2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी को एक बड़ा झटका लगा. दक्षिण भारत के राज्यों में बीजेपी अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है और उसके इरादों पर तब पानी फिर गया जब एआईएडीएमके ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से बाहर होने की घोषणा कर दी.
एनडीए से अलग होने का फैसला चेन्नई में एआईएडीएमके मुख्यालय में पार्टी प्रमुख एडप्पादी के पलानीस्वामी की अध्यक्षता में हुई बैठक में लिया गया. पिछले साल नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले जेडीयू के एनडीए से अलग होने के बाद ये गठबंधन के लिए सबसे बड़ा झटका है. देश के दक्षिणी राज्य कर्नाटक में हार के बाद बीजेपी तमिलनाडु से बहुत उम्मीदें लगाकर बैठी है ऐसे में एआईएडीएमके के अलग होने से देश की सबसे बड़ी पार्टी को झटका तो जरूर लगा है.
गठबंधन टूटने का समय-
एआईएडीएमके के एनडीए से अलग होने की टाइमिंग भी ऐसी रही है जब बीजेपी तमिलनाडु में सनातन धर्म पर डीएमके नेता उदयनिधि के बयान को भुनाने में लगी हुई है. बीजेपी हाल ही में बने विपक्षी गठबंधन इंडिया पर हमला करने के लिए एक बड़ी रणनीति के तहत इसका उपयोग कर रही है. गठबंधन टूटने के बाद द्रविड़ राजनीति के बारे में भगवा पार्टी की समझ पर भी सवाल उठने लगे हैं. एआईएडीएमके का एनडीए से अलग होना तमिलनाडु में गेम चेंजर साबित हो सकता है.
अब जश्न का ये वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिससे बीजेपी की काफी फजीहत हो रही है,, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छतीशगढ के साथ ही तमलनाडु में विधानसभा चुनाव हैं, ऐसे में बीजेपी को उम्मीद थी कि AIDMK के साथ चुनाव लड़ेगी लेकिन उन्होंने बीजेपी को जोरदार झटका दे दिया,, AIADMK ने सोमवार को एक औपचारिक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी NDA से बाहर निकलने की घोषणा की और कहा कि वह वह 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए एक अलग मोर्चे का नेतृत्व करेगी. गठबंधन तोड़ने का एलान करते हुए पार्टी ने कहा कि 2024 लोकसभा चुनावों में वो अपनी जैसी सोच वाली पार्टियों के साथ गठबंधन करेगी.
समस्या कहां पर है?
बीते कुछ समय से दोनों पार्टियों के बीच तनाव चल रहा था. ये कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब कुछ दिनों पहले एआईएडीएमके के वरिष्ठ नेताओं ने नई दिल्ली में बीजेपी चीफ जेपी नड्डा से मुलाकात कर उन्हें तमिलनाडु में बीजेपी प्रमुख अन्नामलाई की राजनीति की आक्रामक शैली से उत्पन्न राज्य की जमीनी स्थिति के बारे में बताया. नेताओं ने मांग की थी कि या तो अन्नामलाई द्रविड़ियन दिग्गज सीएन अन्नादुरई पर की गई टिप्पणी के लिए माफी मांगें या फिर बीजेपी अध्यक्ष बदला जाए लेकिन ऐसा हुआ नहीं.
दरअसल दोनों दलों के बीच विवाद की जड़ में अन्नामलाई का अन्नादुरई को लेकर दिया बयान बताया जा रहा है. अन्नामलाई ने कहा था- साल 1956 में अन्नादुरई ने हिंदू धर्म का अपमान किया था और फिर बाद में जब विरोध हुआ तो उन्हें माफ़ी मांगनी पड़ी और मदुरै से भागना पड़ा था
ADIMK नेतृत्व राज्य में बीजेपी नेताओं की ओर से की जा रही टिप्पणियों से नाराज़ था. इसमें बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष के अन्नामलाई की टिप्पणी भी शामिल है. इन नेताओं को रोकने को लेकर बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व की ओर से कोशिश नहीं दिखी. इससे AIDMK में नाराज़गी थी. ये गठबंधन तोड़ने का एलान ऐसे वक़्त में हुआ था, जब राज्य में पार्टी की पकड़ ढीली होती जा रही है.
जब AIADMK ने की NDA से अलग होने की घोषणा-
इसके बाद सोमवार को एआईएडीएमके ने एनडीए से अलग होने की घोषणा कर दी. हालांकि इस खटास के संबंध में किसी का नाम नहीं लिया गया और पूरा दोष बीजेपी राज्य नेतृत्व पर मढ़ दिया गया. अन्नाद्रमुक ने कहा कि बीजेपी के राज्य नेतृत्व ने जानबूझकर अन्नादुराई और पार्टी की दिवंगत मुखिया जे जयललिता और निवर्तमान प्रमुख पलानीस्वामी को बदनाम किया.
प्रस्ताव में कहा गया है कि एआईएडीएमके को निशाना बनाकर इस तरह की निंदनीय, अनियंत्रित आलोचना पिछले लगभग एक साल से चल रही है और इससे कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों में गहरी नाराजगी है. प्रवक्ता शशिरेखा ने सोमवार को कहा, “यह (हमारे लिए) सबसे खुशी का क्षण है. हम आगामी चुनावों (अपने दम पर) का सामना करके बहुत खुश हैं, चाहे वह संसदीय हो या विधानसभा.”
राजस्थान चुनाव से पहले एक तस्वीर सामने आयी है. जिसने वहां की राजनीतिक हलचल बढ़ा दी है. एक कार्यक्रम के मौके पर सीएम गहलोत और बीजेपी नेता वसुंधरा राजे दोनों एक साथ दिखे. तस्वीर सामने आने के बाद वहां अटकलों का दौर भी शुरू हो गया है. आपको बता दें कि वसुंधरा राजे इस बार बीजेपी के चुनाव प्रचार से भी दूर हैं और उन्होंने परिवर्तन यात्रा में भी हिस्सा नहीं लिया…
क्या बीजेपी को भारी पड़ सकती है वसुंधरा की बेरुखी-
क्या वसुंधरा और बीजेपी हाईकमान के बीच की दूरी लगातार बढ़ रही है, वसुंधरा के एक ऐलान के बाद प्रधानमन्त्री को आनन -फानन में चार साल से अधिक समय बाद जयपुर जाना पड़ा. और तो और बीजेपी आलाकमान ये भी फैसला कर चुका है कि राजस्थान चुनाव में वसुंधरा का करना क्या है ? और इस फैसले का ऐलान प्रधानमंत्री के राजस्थान दौरे के बाद किया जा सकता है. आखिर क्यों राजस्थान में बीजेपी के अंदर सियासी पारा चढ़ा हुआ है और क्या प्रधानमंत्री मोदी जयपुर वसुंधरा राजे को मनाने गए थे.
राजस्थान में चुनाव से पहले वसुंधरा बीजेपी के लिए एक बड़ी मुसीबत बन गयी है. कुल मिलाकर राजस्थान को लेकर बीजेपी और हाईकमान में रार जारी है, इसकी एक वजह है वसुंधरा राजे का एक वीडियो जो की खूब वायरल हो रहा है. कुल मिलाकर वसुंधरा राजे ने राजस्थान में बीजेपी की मुश्किलें बढ़ा दी है. पहले वो बयान सुनिए जिसमें वसुंधरा बीजेपी हाईकमान को सीधा संदेश देती दिखाई दे रही है.
