शंभू बॉर्डर पर हो रहे किसानों के प्रदर्शन को लेकर तमाम तरह की राजनीतिक प्रतिक्रिया सामने आने लगी है। पुलिस लगातार किसानों को रोकने का प्रयास कर रही है। किसान प्रदर्शनकारियों ने पुल पर लगे सभी बैरिकेड को तोड़ दिया। किसानों का प्रदर्शन लगातार बढ़ता जा रहा है। किसानों पर पुलिस ने आंसू गैस के गोले दागे । पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी इसको लेकर निंदा की है।
किसानों पर हो रहा है अत्याचार- ममता बनर्जी
ममता बनर्जी ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट पर साझा करते हुए कहा कि हमारा देश कैसे प्रगति कर सकता है, जब बुनियादी अधिकारों के लिए लड़ने वाले किसानों पर आंसू गैस के गोलों से हमला किया जाता है। मैं इस तरह के कृत्य को लेकर भाजपा की कड़ी निंदा करती हूं। उन्होंने कहा कि किसानों के विरोध को दबाने के बजाए, भाजपा को अपने बढ़े हुए अहंकार, सत्ता की भूखी महत्वाकांक्षाओं और अपर्याप्त शासन को कम करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
गौरतलब है कि हरियाणा पुलिस ने किसान प्रदर्शनकारियों पर आंसू गैस के गोले दागे। अंबाला के पास शंभू में पंजाब के साथ राज्य की सीमा पर लगाए गए बैरिकेड्स को तोड़ने की कोशिश की गयी। न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कानून की मांग कर रहे किसानों ने दिल्ली की ओर मार्च किया। संयुक्त किसान मोर्चा और किसान मजदूर मोर्चा ने घोषणा की थी कि किसान फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी (एमएसपी) की गारंटी के लिए कानून बनाने समेत अपनी मांगों पर जोर देने के लिए मंगलवार को दिल्ली जाएंगे।
मोदी सरकार की विफलता का है यह प्रमाण-असदुद्दीन ओवैसी
किसानों के ‘दिल्ली चलो’ मार्च पर एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि यह मोदी सरकार की विफलता है। उन्हें एमएसपी के लिए कानूनी गारंटी की किसानों की मांग पूरी करनी चाहिए थी। दूसरी मांग स्वामीनाथन समिति के फॉर्मूले को लागू करना है। मुझे तो समझ ही नहीं आ रहा कि आखिर सरकार समय क्यों बर्बाद कर रही है। आप उन्हें ऐसे रोक रहे हैं जैसे किसी पड़ोसी देश की सेना आ रही हो। उनकी मांगों को देश के प्रधानमंत्री को तुरंत स्वीकार करना चाहिए।
न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की गारंटी को लेकर कानून बनाने समेत विभिन्न मांगों के लिए पंजाब-हरियाणा और उत्तर प्रदेश के किसानों ने राष्ट्रव्यापी विरोध-प्रदर्शन की पूरी तैयारी कर ली है। किसान संगठन दिल्ली की सीमाओं पर दिखना शुरू हो गए हैं। वे अपनी मांगों के लिए केंद्र पर दबाव बनाने के लिए सड़कों पर उतर रहे हैं।
किसान आंदोलन (Farmers Protest) के कारण सब्जियों की कीमतों में तेज बढ़ोतरी हो सकती है। किसानों को दिल्ली में प्रवेश करने से रोकने के लिए यूपी गेट सहित सभी मुख्य मार्गों पर बाड़ेबंदी कर दी गई है, जिससे दिल्ली आने-जाने में परेशानी हो गई है। इसका सीधा असर सब्जियों की सप्लाई और इसकी कीमतों पर पड़ सकता है। पिछली बार भी किसान आंदोलन के कारण सब्जियों की कीमतों में बढ़ोतरी हुई थी।
सब्जी विक्रेता विनोद कुमार ने अमर उजाला को बताया कि वे गाजीपुर सब्जी मंडी से सब्जियां लेकर पूर्वी दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में बेचते हैं। अब तक गाजीपुर से बाजार तक सब्जी ले जाने के लिए दो सौ से तीन सौ रुपये के बीच ऑटो मिल जाते थे, लेकिन आज की स्थिति देखते हुए उन्हें पांच सौ रुपये देने पड़ रहे हैं। पहले तो ऑटो आने के लिए तैयार नहीं हो रहे हैं क्योंकि उन्हें मंडी में आने के लिए और वापसी के समय लंबा इंतजार करना पड़ रहा है, इसलिए वे ज्यादा किराया मांग रहे हैं।
