाएगी और यहीं रहकर यहां के लोगों के मुद्दे उठायेंगी,,,ये बात इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि वसुंधरा को केंद्रीय राजनीती में भेजे जाने के कयास लगाए जा रहे थे,,,इस बयान से वसुंधरा ने ये तो साफ़ कर दिया है कि वो राजस्थान से कहीं नहीं जाने वाली,, उनका ये बयान हाईकमान को भी साफ़ संदेश है, हालांकि इसके बाद वो पीएम मोदी की रैली में शामिल हुई,,

जल्द हो सकती है उम्मीदवारों की पहली सूची जारी-

कुल मिलाकर वसुंधरा इतने बगावती तेवर दिखा रही हैं कि जब परिवर्तन यात्रा उनके क्षेत्र से गुजरती हैं तब भी वो उसमें शामिल नहीं होती उलटा उनकी फोटो गहलोत के साथ सामने आ जाती है. वसुंधरा इस समय राजस्थान में हाट टॉपिक बनी हुई हैं,, ऐसे में क्या बीजेपी आलाकमान वसुंधरा को शीर्ष नेतृत्व में भेजने की तैयारी में है ? इसको लेकर भी खबरें सामने आ रही हैं, खबरों के मुताबिक, अगले सप्ताह दिल्ली में राजस्थान को लेकर बीजेपी की केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक संभावित है। इसके बाद पार्टी राज्‍य के लगभग 50 उम्मीदवारों की पहली सूची जारी कर सकती है। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे लगातार अपनी भूमिका स्पष्ट करने की मांग करती रही हैं। बावजूद इसके पार्टी आलाकमान की तरफ से उन्हें विधानसभा चुनाव के मद्देनजर कोई अहम भूमिका नहीं दी गई। इससे ऐसा लगता है कि पार्टी नेतृत्व ने उनके बारे में अपना मन बना लिया है।

चुनाव प्रचार से गायब हैं राजे-

बीजेपी ने राज्य में ‘परिवर्तन संकल्प’ यात्रा निकाली। इस यात्रा में ज्यादातर पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे गायब रहीं। बीजेपी की यात्रा से गायब रहने वाली वसुंधरा राजे ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से मुलाकात की। इस मुलाकात के बाद राज्य में राजनीतिक हलचल बढ़ गई। लोगों के मन में वसुंधरा राजे को लेकर सवाल उठने लगे, क्या राजस्थान में कोई नई खिचड़ी पक रही है? क्या वसुंधरा राजे प्रेशर पॉलिटिक्स कर रही हैं? सामने आई तस्वीर में बीजेपी नेता राजेंद्र राठौड़ और सीएम अशोक गहलोत एक सोफे पर बैठे हुए हैं। वहीं दूसरे सोफे पर विधानसभा अध्यक्ष सीपी जोशी और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे बैठी हुई हैं। इस मुलाकात को लेकर सोशल मीडिया पर तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। कुछ लोगों का मानना है कि यह मुलाकात दोनों नेताओं के बीच किसी समझौते की ओर इशारा करती है। वहीं, कुछ लोग इसे केवल एक औपचारिक मुलाकात बता रहे हैं।

वसुंधरा राजे ने बीते  10 दिनों से दिल्ली में डेरा डाल रखा था.  इसके बाद अब उनकी तस्वीर सीएम गहलोत के साथ नजर आई हैं । राजस्थान में विधानसभा चुनाव 2023 में होने हैं। ऐसे में यह मुलाकात राजनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण है। यह देखना दिलचस्प होगा कि इस मुलाकात के बाद दोनों दलों के बीच क्या होता है,, क्या वसुंधरा राजस्थान में अपनी बात पूरी न होने पर कोई बगावत कर सकती हैं, ये देखना होगा.

हाई कोर्ट के निर्देश पर कार्बेट में पेड़ कटान व अवैध निर्माण मामले में सीबीआई ने शुरू की जांच

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सीबीआई ने जिम कार्बेट नेशनल पार्क के पाखरो रेंज में टाइगर सफारी के नाम पर हुए अवैध निर्माण तथा छह हजार पेड़ काटने के मामले की जांच शुरू कर दी है। राज्य सतर्कता निदेशक वी मुर्गेशन के मुताबिक, राज्य सतर्कता ने कार्बेट मामले से संबंधित सभी दस्तावेज सीबीआई को सौंप दिए हैं।नैनीताल हाईकोर्ट के निर्देश पर सीबीआइ कार्बेट पार्क मामले की जांच सीबीआई कर रही है। इस मामले में सबसे पहले पाखरो सफारी मामले से जुड़े तीन सेवानिवृत्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक (पीसीसीएफ) और एक मौजूदा पीसीसीएफ समेत रेंज में काम करने वाले करीब एक दर्जन वन अधिकारियों, कर्मचारियों व ठेकेदारों से सीबीआई पूछताछ करेगी।

 

जांच का प्रमुख केंद्र होंगे तत्कालीन वन मंत्री हरक सिंह रावत

सीबीआई की जांच का मुख्य केंद्र बिंदु तत्कालीन वन मंत्री हरक सिंह रावत होंगे। विजिलेंस और अन्य जांचों से पता चला है कि हरक सिंह के दबाव में कार्बेट टाइगर सफारी में वित्तीय और अन्य स्वीकृतियां लिए बिना ही काम शुरू कर दिया गया था।

बता दें है कि 21 अगस्त को मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति विपिन सांघी व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ में देहरादून के अनु पंत की जनहित याचिका पर सुनवाई हुई थी। इसमें कहा गया था कि  बिना अनुमति के निर्माण कार्य किए गए। छह जनवरी, 2023 को हाई कोर्ट ने मुख्य सचिव से पेड़ों के कटान के प्रकरण पर जांच रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने और यह बताने को कहा था कि किन लोगों की लापरवाही और संलिप्तता से यह अवैध कार्य हुए।

न्यायिक सेवा की परीक्षा में एक सवाल पर विवाद पहुंचा कोर्ट,मामला देख जज भी हैरान !

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अगर आपसे सवाल पूछा जाय कि बम धमाके से मारना हत्या है या कुछ और ? तो आपका जवाब क्या होगा ? शायद अधिकतर लोग इसको हत्या ही कहेंगे,लेकिन अगर इस सवाल को थोड़ा और घुमा कर कुछ इस तरह पूछा जाय जैसे जैसे की  “‘A ‘ एक मेडिकल स्टोर में बम रख देता है और विस्फोट से पहले लोगों को बाहर निकलने के लिए 3 मिनट का समय देता है। ‘B ‘ जो गठिया का मरीज है, वह भागने में विफल रहता है और मारा जाता है। ऐसे में ‘A ‘ के खिलाफ आईपीसी की किस धारा के तहत केस दर्ज किया जा सकता है?”  इस सवाल पर अब आपका जवाब क्या होगा ? निश्चित रूप से आप का सर घूम जायेगा और आप सोच रहे होंगे ये कैसा सवाल है ? तो आप बिलकुल सही सोच रहे हैं,,, ये कोई कल्पना या सिर्फ बोलने भर की बात नहीं है बल्कि ये सवाल सच में एक परीक्षा के दौरान पूछा गया,,कई छात्र इस सवाल से इतने परेशान हो गए कि उनकी समझ में कुछ आया ही नहीं,कि इसका जवाब क्या हो सकता है,,,इस सवाल से हैरान और असंतुष्ट छात्र कोर्ट पहुंच गए,कोर्ट में मामला सुनकर जज भी हैरान रह गए,आगे जो हुआ वो आपको चौंका देगा,,,

 

 

सवाल पर विवाद पहुंचा हाईकोर्ट 

दरअसल , उत्तराखंड न्यायिक सेवा सिविल जज प्रारंभिक परीक्षा में तीन सवालों को लेकर असफल आवेदकों ने आपत्ति जताई और  इससे संबंधित याचिका भी नैनीताल हाई कोर्ट में दायर की है। इस पर सुनवाई करते हुए उत्तराखंड हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश विपिन सांघी और न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की खंडपीठ के समक्ष विकट समस्या खड़ी हो गई, कि आखिर इस पर क्या फैसला दिया जाय,,,जिस सवाल पर आपत्ति जताई गई थी, उसने हाई कोर्ट के जजों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया।

हुआ कुछ यूँ कि उत्तराखंड न्यायिक सेवा की परीक्षा में एक सवाल पर विवाद सामने आया है। परीक्षा में पूछा गया था कि एक मेडिकल स्टोर में बम रखने वाले और विस्फोट से पहले लोगों को बाहर निकलने के लिए 3 मिनट का समय देने वाले एक व्यक्ति के खिलाफ आईपीसी की किस धारा के तहत केस दर्ज किया जा सकता है? सवाल उत्तराखंड की न्यायिक सेवा की परीक्षा में पूछा गया था, जिसे लेकर विवाद अदालत की चौखट तक पहुंच गया । परीक्षा में असफल रहने वाले छात्रों ने विषय-विशेषज्ञों द्वारा बताए गए इस सवाल के जवाब पर असंतोष जताया है और दो अन्य सवालों पर आपत्ति के साथ कोर्ट में याचिका दाखिल कर दी। कोर्ट ने आयोग को दो सवालों पर फिर से विचार करने का सुझाव भी दे दिया है।

ऐसा सवाल जिस पर जज भी हो गए कन्फ्यूज 

जिस तीसरे सवाल को लेकर जज भी दुविधा में आ गए वो सवाल हम एक बार फिर हूबहू दोहराते हैं जो शायद आपको भी पूरी तरफ कन्फूज कर देगा, दरसल सवाल ये था कि अगर   ‘A ‘ एक मेडिकल स्टोर में बम रख देता है और विस्फोट से पहले लोगों को बाहर निकलने के लिए 3 मिनट का समय देता है। ऐसे में ‘बी’ जो गठिया का मरीज है, वह भागने में विफल रहता है और मारा जाता है। ऐसे में ‘ए’ के खिलाफ आईपीसी की किस धारा के तहत केस दर्ज किया जा सकता है?  जवाब के लिए जो विकल्प दिए गए थे, उनमें से एक ये था  कि आरोपी के खिलाफ धारा 302 के तहत केस दर्ज किया जाना चाहिए जो हत्या के आरोपियों पर लगायी जाती है।

याचिकाकर्ताओं ने उत्तर के रूप में इसी विकल्प को चुना था लेकिन आयोग की ओर से जो उत्तर उपलब्ध कराया गया था, उसमें इस विकल्प को सही नहीं माना गया था। आयोग के अनुसार सही जवाब धारा 304 था, जो हत्या की श्रेणी में नहीं बल्कि गैर-इरादतन हत्या के मामलों में लगाया जाता है। आयोग का तर्क है कि उपर्युक्त मामला आईपीसी की धारा 302 से संबंधित नहीं है बल्कि यह इरादे के अभाव में या फिर लापरवाही के कारण मौत से संबंधित है।  मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि हमारे लिए यह कहना पर्याप्त है कि विषय विशेषज्ञ ने मोहम्मद रफीक के मामले में 2021 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोसा किया है। यह अदालत द्वारा दी गई राय के संबंध में कोई भी विचार देने से बचती है।