क्यों कहा वसुंधरा ने ऐसा ?
अब ये सवाल उठ रहे हैं कि आखिर वसुंधरा राजे ऐसा क्यों कह रही हैं कि वो राजस्थान छोड़ कर नहीं जाएगी. दरअसल जिस तरह से वसुंधरा राजे को चुनाव समिति में जगह नहीं दी गयी उसके बाद ये खबरें सामने आयी कि वसुंधरा की राजनीतिक पारी समाप्त हो चुकी है, उनको भाजपा ने साइडलाइन कर दिया है. लेकिन राजे राजस्थान में अच्छी खासी पकड़ और मजबूत जनाधार रखने वाली नेता है,,और वो ये भी अच्छे से जानती हैं कि जिसको साइड लाइन कर दिया गया है उसको लाइमलाइट में कैसे लाना है ? तो वसुंधरा ने कैसे खेल किया उसके लिए आपको हम कुछ तस्वीरें दिखाते हैं.
कल हुई पीएम की रैली में वसुंधरा राजे मौजूद रही. लेकिन गहलोत सरकार के खिलाफ परिवर्तन रैली से वसुंधरा राजे गायब रहीं. जिसका साफ़ संदेश था कि वसुंधरा चुनाव समिति में न रखे जाने से काफी नाराज थी.एक तरफ अशोक गहलोत के खिलाफ परिवर्तन रैली से वसुंधरा लगातार गायब रहीं तो दूसरी तरफ अशोक गहलोत के साथ उनकी तस्वीरें निकल कर सामने आ गयी. 21 सितंबर को ये तस्वीरें सामने आयीं और वायरल हो गयी, उसके बाद कहा जाने लगा कि राजस्थान में बीजेपी की मुश्किलें बढ़ने जा रही हैं,,वसुंधरा राजे भारतीय जनता पार्टी से इस्तीफा देने जा रही हैं,, बस इन तस्वीरों के तुरंत बाद प्रधानमंत्री मोदी का जयपुर का प्लान सामने आ गया..
क्या बीजेपी ने खुद मार दी अपने पैर पर कुल्हाड़ी-
खबरें चल रही हैं कि वसुंधरा राजे ने बीजेपी आलाकमान को अपनी ताकत दिखाई है, वसुंधरा ये दिखाना चाहती है कि किस तरह से बीजेपी ने उनको चुनाव समिति से बाहर करके कथित तौर पर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार दी है,,आप देख सकते हैं कि किस तरह वसुंधरा महिलाओं के हुजूम के बीच कह रही हैं कि राजस्थान में 60 प्रतिशत महिलाएं हैं,,मतलब जो महिलाएं है वो वोटर भी हैं,,,दूसरी तरफ वसुंधरा कहती हैं कि वो राजस्थान छोड़ कर कहीं नहीं जाएगी और यहीं रहकर यहां के लोगों के मुद्दे उठायेंगी,,,ये बात इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि वसुंधरा को केंद्रीय राजनीती में भेजे जाने के कयास लगाए जा रहे थे,,,इस बयान से वसुंधरा ने ये तो साफ़ कर दिया है कि वो राजस्थान से कहीं नहीं जाने वाली,, उनका ये बयान हाईकमान को भी साफ़ संदेश है, हालांकि इसके बाद वो पीएम मोदी की रैली में शामिल हुई,,
जल्द हो सकती है उम्मीदवारों की पहली सूची जारी-
कुल मिलाकर वसुंधरा इतने बगावती तेवर दिखा रही हैं कि जब परिवर्तन यात्रा उनके क्षेत्र से गुजरती हैं तब भी वो उसमें शामिल नहीं होती उलटा उनकी फोटो गहलोत के साथ सामने आ जाती है. वसुंधरा इस समय राजस्थान में हाट टॉपिक बनी हुई हैं,, ऐसे में क्या बीजेपी आलाकमान वसुंधरा को शीर्ष नेतृत्व में भेजने की तैयारी में है ? इसको लेकर भी खबरें सामने आ रही हैं, खबरों के मुताबिक, अगले सप्ताह दिल्ली में राजस्थान को लेकर बीजेपी की केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक संभावित है। इसके बाद पार्टी राज्य के लगभग 50 उम्मीदवारों की पहली सूची जारी कर सकती है। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे लगातार अपनी भूमिका स्पष्ट करने की मांग करती रही हैं। बावजूद इसके पार्टी आलाकमान की तरफ से उन्हें विधानसभा चुनाव के मद्देनजर कोई अहम भूमिका नहीं दी गई। इससे ऐसा लगता है कि पार्टी नेतृत्व ने उनके बारे में अपना मन बना लिया है।
चुनाव प्रचार से गायब हैं राजे-
बीजेपी ने राज्य में ‘परिवर्तन संकल्प’ यात्रा निकाली। इस यात्रा में ज्यादातर पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे गायब रहीं। बीजेपी की यात्रा से गायब रहने वाली वसुंधरा राजे ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से मुलाकात की। इस मुलाकात के बाद राज्य में राजनीतिक हलचल बढ़ गई। लोगों के मन में वसुंधरा राजे को लेकर सवाल उठने लगे, क्या राजस्थान में कोई नई खिचड़ी पक रही है? क्या वसुंधरा राजे प्रेशर पॉलिटिक्स कर रही हैं? सामने आई तस्वीर में बीजेपी नेता राजेंद्र राठौड़ और सीएम अशोक गहलोत एक सोफे पर बैठे हुए हैं। वहीं दूसरे सोफे पर विधानसभा अध्यक्ष सीपी जोशी और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे बैठी हुई हैं। इस मुलाकात को लेकर सोशल मीडिया पर तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। कुछ लोगों का मानना है कि यह मुलाकात दोनों नेताओं के बीच किसी समझौते की ओर इशारा करती है। वहीं, कुछ लोग इसे केवल एक औपचारिक मुलाकात बता रहे हैं।
वसुंधरा राजे ने बीते 10 दिनों से दिल्ली में डेरा डाल रखा था. इसके बाद अब उनकी तस्वीर सीएम गहलोत के साथ नजर आई हैं । राजस्थान में विधानसभा चुनाव 2023 में होने हैं। ऐसे में यह मुलाकात राजनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण है। यह देखना दिलचस्प होगा कि इस मुलाकात के बाद दोनों दलों के बीच क्या होता है,, क्या वसुंधरा राजस्थान में अपनी बात पूरी न होने पर कोई बगावत कर सकती हैं, ये देखना होगा.