गाजीपुर सब्जी मंडी में मेरठ, मुजफ्फरनगर, हापुड़, गाजियाबाद और ग्रेटर नोएडा से भी सब्जियां बिकने के लिए आती हैं। लेकिन आने-जाने की इस परेशानी के कारण अब उनका किराया भी बढ़ जाएगा। इसका सीधा असर सब्जियों की कीमतों पर पड़ सकता है। इसी तरह हरियाणा से सिंधु बॉर्डर के जरिए सब्जियों की आवक पर असर पड़ सकता है। यहां से गोभी, मिर्च, पालक जैसी हरी सब्जियां दिल्ली में पहुंचती हैं। इसका सीधा असर कीमतों के रूप में देखने को मिल सकता है।
यमुना एक्सप्रेसवे, कालिंदी कुंज बॉर्डर के रास्ते से भी दिल्ली-एनसीआर के आसपास के इलाकों से सब्जियां दिल्ली के आजादपुर सब्जी मंडी, केशोपुर सब्जी मंडी और गाजीपुर सब्जी मंडी में सब्जियां पहुंचती हैं। किसानों के प्रतिबंध का असर इन पर पड़ना तय माना जा रहा है। इसकी असली कीमत आम उपभोक्ताओं को चुकानी पड़ सकती है।
हल्द्वानी में हुई हिंसा और कर्फ्यू का असर नैनीताल के पर्यटन पर पड़ा है। होटल और रिजॉर्ट में सप्ताहांत और वैलेंटाइन वीक के लिए जिन सैलानियों ने एडवांस बुकिंग कराई थी वे उसे कैंसिल करने लगे हैं। होटल संचालकों के अनुसार करीब 50 फीसदी एडवांस बुकिंग कैंसिल हो गई है।
उत्तराखंड से बाहर के सैलानी होटल कारोबारियों से हिंसा और कर्फ्यू का अपटेड भी ले रहे हैं। शुक्रवार को शहर और यहां के पिकनिक स्पॉटों में सैलानियों की आवाजाही कम रही। ऐसे में इस सप्ताहांत (शनिवार व रविवार) के साथ-साथ वैलेंटाइन वीक का पर्यटक सीजन प्रभावित होने के आसार हैं। पर्यटन कारोबारियों का कहना है कि अब नहीं लगता कि सप्ताहांत और वैलेंटाइन के मौके पर सैलानी नैनीताल पहुंचेंगे।
बाहरी इलाकों से कर्फ्यू हटाया गया-
उत्तराखंड के हल्द्वानी के बनभूलपुरा इलाके में कर्फ्यू जारी है। हालांकि बाहरी इलाकों से कर्फ्यू हटा दिया गया है। बनभूलपुरा में ही धार्मिक स्थल तोड़ने पर भीड़ ने गुरुवार को आगजनी और तोड़फोड़ की थी। हल्द्वानी के बनभूलपुरा हिंसा मामले में पुलिस ने एसओ मुखानी, सहायक नगर आयुक्त और एसओ बनभूलपुरा की तहरीर पर 18 नामजद समेत पांच हजार उपद्रवियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया। घटनास्थल और आसपास के इलाके से पांच शव बरामद कर लिए गए हैं। पुलिस ने चार लोगों को हिरासत में लेकर सीसीटीवी फुटेज और वीडियो रिकॉर्डिंग कब्जे में ले ली है।
हल्द्वानी हिंसा के बाद कम आए सैलानी
हल्द्वानी में हुई हिंसा की खबर सुर्खियों में रही है। जिसका असर यह हुआ कि वीकेंड पर नैनीताल आने वाले सैलानी इस बार नहीं आए। बृहस्पतिवार को चुंगी से दो से ढाई सौ गाड़ियां पास हुई थी जबकि शुक्रवार को यह संख्या बमुश्किल सौ का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई।
कैंसिल हो रही है बुकिंग- हल्द्वानी की हिंसा ने वीकेंड और वैलेंटाइन वीक का पर्यटन कारोबार ठप कर दिया है। चौबीस घंटे में नैनीताल के होटलों में 50 फीसदी एडवांस बुकिंग कैंसिल हो चुकी है।
कुछ दिनों से पर्यटन कारोबार मंदा चल रहा था लेकिन बीते एक दो दिन से सैलानियों की आवाजाही बढ़ने लगी थी। हिंसा और कर्फ्यू की खबर मिलने के बाद जो सैलानी नैनीताल पहुंचे भी थे वे शुक्रवार की सुबह से ही लौटने लगे हैं। कई सैलानियों ने होटलों में एडवांस बुकिंग भी कैंसिल करा दी है।
भारी हिंसा के बाद शुक्रवार को शांत रहा शहर-
बृहस्पतिवार को हल्द्वानी के बनभूलपुरा इलाके में हुई भारी हिंसा के बाद शुक्रवार को शहर शांत रहा। कर्फ्यू का संबंधित क्षेत्र में सख्ती से पालन कराया गया जबकि शेष शहर में वाहनों की आवाजाही होती रही और दुकानें बंद रहीं। दोपहर करीब 12 बजे मुख्य सचिव राधा रतूड़ी और डीजीपी अभिनव कुमार बनभूलपुरा पहुंचे और थाने का जायजा लिया।
मध्यप्रदेश से राज्यसभा की 5 सीटें खाली हो रही हैं। इनमें से 4 भाजपा और एक सीट कांग्रेस को जाएगी। कांग्रेस में इस एक सीट के लिए एक अनार सौ बीमार जैसी स्थिति है। पूर्व सीएम कमलनाथ से लेकर पीसीसी चीफ जीतू पटवारी और पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण यादव तक कई दिग्गजों के नाम इस एक सीट के लिए चल रहे हैं.