बता दें कि मोहम्मद रफीक मामले में मध्य प्रदेश में एक पुलिस अधिकारी को एक तेज रफ्तार ट्रक ने कुचल दिया था, जब उन्होंने वाहन पर चढ़ने की कोशिश की थी। ड्राइवर रफीक ने अधिकारी को धक्का देकर गिरा दिया था।
इस बीच याचिका ने कानूनी हलकों में इस बात पर बहस छेड़ दी है कि क्या किसी आतंकवादी कृत्य को ‘हत्या’ की बजाय ‘लापरवाही के कारण मौत’ के रूप में देखा जा सकता है। हाई कोर्ट के वरिष्ठ वकील  बताते हैं  कि यह स्पष्ट रूप से लापरवाही का मामला नहीं है क्योंकि अधिनियम स्वयं इरादे को दर्शाता है। ‘ए’ द्वारा किया गया  काम ऐक्ट के परिणामों को जानता था। ऐसे में बिना किसी संदेह के यह मामला आईपीसी की धारा 302 यानी हत्या के दायरे में आता है।

 

आयोग के जवाब पर इस तरह उठे सवाल 

आयोग द्वारा उपलब्ध कराए गए जवाब जिसे आयोग की ओर से सही जवाब बताया गया है. उसको 
हाईकोर्ट के वकील की दलील गलत साबित करती दिखाई देती है. हाई कोर्ट ने आयोग को दोनों सवालों पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया है। जबकि तीसरे प्रश्न के संबंध में कोर्ट ने कहा कि इसे पूरी तरह से संवेदनहीन तरीके से तैयार किया गया था। अदालत ने कहा कि हमें यह देखकर दुख होता है कि प्रश्न को पूरी तरह से कैजुअल अप्रोच के साथ तैयार किया गया है। अदालत ने कहा कि पूरी प्रक्रिया चार सप्ताह के भीतर पूरी की जानी चाहिए और एक नई मेरिट सूची तैयार की जानी चाहिए जिसके आधार पर चयन प्रक्रिया जारी रहनी चाहिए।

अब इस सवाल के बाद एक नई बहस कानून के नियमों को लेकर भी शुरू हो गयी है तो दूसरी तरफ आयोग की काम करने सहित प्रश्नपत्र बनाने को लेकर उनकी गंभीरता पर भी सवाल खड़े हो गए हैं,,,कोर्ट ने भी आयोग की सवेंदनहीनता को माना है,,,आयोगों पर उत्तराखंड में सवाल उठना कोई नई बात नहीं है बल्कि उत्तराखंड में परीक्षा आयोजित करने वाले आयोग पिछले काफी समय से सवालों के घेरे में हैं, चाहे वो uksssc रहा हो या अब ukpsc हो, इन आयोगों की विश्वसनीयता पिछले काफी समय से  सवालों के घेरे में रही है, हाल ही में सामने आये भर्ती घोटालों ने तो वैसे भी उत्तराखंड का नाम पूरे देश में प्रसिद्ध कर  दिया है, इन भर्ती घोटालों के खिलाफ बेरोजगार छात्र कई बार प्रदर्शन कर चुके हैं,और आज भी उनका प्रदर्शन जारी है, बेरोजगारों की सिर्फ यही मांग है कि इन भर्ती घोटालों की  निष्पक्ष जांच सीबीआई से करवाई जाय,पर आज तक उत्तराखंड की सरकार उनकी मांगों को मानना तो दूर आंदोलन कर रहे बेरोजगारों से मिलने तक नहीं गयी,,,आयोगों की घटती निष्ठा इस प्रदेश के बेरोजगार छात्रों के भविष्य के लिए एक बड़ी चिंता है और प्रदेश सरकार पर लगता एक बड़ा प्रश्न चिन्ह,,,जो परीक्षाये एक पारदर्शी तरिके से कराने में नाकमयाब साबित हुई है,,, बाकी रही सही कसर इस तरह के सवाल पूरे कर रहे  है,,,    

एक साल पूरा ,न्याय अधूरा ! महिला आरक्षण बिल मुबारक हो…

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क्या बिल के बाद सुधरेगी महिलाओं की स्थिति-

 

चुनावी साल में तीन दशकों से लंबित महिला आरक्षण बिल को  मोदी कैबिनेट  ने मंजूरी दे दी, विपक्ष ने भी इस बिल के समर्थन में है. तो अब क्या ये माना जाय कि इस बिल के आने मात्र से  महिलाओं की स्तिथि में सुधार हो जायेगा, महिलाओ की कितनी स्थिति कितनी सुधरती है ये तो आने वाला वक्त बताएगा। बहरहाल  कई सवाल है, जिनका जवाब मिलना अभी बाकी है.

 

महिला आरक्षण से पहले सबसे ज्यादा जरूरी है उनकी सुरक्षा। प्रधानमंत्री मोदी हमेशा ही महिलाओं की बात हर मंच से करते दिखाई देते हैं,बेटी बचाओ,बेटी पढ़ाओ का नारा भी प्रधानमंत्री मोदी ने ही दिया है. लेकिन उन्ही के एक  राज्य जहां की महिलाओं ने उनको वोट के रूप में दिल खोलकर आशीर्वाद दिया हो उस राज्य में  एक बहादुर  बेटी की हत्या कर दी जाती है.

आखिर कब मिलेगा न्याय-

वो लड़की जो अपने दम  पर कुछ काम करके अपने परिवार का सहारा बनना चाहती थी और उस बेटी की बेबस मां न्याय के लिए कोर्ट से लेकर सड़क तक दर-दर भटक कर एड़ियां रगड़ रही हो. एक साल से उस मां के आंसू रुक नहीं रहे हो  और मोदी जी के धाकड़ मुख्यमंत्री उनको न्याय नहीं दिला पा रहे हों.  तो महिला सुरक्षा की बात करना बेमानी प्रतीत होता है,, एक साल से बुजुर्ग माता पिता न्याय के लिए हर दरवाजे और चौखट को खटका रहे हैं लेकिन सरकार उस बदनसीब बेटी के नाम पर एक जगह का नामकरण करके अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होना चाहती है.

एक साल बाद भी इंसाफ नहीं-

उत्तराखंड के बहुचर्चित अंकिता भंडारी हत्याकांड को  एक साल पूरा हो गया है। इस मर्डर केस की गूंज पूरे उत्तराखंड में सुनाई दी थी। 19 साल की अंकिता के साथ युवकों की हैवानियत की कहानी ने लोगों को हिलाकर रख दिया था। अंकिता एक रिजॉर्ट मे रिसेप्शनिस्ट थी। उसकी हत्या सिर्फ इसलिए कर दी गई थी, क्योंकि उस पर रिजॉट में आने वाले VIP गेस्ट को स्पेशल सर्विस देने का दबाव बनाया गया था.. जिसे उसने मना कर दिया,,ये रिजॉर्ट भी बीजेपी नेता के बेटे का था और अपराधी भी खुद बीजेपी नेता का बेटा,,,,केस में भाजपा नेता विनोद आर्य के बेटे पुलकित आर्य पर रेप और हत्या के आरोप लगे, जिसमें सौरभ भास्कर और अंकित गुप्ता ने उसकी मदद की।पुलिस ने आरोपियों को दबोच कर सख्ती से पूछताछ की तो उन्होंने गुनाह कबूल लिया था।

आखिर इतनी देरी क्यों-

सवाल ये खड़ा होता है कि जब अपराधी अपना गुनाह कबूल कर चुके हैं, जांच टीम  दावा कर रही थी  कि टीम के पास पुरे सबूत मौजूद हैं,तो फिर अंकिता को एक साल बाद भी न्याय क्यों नहीं मिल पाया,न्याय मिलने में इतनी देरी क्यों ? अंकिता के माता -पिता ये दावा करते हैं कि स्थानीय विधायक ने रातो रात रिजॉर्ट पर बुलडोजर चला कर सबूत नष्ट किये लेकिन आज भी धाकड़ मुख़्यमंत्री ने अपनी विधायक से इसको लेकर कोई स्पष्टीकरण नहीं मांगा,ऐसे में ये भी संशय पैदा होता है कि क्या बीजेपी नेता का बेटा होने की वजह से अंकिता को न्याय मिलने में देरी हो रही है,,पूरा प्रदेश उस VIP का नाम जानना चाहती है जिसको स्पेशल सर्विस के नाम पर अंकिता पर दबाव बनाया जा रहा था,आखिर क्यों सरकार उस VIP का नाम सार्वजनिक नहीं करना चाह रही.

कई बयानों में खुलासा फिर भी न्याय नहीं-

हत्या से पहले अंकिता पर जो बीती उसका खुलासा गवाहों के बयान में हुआ है। एक  रिपोर्ट के मुताबिक अंकिता भंडारी का लगातार सेक्सुअल हरासमेंट हो रहा था। इतना ही नहीं हत्या से पहले उसके साथ रेप भी हुआ। गवाहों के बयान के मुताबिक पुलकित आर्य की बर्थडे पार्टी के दिन अंकिता को कोल्ड ड्रिंक में शराब मिलाकर पिलाई गई। जब वो बेहोश हो गई तो उसके साथ दुष्कर्म किया गया। सौरभ भास्कर इस करतूत में शामिल था। 108 नंबर कमरे में अंकिता के साथ दुष्कर्म हुआ था, पुलकित ने भी उसके साथ गलत हरकते की। ये लोग उसका यौन शोषण कर रहे थे, बाद में उसे वीआईपी को सौंपने की भी प्लानिंग कर रहे थे।

क्या ये है सरकार का न्याय-

अब जब हत्याकांड को एक साल हो गया है तो मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अंकिता भंडारी के नाम पर डोभ श्रीकोट स्थित राजकीय नर्सिंग कॉलेज का नाम रखने की घोषणा कर दी, लेकिन आरोपियों को अभी तक सजा नहीं हुई।

 

अभी कुछ दिन पहले ही उत्तराखंड में एक सूचना सामने आयी है कि किस तरह बीजेपी की डबल इंजन की सरकार में 2021 से 2023 तक 38 सौ  से अधिक महिलाएं गायब हो गयी है, क्या इस तरह  मोदी सरकार के धाकड़ मुख़्यमंत्री बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ का नारा सफल बनाएंगे,ऐसे हालातों को देख तो लगता है कि जब बेटी बचेगी ही नहीं तो पढ़ने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता.

पूरे प्रदेश में आक्रोश- 

अंकिता भंडारी हत्याकांड से पुरे प्रदेश के लोगों में रोष व्याप्त है,पहाड़ की इस बेटी से यहां के सभी लोगों की भावनाएं जुड़ी हुई हैं,लोगों का गुस्सा सड़कों पर भी फूटता दिखाई देता है, लोग सरकार की मंशा पर ही सवाल उठा रहे हैं, विपक्ष भी लगातार इस मुद्दे पर सरकार को घेरता आ रहा है,लेकिन भाजपा उन पर राजनीति करने का आरोप जरूर लगाती है.