अगर आपसे सवाल पूछा जाय कि बम धमाके से मारना हत्या है या कुछ और ? तो आपका जवाब क्या होगा ? शायद अधिकतर लोग इसको हत्या ही कहेंगे,लेकिन अगर इस सवाल को थोड़ा और घुमा कर कुछ इस तरह पूछा जाय जैसे जैसे की “‘A ‘ एक मेडिकल स्टोर में बम रख देता है और विस्फोट से पहले लोगों को बाहर निकलने के लिए 3 मिनट का समय देता है। ‘B ‘ जो गठिया का मरीज है, वह भागने में विफल रहता है और मारा जाता है। ऐसे में ‘A ‘ के खिलाफ आईपीसी की किस धारा के तहत केस दर्ज किया जा सकता है?” इस सवाल पर अब आपका जवाब क्या होगा ? निश्चित रूप से आप का सर घूम जायेगा और आप सोच रहे होंगे ये कैसा सवाल है ? तो आप बिलकुल सही सोच रहे हैं,,, ये कोई कल्पना या सिर्फ बोलने भर की बात नहीं है बल्कि ये सवाल सच में एक परीक्षा के दौरान पूछा गया,,कई छात्र इस सवाल से इतने परेशान हो गए कि उनकी समझ में कुछ आया ही नहीं,कि इसका जवाब क्या हो सकता है,,,इस सवाल से हैरान और असंतुष्ट छात्र कोर्ट पहुंच गए,कोर्ट में मामला सुनकर जज भी हैरान रह गए,आगे जो हुआ वो आपको चौंका देगा,,,
सवाल पर विवाद पहुंचा हाईकोर्ट
दरअसल , उत्तराखंड न्यायिक सेवा सिविल जज प्रारंभिक परीक्षा में तीन सवालों को लेकर असफल आवेदकों ने आपत्ति जताई और इससे संबंधित याचिका भी नैनीताल हाई कोर्ट में दायर की है। इस पर सुनवाई करते हुए उत्तराखंड हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश विपिन सांघी और न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की खंडपीठ के समक्ष विकट समस्या खड़ी हो गई, कि आखिर इस पर क्या फैसला दिया जाय,,,जिस सवाल पर आपत्ति जताई गई थी, उसने हाई कोर्ट के जजों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया।
हुआ कुछ यूँ कि उत्तराखंड न्यायिक सेवा की परीक्षा में एक सवाल पर विवाद सामने आया है। परीक्षा में पूछा गया था कि एक मेडिकल स्टोर में बम रखने वाले और विस्फोट से पहले लोगों को बाहर निकलने के लिए 3 मिनट का समय देने वाले एक व्यक्ति के खिलाफ आईपीसी की किस धारा के तहत केस दर्ज किया जा सकता है? सवाल उत्तराखंड की न्यायिक सेवा की परीक्षा में पूछा गया था, जिसे लेकर विवाद अदालत की चौखट तक पहुंच गया । परीक्षा में असफल रहने वाले छात्रों ने विषय-विशेषज्ञों द्वारा बताए गए इस सवाल के जवाब पर असंतोष जताया है और दो अन्य सवालों पर आपत्ति के साथ कोर्ट में याचिका दाखिल कर दी। कोर्ट ने आयोग को दो सवालों पर फिर से विचार करने का सुझाव भी दे दिया है।
ऐसा सवाल जिस पर जज भी हो गए कन्फ्यूज
जिस तीसरे सवाल को लेकर जज भी दुविधा में आ गए वो सवाल हम एक बार फिर हूबहू दोहराते हैं जो शायद आपको भी पूरी तरफ कन्फूज कर देगा, दरसल सवाल ये था कि अगर ‘A ‘ एक मेडिकल स्टोर में बम रख देता है और विस्फोट से पहले लोगों को बाहर निकलने के लिए 3 मिनट का समय देता है। ऐसे में ‘बी’ जो गठिया का मरीज है, वह भागने में विफल रहता है और मारा जाता है। ऐसे में ‘ए’ के खिलाफ आईपीसी की किस धारा के तहत केस दर्ज किया जा सकता है? जवाब के लिए जो विकल्प दिए गए थे, उनमें से एक ये था कि आरोपी के खिलाफ धारा 302 के तहत केस दर्ज किया जाना चाहिए जो हत्या के आरोपियों पर लगायी जाती है।
याचिकाकर्ताओं ने उत्तर के रूप में इसी विकल्प को चुना था लेकिन आयोग की ओर से जो उत्तर उपलब्ध कराया गया था, उसमें इस विकल्प को सही नहीं माना गया था। आयोग के अनुसार सही जवाब धारा 304 था, जो हत्या की श्रेणी में नहीं बल्कि गैर-इरादतन हत्या के मामलों में लगाया जाता है। आयोग का तर्क है कि उपर्युक्त मामला आईपीसी की धारा 302 से संबंधित नहीं है बल्कि यह इरादे के अभाव में या फिर लापरवाही के कारण मौत से संबंधित है। मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि हमारे लिए यह कहना पर्याप्त है कि विषय विशेषज्ञ ने मोहम्मद रफीक के मामले में 2021 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोसा किया है। यह अदालत द्वारा दी गई राय के संबंध में कोई भी विचार देने से बचती है।
बता दें कि मोहम्मद रफीक मामले में मध्य प्रदेश में एक पुलिस अधिकारी को एक तेज रफ्तार ट्रक ने कुचल दिया था, जब उन्होंने वाहन पर चढ़ने की कोशिश की थी। ड्राइवर रफीक ने अधिकारी को धक्का देकर गिरा दिया था।
इस बीच याचिका ने कानूनी हलकों में इस बात पर बहस छेड़ दी है कि क्या किसी आतंकवादी कृत्य को ‘हत्या’ की बजाय ‘लापरवाही के कारण मौत’ के रूप में देखा जा सकता है। हाई कोर्ट के वरिष्ठ वकील बताते हैं कि यह स्पष्ट रूप से लापरवाही का मामला नहीं है क्योंकि अधिनियम स्वयं इरादे को दर्शाता है। ‘ए’ द्वारा किया गया काम ऐक्ट के परिणामों को जानता था। ऐसे में बिना किसी संदेह के यह मामला आईपीसी की धारा 302 यानी हत्या के दायरे में आता है।
आयोग के जवाब पर इस तरह उठे सवाल
आयोग द्वारा उपलब्ध कराए गए जवाब जिसे आयोग की ओर से सही जवाब बताया गया है. उसको हाईकोर्ट के वकील की दलील गलत साबित करती दिखाई देती है. हाई कोर्ट ने आयोग को दोनों सवालों पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया है। जबकि तीसरे प्रश्न के संबंध में कोर्ट ने कहा कि इसे पूरी तरह से संवेदनहीन तरीके से तैयार किया गया था। अदालत ने कहा कि हमें यह देखकर दुख होता है कि प्रश्न को पूरी तरह से कैजुअल अप्रोच के साथ तैयार किया गया है। अदालत ने कहा कि पूरी प्रक्रिया चार सप्ताह के भीतर पूरी की जानी चाहिए और एक नई मेरिट सूची तैयार की जानी चाहिए जिसके आधार पर चयन प्रक्रिया जारी रहनी चाहिए।
अब इस सवाल के बाद एक नई बहस कानून के नियमों को लेकर भी शुरू हो गयी है तो दूसरी तरफ आयोग की काम करने सहित प्रश्नपत्र बनाने को लेकर उनकी गंभीरता पर भी सवाल खड़े हो गए हैं,,,कोर्ट ने भी आयोग की सवेंदनहीनता को माना है,,,आयोगों पर उत्तराखंड में सवाल उठना कोई नई बात नहीं है बल्कि उत्तराखंड में परीक्षा आयोजित करने वाले आयोग पिछले काफी समय से सवालों के घेरे में हैं, चाहे वो uksssc रहा हो या अब ukpsc हो, इन आयोगों की विश्वसनीयता पिछले काफी समय से सवालों के घेरे में रही है, हाल ही में सामने आये भर्ती घोटालों ने तो वैसे भी उत्तराखंड का नाम पूरे देश में प्रसिद्ध कर दिया है, इन भर्ती घोटालों के खिलाफ बेरोजगार छात्र कई बार प्रदर्शन कर चुके हैं,और आज भी उनका प्रदर्शन जारी है, बेरोजगारों की सिर्फ यही मांग है कि इन भर्ती घोटालों की निष्पक्ष जांच सीबीआई से करवाई जाय,पर आज तक उत्तराखंड की सरकार उनकी मांगों को मानना तो दूर आंदोलन कर रहे बेरोजगारों से मिलने तक नहीं गयी,,,आयोगों की घटती निष्ठा इस प्रदेश के बेरोजगार छात्रों के भविष्य के लिए एक बड़ी चिंता है और प्रदेश सरकार पर लगता एक बड़ा प्रश्न चिन्ह,,,जो परीक्षाये एक पारदर्शी तरिके से कराने में नाकमयाब साबित हुई है,,,
सवाल ये की आखिर बीजेपी पर ये आरोप क्यों लग रहे हैं ?