मध्यप्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ नेता कमलनाथ ने कल यानी शुक्रवार को दिल्ली में कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात की। कमलनाथ ने सोनिया गांधी से खुद के लिए राज्यसभा के टिकट की मांग की है। दरअसल, मध्यप्रदेश से राज्यसभा की 5 सीटें खाली हो रही हैं। इनमें से चार भाजपा और एक सीट कांग्रेस को जाएगी। पूर्व सीएम कमलनाथ से लेकर पीसीसी चीफ जीतू पटवारी और पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण यादव तक कई दिग्गजों के नाम इस एक सीट के लिए चल रहे हैं, हालांकि कांग्रेस के पिछड़ा वर्ग कार्ड के चलते इन नामों में अरुण यादव का दावा सबसे मजबूत माना जा रहा है। इस बीच 13 फरवरी को कमलनाथ ने कांग्रेस विधायकों को डिनर पर बुलाया है।
अपने बेटे नकुलनाथ को छिंदवाड़ा से लड़ाने का एलान कर चुके कमलनाथ खुद के लिए राज्यसभा चाहते हैं। कमलनाथ के करीबी सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस आलाकमान अगर किसी पिछड़ा, ओबीसी या एससी-एटी को राज्यसभा देने की वकालत करता है, तो कमलनाथ आखिरी मौके में अपने करीबी पूर्व सांसद सज्जन (एससी) पर दांव लगा सकते हैं। इसके पहले कमलनाथ ने कहा था कि उनके बेटे नकुल एआईसीसी द्वारा सीट के लिए नामांकित किए जाने के बाद आगामी चुनाव में मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ेंगे। कमलनाथ का बयान नकुल के बयान के एक दिन बाद आया था, जो वर्तमान में छिंदवाड़ा लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं, उन्होंने घोषणा की थी कि वह आगामी चुनावों में इस सीट से फिर से चुनाव लड़ेंगे। हालांकि बाद में कमलनाथ ने इस विषय पर सफाई भी दी थी।
राज्यसभा में शुक्रवार को जम्मू-कश्मीर से जुड़े तीन विधेयकों को पारित किया गया है, जो स्थानीय निकायों में अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देने और केंद्र में अनुसूचित जाति और जनजाति की सूची को संशोधित करने का प्रावधान करते हैं। जम्मू और कश्मीर स्थानीय निकाय कानून (संशोधन) विधेयक, 2024 और संविधान (जम्मू और कश्मीर) अनुसूचित जाति आदेश (संशोधन) विधेयक, 2024 और संविधान (जम्मू और कश्मीर) अनुसूचित जनजाति आदेश (संशोधन) विधेयक, 2024 इस सप्ताह की शुरुआत में लोकसभा द्वारा पारित किया गया था।
जम्मू-कश्मीर स्थानीय निकाय कानून(संशोधन) विधेयक, 2024 पारित
केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने जम्मू और कश्मीर स्थानीय निकाय कानून(संशोधन) विधेयक, 2024 पेश किया गया था। जिसमें केंद्र शासित प्रदेश में स्थानीय निकायों में ओबीसी को आरक्षण देने की बात कही गई थी। शुक्रवार को राज्यसभा ने जम्मू और कश्मीर स्थानीय निकाय कानून (संशोधन) विधेयक, 2024 पारित किया है। विधेयक जम्मू और कश्मीर पंचायती राज अधिनियम, 1989 (1989 का IX), जम्मू और कश्मीर नगरपालिका अधिनियम, 2000 और जम्मू-कश्मीर नगर निगम अधिनियम, 2000 में संशोधन करता है। लोकसभा में यह विधेयक पहले ही पारित हो चुका है।
संविधान (जम्मू-कश्मीर) अनुसूचित जाति आदेश (संशोधन) विधेयक, 2024 पारित
सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री वीरेंद्र कुमार ने संविधान (जम्मू और कश्मीर) अनुसूचित जाति आदेश (संशोधन) विधेयक, 2024 को पेश किया था, जो अनुसूचित जाति की सूची में वाल्मीकि समुदाय को जोड़ता है। विधेयक 1956 के संविधान (जम्मू और कश्मीर) अनुसूचित जाति आदेश में संशोधन करता है, जो जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में अनुसूचित जाति मानी जाने वाली जातियों को सूचीबद्ध करता है। शुक्रवार को राज्यसभा में विधेयक पारित किया गया। यह विधेयक पहले लोकसभा में पारित हो चुका था।
संविधान (जम्मू-कश्मीर) अनुसूचित जनजाति आदेश (संशोधन) विधेयक, 2024 पारित
केंद्रीय जनजातीय मामलों और कृषि और किसान कल्याण मंत्री ने संविधान (जम्मू-कश्मीर) अनुसूचित जनजाति आदेश (संशोधन) विधेयक, 2024 पेश किया था, जो अनुसूचित जनजातियों के लिए अलग सूची बनाने के लिए संविधान (जम्मू और कश्मीर) अनुसूचित जनजाति आदेश 1989 में संशोधन का प्रावधान करता है। शुक्रवार को राज्यसभा ने इस विधेयक को पारित किया है। यह विधेयक पहले लोकसभा में पारित हो चुका था।
हल्द्वानी के बनभूलपुरा क्षेत्र में गुरुवार को बवाल हो गया। मलिक के बगीचे में अवैध कब्जे तोड़ने गई नगर निगम और पुलिस की टीम पर स्थानीय लोगों ने पथराव किया । इस दौरान 20 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हो गए। पथराव के बाद शुरू हुई हिंसा आसपास के कई इलाकों में फैल गई। जिसके बाद दंगाइयों ने बनभूलपुरा थाना फूंक दिया है। मामले का संज्ञान लेते हुए सीएम धामी ने उच्च स्तरीय बैठक बुलाई. दिए. जिसमें सीएम ने अराजक तत्वों से सख्ती से निपटने के निर्देश दिए
वहीं, नैनीताल डीएम ने शहर में कर्फ्यू लगा दिया है। दंगाइयों को देखते ही गोली मारने के आदेश दिए गए है।
सीएम ने दिए सख़्ती से निपटने के निर्देश-
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने हल्द्वानी के बनभूलपुरा में अवैध निर्माण को हटाये जाने के दौरान पुलिस एवं प्रशासन के अधिकारियों एवं कर्मियों पर हुए हमले तथा क्षेत्र में अशांति फैलाने की घटना को गंभीरता से लिया है। सीएम ने सभी संबंधित अधिकारियों को क्षेत्र में शांति एवं कानून व्यवस्था सुनिश्चित किये जाने के सख्त निर्देश भी दिये है।
CM धामी ने की स्थिति की समीक्षा-सीएम ने इस संबंध में गुरुवार शाम मुख्यमंत्री आवास में मुख्य सचिव राधा रतूड़ी, पुलिस महानिदेशक अभिनव कुमार और अन्य उच्चाधिकारियों के साथ स्थिति की समीक्षा की। मुख्यमंत्री ने स्थानीय लोगों से शान्ति बनाये रखने की अपील करते हुए अराजक तत्वों के विरूद्ध सख्त कार्यवाही के निर्देश दिये है। सीएम ने कहा कि इस घटना के दोषियों के विरूद्ध सख्त कार्यवाही कर क्षेत्र में शांति व्यवस्था सुनिश्चित की जाए. उन्होंने स्पष्ट निर्देश दिये कि प्रदेश में किसी को भी कानून व्यवस्था से खिलवाड़ करने की छूट नहीं दी जानी चाहिए।