2024 में भाजपा के लिए बड़ी दिक्कत-

लेकिन ये तय है कि जितनी देर अंकिता को न्याय मिलने में हो रही है,उससे सरकार की छवि को धीरे धीरे नुकसान हो रहा है,क्योकि जब हत्याकांड सामने आया था तब भी किसी भाजपा नेता ने इस पर खुल कर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, जिससे जनता में पहले ही एक मेसेज जा चुका है,,,अभी भी अंकिता को न्याय न मिलना 2024 में भाजपा के सामने एक बड़ा मुद्दा बनकर उठेगा,,,जो कम से कम भाजपा के सबसे मजबूत गढ़ माने जाने वाली पौड़ी लोकसभा सीट पर बड़ा असर डालेगा,क्योकि अंकिता इसी सीट से आती है,जहां के लोग इस घटना से आज भी बेहद आक्रोशित हैं.

क्या है महिला आरक्षण बिल ? जाने पूरी जानकारी इस खबर में… 

300 Minutes Read -

केंद्र सरकार की ओर से  नए संसद भवन में पहला विधेयक महिला आरक्षण बिल पेश कर दिया गया है. संसद के निचले सदन में कानून मंत्री अर्जुनराम मेघवाल ने महिलाओं को लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में 33 फीसदी आरक्षण दिलाने वाला ये बिल पेश किया. सरकार का दावा है कि विधेयक पर चर्चा के बाद कल ही इसे पारित भी करा लिया जाएगा.

अब सवाल ये उठता है कि अगर सरकार की योजना के मुताबिक ये बिल कल लोकसभा से पारित हो जाता है तो क्‍या 2024 में होने वाले लोकसभा चुनावों में 181 संसदीय क्षेत्र महिला प्रत्याशियों के लिए आरक्षित कर दिए जाएंगे?

विधेयक में आखिर क्या प्रस्ताव है ?

महिला आरक्षण विधेयक में संसद और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण का प्रस्ताव रखा गया था. बिल में प्रस्ताव रखा गया था कि हर लोकसभा चुनाव के बाद आरक्षित सीटों को रोटेट किया जाना चाहिए. आरक्षित सीटें राज्य या केंद्र शासित प्रदेशों के अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में रोटेशन के जरिये आवंटित की जा सकती हैं. बता दें कि मौजूदा समय में पंचायतों और नगरपालिकाओं में 15 लाख से ज्यादा चुनी हुई महिला प्रतिनिधि हैं, जो 40 फीसदी के आसपास होता है. वहीं, लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं की उपस्थिति काफी कम है.

महिलाओं की शक्ति,, समझ और नेतृत्व जिसे दशकों तक भारतीय राजनीति में जगह नहीं मिली, उसको पूजन योग्य बताते हुए सरकार ने ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ का प्रस्ताव लोकसभा में पेश किया है.लेकिन क़ानून बनाने और नारी शक्ति के वंदन के अमल में सरकार का ही नहीं राजनीतिक पार्टियों का इम्तिहान होगा. काम के अन्य क्षेत्रों की ही तरह, राजनीति भी पुरुष प्रधान रही है. आरक्षण के जरिए महिलाओं के राजनीति में आने को समर्थन देने से राजनेता बार-बार पीछे हटे हैं.साल 1992 में पंचायत के स्तर पर 33 प्रतिशत आरक्षण का कानून बनाए जाने के बावजूद यही आरक्षण संसद और विधानसभाओं में लाने के प्रस्ताव पर आम राय बनाने में तीन दशक से ज़्यादा लग गए हैं.

बिल से जुड़ी सभी जानकारियां  – 

दरअसल महिला आरक्षण बिल 1996 से ही अधर में लटका हुआ है. उस समय H. D देव गौड़ा सरकार ने 12 सितंबर 1996 को इस बिल को संसद में पेश किया था. लेकिन पारित नहीं हो सका था. यह बिल 81 वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में पेश हुआ था. बिल में संसद और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण का प्रस्ताव था. इस 33 फीसदी आरक्षण के भीतर ही  S.C, S.T के लिए उप-आरक्षण का प्रावधान था. लेकिन अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण का प्रावधान नहीं था. इस बिल में प्रस्ताव है कि लोकसभा के हर चुनाव के बाद आरक्षित सीटों को रोटेट किया जाना चाहिए.

आरक्षित सीटें राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में रोटेशन के ज़रिए आवंटित की जा सकती हैं. इस संशोधन अधिनियम के लागू होने के 15 साल बाद महिलाओं के लिए सीटों का आरक्षण खत्म हो जाएगा.अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने 1998 में लोकसभा में फिर महिला आरक्षण बिल को पेश किया था. कई दलों के सहयोग से चल रही वाजपेयी सरकार को इसको लेकर विरोध का सामना करना पड़ा. इस वजह से बिल पारित नहीं हो सका. वाजपेयी सरकार ने इसे 1999, 2002, 2003 और 2004 में भी पारित कराने की कोशिश की लेकिन सफल नहीं हुई. बीजेपी सरकार जाने के बाद 2004 में कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए सरकार सत्ता में आई और डॉक्टर मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने.

जब 2008 में यूपीए ने पेश किया था बिल – 

यूपीए सरकार ने 2008 में इस बिल को 108 वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में राज्यसभा में पेश किया. वहां ये बिल 9  मार्च 2010 को भारी बहुमत से पारित हुआ. बीजेपी, वाम दलों और जेडीयू ने बिल का समर्थन किया था. यूपीए सरकार ने इस बिल को लोकसभा में पेश नहीं किया. इसका विरोध करने वालों में समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल शामिल थीं. ये दोनों दल यूपीए का हिस्सा थे. कांग्रेस को डर था कि अगर उसने बिल को लोकसभा में पेश किया तो उसकी सरकार ख़तरे में पड़ सकती है.

 

साल में 2008 में इस बिल को क़ानून और न्याय संबंधी स्थायी समिति को भेजा गया था. इसके दो सदस्य वीरेंद्र भाटिया और शैलेंद्र कुमार समाजवादी पार्टी के थे. इन लोगों ने कहा कि वे महिला आरक्षण के विरोधी नहीं हैं. लेकिन जिस तरह से बिल का मसौदा तैयार किया गया, वे उससे सहमत नहीं थे. इन दोनों सदस्यों की सिफ़ारिश की थी कि हर राजनीतिक दल अपने 20 फ़ीसदी टिकट महिलाओं को दें और महिला आरक्षण 20 फीसदी से अधिक न हो.  साल 2014 में लोकसभा भंग होने के बाद यह बिल अपने आप खत्म हो गया. लेकिन राज्यसभा स्थायी सदन है, इसलिए यह बिल अभी जिंदा है.अब  इसे लोकसभा में नए सिरे से पेश करना पड़ेगा. अगर लोकसभा इसे पारित कर दे, तो राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह कानून बन जाएगा. अगर यह बिल कानून बन जाता है तो 2024 के चुनाव में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण मिल जाएगा.

बिल के समर्थन में विपक्ष ने भी दिलाई थी याद- 

साल 2014 में सत्ता में आई बीजेपी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में इस बिल की तरफ ध्यान नहीं दिया. नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में इसे पेश करने का मन बनाया है.हालांकि उसने 2014 और 2019 के चुनाव घोषणा पत्र में 33 फीसदी महिला आरक्षण का वादा किया है. इस मुद्दे पर उसे मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस का भी समर्थन हासिल है.कांग्रेस संसदीय दल की नेता सोनिया गांधी ने 2017 में प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखकर इस बिल पर सरकार का साथ देने का आश्वासन दिया था.वहीं कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद राहुल गांधी ने 16 जुलाई 2018 को प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर महिला आरक्षण बिल पर सरकार को अपनी पार्टी के समर्थन की बात दोहराई थी.

विपक्ष ने उठाया मुद्दा- 

सोमवार को कैबिनेट की बैठक में महिला आरक्षण बिल को मंजूरी मिलने की बात सामने आने के बाद कांग्रेस ने इस मुद्दे को उठाया. कांग्रेस ने कहा कि बहुमत होने के बाद भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में इस बिल को पारित कराने का कोई प्रयास नहीं किया. कांग्रेस ने विशेष सत्र में इस बिल को पारित कराने की मांग की है. विशेष सत्र से पहले सरकार ने सर्वदलीय बैठक बुलाई थी. इसमें कांग्रेस बीजू जनता दल,, भारत राष्ट्र समिति और कई अन्य दलों ने महिला आरक्षण विधेयक को संसद में पेश करने पर ज़ोर दिया था. इस समय लोकसभा में 82 और राज्य सभा में 31 महिला सदस्य हैं. यानी की लोकसभा में महिलाओं की भागीदारी 15 फीसदी और राज्य सभा में 13 फ़ीसदी है.

 पहली बार इस सरकार ने की थी बिल पेश करने  की कोशिश-

इंदिरा गांधी 1975 में प्रधानमंत्री थीं तो ‘to words equality ‘ नाम की एक रिपोर्ट आई थी. इसमें हर क्षेत्र में महिलाओं की स्थिति का विवरण दिया गया था.इसमें महिलाओं के लिए आरक्षण की भी बात थी. इस रिपोर्ट को तैयार करने वाली कमेटी के अधिकतर सदस्य आरक्षण के खिलाफ थे. वहीं महिलाएं चाहती थीं कि वो आरक्षण के रास्ते से नहीं बल्कि अपने बलबूते पर राजनीति में आए.

राजीव गांधी ने अपने प्रधानमंत्री काल में 1980 के दशक में पंचायत और स्थानीय निकाय चुनाव में महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण दिलाने के लिए विधेयक पारित करने की कोशिश की थी, लेकिन राज्य की विधानसभाओं ने इसका विरोध किया था. उनका कहना था कि इससे उनकी शक्तियों में कमी आएगी. पहली बार महिला आरक्षण बिल को एचडी देवगौड़ा की सरकार ने 12 सितंबर 1996 को पेश करने की कोशिश की.  सरकार ने 81 वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में संसद में महिला आरक्षण विधेयक पेश किया. इसके तुरंत बाद देवगौड़ा सरकार अल्पमत में आ गई. देवगौड़ा सरकार को समर्थन दे रहे मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद महिला आरक्षण बिल के विरोध में थे.  जून 1997 में फिर इस विधेयक को पारित कराने का प्रयास हुआ. उस समय शरद यादव ने विधेयक का विरोध करते हुए कहा था, ”परकटी महिलाएं हमारी महिलाओं के बारे में क्या समझेंगी और वो क्या सोचेंगी.”

1998 में जब वाजपेयी सरकार में बिल पेश करने की हुई थी कोशिश- 

1998 में 12वीं लोकसभा में अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए की सरकार आई. इसके कानून मंत्री एन थंबीदुरई ने महिला आरक्षण बिल को पेश करने की कोशिश की. लेकिन सफलता नहीं मिली. एनडीए सरकार ने 13वीं लोकसभा में 1999 में दो बार महिला आरक्षण बिल को संसद में पेश करने की कोशिश की. लेकिन सफलता नहीं मिली.   वाजपेयी सरकार ने 2003 में एक बार फिर महिला आरक्षण बिल पेश करने की कोशिश की. लेकिन प्रश्नकाल में ही जमकर हंगामा हुआ और बिल पारित नहीं हो पाया.