बीजेपी क्यों पहले से अस्पताल बंद करवाना चाहती थी ?
क्यों कांग्रेस ने इसे बदले की राजनीति का करार दिया ?
क्या ये बदले की राजनीति है ?
अमेठी से बीजेपी ने सिर्फ राहुल गांधी को ही नहीं हटाया बल्कि वहां से पूरे गांधी परिवार का नामो निशान मिटाने में लगी है.. इसलिए लंबे समय से बीजेपी की नजर संजय गांधी अस्पताल पर थी. अस्पताल को ताला लगाने की हर संभव कोशिश हो रही थी और फिर आखिरकार बीजेपी ने वो मौका ढूंढ ही लिया और बेहद जल्दबाजी दिखाते हुए संजय गांधी अस्पताल का लाइसेंस निरस्त कर दिया. यहां तक की उसकी ओपीडी और सारी सेवाएं बंद कर दी. इस मामले ने पूरे राज्य की राजनीति का पारा गरमा दिया. कांग्रेस पहले से ही इसे बदले की राजनीति बता रही है।उसका कहना है कि अस्पताल इसलिए बंद किया गया क्योंकि ये उस ट्रस्ट द्वारा संचालित है जिसकी अध्यक्ष सोनिया गांधी हैं. कांग्रेस ने यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से अस्पताल का ताला खुलवाने की मांग की है.इस बीच वरुण गांधी ने भी अस्पताल बंद करने पर आपत्ति जताई।
सीएम योगी को लिखा पत्र-
कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने सीएम योगी आदित्यनाथ को इसके लिए एक पत्र भी लिखा है. इसमें उन्होंने संजय गांधी अस्पताल का लाइसेंस रद्द किए जाने के आदेश को वापस लेने की अपील की है. उन्होंने कहा है कि अस्पताल का रजिस्ट्रेशन रद्द करना उचित नहीं है. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने पत्र में आगे कहा है कि संजय गांधी अस्पताल में लाखों लोगों का इलाज़ होता है. अस्पताल कम पैसे पर बड़ी स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराता है. ये अस्पताल अमेठी क्षेत्र के स्वास्थ्य सेवाओं की लाइफ लाइन है. ऐसे में उन्हें विश्वास है कि सीएम के निर्देशों से अमेठी की जनता व संजय गांधी अस्पताल के साथ अन्याय नहीं होगा.
क्यों लगाया गया अस्पताल पर ताला ?
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक 14 सितंबर की सुबह पेट दर्द की शिकायत के बाद एक 22 साल की महिला को संजय गांधी अस्पताल में भर्ती कराया गया था. लेकिन, पित्ताशय की सर्जरी से पहले उसकी हालत खराब होने पर उसे लखनऊ के एक निजी अस्पताल में रेफर कर दिया गया. जहां 16 सितंबर को महिला की मौत हो गई. महिला के परिवार ने आरोप लगाया कि संजय गांधी अस्पताल में एनेस्थीसिया के ओवरडोज के कारण महिला की मौत हुई. इसे लेकर 17 सितंबर को एक FIR दर्ज की गई. पुलिस ने महिला की मौत पर अस्पताल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सहित चार कर्मचारियों के खिलाफ इलाज के दौरान लापरवाही से मौत होने का मामला दर्ज किया. जैसे ही ये खबर आयी ताक में बैठी बीजेपी सरकार तुरंत एक्शन में आ गयी.. मामले का संज्ञान उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक ने लिया और तत्काल जिले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ अंशुमान सिंह को निर्देशित करते हुए कार्रवाई करने को कहा, इधर सीएमओ ने तीन सदस्यीय जांच कमेटी का गठन किया जांच कमेटी ने अस्पताल पहुंचकर हर पहलू की जांच कर अपनी रिपोर्ट सीएमओ को भेज दी, जिसके बाद संजय गांधी अस्पताल को कारण बताओ नोटिस देते हुए स्पष्टीकरण देने के लिए 3 महीने का समय दिया गया.
आखिर बीजेपी को इतनी जल्दी क्यों ?
लेकिन 24 घंटे के अंदर ही संजय गांधी अस्पताल का लाइसेंस निरस्त करते हुए उसकी ओपीडी और सारी सेवाएं बंद कर दी गयी.. अब यहां पर सवाल उठता है की जब 3 महीने का समय स्पष्टीकरण के लिए दिया गया था तो इस पर ताला लगाने की इतनी जल्दी क्या थी.. बीजेपी ने क्यों 24 घंटे के अंदर ही सारी सेवाएं बंद कर दी.. क्या इस पर गौर करने वाली बात नहीं है ? इतनी जल्दी एक्शन लेने से सरकार की मंशा पर सवाल खड़े हो रहे है. क्या सरकार को आम जनता की कोई चिंता नहीं है ?
400 कर्मचारियों पर संकट-
उधर, अमेठी के मुंशीगंज में स्थित संजय गांधी अस्पताल का लाइसेंस निलंबित करने के बाद अस्पताल के 400 से अधिक कर्मचारियों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है. बुधवार (20 सितंबर) को अस्पताल में तैनात कर्मचारियों ने अस्पताल परिसर में प्रदर्शन करने के बाद डीएम को ज्ञापन सौंपा. उन्होंने अस्पताल के लाइसेंस को बहाल करने की मांग की. कर्मचारियों का कहना था कि अगर अस्पताल बंद हो गया तो उनके सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो जाएगा.