दंगाइयों को देखते ही गोली मारने के दिए निर्देश-
सीएम ने स्पष्ट निर्देश दिये कि प्रदेश में किसी को भी कानून व्यवस्था से खिलवाड करने की छूट नहीं दी जानी चाहिए। प्रशासनिक अधिकारी निरंतर क्षेत्र में कानून व्यवस्था बनाये रखने के लिये प्रयासरत रहे। डीएम वंदना ने फ़ोन पर सीएम धामी को अवगत कराया कि अशान्ति वाले क्षेत्र बनभूलपुरा में कर्फ्यू लगाया गया है तथा स्थिति को सामान्य बनाये रखने के लिये दंगाइयों को देखते ही गोली मारने के आदेश दिये गये है।
नोएडा और ग्रेटर नोएडा में प्राधिकरण से बेहतर मुआवजे की मांग को लेकर किसान दिल्ली के लिए कूच कर चुके हैं। इस कारण नोएडा से दिल्ली आने वाले रास्तों पर भारी जाम लग गया है। प्रशासन ने सख्ती से किसानों को दिल्ली आने से रोकने की कोशिश कर उन्हें दिल्ली बॉर्डर पर ही रोक दिया है। इससे किसान आंदोलन जैसी स्थिति बनती दिख रही है। लेकिन सरकार के लिए आने वाले समय में किसानों के मोर्चे पर परेशानी बढ़ सकती है। संयुक्त किसान मोर्चा ने 16 फरवरी को पूरे देश में राष्ट्रीय स्तर पर ग्रामीण भारत बंद करने का निर्णय लिया है। इस आंदोलन को विपक्ष के कुछ बड़े राजनीतिक दलों का समर्थन भी मिलने का दावा किया जा रहा है।
मिली जानकारी के अनुसार, 16 फरवरी को संयुक्त किसान मोर्चा के नेतृत्व में किसान संगठन एक दिन के लिए भारत बंद रखेंगे। सुबह नौ बजे से शाम चार बजे के बीच पूरे देश के ग्रामीण क्षेत्रों में प्रदर्शन और रैलियां निकाले जाने की योजना है। इसका आयोजन भी स्वामीनाथन आयोग के अनुसार सभी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा और मनरेगा से किसानी को जोड़ने जैसी मांगों को लेकर की जायेगी। किसानों का आरोप है कि उनके आंदोलन को समाप्त करने के लिए केंद्र सरकार ने जो वादे किए थे, वह पूरे नहीं हुए।इसी दिन विभिन्न विभागों के वामपंथी श्रमिक संगठनों ने भी एक दिन के बंद का आह्वान किया है। इससे भी किसान आंदोलन को मजबूती मिल सकती है। इसके साथ कुछ अन्य वर्गों को भी जोड़ने की कोशिश की जा रही है। बेरोजगारी के मुद्दे पर प्रदर्शन कर रहे युवाओं को भी इससे जोड़ने की तैयारी की जा रही है।
संयुक्त किसान मोर्चा से जुड़े सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, डीएमके सहित कुछ विपक्षी दलों का भी इस आंदोलन को समर्थन मिल सकता है। इससे इसका असर बढ़ सकता है। विशेषकर दक्षिण भारत और पूर्वी हिस्से में इसका असर होने की बात कही जा रही है। लोकसभा चुनावों के ठीक पहले इस तरह का प्रदर्शन कर किसान सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति अपना रहे हैं। किसानों ने पश्चिम बंगाल चुनाव के पहले इसी तरह अभियान चलाया था। माना जाता है कि तृणमूल कांग्रेस को इसका लाभ मिला था। अब लोकसभा चुनाव के ठीक पहले भी किसानों का मुद्दा गरमाने की कोशिश की जा रही है।
किसानों के लिए बड़े काम का दावा-
किसान संगठनों के आरोपों से उलट केंद्र सरकार का दावा है कि उसने किसानों की आर्थिक स्थिति बेहतर करने के लिए बड़ा काम किया है। किसानों को प्रतिवर्ष 6000 रुपये की नकद आर्थिक सहायता, किसान क्रेडिट कार्ड देकर खाद-बीज खरीदने में सहायता, पीएम आवास के तहत गरीब किसानों को आवासीय सहायता, आयुष्मान योजना के जरिये बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के लिए सहायता दी जा रही है। मिलेट फ़ूड को बढ़ावा देकर भी गरीब किसानों को आर्थिक रूप से मजबूत करने की कोशिश हुई है।
उत्तराखंड में भी प्रवर्तन निदेशालय यानी ED की एंट्री हो गई है ईडी ने पूर्व कैबिनेट मंत्री और कांग्रेस के नेता हरक सिंह रावत के 10 से ज्यादा ठिकानों पर छापेमारी शुरू कर दी है. उत्तराखंड से लेकर दिल्ली और चंडीगढ़ में छापा मारा है। तीन राज्यों के 15 से अधिक ठिकानों पर ईडी का तलाशी अभियान चल रहा है।
उत्तराखंड के कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में 6000 पेड़ों के अवैध कटान और इसके आसपास अवैध रूप से निर्माण के मामले में जांच चल रही है सीबीआई इस पूरे प्रकरण पर पहले ही नैनीताल हाई कोर्ट के निर्देश पर जांच कर रही है जबकि कई गड़बड़ियां पकड़े जाने के बाद उत्तराखंड वन विभाग के कई IFS अधिकारियों को ED ने रडार पर ले लिया था और अब हरक सिंह रावत के ठिकानों पर छापेमारी की गई है हालाँकि ये अभी साफ़ नहीं है कि हरक सिंह रावत के घर किस मामले की जांच में ED ने दबिश दी है लेकिन इस छापेमारी में एक शख्स का बयान सामने आया है इस शख्स का दावा था कि उसे किसी अलमारी की चाबी बनाने के लीये हरक सिंह के आवास पर बुलाया गया जिसमें कई फाइलें मौजूद थी जिस समय ED ने हरक सिंह के आवास पर छापा मारा उस समय उनकी पत्नी ही घर पर मौजूद रही।
हरक सिंह की छापेमारी की खबर के बाद उत्तराखंड में तहलका मच गया इस मामले में पूरी कांग्रेस हरक सिंह रावत के साथ एकजुट दिखाई दी सभी कांग्रेसी विधायक उनसे मिलने उनके आवास पहुंचे सभी ने इस कार्रवाई को बदले की कार्रवाई बताया।
पूर्व कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत के अलावा वन विभाग के वरिष्ठ आइएफएस अधिकारी सुशांत पटनायक के घर पर भी ED की रेड की खबर है सुशांत पटनायक एक युवती से छेड़छाड़ के मामले में चर्चाओं में आए थे कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में अवैध निर्माण और पेड़ कटान के मामले में भी डीजी फॉरेस्ट की जांच में सुशांत पटनायक का नाम है सुशांत पटनायक उत्तराखंड में ताकतवर अधिकारी के रूप में जाने जाते हैं हालांकि अभी तक ED की उनके घर पर छापेमारी की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है.