 

एनडीए सरकार के बाद सत्तासीन हुई यूपीए सरकार ने 2010 में महिला आरक्षण बिल को राज्यसभा में पेश किया. लेकिन सपा-राजद ने सरकार से समर्थन वापस लेने की धमकी दी. इसके बाद बिल पर मतदान स्थगित कर दिया गया. बाद में 9  मार्च 2010 को राज्यसभा ने महिला आरक्षण बिल को 1  के मुकाबले 186 मतों के भारी बहुमत से पारित किया. जिस दिन यह बिल पारित हुई उस दिन मार्शल्स का इस्तेमाल हुआ.

कुछ तथ्य और जानकारियां-

अब आपके सामने कुछ तथ्य रखते हैं जिनको देख शायद कुछ तस्वीर और साफ हो पायेगी, 543 सीटों वाली लोकसभा में फिलहाल सिर्फ़ 78 महिला सांसद हैं, जबकि 238 सीटों वाली राज्यसभा में सिर्फ़ 31 महिला सांसद हैं, छत्तीसगढ़ विधानसभा में महिला विधायकों की संख्या 14 फीसदी है,जबकि पश्चिम बंगाल विधानसभा में महिला विधायकों की संख्या 13.7 फीसदी, झारखंड विधानसभा में महिला विधायकों की संख्या 12.4 फीसदी और बिहार, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और दिल्ली विधानसभा में महिला विधायकों की संख्या 10-12 फीसदी तक है,

बाकी राज्यों  में महिला विधायकों की संख्या 10 फीसदी से कम है, इससे ये अंदाजा लगाया जा सकता है कि महिलाओं की राजनीति में भागीदारी बेहद कम है.

क्या 2024 चुनाव तक लागू होगा विधेयक-

ये भी सवाल उठता है कि ये बिल कानून का रूप लेने के बाद  कब  लागू होगा और इसमें सबसे बड़ी समस्या क्या है ? अगर महिला आरक्षण विधेयक  लोकसभा में पारित हो भी जाता है तो भी इसे लोकसभा चुनाव 2024 में लागू करना मुश्किल है. संसद से पारित होने के बाद महिला आरक्षण बिल को कम से कम 50 फीसदी विधानसभाओं से पारित कराना होगा.  यानी कि अगर केंद्र सरकार को ये कानून देशभर में लागू करना है तो इसे कम से कम 15 राज्यों की विधानसभाओं से भी पास कराना होगा. वहीं, 2026 के बाद परिसीमन का काम भी होना है. कानून बनने पर भी महिला आरक्षण विधेयक परिसीमन के बाद ही लागू किया जा सकेगा. ऐसे में महिला आरक्षण लोकसभा चुनाव 2029 में लागू हो सकता है.

15 साल के लिए ही होगा लागू-

अब सवाल ये उठता है कि कानून बनने के बाद 33 फीसदी महिला आरक्षण कब तक लागू रहेगा? तो सबसे बड़ी बात आपको बता दें कि राज्यसभा और विधान परिषदों में महिला आरक्षण लागू नहीं होगा.साल 1996 में जब ये विधेयक पेश किया गया था, तो इसके प्रस्‍ताव में स्पष्ट तौर पर लिखा गया था कि इसे सिर्फ 15 साल के लिए ही लागू किया जाएगा. इसके बाद इसके लिए फिर से विधेयक लाकर संसद के दोनों सदनों से पारित कराना होगा. सवाल ये उठता है कि अगर ये विधेयक कानून बन जाता है तो इसकी 15 साल की अवधि कब से शुरू होगी ? कानून विशेषज्ञों के मुताबिक, महिला आरक्षण की 15 साल की अवधि लोकसभा में इसके लागू होने के बाद से ही शुरू होगी. अगर ये 2029 में लागू हो जाता है तो ये 2044 तक लागू रहेगा. इसके बाद दोबारा विधेयक संसद में लाना होगा और पूरी प्रक्रिया से गुजरना होगा.

अभी लोकसभा में 15 फीसदी है महिलाओं की भागीदारी- 

अब आपको बताते हैं, इस बिल के लागू होने पर क्या  समीकरण बनेंगे ? महिला आरक्षण लागू होने के बाद लोकसभा में मौजूदा सांसदों की संख्या के आधार पर संसद के निचले सत्र में कम से कम 181 महिला MP तो होंगी ही. फिलहाल लोकसभा में महिला सांसदों की भागीदारी 15 फीसदी से भी कम है. इस समय लोकसभा में 78 महिला सांसद ही हैं. अगर परिसीमन के बाद संसद सीटों की संख्या बढ़ती है तो महिला सांसदों की संख्या में भी इजाफा होगा.

कई पार्टियां क्यों कर रही हैं विरोध- 

सबसे बड़ा और अहम सवाल जिस को लेकर कई पार्टियां इस बिल का विरोध कर  रही हैं इसकी सबसे बड़ी वजह है एससी-एसटी आरक्षण ? सवाल ये  है कि क्या इनको अलग से आरक्षण मिलेगा ? तो आपको ये भी बता दें कि लोकसभा में  S.C और S.T  आरक्षण लागू है. लेकिन  S.C, S.T   महिलाओं को अलग से आरक्षण नहीं मिलेगा. महिला प्रतिनिधियों को कोटा में कोटा मिलेगा.

महिलाओं को आरक्षण- 

आसान भाषा में कहें तो लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एससी-एसटी वर्ग के लिए पहले से आरक्षित सीटों में ही महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण मिलेगा. फिलहाल लोकसभा में 47 सीटें  S.T  और 84 सीटें S.C  वर्ग के लिए आरक्षित हैं. संसद की मौजूदा स्थिति के आधार पर कहा जा सकता है कि कानून बनने के बाद 16 सीटें एसटी और 28 सीटें एससी वर्ग की महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी. बता दें कि लोकसभा में ओबीसी वर्ग के लिए आरक्षण की कोई व्यवस्था नहीं है. इसके अलावा महिलाएं उन सीटों पर भी चुनाव लड़ सकती हैं, जो उनके लिए आरक्षित नहीं हैं.

उत्तराखंड में लापता हुई 3854 महिलाएं और 1134 लड़कियां, RTI का बड़ा खुलासा…

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  • देवभूमि में महिलाएँ के अपराध के बढ़ते मामले.
  • महिलाओं के गुमशुदगी के बढ़ते आंकड़ों पर सवाल.
  • 2021 से 2023 तक 3854 महिलाओं की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज.
  • RTI ने किया बड़ा खुलासा.
  • आखिर कहाँ गायब हो रही हैं इतनी महिलाएँ ? 
महिलाओं की गुमशुदगी को लेकर RTI का बड़ा खुलासा-

देवभूमि उत्तराखंड को शांत औऱ अपराध मुक्त प्रदेश के रूप में माना जाता है, लेकिन अब उत्तराखंड को मानो किसी की नजर लग गयी है, सवाल उठने लगे हैं कि क्या उत्तराखंड अब महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं रह गया है,ऐसा हम नहीं कुछ चिंताजनक आंकड़े बता रहा रहे हैं, पुलिस मुख्यालय से मिली जानकारी में कुछ ऐसे आंकड़े महिलाओं और बेटियों के गायब होने के सामने आए हैं जो आपके होश उड़ा सकती है, ये आंकड़े प्रदेश में कानून व्यवस्था से लेकर बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ के नारे पर भी सवाल उठाती है।


2021 से 2023 तक महिलाओं की गुमशुदगी के आंकड़े-

देश के अलग-अलग राज्यों में महिलाओं के खिलाफ अपराध की खबरें आती रहती हैं। इसी तरह उत्तराखंड में लम्बे समय से महिलाओं के लापता होने की घटनाओं के बीच सनसनीखेज खुलासा हुआ है।ये जानकारी एक RTI के जवाब में  काशीपुर निवासी नदीम उद्दीन को पुलिस मुख्यालय द्वारा उपलब्ध कराई गयी है कि जनवरी 2021 से मई, 2023 के बीच मात्र 29 महीने में 3854 महिलायें और 1134 लड़कियां लापता हो गईं। ला महिलाओं और लड़कियों की गुमशुदगी पुलिस विभाग में पंजीकृत हुई है। इन मामलों में पुलिस और स्थानीय जनता की सक्रियता से इनमें से 2961 महिला तथा 1042 लड़कियां बरामद भी की जा चुकी हैं।

RTI का बड़ा खुलासा- 

पुलिस मुख्यालय द्वारा आरटीआई एक्टिविस्ट नदीम उद्दीन को उपलब्ध कराई सूचना के अनुसार, राज्य के 13 जिलों तथा रेलवे सुरक्षा पुलिस (जी.आर.पी.) के अंतर्गत, जनवरी 2021 से मई 2023 तक कुल 3854 महिलाएं गुमशुदा दर्ज की गई है। इनमें 2021 में 1494, वर्ष 2022 में 1632 तथा वर्ष 2023 में मई तक 728 महिलाएं शामिल हैं। इसी अवधि में कुल 1132 लड़कियां गुमशुदा दर्ज हुई हैं। जिसमें 2021 में 404, साल 2022 में 425 और 2023 में मई तक 305 लड़कियां शामिल हैं।

5 महीने में 414 मामले-

बीते पांच महीनों में राज्य के विभिन्न थानों में 305 बालिकाओं के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज हुई। वहीं इस अवधि में 109 किशोरों के लापता होने की शिकायतें भी आई हैं। 

RTI में मिली जानकारी के अनुसार वर्ष 2023 के जनवरी से मई माह के बीच लापता 300 से अधिक बालिकाओं में से 59 का अब तक पता नहीं चल पाया है। सभी की उम्र 18 वर्ष से कम है। बेटियां कहां और किस हाल में हैं, यह सोचकर परिजन परेशान हैं।

इन जिलों में इतने मामले-

हरिद्वार जिले से सबसे ज्यादा 95 और देहरादून से 80 बालिकाएं लापता हुई हैं। वहीं कुमाऊं की बात करें तो ऊधमसिंह नगर से 49 और नैनीताल से 17 नाबालिग बेटियां लापता हुई हैं। पहाड़ों में पिथौरागढ़ से सबसे अधिक 15 बेटियां लापता हैं।

सबसे ज्यादा गुमशुदगी के मामले इस जिले में- 

राज्य में सबसे ज्यादा किशोर भी हरिद्वार जिले से लापता हो रहे हैं। बीते पांच माह में हरिद्वार से 47 किशोर लापता हुए हैं। देहरादून से 16 और ऊधमसिंह नगर से 11 किशोर लापता हुए। कुल लापता हुए 109 किशोरों में से 94 को पुलिस ने बरामद कर लिया है। 

 
क़ानून व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती-

इन आंकड़ों से ये भी सवाल उठते हैं क्या देवभूमि में महिलाओं की गुमशुदगी के पीछे कोई सोची समझी साजिश तो नहीं, इतनी बड़ी संख्या तो कुछ इसी तरफ इशारा करती है, कानून व्यवस्था के लिए भी ये एक चुनौती है कि इस तरह महिलाओं और बेटियों के गायब होने के पीछे आखिर क्या राज छिपा है, राज्य सरकार पर भी इस पर सवाल उठते हैं। ये सवाल और भी गहरा जाते हैं जब ग्रह मंत्रालय का प्रभार भी प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के अधीन है 

ऐसे में पहाड़ से महिलाओं, बेटियों और बच्चों के गायब होने की घटना चिंता जाहिर करती है. खासकर तब जब मात्र ढाई  वर्ष के अंतराल में हज़ारों की संख्या में बेटियां गायब होने लगें 

महंगे पेंट का खर्चा भूल जाइए, गाय के गोबर से बना एंटी बैक्टीरियल पेंट से चमकेगा घर…

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गाय के गोबर से बनेगा प्राकृतिक पेंट, जाने  इसके फायदे-

गौशालाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने की मुहिम.