कांग्रेस ने कहा सब कुछ स्मृति ईरानी के इशारे पर हुआ-
आपको बता दें इस मामले ने इसलिए भी इतना तूल पकड़ा है क्योंकि ये दो राष्ट्रीय पार्टियों बीजेपी और कांग्रेस के बीच का विवाद है, दरअसल ये अस्पताल संजय गांधी ट्रस्ट की तरफ से संचालित किया जाता है. इस ट्रस्ट की अध्यक्ष सोनिया गांधी हाँ, और ट्रस्ट के सदस्य प्रियंका गांधी और राहुल गांधी है, यही नहीं अमेठी और रायबरेली कांग्रेस का गढ़ मन जाता है, जिसकी एक वजह ये अस्पताल भी है, ये अस्पताल 1986 से अपनी सेवाएं दे रहा है, अमेठी जिले का 350 बेड का ये एकलौता अस्पताल है, जहाँ पर लड़भाग 400 कर्मचारी काम करते है , यहाँ पर ANM, और GNM के कोर्स भी संचालित है जिसमे 1200 छात्र छात्राएं ट्रेनिंग ले रहे हैं ,
अब ऐसे में बीजेपी सरकार की इस कारवाही को लेकर कुछ राजनीति के जानकार ये दवा कर रहे हैं की अमेठी और रायबरेली में कांग्रेस और गांधी परिवार की इतनी पूछ है, जिस से बीजेपी इतनी परेशान है, और कांग्रेस का नामो निशान मिटाना चाहती है. वही कांग्रेस ने इस पर खुलकर बोला है की ये बदले की राजनीति है, कांग्रेस जिला अध्यक्ष और कांग्रेस के पूर्व एमएलसी दीपक सिंह के नेतृत्व में कांग्रेसियों ने भी विरोध प्रदर्शन किया. विरोध प्रदर्शन को लेकर कांग्रेस के पूर्व एमएलसी दीपक सिंह ने कहा कि अस्पताल को बंद करना बिल्कुल ठीक नहीं है. अगर कोई संस्थागत व्यक्ति हो और वह संविधान की शपथ ले तो उसे संविधान के दायरे में रहकर काम करना चाहिए. दीपक सिंह ने सांसद स्मृति ईरानी पर निशाना साधने के साथ स्वास्थ्य मंत्री बृजेश पाठक पर भी निशाना साधा. उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति कई बार विधायक रहा हो, कानून मंत्री रहा हो, उसे तो अमेठी की सांसद स्मृति ईरानी के इशारे पर ये काम नहीं करना चाहिए.
केंद्र सरकार की ओर से नए संसद भवन में पहला विधेयक महिला आरक्षण बिल पेश कर दिया गया है. संसद के निचले सदन में कानून मंत्री अर्जुनराम मेघवाल ने महिलाओं को लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में 33 फीसदी आरक्षण दिलाने वाला ये बिल पेश किया. सरकार का दावा है कि विधेयक पर चर्चा के बाद कल ही इसे पारित भी करा लिया जाएगा.
अब सवाल ये उठता है कि अगर सरकार की योजना के मुताबिक ये बिल कल लोकसभा से पारित हो जाता है तो क्या 2024 में होने वाले लोकसभा चुनावों में 181 संसदीय क्षेत्र महिला प्रत्याशियों के लिए आरक्षित कर दिए जाएंगे?
विधेयक में आखिर क्या प्रस्ताव है ?
महिला आरक्षण विधेयक में संसद और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण का प्रस्ताव रखा गया था. बिल में प्रस्ताव रखा गया था कि हर लोकसभा चुनाव के बाद आरक्षित सीटों को रोटेट किया जाना चाहिए. आरक्षित सीटें राज्य या केंद्र शासित प्रदेशों के अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में रोटेशन के जरिये आवंटित की जा सकती हैं. बता दें कि मौजूदा समय में पंचायतों और नगरपालिकाओं में 15 लाख से ज्यादा चुनी हुई महिला प्रतिनिधि हैं, जो 40 फीसदी के आसपास होता है. वहीं, लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं की उपस्थिति काफी कम है.
महिलाओं की शक्ति,, समझ और नेतृत्व जिसे दशकों तक भारतीय राजनीति में जगह नहीं मिली, उसको पूजन योग्य बताते हुए सरकार ने ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ का प्रस्ताव लोकसभा में पेश किया है.लेकिन क़ानून बनाने और नारी शक्ति के वंदन के अमल में सरकार का ही नहीं राजनीतिक पार्टियों का इम्तिहान होगा. काम के अन्य क्षेत्रों की ही तरह, राजनीति भी पुरुष प्रधान रही है. आरक्षण के जरिए महिलाओं के राजनीति में आने को समर्थन देने से राजनेता बार-बार पीछे हटे हैं.साल 1992 में पंचायत के स्तर पर 33 प्रतिशत आरक्षण का कानून बनाए जाने के बावजूद यही आरक्षण संसद और विधानसभाओं में लाने के प्रस्ताव पर आम राय बनाने में तीन दशक से ज़्यादा लग गए हैं.
बिल से जुड़ी सभी जानकारियां –
दरअसल महिला आरक्षण बिल 1996 से ही अधर में लटका हुआ है. उस समय H. D देव गौड़ा सरकार ने 12 सितंबर 1996 को इस बिल को संसद में पेश किया था. लेकिन पारित नहीं हो सका था. यह बिल 81 वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में पेश हुआ था. बिल में संसद और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण का प्रस्ताव था. इस 33 फीसदी आरक्षण के भीतर ही S.C, S.T के लिए उप-आरक्षण का प्रावधान था. लेकिन अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण का प्रावधान नहीं था. इस बिल में प्रस्ताव है कि लोकसभा के हर चुनाव के बाद आरक्षित सीटों को रोटेट किया जाना चाहिए.
आरक्षित सीटें राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में रोटेशन के ज़रिए आवंटित की जा सकती हैं. इस संशोधन अधिनियम के लागू होने के 15 साल बाद महिलाओं के लिए सीटों का आरक्षण खत्म हो जाएगा.अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने 1998 में लोकसभा में फिर महिला आरक्षण बिल को पेश किया था. कई दलों के सहयोग से चल रही वाजपेयी सरकार को इसको लेकर विरोध का सामना करना पड़ा. इस वजह से बिल पारित नहीं हो सका. वाजपेयी सरकार ने इसे 1999, 2002, 2003 और 2004 में भी पारित कराने की कोशिश की लेकिन सफल नहीं हुई. बीजेपी सरकार जाने के बाद 2004 में कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए सरकार सत्ता में आई और डॉक्टर मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने.
जब 2008 में यूपीए ने पेश किया था बिल –
यूपीए सरकार ने 2008 में इस बिल को 108 वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में राज्यसभा में पेश किया. वहां ये बिल 9 मार्च 2010 को भारी बहुमत से पारित हुआ. बीजेपी, वाम दलों और जेडीयू ने बिल का समर्थन किया था. यूपीए सरकार ने इस बिल को लोकसभा में पेश नहीं किया. इसका विरोध करने वालों में समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल शामिल थीं. ये दोनों दल यूपीए का हिस्सा थे. कांग्रेस को डर था कि अगर उसने बिल को लोकसभा में पेश किया तो उसकी सरकार ख़तरे में पड़ सकती है.