दिल्ली, उत्तराखंड, चंडीगढ़ समेत 16 जगहों पर ED की छापेमारी चल रही है हरक सिंह रावत के बिधौली स्थित हॉस्टल, और श्रीनगर में उनके होटल, गहेड गांव स्थित उनके पैतृक घर और सहसपुर में उनके आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज में भी ईडी की टीम गई है हरक सिंह के बाद ईडी ने पूर्व आएफएस अधिकारी किशन चंद के आवास पर छापा मारा,,मामले में पूर्व डीएफओ किशनचंद की संपत्ति को भी पहले अटैच किया जा चुका है।
हरक सिंह रावत 2022 में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस में शामिल हो गए थे. इसके बाद से ही ऐसा लगता है कि उनकी मुश्किल बढ़ गई हैं. हरक सिंह रावत अभी लोकसभा चुनाव लड़ने की तैयारी में भी जुटे हुए हैं. हरिद्वार सीट से उनकी तैयारी चल रही हैं।
उत्तराखंड देश का पहला वो राज्य बन सकता है जो सबसे पहले समान नागरिक संहिता यानी (यूसीसी) लागू कर सकता है। चार फरवरी को उत्तराखंड कैबिनेट से यूसीसी विधेयक को मंजूरी मिलने के बाद उसे आज विधानसभा में पेश किया गया। अब राज्यपाल से मंजूरी मिलने के बाद विधेयक कानून बन जाएगा।
आज उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने राज्य विधानसभा में समान नागरिक संहिता उत्तराखंड 2024 विधेयक पेश किया। समान नागरिक संहिता उत्तराखंड 2024 विधेयक पेश करने के बाद राज्य विधानसभा में विधायकों ने वंदे मातरम और जय श्री राम के खूब नारे लगाए। जानिए उत्तराखंड में UCC लागू होने से क्या कुछ बदलेगा।
मसौदे में 400 से अधिक धाराएं-
समान नागरिक संहिता विधेयक पास होने के बाद ये कानून बन जाएगा। इसके साथ ही उत्तराखंड देश में यूसीसी लागू करने वाला आजादी के बाद पहला राज्य होगा। सूत्रों के अनुसार, मसौदे में 400 से ज्यादा धाराएं हैं, जिसका लक्ष्य पारंपरिक रीति-रिवाजों से पैदा होने वाली विसंगतियों को दूर करना है।
इन समस्याओं के कारण हो रही UCC की वकालत-
समान नागरिक संहिता के प्रबल हिमायती एडवोकेट अश्वनी उपाध्याय के मुताबिक, समान नागरिक संहिता लागू नहीं होने से कई समस्याएं हैं। जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं।
UCC लागू होने के बाद बहुविवाह पर लगेगी रोक-
कुछ कानून में बहुविवाह करने की छूट है। चूंकि हिंदू, ईसाई और पारसी के लिए दूसरा विवाह अपराध है और सात वर्ष की सजा का प्रावधान है। इसलिए कुछ लोग दूसरा विवाह करने के लिए धर्म बदल लेते हैं। समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के लागू होने के बाद बहुविवाह पर पूरी तरह से रोक लग जाएगी।
शादी के लिए अब कानूनी उम्र 21 साल होगी तय-
विवाह की न्यूनतम उम्र कहीं तय तो कहीं तय नहीं है। एक धर्म में छोटी उम्र में भी लड़कियों की शादी हो जाती है। वे शारीरिक व मानसिक रूप से परिपक्व नहीं होतीं। जबकि अन्य धर्मों में लड़कियों के 18 और लड़कों के लिए 21 वर्ष की उम्र लागू है। कानून बनने के बाद युवतियों की शादी की कानूनी उम्र 21 साल तय हो जाएगी।
बिना रजिस्ट्रेशन के लिव इन रिलेशन में रहने पर अब होगी जेल-
इसके साथ ही लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वालों के लिए रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी होगा। समान नागरिक संहिता लागू होने के बाद उत्तराखंड में लिव इन रिलेशनशिप का वेब पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी होगा। रजिस्ट्रेशन न कराने पर युगल को छह महीने का कारावास और 25 हजार का दंड या दोनों हो सकते हैं। रजिस्ट्रेशन के तौर पर जो रसीद युगल को मिलेगी उसी के आधार पर उन्हें किराए पर घर, हॉस्टल या पीजी मिल सकेगा। यूसीसी में लिव इन रिलेशनशिप को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है। इसके मुताबिक, सिर्फ एक व्यस्क पुरुष व वयस्क महिला ही लिव इन रिलेशनशिप में रह सकेंगे। वे पहले से विवाहित या किसी अन्य के साथ लिव इन रिलेशनशिप या प्रोहिबिटेड डिग्रीस ऑफ रिलेशनशिप में नहीं होने चाहिए। पंजीकरण कराने वाले युगल की सूचना रजिस्ट्रार को उनके माता-पिता या अभिभावक को देनी होगी।