प्राकृतिक पेंट बनाने में किया जाएगा गोबर का इस्तेमाल.

गोबर युक्त पेन्ट एन्टी फंगल, एन्टी बैक्टीरियल, अन्य केमिकल पेन्ट से सस्ता.

यूपी के बांदा में अन्ना गोवंशों को संरक्षित रखने के लिए तीन सौ से अधिक गौशाला बनाए गए हैं। इन गौशालाओं में संरक्षित गोवंशों के भरण पोषण के लिए पर्याप्त बजट न होने पर जन भागीदारी से गोवंशों को चारा भूसा उपलब्ध कराया जा रहा है। साथ ही जिला अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल गौशालाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए मुहिम चला रही हैं। इसी मुहिम के तहत अब गौशाला से निकलने वाले गोबर का इस्तेमाल प्राकृतिक पेंट बनाने में किया जा रहा है।

किसानों के लिए मुनाफे का सौदा-

गोवंश के गोबर से वर्मी कम्पोस्ट तैयार खाद कृषि उत्पादन के लिए बहुत लाभकारी है। इसके साथ ही गौवंश के गोबर युक्त पेन्ट एन्टी फंगल, अन्य केमिकल पेन्ट से सस्ता, एन्टी बैक्टीरियल भी होता है। इसका फसलों में इसका छिड़काव और प्रयोग करने से भी फसल पैदावार में भी लाभ मिलता है।इस तरह तैयार होगा प्राकृतिक पेंट-

  • सबसे पहले गाय के गोबर से कंकड़, घास निकाल कर अलग किया जाता हैं और उसका वजन किया जाता हैं।
  • इसके बाद साफ किए गए गोबर को एक भंडारण टैंक में डाला जाता हैं जिसमें पानी होता है।
  • मोटर चलित भंडारण टैंक गाय के गोबर और पानी को 40 मिनट तक मथता है।
  • इससे पहले उस मिश्रण को दूसरे सेक्शन में ले जाया जाता है। जहां इसे एक समान पेस्ट जैसे तरल में बदल दिया जाता है।
  • तरल को 100 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर आधे घंटे तक गर्म किया जाता है, जिसके बाद इसे ब्लीच किया जाता है।
  • इसके बाद मिश्रण में रंग मिलाया जाता है, और यह प्राकृतिक पेंट तैयार होता है।
  • इस पेंट को प्राकृतिक पेंट के ब्रांड नाम से बाजार में बेचा जाता है।
 

प्राकृतिक पेंट बनाने का निर्णय-

इस प्राकृतिक पेंट प्रोजेक्ट के अंतर्गत, स्थानीय गौशाला संचालकों, पंचायत प्रमुखों, स्वयंसेवी संस्थाओं, और अधिकारियों को जागरूक करने के लिए एक अभियान चलाया जा रहा है। इस अभियान के तहत, तीन स्वयंसेवी संस्थाएं प्राकृतिक पेंट बनाने का निर्णय ले चुकी है। इसके अलावा गौवंशों को हरा चारा प्रदान करने के लिए भी कई मादक उपायों का उपयोग किया जा रहा है, जिससे उनकी सुरक्षा और खुशहाली सुनिश्चित की जा सकती है।

 

प्रतिदिन 5500 रुपये की होगी आमदनी-

प्रोजेक्ट मैनेजर की माने तो 1 किलोग्राम गोबर में पाउडर मिलाकर 3 लीटर पेंट तैयार होगा. 1 लीटर पेंट 225 से 250 रुपये लीटर में बिकेगा. यानी 1 किलो गोबर से करीब 700 रुपये की आमदनी होगी. एक गाय प्रतिदिन 8 किलोग्राम गोबर देती है, जिससे प्रतिदिन करीब 5500 रुपये तक की आमदनी होगी. इसके लिए खादी आश्रम से अनुबंध होगा, जो पेंट लेकर बिक्री करेगा. यह पेंट दो किस्म के डिस्टेंपर और इमल्शन में तैयार होगा. गाय के गोबर से बने प्राकृतिक पेंट को घर की दीवारों पर कराया जा सकेग।

 

सुसाइड शहर बनता कोटा, आखिर क्यों नही रुक रहे कोटा में सुसाइड केस…

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आखिर क्या है कोटा की कहानी-

कोरोना महामारी जब चरम पर थी तब देश में नेशनल एजुकेशन पॉलिसी आयी… इस पॉलिसी में कोचिंग कल्चर की आलोचना की गई थी. कोचिंग संस्थानों में सबसे आगे माने जाने वाले शहर राजस्थान के कोटा में कोचिंग कल्चर,,  स्टूडेंट्स की जान ले रहा है. अकेले कोटा में इस साल अगस्त तक 23 बच्चों ने खुद को मौत के हवाले कर दिया. ये छात्र वहां रहकर कोचिंग संस्थानों में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे थे। आखिर वहां छात्रों द्वारा आत्महत्या का दौर खत्म क्यों नहीं हो रहा है?  क्या कारण है कि सुनहरे भविष्य की राह पर चलने वाले छात्र अपना जीवन खत्म करने को मजबूर हो रहे हैं? छात्रों में ऐसा नकारात्मक दृष्टिकोण क्यों आ रहा है? अब सवाल ये खड़ा होता है कि आखिर क्यों बच्चे ऐसा कदम उठा रहे हैं. इसके पीछे आखिर क्या कारण है.

 

क्यों बच्चों पर बढ़ रहा है बोझ-

ये एक तरह की ज़िम्मेदारी बच्चों के कंधों पर तब डाल दी जाती है, जब उनका कंधा पहले से ही 10 किलो के स्कूली बैग से झुका होता है। ऐसे बच्चे कुछ और बनने का सपना नहीं देख पाते, उनकी आंख खुलने से पहले ही उन्हें एक सपना दिखा दिया जाता है IIT या NEET क्वालीफाई करके देश के किसी बड़े मेडिकल कॉलेज में एडमिशन लेने का, बिना ये जाने कि उनमें वो सपना हासिल करने की क्षमता है भी या नहीं।  इन छोटे-छोटे रंगीन गुब्बारों में इतनी ज्यादा आईआईटी और नीट के सपने की हवा भर दी जाती है कि वो आसमान में उड़ने की बजाय कोटा में पहुंच कर फट जाते हैं. बीते दिनों तीन छात्रों के साथ भी ऐसा ही हुआ। प्रणव , उज्ज्वल , और अंकुश  ये 17 -18 साल के तीन  छात्र उस उम्र में दुनिया को अलविदा कर के चले गए. अब तक के जांच में जो बात सामने निकल कर आई है वो ये है कि ये तीनों छात्र पढ़ाई के दबाव की वजह से डिप्रेस थे और कई दिनों से अपनी कोचिंग और क्लासेज भी मिस कर रहे थे।

आज व्यक्ति का मूल्यांकन उसके मूल्यों और सही आचरण से नहीं होता, बल्कि उसके द्वारा कमाए धन से माना जाता है। दूसरा कारण माता-पिता की महत्वाकांक्षा है। आज हर माता-पिता अपने बच्चों को डॉक्टर और इंजीनियर के अतिरिक्त और कुछ नहीं बनाना चाहता। आईआईटी और एम्स से नीचे किसी इंस्टीट्यूट में वे अपने बच्चों का एडमिशन नहीं करवाना चाहते। अभिभावकों के जीवन में बच्चों की रुचियों, उनकी महत्वाकांक्षाओं का कोई महत्व नहीं होता। माता-पिता अपने दृष्टिकोण के अनुसार उनके लिए दिशा निर्धारित करते हैं। उन्हें क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए, इसका निर्धारण माता-पिता बच्चों पर न छोड़कर स्वयं करते हैं।

 

आखिर बच्चे क्यों उठा रहे हैं ये कदम?

कोचिंग संस्थानों की इस मानसिकता से कहीं न कहीं वह छात्र भी प्रभावित होता है, जो इनसे जुड़ा है। कोचिंग संस्थान जितने बच्चों का दाखिला करते हैं, उन पर उन्हें बराबर ध्यान देना चाहिए और उनकी क्षमतानुसार उन्हें शिक्षा देने के साथ उनकी प्रतिभा का विकास करना चाहिए, पर वे सभी को एक डंडे से हांकते हैं। पाठ्यक्रम पूरा करने की होड़ में कोचिंग इंस्टीट्यूट यह भूल जाते हैं कि कुछ बच्चे सबके साथ दौड़ नहीं सकते। ऐसे ही छात्रों के मन में हीनता बोध का जन्म होता है, जो उन पर इस कदर हावी हो जाता कि उन्हें लगने लगता है कि वे अब कुछ नहीं कर सकते। उन्हें ग्लानि होती है कि उन्होंने अपने माता-पिता का पैसा बर्बाद कर दिया। जब ये ग्लानि अपने चरम पर पहुंच जाती है तो वे आत्महत्या की ओर कदम बढ़ा लेते हैं,

कोटा में अब तक इतने छात्रों ने किया सुसाइड-

कोटा में इस वर्ष अब तक 23 छात्रों की मौत सुसाइड करने से हुई है. यह घटना सिर्फ इस बार की नहीं है. पिछले साल भी कोटा में 17 छात्रों की मौत आत्महत्या करने से हुई थी. 2022 के पहले भी यह होता रहा रहा है.. 27 अगस्त को टेस्ट में कम नंबर आने पर नीट की तैयारी कर रहे दो छात्रों ने आत्महत्या कर ली… आखिरी कैसे और कब कोटा में रुकेगा छात्रों की आत्महत्या का सिलसिला…  आपको इसके बारे में आगे बताये पहले एक नजर कोटा शहर में हुई उन छात्रों की मौत के आंकड़ों पर डालते हैं जो आपको सोचने को मजबूर कर देंगे,, कोटा में साल 2015 में  17 छात्रों की  मौतें  जबकि  2016 में  16 छात्रों की मौतें..  2017 में  7 छात्रों की मौतें , 2018 में  8 छात्रों की मौतें,  2020 में  4 की मौतें वहीं 2022 में  15 और इस साल यानी 2023 में अब तक 23 छात्र आत्महत्या कर चुके हैं,,