साल में 2008 में इस बिल को क़ानून और न्याय संबंधी स्थायी समिति को भेजा गया था. इसके दो सदस्य वीरेंद्र भाटिया और शैलेंद्र कुमार समाजवादी पार्टी के थे. इन लोगों ने कहा कि वे महिला आरक्षण के विरोधी नहीं हैं. लेकिन जिस तरह से बिल का मसौदा तैयार किया गया, वे उससे सहमत नहीं थे. इन दोनों सदस्यों की सिफ़ारिश की थी कि हर राजनीतिक दल अपने 20 फ़ीसदी टिकट महिलाओं को दें और महिला आरक्षण 20 फीसदी से अधिक न हो. साल 2014 में लोकसभा भंग होने के बाद यह बिल अपने आप खत्म हो गया. लेकिन राज्यसभा स्थायी सदन है, इसलिए यह बिल अभी जिंदा है.अब इसे लोकसभा में नए सिरे से पेश करना पड़ेगा. अगर लोकसभा इसे पारित कर दे, तो राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह कानून बन जाएगा. अगर यह बिल कानून बन जाता है तो 2024 के चुनाव में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण मिल जाएगा.
बिल के समर्थन में विपक्ष ने भी दिलाई थी याद-
साल 2014 में सत्ता में आई बीजेपी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में इस बिल की तरफ ध्यान नहीं दिया. नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में इसे पेश करने का मन बनाया है.हालांकि उसने 2014 और 2019 के चुनाव घोषणा पत्र में 33 फीसदी महिला आरक्षण का वादा किया है. इस मुद्दे पर उसे मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस का भी समर्थन हासिल है.कांग्रेस संसदीय दल की नेता सोनिया गांधी ने 2017 में प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखकर इस बिल पर सरकार का साथ देने का आश्वासन दिया था.वहीं कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद राहुल गांधी ने 16 जुलाई 2018 को प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर महिला आरक्षण बिल पर सरकार को अपनी पार्टी के समर्थन की बात दोहराई थी.
विपक्ष ने उठाया मुद्दा-
सोमवार को कैबिनेट की बैठक में महिला आरक्षण बिल को मंजूरी मिलने की बात सामने आने के बाद कांग्रेस ने इस मुद्दे को उठाया. कांग्रेस ने कहा कि बहुमत होने के बाद भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में इस बिल को पारित कराने का कोई प्रयास नहीं किया. कांग्रेस ने विशेष सत्र में इस बिल को पारित कराने की मांग की है. विशेष सत्र से पहले सरकार ने सर्वदलीय बैठक बुलाई थी. इसमें कांग्रेस बीजू जनता दल,, भारत राष्ट्र समिति और कई अन्य दलों ने महिला आरक्षण विधेयक को संसद में पेश करने पर ज़ोर दिया था. इस समय लोकसभा में 82 और राज्य सभा में 31 महिला सदस्य हैं. यानी की लोकसभा में महिलाओं की भागीदारी 15 फीसदी और राज्य सभा में 13 फ़ीसदी है.
पहली बार इस सरकार ने की थी बिल पेश करने की कोशिश-
इंदिरा गांधी 1975 में प्रधानमंत्री थीं तो ‘to words equality ‘ नाम की एक रिपोर्ट आई थी. इसमें हर क्षेत्र में महिलाओं की स्थिति का विवरण दिया गया था.इसमें महिलाओं के लिए आरक्षण की भी बात थी. इस रिपोर्ट को तैयार करने वाली कमेटी के अधिकतर सदस्य आरक्षण के खिलाफ थे. वहीं महिलाएं चाहती थीं कि वो आरक्षण के रास्ते से नहीं बल्कि अपने बलबूते पर राजनीति में आए.
राजीव गांधी ने अपने प्रधानमंत्री काल में 1980 के दशक में पंचायत और स्थानीय निकाय चुनाव में महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण दिलाने के लिए विधेयक पारित करने की कोशिश की थी, लेकिन राज्य की विधानसभाओं ने इसका विरोध किया था. उनका कहना था कि इससे उनकी शक्तियों में कमी आएगी. पहली बार महिला आरक्षण बिल को एचडी देवगौड़ा की सरकार ने 12 सितंबर 1996 को पेश करने की कोशिश की. सरकार ने 81 वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में संसद में महिला आरक्षण विधेयक पेश किया. इसके तुरंत बाद देवगौड़ा सरकार अल्पमत में आ गई. देवगौड़ा सरकार को समर्थन दे रहे मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद महिला आरक्षण बिल के विरोध में थे. जून 1997 में फिर इस विधेयक को पारित कराने का प्रयास हुआ. उस समय शरद यादव ने विधेयक का विरोध करते हुए कहा था, ”परकटी महिलाएं हमारी महिलाओं के बारे में क्या समझेंगी और वो क्या सोचेंगी.”
1998 में जब वाजपेयी सरकार में बिल पेश करने की हुई थी कोशिश-
1998 में 12वीं लोकसभा में अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए की सरकार आई. इसके कानून मंत्री एन थंबीदुरई ने महिला आरक्षण बिल को पेश करने की कोशिश की. लेकिन सफलता नहीं मिली. एनडीए सरकार ने 13वीं लोकसभा में 1999 में दो बार महिला आरक्षण बिल को संसद में पेश करने की कोशिश की. लेकिन सफलता नहीं मिली. वाजपेयी सरकार ने 2003 में एक बार फिर महिला आरक्षण बिल पेश करने की कोशिश की. लेकिन प्रश्नकाल में ही जमकर हंगामा हुआ और बिल पारित नहीं हो पाया.
एनडीए सरकार के बाद सत्तासीन हुई यूपीए सरकार ने 2010 में महिला आरक्षण बिल को राज्यसभा में पेश किया. लेकिन सपा-राजद ने सरकार से समर्थन वापस लेने की धमकी दी. इसके बाद बिल पर मतदान स्थगित कर दिया गया. बाद में 9 मार्च 2010 को राज्यसभा ने महिला आरक्षण बिल को 1 के मुकाबले 186 मतों के भारी बहुमत से पारित किया. जिस दिन यह बिल पारित हुई उस दिन मार्शल्स का इस्तेमाल हुआ.
कुछ तथ्य और जानकारियां-
अब आपके सामने कुछ तथ्य रखते हैं जिनको देख शायद कुछ तस्वीर और साफ हो पायेगी, 543 सीटों वाली लोकसभा में फिलहाल सिर्फ़ 78 महिला सांसद हैं, जबकि 238 सीटों वाली राज्यसभा में सिर्फ़ 31 महिला सांसद हैं, छत्तीसगढ़ विधानसभा में महिला विधायकों की संख्या 14 फीसदी है,जबकि पश्चिम बंगाल विधानसभा में महिला विधायकों की संख्या 13.7 फीसदी, झारखंड विधानसभा में महिला विधायकों की संख्या 12.4 फीसदी और बिहार, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और दिल्ली विधानसभा में महिला विधायकों की संख्या 10-12 फीसदी तक है,
बाकी राज्यों में महिला विधायकों की संख्या 10 फीसदी से कम है, इससे ये अंदाजा लगाया जा सकता है कि महिलाओं की राजनीति में भागीदारी बेहद कम है.