विवाह पंजीकरण कराना होगा जरूरी-
कानून लागू होने के बाद विवाह पंजीकरण कराना होगा। अगर ऐसा नहीं कराया तो किसी भी सरकारी सुविधा से वंचित होना पड़ सकता है।
UCC लागू होने के बाद उत्तराधिकार की प्रक्रिया होगी सरल-
एक कानून में मौखिक वसीयत व दान मान्य है। जबकि दूसरे कानूनों में शत प्रतिशत संपत्ति का वसीयत किया जा सकता है। यह धार्मिक यह मजहबी विषय नहीं बल्कि सिविल राइट या मानवाधिकार का मामला है। एक कानून में उत्तराधिकार की व्यवस्था अत्यधिक जटिल है। पैतृक संपत्ति में पुत्र व पुत्रियों के मध्य अत्यधिक भेदभाव है। कई धर्मों में विवाहोपरांत अर्जित संपत्ति में पत्नी के अधिकार परिभाषित नहीं हैं। विवाह के बाद बेटियों के पैतृक संपत्ति में अधिकार सुरक्षित रखने की व्यवस्था नहीं है। ये अपरिभाषित हैं। इस कानून के लागू होने के बाद उत्तराधिकार की प्रक्रिया सरल बन जाएगी।
बुजुर्ग मां-बाप के भरण-पोषण की जिम्मेदारी होगी पत्नी पर –
कानून लागू होने के बाद नौकरीपेशा बेटे की मौत की स्थिति में बुजुर्ग मां-बाप के भरण-पोषण की पत्नी पर जिम्मेदारी होगी। उसे मुआवजा भी मिलेगा। पति की मौत की स्थिति में यदि पत्नी दोबारा विवाह करती है तो उसे मिला हुआ मुआवजा मां-बाप के साथ साझा किया जाएगा।
गोद लेने का बदलेगा नियम –
कानून लागू होने के बाद राज्य में मुस्लिम महिलाओं को भी गोद लेने का अधिकार मिलेगा। गोद लेने की प्रक्रिया आसान होगी। इसके साथ ही अनाथ बच्चों के लिए संरक्षकता की प्रक्रिया सरल होगी। कानून लागू होने के बाद दंपति के बीच झगड़े के मामलों में उनके बच्चों की कस्टडी उनके दादा-दादी को दी जा सकती है।
UCC में होगी तलाक लेने की प्रक्रिया-
पति-पत्नी दोनों को तलाक के समान आधार उपलब्ध होंगे। तलाक का जो ग्राउंड पति के लिए लागू होगा, वही पत्नी के लिए भी लागू होगा। फिलहाल पर्सनल लॉ के तहत पति और पत्नी के पास तलाक के अलग-अलग ग्राउंड हैं।
UCC से पहले की तलाक लेने की प्रक्रिया-
अगर इस्लाम के तीनों तलाक प्रक्रिया की तुलना करें तो ये काफी अलग हैं। तीन तलाक झटके में किसी भी माध्यम से तीन बार तलाक बोलकर दिया जा सकता है। इसमें तो कई बार लोग फोन पर मैसेज या कॉल के माध्यम से तलाक दे दिया करते थे। तलाक-ए-हसन और तलाक-ए-अहसन में तलाक की एक प्रक्रिया और निश्चित अवधि होती है। इन दोनों प्रक्रियाओं में पति पत्नी को फैसला लेने के लिए वक्त मिलता है। इसके अलावा मुस्लिम समाज में महिलाओं के तलाक लेने के लिए भी विकल्प है। महिलाएं खुला तलाक ले सकती हैं। कोर्ट के हस्तक्षेप के बिना कोई महिला खुला तलाक के तहत पति से तलाक लेने की बात कर सकती है। हालांकि इस तरह के तलाक में महिला को मेहर यानी निकाह के समय पति की तरफ से दिए गए पैसे चुकाने होते हैं। साथ ही खुला तलाक में पति की रजामंदी भी जरूरी होती है।
मई 2022 में UCC पर समिति का हुआ था गठन-
दरअसल, उत्तराखंड सरकार ने मई 2022 में सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश के नेतृत्व में विशेषज्ञों की एक समिति गठित की थी। सरकार ने एक अधिसूचना 27 मई 2022 को जारी की गई थी और शर्तें 10 जून 202 को अधिसूचित की गई थीं। समिति ने बैठकों, परामर्शों, क्षेत्र के दौरे और विशेषज्ञों और जनता के साथ बातचीत के बाद मसौदा तैयार किया। इस प्रक्रिया में 13 महीने से अधिक का समय लगा। जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाली समिति ने अपनी पहली बैठक 4 जुलाई 2022 को दिल्ली में की थी। मसौदे के महत्वपूर्ण पहलुओं पर जुलाई 2023 में एक मैराथन बैठक में विचार-विमर्श किया गया और इसे अंतिम रूप दिया गया। कमेटी को समान नागरिक संहिता पर ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरीकों से करीब 20 लाख सुझाव मिले हैं। इनमें से कमेटी ने लगभग ढाई लाख लोगों से सीधे मिलकर इस मुद्दे पर उनकी राय जानी है।
जानिए क्या है समान नागरिक संहिता ?