क्या कहते हैं NCRB के आंकड़े-

NCRB के आंकड़ों पर नज़र डालें तो हर साल देश में हजारों छात्र आत्महत्या करते हैं.. पिछले पांच साल के आंकड़ों पर नज़र डालें तो 2017 में जहां कुल 9 हजार 905 छात्रों ने आत्महत्या की थी, वहीं साल 2018 में 10 हजार 159 छात्रों ने आत्महत्या की थी… 2019 में ये आंकड़ा 10 हजार 335 था और 2020 में ये 12 हजार 526 तक पहुंच गया..  जबकि, 2021 में देश में कुल 13 हजार 89 छात्रों ने आत्महत्या की… आपको बता दें 2020 से 2021, जब सबसे ज्यादा छात्रों ने आत्महत्या की उस वक्त कोरोना काल चल रहा था और ज्यादातर छात्र अपने घरों से पढ़ाई कर रहे थे.. ये सोचने वाली बात है कि हॉस्टल में रहने की बजाय जब छात्रों को घर पर रह कर पढ़ाई करनी पड़ी तो उनमें आत्महत्या की दर ज्यादा थी। NCRB के आंकड़े में एक और बात सामने आई की आत्महत्या करने वाले छात्रों में लड़कों की संख्या लड़कियों की अपेक्षा ज्यादा थी।

ये राज्य आत्महत्या के मामले में सबसे ऊपर-

छात्रों के आत्महत्या के मामले में देश के जो पांच राज्य सबसे ऊपर हैं, उनमें महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक और ओडिशा हैं। एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार, साल 2021 में महाराष्ट्र के 1 हजार 834 छात्रों ने आत्महत्या की , वहीं मध्य प्रदेश के 1 हजार 308 छात्रों ने आत्महत्या की। जबकि, तमिलनाडु के 1 हजार 246 छात्रों ने आत्महत्या को चुना। वहीं कर्नाटक के 855 और ओडिशा के 834 छात्रों ने आत्महत्या कर ली… हालांकि, एनसीआरबी की रिपोर्ट में इस बात का जिक्र नहीं है कि छात्रों के आत्महत्या के पीछे की वजह क्या है, लेकिन ये जरूर बताया गया है कि साल 2021 में जिन 13 हजार 89 छात्रों ने आत्महत्या की थी, उनमें 10 हजार 732 की उम्र 18 साल से कम थी।

साल 2020 के मिड में आई नेशनल एजुकेशन पॉलिसी में कहा गया था कि कोचिंग कल्चर पर लगाम लगाने के लिए करिकुलम और एग्जाम सिस्टम में व्यापक सुधार किए जाएंगे, लेकिन कोटा के हाल से साफ है कि इस ओर कोई खास कदम नहीं उठाए गए. आंकड़े भी इसकी गवाही देते हैं. अगर इंजीनियरिंग और मेडिकल के करिकुलम और एक्जाम सिस्टम में बदलाव होते तो उसका असर कोटा की कोचिंग फैक्ट्रीज पर देखने को मिलता, लेकिन आंकड़े कुछ और ही कहते हैं.

इस साल सबसे ज्यादा आत्महत्या के मामले-

एक रिपोर्ट के मुताबिक कोटा में 4 हजार होस्टल्स और 40 हजार पेइंग गेस्ट हैं. इन ठिकानों में देशभर से आए 2 लाख से ज़्यादा बच्चे रहते हैं. ये बच्चे जॉइंट एंट्रेंस एग्जाम यानी JEE और NEET की रेस का हिस्सा होते हैं. पढ़ाई की रेस में लगे युवा उम्मीदवारों में से 23 ने इस साल अगस्त तक जान दे दी. छात्रों की आत्महत्या के मामले में ये पिछले 8 सालों का सबसे बड़ा आंकड़ा है. किसी कदम का कैसा असर होता है उसको समझने का सबसे लेटेस्ट एग्जांपल है CUET  यानी कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट… मामला डीयू जैसी यूनिवर्सिटी का है. डीयू में पहले मेरिट बेसिस पर एडमिशन मिलता था. ऐसे एडमिशन के मामले में CBSE  बोर्ड वाले आगे निकल जाते थे और स्टेट बोर्ड वाले मार खा जाता थे. माना यही जाता है कि CBSE की तुलना में स्टेट बोर्ड काफी कम नंबर देते हैं.

 

एग्जाम पर दो महीने की पाबंदी-

एक बच्चे का आधे से ज्यादा समय केवल स्कूल में निकल जाता है. इसके बाद वह ट्यूशन या कोचिंग में पिसता है. फिर स्कूल और ट्यूशन में मिली एक्टिवीटीज में लग जाता है. ऐसे में अगर कोई सी भी चीज थोड़ी भी इधर-उधर हो जाए तो न जाने उसके मेंटल हेल्थ पर क्या असर पड़ता होगा…  वो भी उस दौर में जब अचीवमेंट्स को सोशल मीडिया पर सेलिब्रेट किया जाता है… लाइक्स और कमेंट्स वाले सेलिब्रेशन का भी बच्चों के दिमाग पर जो असर पड़ता है, शायद ही उसकी कोई मैपिंग हुई हो. हालांकि एक बात तय है कि मौजूदा कोचिंग सिस्टम का स्टूडेंट्स के दिमाग पर तगड़ा असर है. शायद इसी वजह से 23 बच्चों की मौतों की वजह से कोटा के कोचिंग सेंटर में होने वाले टेस्ट और एग्जाम पर दो महीने के लिए पाबंदी लगा दी गई है. ये पाबंदी DISTRICT ADMINISTRATION ने लगाई है… इस तरह का बैन जरूरी भी है. बच्चों को डॉक्टर इंजीनियर बनाने के प्रेशर में घर वाले 13 से 14 साल की उम्र में ही अपने से दूर करके कोटा की कोचिंग फैक्ट्री में मजदूरी करने भेज देते हैं,..  जबकि जेईई-नीट की परीक्षाएं 12वीं के बाद होती हैं,,, लेकिन स्कूलिंग छुड़वाकर, अटेंडेंस के मामले में तिकड़म लगाकर बच्चों को कोटा फैक्ट्री का मजदूर बना दिया जाता है. छोटी उम्र में परिवार से दूर एक नीरस से शहर में ये बच्चे जब कोचिंग सेंटर्स में एडमिशन लेते हैं तब इन्हें कंपार्टमेंट लाइज कर दिया जाता है.

2021 में 13 हजार से अधिक की मृत्यु आत्महत्या से-

कुछ हफ्ते पहले, राजस्थान के ‘कोचिंग हब’ कोटा में एक अनोखा ‘आत्महत्या-विरोधी’ उपाय लागू किया गया था. इस उपाय के तहत पंखे में स्प्रिंग लगाने की बात की गयी. ऐसे में अगर कोई छात्र लटककर आत्महत्या करने की कोशिश करता है, तो स्प्रिंग फैलेगा और छात्र की मौत नहीं होगी. कोचिंग हब ‘कोटा’ की स्थिति वास्तव में बेहद गंभीर है… लेकिन छात्रों में बड़े पैमाने पर हो रही आत्महत्या की घटना केवल कोटा तक ही सीमित नहीं है. NEET परीक्षा विवाद को लेकर तमिलनाडु में कम से कम 16 छात्रों ने आत्महत्या कर ली थी… कोलकाता के जादव पुर विश्वविद्यालय में, इसी महीने अगस्त की शुरुआत में कथित तौर पर रैगिंग और यौन उत्पीड़न के बाद एक 17 वर्षीय किशोर ने आत्महत्या कर ली. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के 2021 की रिपोर्ट के अनुसार 2021 में करीब 13 हजार से अधिक छात्रों की मृत्यु आत्महत्या करने से हुई थी.

युवा भारतीयों को परेशान करने वाले सभी मुद्दों के बीच, केवल आत्महत्या पर बात करना कोई समाधान नहीं है. इससे संबंधित अन्य कई कारक है जिन पर बात होनी चाहिए. कोटा माता-पिता के सपनों की फैक्ट्री के रूप में जाना जाता है. यहां मेडिकल और इंजीनियरिंग की तैयारी करने वाले स्टूडेंट्स भारी संख्या में कोचिंग करने आते हैं. उन स्टूडेंट्स पर अपने और माता-पिता के सपनों को पूरा करने की पूरी जिम्मेदारी होती है. इस दौरान छात्र अपनी इच्छाओं और क्षमता की परवाह किए बगैर अपना लक्ष्य पूरा करने की पूरी कोशिश करते हैं. और जब नतीजा सामने नहीं आता, तो वो आत्महत्या करना ही उचित समझते हैं…

किसी भी फैक्टर पर ध्यान नहीं दिया जाता-

यह सच है कि नेशनल सोसाइटी ऑफ प्रोफेशनल सर्वेयर्स (NSPS) के साथ-साथ अन्य रिपोर्ट्स में भी आत्महत्या के तरीकों तक पहुंच को कम करने की सिफारिश की गई है. लेकिन मूल कारणों पर बात किए बिना, आत्महत्या के तरीकों पर बात करना न केवल असंवेदनशील है, बल्कि अपने उद्देश्य में नाकाम होना भी है. दरअसल मेंटल हेल्थ को आजकल बायो साइको सोशल लेंस से देखा जा रहा है. जहां आत्महत्या की प्रवृत्ति बायोलॉजिकल, साइकोलॉजिकल और सोशल फैक्टर से प्रभावित होती है. लेकिन जब हम इन मामलों का आकलन करते हैं, तो बस बायोलॉजिकल और साइकोलॉजिकल फैक्टर पर ही ध्यान दिया जाता है. सोशल फैक्टर पर बात तक नहीं होती है. कई संस्थानों के मामले में तो इन दोनों फैक्टर पर भी ध्यान नहीं दिया जाता,,,यह सोचना गलत है कि विद्यार्थियों पर केवल सफल होने का दबाव होता है.


कई कारणों की वजह से होती है ये दिक्कतें- 

आत्महत्या की प्रवृत्ति अक्सर कई कारणों की वजह से यानी मल्टी फैक्टोरियल होती है. कोचिंग संस्थानों में छात्र कभी अपना तो कभी अपने परिवार का सपना पूरा करने आते हैं. जब वो अपने परिवार से दूर नए-नए बाहर आते हैं तो बहुत कुछ ऐसा होता है, जिसके बारे में उन्होंने कभी नहीं सोचा होता. पारिवारिक समस्या, बेरोजगारी, मानसिक बीमारियों से लेकर भेदभाव और दुर्व्यवहार तक. ये कई कारक होते हैं, जो मिलकर आत्महत्या की प्रवृत्ति में योगदान करते हैं.यह ध्यान रखना चाहिए कि सभी स्टूडेंट्स सामाजिक और आर्थिक रूप से समान नहीं होते हैं.