क्या 2024 चुनाव तक लागू होगा विधेयक-
ये भी सवाल उठता है कि ये बिल कानून का रूप लेने के बाद कब लागू होगा और इसमें सबसे बड़ी समस्या क्या है ? अगर महिला आरक्षण विधेयक लोकसभा में पारित हो भी जाता है तो भी इसे लोकसभा चुनाव 2024 में लागू करना मुश्किल है. संसद से पारित होने के बाद महिला आरक्षण बिल को कम से कम 50 फीसदी विधानसभाओं से पारित कराना होगा. यानी कि अगर केंद्र सरकार को ये कानून देशभर में लागू करना है तो इसे कम से कम 15 राज्यों की विधानसभाओं से भी पास कराना होगा. वहीं, 2026 के बाद परिसीमन का काम भी होना है. कानून बनने पर भी महिला आरक्षण विधेयक परिसीमन के बाद ही लागू किया जा सकेगा. ऐसे में महिला आरक्षण लोकसभा चुनाव 2029 में लागू हो सकता है.
15 साल के लिए ही होगा लागू-
अब सवाल ये उठता है कि कानून बनने के बाद 33 फीसदी महिला आरक्षण कब तक लागू रहेगा? तो सबसे बड़ी बात आपको बता दें कि राज्यसभा और विधान परिषदों में महिला आरक्षण लागू नहीं होगा.साल 1996 में जब ये विधेयक पेश किया गया था, तो इसके प्रस्ताव में स्पष्ट तौर पर लिखा गया था कि इसे सिर्फ 15 साल के लिए ही लागू किया जाएगा. इसके बाद इसके लिए फिर से विधेयक लाकर संसद के दोनों सदनों से पारित कराना होगा. सवाल ये उठता है कि अगर ये विधेयक कानून बन जाता है तो इसकी 15 साल की अवधि कब से शुरू होगी ? कानून विशेषज्ञों के मुताबिक, महिला आरक्षण की 15 साल की अवधि लोकसभा में इसके लागू होने के बाद से ही शुरू होगी. अगर ये 2029 में लागू हो जाता है तो ये 2044 तक लागू रहेगा. इसके बाद दोबारा विधेयक संसद में लाना होगा और पूरी प्रक्रिया से गुजरना होगा.
अभी लोकसभा में 15 फीसदी है महिलाओं की भागीदारी-
अब आपको बताते हैं, इस बिल के लागू होने पर क्या समीकरण बनेंगे ? महिला आरक्षण लागू होने के बाद लोकसभा में मौजूदा सांसदों की संख्या के आधार पर संसद के निचले सत्र में कम से कम 181 महिला MP तो होंगी ही. फिलहाल लोकसभा में महिला सांसदों की भागीदारी 15 फीसदी से भी कम है. इस समय लोकसभा में 78 महिला सांसद ही हैं. अगर परिसीमन के बाद संसद सीटों की संख्या बढ़ती है तो महिला सांसदों की संख्या में भी इजाफा होगा.
कई पार्टियां क्यों कर रही हैं विरोध-
सबसे बड़ा और अहम सवाल जिस को लेकर कई पार्टियां इस बिल का विरोध कर रही हैं इसकी सबसे बड़ी वजह है एससी-एसटी आरक्षण ? सवाल ये है कि क्या इनको अलग से आरक्षण मिलेगा ? तो आपको ये भी बता दें कि लोकसभा में S.C और S.T आरक्षण लागू है. लेकिन S.C, S.T महिलाओं को अलग से आरक्षण नहीं मिलेगा. महिला प्रतिनिधियों को कोटा में कोटा मिलेगा.
महिलाओं को आरक्षण-
आसान भाषा में कहें तो लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एससी-एसटी वर्ग के लिए पहले से आरक्षित सीटों में ही महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण मिलेगा. फिलहाल लोकसभा में 47 सीटें S.T और 84 सीटें S.C वर्ग के लिए आरक्षित हैं. संसद की मौजूदा स्थिति के आधार पर कहा जा सकता है कि कानून बनने के बाद 16 सीटें एसटी और 28 सीटें एससी वर्ग की महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी. बता दें कि लोकसभा में ओबीसी वर्ग के लिए आरक्षण की कोई व्यवस्था नहीं है. इसके अलावा महिलाएं उन सीटों पर भी चुनाव लड़ सकती हैं, जो उनके लिए आरक्षित नहीं हैं.
गाय के गोबर से बनेगा प्राकृतिक पेंट, जाने इसके फायदे-
गौशालाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने की मुहिम.
प्राकृतिक पेंट बनाने में किया जाएगा गोबर का इस्तेमाल.
गोबर युक्त पेन्ट एन्टी फंगल, एन्टी बैक्टीरियल, अन्य केमिकल पेन्ट से सस्ता.
यूपी के बांदा में अन्ना गोवंशों को संरक्षित रखने के लिए तीन सौ से अधिक गौशाला बनाए गए हैं। इन गौशालाओं में संरक्षित गोवंशों के भरण पोषण के लिए पर्याप्त बजट न होने पर जन भागीदारी से गोवंशों को चारा भूसा उपलब्ध कराया जा रहा है। साथ ही जिला अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल गौशालाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए मुहिम चला रही हैं। इसी मुहिम के तहत अब गौशाला से निकलने वाले गोबर का इस्तेमाल प्राकृतिक पेंट बनाने में किया जा रहा है।
किसानों के लिए मुनाफे का सौदा-
गोवंश के गोबर से वर्मी कम्पोस्ट तैयार खाद कृषि उत्पादन के लिए बहुत लाभकारी है। इसके साथ ही गौवंश के गोबर युक्त पेन्ट एन्टी फंगल, अन्य केमिकल पेन्ट से सस्ता, एन्टी बैक्टीरियल भी होता है। इसका फसलों में इसका छिड़काव और प्रयोग करने से भी फसल पैदावार में भी लाभ मिलता है।इस तरह तैयार होगा प्राकृतिक पेंट-
सबसे पहले गाय के गोबर से कंकड़, घास निकाल कर अलग किया जाता हैं और उसका वजन किया जाता हैं।
इसके बाद साफ किए गए गोबर को एक भंडारण टैंक में डाला जाता हैं जिसमें पानी होता है।
मोटर चलित भंडारण टैंक गाय के गोबर और पानी को 40 मिनट तक मथता है।
इससे पहले उस मिश्रण को दूसरे सेक्शन में ले जाया जाता है। जहां इसे एक समान पेस्ट जैसे तरल में बदल दिया जाता है।
तरल को 100 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर आधे घंटे तक गर्म किया जाता है, जिसके बाद इसे ब्लीच किया जाता है।
इसके बाद मिश्रण में रंग मिलाया जाता है, और यह प्राकृतिक पेंट तैयार होता है।
इस पेंट को प्राकृतिक पेंट के ब्रांड नाम से बाजार में बेचा जाता है।