समान नागरिक संहिता का अर्थ होता है भारत में रहने वाले हर नागरिक के लिए एक समान कानून होना, चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का क्यों न हो। समान नागरिक संहिता लागू होने से सभी धर्मों का एक कानून होगा। शादी, तलाक, गोद लेने और जमीन-जायदाद के बंटवारे में सभी धर्मों के लिए एक ही कानून लागू होगा।
यह मुद्दा कई दशकों से राजनीतिक बहस के केंद्र में रहा है। UCC केंद्र की मौजूदा सत्ताधारी भाजपा के लिए जनसंघ के जमाने से प्राथमिकता वाला एजेंडा रहा है। भाजपा सत्ता में आने पर UCC को लागू करने का वादा करने वाली पहली पार्टी थी और यह मुद्दा उसके 2019 के लोकसभा चुनाव घोषणा पत्र का भी हिस्सा था।
केंद्रीय जांच एजेंसी ‘ईडी’, के रडार पर विभिन्न राज्यों के 17 मौजूदा एवं पूर्व मुख्यमंत्री हैं। इनमें कुछ मुख्यमंत्रियों से पूछताछ हो चुकी है, तो कई सियासतदानों का नंबर लगना बाकी है। ईडी जांच की रडार, केवल मुख्यमंत्रियों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसके निशाने पर पूर्व केंद्रीय गृह/वित्त/रेलवे जैसे बड़े मंत्रालयों का कार्यभार संभाल चुके नेता भी रहे हैं। जांच एजेंसी की इस फेहरिस्त में चार मौजूदा एवं पूर्व डिप्टी सीएम भी शामिल हैं। इनके अलावा देश के अन्य सियासतदान व उनके परिजन भी जांच एजेंसी के निशाने पर आ चुके हैं।
सोनिया गांधी से लेकर खरगे तक-
ईडी के निशाने पर आने वाले विपक्षी नेताओं में कांग्रेस नेता सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे, लालू प्रसाद यादव और राकांपा संस्थापक शरद पवार जैसे कई दिग्गज नेता रहे हैं। गत वर्ष केंद्रीय जांच एजेंसियों के दुरुपयोग का आरोप लगाने वाली कई विपक्षी पार्टियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक चिट्ठी लिखी थी। इनमें टीएमसी, आप, आरजेडी, नेशनल कांफ्रेंस, केसीआर की पार्टी, सपा और उद्धव बालासाहेब ठाकरे (यूबीटी) आदि दल शामिल थे। इन सभी दलों के नेता जांच एजेंसियों के निशाने पर रहे हैं। अरविंद केजरीवाल ने कहा था, हमारे देश के प्रधानमंत्री ने ठान लिया है कि अगर भाजपा को वोट नहीं दोगे और किसी दूसरी पार्टी को वोट दोगे, तो उस सरकार को किसी भी हाल में काम नहीं करने दिया जाएगा। किसी राज्य में दूसरी पार्टी की सरकार बनती है, तो उसके नेताओं के पीछे ईडी और सीबीआई छोड़ दी जाती है। अब केजरीवाल ने आरोप लगाया है कि उन पर भाजपा में शामिल होने का दबाव बनाया जा रहा है। आप विधायकों को लालच देने की कोशिश हो रही है।
ईडी के रडार पर आए मौजूदा एवं पूर्व मुख्यमंत्री-
बिहार के पूर्व सीएम एवं केंद्रीय रेल मंत्री रहे लालू प्रसाद यादव एवं उनके परिवार के सदस्यों से जमीन के बदले नौकरी, घोटाले में पूछताछ की जा रही है। यह मामला सीबीआई द्वारा दर्ज किया गया था, लेकिन बाद में ईडी ने भी इस केस की जांच शुरू की। छत्तीसगढ़ के पूर्व सीएम भूपेश बघेल के खिलाफ भी ईडी की जांच चल रही है। इनमें कोयला ट्रांसपोर्टेशन व महादेव गेमिंग एप आदि शामिल हैं। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा को मानेसर जमीन मामला और पंचकुला के ‘एजेएल’ केस में ईडी को जांच का सामना करना पड़ रहा है। राजस्थान के पूर्व सीएम अशोक गहलोत भी जांच एजेंसियों के निशाने पर रहे हैं। यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के कार्यकाल में लिए गए कई फैसलों और विकास योजनाओं के मामले की जांच केंद्रीय एजेंसियां कर चुकी हैं। सपा प्रमुख और पूर्व सीएम अखिलेश यादव भी सीबीआई व ईडी के रडार पर रहे हैं। इनमें गोमती रिवर फ्रंट और माइनिंग घोटाला जैसे केस शामिल हैं।
ये मुख्यमंत्री/पूर्व सीएम भी जांच से अछूते नहीं-
पंजाब के पूर्व सीएम चरणजीत सिंह चन्नी से अवैध रेत खनन मामले में ईडी पूछताछ कर चुकी है। जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती भी ईडी जांच का सामना कर रहे हैं। इन केसों में जम्मू-कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन और जम्मू कश्मीर बैंक से जुड़ा मामला शामिल हैं। अरुणाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री नेबाम टुकी के खिलाफ 2019 में सीबीआई ने जांच शुरू की थी। उसी आधार पर ईडी ने भी मामले की जांच प्रारंभ की। मणिपुर के पूर्व सीएम ओकराम इबोबी पर भ्रष्टाचार के आरोप में पहले सीबीआई ने केस दर्ज किया था। उसके बाद ईडी ने पीएमएलए के तहत मामला दर्ज किया। गुजरात के पूर्व सीएम शंकर सिंह वाघेला भी सीबीआई व ईडी के रडार पर आ चुके हैं। उन पर केंद्रीय मंत्री रहते हुए मुंबई में जमीन घोटाले का आरोप लगा था। तत्कालीन केंद्रीय टेक्सटाइल मंत्री रहे वघेला पर जमीन की खरीद फरोख्त में सरकारी खजाने को 709 करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचाने का आरोप था। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री रहे शरद पवार भी ईडी जांच के दायरे में आ चुके हैं।