वित्तीय रूप से कमजोर वर्ग से आने वाले छात्रों पर जल्दी से कुछ बनकर, अपने परिवार का भरण-पोषण करने की जिम्मेदारी अधिक होती है. नौकरी न मिलने, प्लेसमेंट न होने की संभावना हर संस्थान में ज्यादा होती है. लेकिन कोई भी संस्थान इस पर बात करना जरूरी नहीं समझता… न्यूमेरिकल questionऔर हाई स्कोरिंग इक्वेशन के शॉर्टकट याद करते-करते स्टूडेंट्स का मेंटल हेल्थ बुरी तरह से खत्म हो जाता है.. आंकड़ों की बात करें, तो NCRB डेटा केवल उन्हीं नंबरों की गिनती करता है, जिसके परिणामस्वरूप मृत्यु होती है. जो आत्महत्या करने में सफल हो गए होते हैं.. लेकिन उनका क्या, जो इस परिस्थिति से गुजरे तो सही लेकिन आत्महत्या करने में सफल नहीं हो पाएं…

 

कोई भी व्यक्ति इसका शिकार हो सकता है-


आत्महत्याओं के प्रति दृष्टिकोण बदलने की जरूरत है,,,एक ऐसा देश जहां एंग्जायटी जैसे मेंटल कंडीशन तक पर बात नहीं होती. इसे एक टैबू की तरह लिया जाता है और इससे पीड़ित लोगों को जज किया जाता है. वहां आत्महत्या के मुद्दे पर चर्चा करना बेहद मुश्किल है. ऐसा नहीं है कि जो लोग मानसिक तौर पर कमजोर होते हैं, केवल वो ही आत्महत्या करने का प्रयास करते हैं. कभी-कभी हमारे ईर्द-गिर्द की परिस्थितियां ऐसी होती हैं कि मजबूत से मजबूत हृदय वाला व्यक्ति भी इसका शिकार हो जाता है. व्यक्ति के चारों ओर ऐसी तनावपूर्ण स्थितियां होती हैं जो उसे इस ओर ले जाती हैं. उदाहरण के लिए जब एक छात्र किसी तरह के बदमाशी, यौन या शारीरिक शोषण, पढ़ाई में खराब प्रदर्शन से लेकर लिंग, धर्म या जाति के आधार पर शोषित होता है, तो वह ऐसा कर बैठता है.

अगर हम में से कोई भी एक बार इस परिस्थिति का डटकर सामना करने की कोशिश करें, तो शायद हम खुद को बचा सकें. केवल हमें एक बार साहस करके अपनी बात रखने की जरूरत है. लेकिन इसके लिए संस्थान के दृष्टिकोण में भी बदलाव की आवश्यकता है. स्कूल-कॉलेज, कोचिंग संस्थानों में आत्महत्या से संबंधित हिंसा को रोकने पर बात होनी चाहिए. हर शिक्षा संस्थान में भेदभाव पर चर्चा करनी चाहिए. टीचर्स व प्रोफेसर स्टूडेंट्स के आवश्यकता के अनुसार उनकी मदद करें ये सुनिश्चित करना चाहिए… इसके अलावा, सभी छात्रों के लिए संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य सहायता सहित स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए. फिलहाल फोकस सिर्फ आत्महत्या से होने वाली मौतों को कम करने पर है….

छात्रों के जीवन पर विचार करने की है आवश्यकता-
अब ये भी सवाल उठता है कि संस्थाएं आत्महत्याओं को कैसे रोक सकती हैं ? इसके लिए हमें प्राथमिक स्तर पर इस स्थिति को रोकने के तरीकों पर विचार करने की जरूरत है. अगर हम स्टूडेंट्स के पर्सनल लेवल पर जाकर बात करें, तो सबसे पहले हमें उन्हें उस जगह से निकालना चाहिए,, जहां वो किसी कारण से परेशानी का सामना कर रहे हैं. या फिर किसी तरह की हिंसा का शिकार हो रहे हैं. न कि उनके कमरे से पंखा निकाल लेना चाहिए कि वो सुसाइड न करे. हमें यह सोचना चाहिए कि उक्त छात्र अपना जीवन समाप्त करने का प्रयास क्यों कर रहा है ? निश्चित तौर पर, सभी कारण टालने योग्य तो नहीं ही होंगे. यहां तक कि परिवारों को भी छात्रों के जीवन में उनकी भूमिका पर विचार करने की जरूरत है. सब लोग डॉक्टर और इंजीनियर बन जाएं, ये जरूरी नहीं. कई लोग तो ऐसी डिग्री लेने के बाद अपना रास्ता बदल देते हैं.

 

आत्महत्या की रोकथाम जरूरी-

क्या एक युवा किशोर से ये उम्मीद करना कि वो उस कंपटीशन में भाग ले और टॉप करे. वो भी ऐसे में  जो उसने कभी खुद के लिए चुना ही नहीं. क्या ये उचित है? भारत में युवाओं की आबादी बहुत अधिक है और 15 से 29 वर्ष आयु वर्ग में मृत्यु का प्रमुख कारण आत्महत्या है. इनको रोकने के लिए कई प्रयास जरूरी हैं, जैसे मानसिक स्वास्थ्य देखभाल तक पहुंच में सुधार और  इसमें गुणवत्तापूर्ण मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना, स्वास्थ्य के सामाजिक निर्धारकों को संबोधित करना, इसमें नौकरी के अवसर प्रदान करना, वित्तीय सहायता, भेदभाव और हिंसा को रोकना व इन विषयों पर चर्चा करना और सामाजिक समावेशन को बढ़ावा देना शामिल है…आत्महत्या की रोकथाम के बारे में जागरूकता बढ़ाना और  इसमें लोगों को आत्महत्या के खतरनाक कारकों और सहायता कैसे प्राप्त करें इसके बारे में शिक्षित करना,आत्महत्या जैसी मानसिकता से जूझ रहे लोगों की मदद करना, इसमें भावनात्मक सहायता, व्यावहारिक मदद और संसाधनों के लिए तंत्र बनाना शामिल है…साथ ही सबसे महत्वपूर्ण सभी शैक्षणिक संस्थानों को आत्महत्या से निपटने के लिए अपने तंत्र पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है.

उत्तराखंड के वीरान हुए दो वाइब्रेंट विलेज सूची से हटाए जाएंगे, केंद्र को भेजा प्रस्ताव…

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वाइब्रेंट विलेज सूची से हटेंगे चमोली का रेवालचक, पिथौरागढ़ का हीरा गुमारी गांव, केंद्र को भेजा प्रस्ताव.

 

उत्तराखंड के वीरान हुए दो वाइब्रेंट विलेज सूची से हटाए जाएंगे,

चमोली का रेवालचक, पिथौरागढ़ का हीरा गुमारी गांव वीरान

राज्य सरकार ने गृह मंत्रालय को भेजा प्रस्ताव

वाइब्रेंट विलेज की संख्या 51 से घटकर हो जाएगी 49

49 विलेज के लिए करीब 1200 करोड़ का एक्शन प्लान तैयार-

उत्तराखंड के 51 वाइब्रेंट विलेज में से दो वीरान वाइब्रेंट विलेज को सूची से हटाया जाएगा। सरकार ने इसके लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय को प्रस्ताव भेज दिया है। अनुमति मिलने के बाद उत्तराखंड के वाइब्रेंट विलेज की संख्या 49 रह जाएगी। इन 49 विलेज के लिए करीब 1200 करोड़ का एक्शन प्लान तैयार हो चुका है।

 

चमोली का रेवालचक गांव, पिथौरागढ़ का हीरा गुमारी गांव वीरान-

बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सीमावर्ती गांवों के विकास को वाइब्रेंट विलेज योजना की शुरुआत की थी। केंद्रीय गृह मंत्रालय इस योजना का क्रियान्वयन कर रहा है। इसके तहत उत्तराखंड के पिथौरागढ़, चमोली में सीमावर्ती 51 गांवों को चुना गया था। इनमें से चमोली जिले का रेवालचक गांव कई साल पहले एवलांच की चपेट में आने के बाद खाली हो चुका है, जबकि दूसरा पिथौरागढ़ का हीरा गुमारी गांव रिजर्व फॉरेस्ट में होने की वजह से वीरान है।

 

दोनों गांवों को सूची से हटाने का प्रस्ताव-

वाइब्रेंट विलेज की नोडल अधिकारी नीतिका खंडेलवाल ने बताया कि इन दोनों गांवों को सूची से हटाने का प्रस्ताव गृह मंत्रालय को भेज दिया गया है। मंत्रालय से अभी इसकी अनुमति नहीं मिली है। एक्शन प्लान पर गृह मंत्रालय ही निर्णय लेगा। हर वाइब्रेंट विलेज का अलग से एक्शन प्लान तैयार किया गया है।

 

2963 वाइब्रेंट विलेज के विकास का ऐलान-

केंद्र सरकार ने उत्तराखंड, हिमाचल, अरुणाचल, सिक्किम व लद्दाख के 2963 वाइब्रेंट विलेज के विकास का ऐलान किया था। इनमें से पहले चरण में 662 गांवों को शामिल किया गया है, जिनके लिए कुल 4000 करोड़ बजट का प्रावधान मोदी सरकार ने किया है।

 

वाइब्रेंट विलेज की ऐसे बदलेगी सूरत-

इन वाइब्रेंट विलेज को आर्थिक रूप से मजबूत बनाया जाएगा। यहां सड़कों का निर्माण होगा। इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित किया जाएगा। जरूरतों के हिसाब से सौर ऊर्जा व पवन ऊर्जा प्रोजेक्ट लगेंगे। टीवी व टेलीकॉम की कनेक्टिविटी दी जाएगी, जिसमें आईटी इनेबल कॉमन सर्विस सेंटर भी शामिल हैं। इको सिस्टम को पुनर्विकसित किया जाएगा। पर्यटन व संस्कृति को प्रोत्साहन दिया जाएगा। वित्तीय समावेशन होगा। कौशल विकास व उद्यमिता को बढ़ावा दिया जाएगा। कृषि, हॉर्टिकल्चर, औषधीय पौधे को प्रोत्साहन देने को को-ऑपरेटिव सोसाइटी विकसित की जाएगी ताकि लोगों की आजीविका के साधन बढ़ें।

चुनाव से ठीक पहले फिर फंसी मध्य प्रदेश की मामा सरकार…

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एक और नया ताजा घोटाला- 

मध्य प्रदेश में चुनाव हैं और एक बार फिर यहां घोटालों की आवाज सुनाई देने लग गयी है,मध्य प्रदेश में आजकल घोटाले पर घोटाले सामने आ रहे हैं. अभी एक ताजा घोटाला और सामने आया है.. जिसमें दावा किया जा रहा है कि शिवराज सरकार की एक योजना के तहत  बीजेपी नेताओ के करीबी और रिश्तेदारों पर जनता की कमाई का पैसा उड़ाया जा रहा है.. और उनको मौज कराई जा रही है.. लेकिन  इस नए घोटाले का जिक्र करने से पहले थोड़ी सी जानकारी मध्य्प्रदेश के उस घोटाले की भी लेना जरूरी है, जिसे आजाद भारत का सबसे बड़ा घोटाला कहा जाता है।
आजाद भारत के इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला- 