ईडी की हिरासत में सोरेन तो केजरीवाल को समन-
तेलंगाना के मुख्यमंत्री सीएम रेवंथ रेड्डी भी ईडी के रडार पर रहे हैं। उन पर आरोप था कि उन्होंने 2015 में एमएलसी इलेक्शन में पचास लाख रुपये की रिश्वत दी थी। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने पिछले दिनों मुख्यमंत्री का पद छोड़ा है। उन्हें जमीन घोटाले में ईडी ने गिरफ्तार कर लिया है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को कथित शराब घोटाले में ईडी की तरफ से पांच समन जारी हो चुके हैं। केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन भी जांच एजेंसी के निशाने पर रहे हैं। गोल्ड स्मगलिंग केस सहित दूसरे मामलों में वे ईडी जांच का सामना कर रहे हैं। हाल ही में उनकी बेटी वीणा विजयन की कंपनी के खिलाफ केंद्र सरकार ने जांच का आदेश दिया है। एसएनसी-लवलीन केरल जलविद्युत घोटाला, इस केस में भी पिनाराई विजयन को जांच का सामना करना पड़ा है। आंध्रप्रदेश के पूर्व सीएम वाईएस जगन मोहन रेड्डी भी कई तरह के वित्तीय मामलों को लेकर ईडी जांच का सामना कर रहे हैं।
ईडी के निशाने पर पूर्व केंद्रीय मंत्री व डिप्टी सीएम भी-
पूर्व केंद्रीय गृह/वित्त मंत्री पी. चिदंबरम, पूर्व केंद्रीय रेल मंत्री पवन बंसल और पूर्व केंद्रीय रेल एवं श्रम और रोजगार मंत्री मल्लिकार्जुन खरगे को भी ईडी जांच का सामना करना पड़ा है। महाराष्ट्र के पूर्व गृह मंत्री अनिल देशमुख, ईडी के मामले में जेल जा चुके हैं। कर्नाटक के मौजूदा डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार को भी ईडी जांच का सामना करना पड़ा है। बिहार के पूर्व डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव से भी ईडी द्वारा पूछताछ की जा रही है। दिल्ली के पूर्व सीएम मनीष सिसोदिया, ईडी के केस में जेल में हैं। महाराष्ट्र के मौजूदा डिप्टी सीएम अजित पवार के खिलाफ भी ईडी का मामला रहा है।
इन नेताओं को करना पड़ा जांच का सामना-
महाराष्ट्र में पूर्व मंत्री नवाब मलिक, ईडी केस में जेल जा चुके हैं। पश्चिम बंगाल के शारदा चिटफंड घोटाले में सीबीआई व ईडी की जांच के दायरे की आंच, कई नेताओं तक पहुंच चुकी है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के करीबियों को जांच का सामना करना पड़ा है। पश्चिम बंगाल पुलिस और ईडी की जांच रिपोर्ट में कहा गया है कि 80 फीसदी जमाकर्ताओं के पैसे का भुगतान किया जाना बाकी है। जब सीबीआई टीम ने पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार के खिलाफ कार्रवाई की, तो जांच एजेंसी के अधिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया। इस मामले में सीएम ममता बनर्जी धरने पर भी बैठी थीं। तेलंगाना के सीएम की बेटी के. कविता, मनी लॉन्ड्रिंग मामले में शरद पवार के पोते रोहित, पश्चिम बंगाल सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे पार्थ चटर्जी, शिवसेना के सांसद संजय राउत, टीएमसी सांसद अभिषेक, आरजेडी के एमएलसी सुनील सिंह, सांसद अशफाक करीम, फैयाज अहमद और पूर्व एमएलसी सुबोध राय भी जांच एजेंसी की रडार पर रहे हैं।
जांच एजेंसी के निशाने पर 95 फीसदी विपक्षी नेता-
कांग्रेस नेता अजय माकन के मुताबिक, विपक्षी नेताओं के पीछे जांच एजेंसी लगी रहती है। नतीजा, कई नेता, भाजपा की शरण में चले गए। आज उनसे जांच एजेंसी पूछताछ नहीं कर रही। एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की रिपोर्ट बताती है कि गत आठ वर्ष में लगभग 225 चुनावी उम्मीदवारों ने कांग्रेस पार्टी छोड़ दी थी। 45 फीसदी नेताओं ने भाजपा ज्वाइन की है। पार्टी छोड़ने वालों में हार्दिक पटेल, अश्विनी कुमार, आरपीएन सिंह, गुलाम नबी आजाद, जयवीर शेरगिल, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सुनील जाखड़, जितिन प्रसाद, सुष्मिता देव, कीर्ति आजाद, अदिति सिंह, कैप्टन अमरिंदर सिंह, उर्मिला मातोंडकर, हिमंत बिस्व सरमा, हरक सिंह रावत, जयंती नटराजन, एन बीरेन सिंह और दिवंगत अजीत जोगी आदि शामिल हैं। माकन का कहना था कि मोदी सरकार में ईडी ने जिन राजनेताओं के यहां पर रेड की है या उनसे पूछताछ की है, उनमें 95 फीसदी विपक्ष के नेता हैं। इसमें सबसे ज्यादा रेड तो कांग्रेस पार्टी के नेताओं के घरों और दफ्तरों पर की गई हैं। पार्टी ने आशंका जताई है कि 2024 के लोकसभा चुनाव तक, विपक्ष के अनेक नेता, केंद्रीय जांच एजेंसियों के जाल में फंस सकते हैं। असम के सीएम हिमंता बिस्वा सरमा, कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा, नारायण राणे, रमन सिंह, मुकुल रॉय और सुवेंदु अधिकारी, आदि नेताओं के पीछे अब ईडी नहीं है। जनता सब समझती है कि ये नेता, अब ईडी की जांच से क्यों बच हुए हैं।