मध्य प्रदेश की राजनीति,और शिवराज सरकार का जिक्र जब भी आएगा एक घोटाले का नाम हमेशा  सामने आएगा. और वो है ‘व्यापम घोटाला ‘  ये वो घोटाला है जिसे आजाद भारत के इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला कहा जाता है. साल था 2013 जब मध्य प्रदेश में व्यापम घोटाले का खुलासा हुआ था। मध्य प्रदेश के बहुचर्चित व्यावसायिक परीक्षा मंडल  यानी व्यापम घोटाले का पर्दाफाश हुए 10 साल हो गए हैं। अगले कुछ महीने में मध्य प्रदेश में विधानसभा के चुनाव हैं। इस वजह से व्यापम घोटाला एक बार फिर से राजनीतिक चर्चा का विषय बना हुआ है। ये इसलिए भी चर्चित है क्योंकि इस घोटाले का पर्दाफाश होने के बाद कई पत्रकार समेत कई लोगों की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई।

 

2013 में हुई थी इस घोटाले से 40 से ज्यादा की मौतें- 

कई मीडिया रिपोर्ट्स के  एक अनुमान के मुताबिक व्यापम घोटाले से जुड़े 40 से ज्यादा लोगों की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो चुकी है। इतना ही नहीं, इस मामले में कई गिरफ्तारियां भी हुई है. साल 2013 में  व्यावसायिक परीक्षा मंडल यानी व्‍यापम की परीक्षाओं में अभ्यर्थियों की जगह किसी दूसरे को बिठाना, नकल कराना और अन्य तरह की धांधलियों की वजह से इस मामले में अब तक 125 से ज्यादा लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है। इस मामले में जब जांच शुरू हुई तो जांचकर्ता और आरोपियों की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत होने लगी। घोटाले के तार मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के अलावा बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, झारखंड, आंध्र प्रदेश समेत कई राज्यों से जुड़े होने की बात सामने आई। आखिरकार सुप्रीम कोर्ट में ये मामला पहुंचने पर इस मामले की जांच केंद्रीय जांच एजेंसी CBI को सौंपी गई।

 

इस घोटाले के तार कई लोगों से जुड़े मिले-

व्यापम में रिश्वत लेकर प्रवेश परीक्षाओं और भर्तियों में नकल करने के मामले में 4 हजार 46 लोगों को आरोपी बनाया गया है। इसमें से 956 आरोपियों की गिरफ्तारी अब तक भी  नहीं हो पाई है। वहीं CBI ने 1242 लोगों को आरोपी बनाया है। गौर करने वाली बात यह है कि इस मामले में मध्य प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल राम नरेश यादव के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज है। इतना ही नहीं व्यापम घोटाले में तत्कालीन शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा की गिरफ्तारी भी हो चुकी है। इस धांधली का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब एंट्रेंस एग्जाम के बाद अभ्यर्थी इंटरव्यू के लिए पहुंचे तो उनका चेहरा और एडमिट कार्ड पर लगी फोटो दोनों अलग होते। इसके बाद भी उन्हें इंटरव्यू में पास करके उन्हें एडमिशन दे दिया जाता। मामला उजागर होने पर इसके तार मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के कार्यालय और तत्कालीन राज्यपाल राम नरेश यादव तक जुड़ते पाए गए।

 

फिर विवादों में क्यों आयी शिवराज सरकार ?

अब बात उस नए घोटाले की जिससे शिवराज सरकार फिर विवादों में आ गयी है,,मध्य प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा  कोई भी मौका नहीं छोड़ना चाह रही है. सूबे के मुखिया शिवराज सिंह चौहान  युवाओं से लेकर बुजुर्गों तक को रिझाने के लिए रोजाना कुछ न कुछ नया कर रहे हैं. लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है.चुनाव से ठीक पहले मुख्यमंत्री शिवराज ने मुख्यमंत्री हवाई तीर्थ यात्रा की शुरुआत की है.लेकिन इस योजना से बुजुर्गों को हवाई यात्रा का दावा करने वाली शिवराज सरकार की अब पोल खुलती हुई नजर आ रही है।

 

चुनाव से ठीक पहले इस योजना की शुरुवात- 

चुनाव से ठीक पहले मुख्यमंत्री शिवराज ने मुख्यमंत्री हवाई तीर्थ यात्रा की शुरुआत की है. लेकिन इस योजना का लाभ बीजेपी के पदाधिकारी उठा रहे हैं. पैसे वाले रसूखदार लोग उठा रहे हैं, मिली जानकारी के अनुसार हवाई सफर रायसेन से पूर्व जिलाध्यक्ष समेत बीजेपी के दिग्गज नेता सहित हेल्थ मिनिस्टर प्रभुराम चौधरी के सबसे करीबी लोग कर रहे हैं. मंत्री विश्वास सारंग के करीबी रसूखदार बीजेपी भोपाल मंडल अध्यक्ष नीरज पचौरी के ब्रजमोहन भी सीएम की मुफ्त रेवड़ी वाली हवाई यात्रा में तीर्थ दर्शन कर आये. कद्दावर मंत्री प्रभुराम चौधरी ने तीर्थ यात्रियों को हवाई यात्रा पर भेजते हुए फेसबुक पर फोटो डाली, प्रभुराम चौधरी के साथ फोटो में रायसेन से पूर्व जिला अध्यक्ष नरेंद्र सिंह कुशवाह हैं, बीजेपी रायसेन के 2003 से 2007 तक जिला अध्यक्ष रहे हैं. इसके अलावा प्रभुराम चौधरी के खासम खास मलखान सिंह, कालूराम विश्वकर्मा भी हवाई जहाज पर सवार हुए. इस लिस्ट में बड़ी संख्या में बीजेपी नेता प्रयागराज डुपकी लगाने गए।

 

करीबियों को हो रहा है योजना का फायदा- 

भोपाल की हवाई तीर्थ दर्शन की सूची में मंत्री विश्वास के विस्वस्थ हवाई सरकार पर खूब उड़े. मंत्री ने मुख्यमंत्री की योजना को पलीता लगा दिया है. पोस्टर में नजर आ रहे है नीरज पचौरी जो की बीजेपी के मंडल अध्यक्ष पोस्टर पर मंत्री विश्वास सारंग का फोटो बताता है की ये उनके बेहद करीबी हैं, करीबी होने की वजह से फायदे भी मिल रहे हैं. मंडल अध्यक्ष नीरज पचौरी के पिता ब्रजमोहन पचौरी इनके पास करोड़ों की सम्पति है पर मंत्री विश्वास के करीबी हैं तो इन्हें गरीबों की योजना का लाभ मिल रहा है. क्योंकि ब्रजमोहन पचौरी मंत्री विश्वास के लिए वोट बटोरने के लिए नरेला में काम आते है . मकसद ये था कि इस यात्रा में निर्धन परिवार के लोग ही यात्रा करें, लेकिन निर्धन बुजुर्गों के हक को बीजेपी नेताओं ने मार लिया है।

 

12 अप्रैल को सर्कुलर किया था जारी- 

पहली बार किसी राज्य में सरकार के खर्च पर हवाई जहाज से तीर्थ यात्रा की शुरुआत हुई ..शिवराज सिंह चौहान के द्वारा काफी धूम-धाम से शुरु की गयी शिवराज सरकार धार्मिक न्यास और धर्मस्व विभाग ने 12 अप्रैल 2023 को यात्रा से जुड़ा सर्कुलर जारी किया था. इसके मुताबिक, यात्रियों को चुनने के दो क्राइटेरिया पहला, यात्री की उम्र 65 साल से ज्यादा होना चाहिए, दूसरा, वो इनकम टैक्स न देता हो. सर्कुलर के हिसाब से यात्रियों के सिलेक्शन की जिम्मेदारी जिला कलेक्टर को दी गई है. ये भी कहा गया है कि तय संख्या से ज्यादा आवेदन आने पर यात्रियों का सिलेक्शन कम्प्यूटराइज्ड लॉटरी सिस्टम से किया जाए।

 

आखिर इन लोगों को क्यों करवाया गया तीर्थाटन- 

21 मई को पहला ग्रुप राजधानी भोपाल से हवाई जहाज से  प्रयागराज भेजा गया था, इसमें कुल 32 यात्री शामिल थें, लेकिन इन यात्रियों में अधिकांश भाजपा के पदाधिकारी और उसके नेताओं के परिजन थें. इसमें दो यात्रियों की पहचान महाराष्ट्र और तमिलनाडु निवासी के रुप में हुई है. अब सवाल है कि मध्य प्रदेश सरकार उन्हें अपने खर्चे से यात्रा कैसे करवा रही थी?  इसके साथ ही तीर्थ योजना का लाभार्थी के लिए जो मापदंड तय किया गया था, उसकी भी धज्जियां उड़ाई गयी है, मापदंड के विपरीत इसमें से अधिकांश बड़े-बड़े हाउसिंग सोसाइटी में रहने वाले लोग हैं, जिनके पास आलीशान गाड़ियां और लग्जरी भरी जिंदगी है, बावजूद इसके इन सभी को गरीब-वचिंत बताकर तीर्थाटन करवाया गया।

 

10 साल बीत चुके हैं व्यापम घोटाले को-

व्यापम घोटाले का पर्दाफाश हुए 10 साल बीत चुके हैं। लेकिन घोटालों का जिन्न आज भी शिवराज सरकार का पीछा नहीं छोड़ रहा,,  पिछले दिनों पटवारी भर्ती परीक्षा में एक बार फिर से धांधली के आरोप लगे। आरोप ये भी लगे कि ये भी व्यापम की तरह ही एक और घोटाला है, जिससे शिवराज सरकार फिर से निशाने पर आ गयी, ये मामला थोड़ा हल्का पड़ा  ही  था कि अभी हाल ही में एक और घोटाले के आरोपों में शिवराज सरकार घिर गयी है, जिस पर खूब हंगामा मचा हुआ है,और अब विपक्षी भी शिवराज सरकार पर तंज कस रहे हैं कि वो दिन दूर नहीं जब गूगल पर घोटाला सर्च करेंगे  तो शिवराज सिंह चौहान की तस्वीर सामने आएगी।

प्रियंका गांधी के द्वारा मध्य प्रदेश की शिवराज सिंह चौहान को 50 फीसदी कमीशन वाली सरकार बताने पर मुकदमा दर्ज किया गया है,  प्रियंका और दूसरे कांग्रेस नेताओं के खिलाफ करीब 45 थानों में मुकदमा दर्ज किया गया है. साफ है कि जिस प्रकार वहां से भ्रष्टाचार की खबरें आ रही है, और कांग्रेस के आरोपों पर भाजपा जिस गैर जरूरी उग्रता के साथ प्रतिक्रिया दे रही है, मध्यप्रदेश में भी भाजपा कर्नाटक की राह चलती नजर आ रही है।