प्राकृतिक पेंट बनाने का निर्णय-
इस प्राकृतिक पेंट प्रोजेक्ट के अंतर्गत, स्थानीय गौशाला संचालकों, पंचायत प्रमुखों, स्वयंसेवी संस्थाओं, और अधिकारियों को जागरूक करने के लिए एक अभियान चलाया जा रहा है। इस अभियान के तहत, तीन स्वयंसेवी संस्थाएं प्राकृतिक पेंट बनाने का निर्णय ले चुकी है। इसके अलावा गौवंशों को हरा चारा प्रदान करने के लिए भी कई मादक उपायों का उपयोग किया जा रहा है, जिससे उनकी सुरक्षा और खुशहाली सुनिश्चित की जा सकती है।
प्रतिदिन 5500 रुपये की होगी आमदनी-
प्रोजेक्ट मैनेजर की माने तो 1 किलोग्राम गोबर में पाउडर मिलाकर 3 लीटर पेंट तैयार होगा. 1 लीटर पेंट 225 से 250 रुपये लीटर में बिकेगा. यानी 1 किलो गोबर से करीब 700 रुपये की आमदनी होगी. एक गाय प्रतिदिन 8 किलोग्राम गोबर देती है, जिससे प्रतिदिन करीब 5500 रुपये तक की आमदनी होगी. इसके लिए खादी आश्रम से अनुबंध होगा, जो पेंट लेकर बिक्री करेगा. यह पेंट दो किस्म के डिस्टेंपर और इमल्शन में तैयार होगा. गाय के गोबर से बने प्राकृतिक पेंट को घर की दीवारों पर कराया जा सकेग।
कोरोना महामारी जब चरम पर थी तब देश में नेशनल एजुकेशन पॉलिसी आयी… इस पॉलिसी में कोचिंग कल्चर की आलोचना की गई थी. कोचिंग संस्थानों में सबसे आगे माने जाने वाले शहर राजस्थान के कोटा में कोचिंग कल्चर,, स्टूडेंट्स की जान ले रहा है. अकेले कोटा में इस साल अगस्त तक 23 बच्चों ने खुद को मौत के हवाले कर दिया. ये छात्र वहां रहकर कोचिंग संस्थानों में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे थे। आखिर वहां छात्रों द्वारा आत्महत्या का दौर खत्म क्यों नहीं हो रहा है? क्या कारण है कि सुनहरे भविष्य की राह पर चलने वाले छात्र अपना जीवन खत्म करने को मजबूर हो रहे हैं? छात्रों में ऐसा नकारात्मक दृष्टिकोण क्यों आ रहा है? अब सवाल ये खड़ा होता है कि आखिर क्यों बच्चे ऐसा कदम उठा रहे हैं. इसके पीछे आखिर क्या कारण है.
क्यों बच्चों पर बढ़ रहा है बोझ-
ये एक तरह की ज़िम्मेदारी बच्चों के कंधों पर तब डाल दी जाती है, जब उनका कंधा पहले से ही 10 किलो के स्कूली बैग से झुका होता है। ऐसे बच्चे कुछ और बनने का सपना नहीं देख पाते, उनकी आंख खुलने से पहले ही उन्हें एक सपना दिखा दिया जाता है IIT या NEET क्वालीफाई करके देश के किसी बड़े मेडिकल कॉलेज में एडमिशन लेने का, बिना ये जाने कि उनमें वो सपना हासिल करने की क्षमता है भी या नहीं। इन छोटे-छोटे रंगीन गुब्बारों में इतनी ज्यादा आईआईटी और नीट के सपने की हवा भर दी जाती है कि वो आसमान में उड़ने की बजाय कोटा में पहुंच कर फट जाते हैं. बीते दिनों तीन छात्रों के साथ भी ऐसा ही हुआ। प्रणव , उज्ज्वल , और अंकुश ये 17 -18 साल के तीन छात्र उस उम्र में दुनिया को अलविदा कर के चले गए. अब तक के जांच में जो बात सामने निकल कर आई है वो ये है कि ये तीनों छात्र पढ़ाई के दबाव की वजह से डिप्रेस थे और कई दिनों से अपनी कोचिंग और क्लासेज भी मिस कर रहे थे।
आज व्यक्ति का मूल्यांकन उसके मूल्यों और सही आचरण से नहीं होता, बल्कि उसके द्वारा कमाए धन से माना जाता है। दूसरा कारण माता-पिता की महत्वाकांक्षा है। आज हर माता-पिता अपने बच्चों को डॉक्टर और इंजीनियर के अतिरिक्त और कुछ नहीं बनाना चाहता। आईआईटी और एम्स से नीचे किसी इंस्टीट्यूट में वे अपने बच्चों का एडमिशन नहीं करवाना चाहते। अभिभावकों के जीवन में बच्चों की रुचियों, उनकी महत्वाकांक्षाओं का कोई महत्व नहीं होता। माता-पिता अपने दृष्टिकोण के अनुसार उनके लिए दिशा निर्धारित करते हैं। उन्हें क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए, इसका निर्धारण माता-पिता बच्चों पर न छोड़कर स्वयं करते हैं।
आखिर बच्चे क्यों उठा रहे हैं ये कदम?
कोचिंग संस्थानों की इस मानसिकता से कहीं न कहीं वह छात्र भी प्रभावित होता है, जो इनसे जुड़ा है। कोचिंग संस्थान जितने बच्चों का दाखिला करते हैं, उन पर उन्हें बराबर ध्यान देना चाहिए और उनकी क्षमतानुसार उन्हें शिक्षा देने के साथ उनकी प्रतिभा का विकास करना चाहिए, पर वे सभी को एक डंडे से हांकते हैं। पाठ्यक्रम पूरा करने की होड़ में कोचिंग इंस्टीट्यूट यह भूल जाते हैं कि कुछ बच्चे सबके साथ दौड़ नहीं सकते। ऐसे ही छात्रों के मन में हीनता बोध का जन्म होता है, जो उन पर इस कदर हावी हो जाता कि उन्हें लगने लगता है कि वे अब कुछ नहीं कर सकते। उन्हें ग्लानि होती है कि उन्होंने अपने माता-पिता का पैसा बर्बाद कर दिया। जब ये ग्लानि अपने चरम पर पहुंच जाती है तो वे आत्महत्या की ओर कदम बढ़ा लेते हैं,
कोटा में अब तक इतने छात्रों ने किया सुसाइड-
कोटा में इस वर्ष अब तक 23 छात्रों की मौत सुसाइड करने से हुई है. यह घटना सिर्फ इस बार की नहीं है. पिछले साल भी कोटा में 17 छात्रों की मौत आत्महत्या करने से हुई थी. 2022 के पहले भी यह होता रहा रहा है.. 27 अगस्त को टेस्ट में कम नंबर आने पर नीट की तैयारी कर रहे दो छात्रों ने आत्महत्या कर ली… आखिरी कैसे और कब कोटा में रुकेगा छात्रों की आत्महत्या का सिलसिला… आपको इसके बारे में आगे बताये पहले एक नजर कोटा शहर में हुई उन छात्रों की मौत के आंकड़ों पर डालते हैं जो आपको सोचने को मजबूर कर देंगे,, कोटा में साल 2015 में 17 छात्रों की मौतें जबकि 2016 में 16 छात्रों की मौतें.. 2017 में 7 छात्रों की मौतें , 2018 में 8 छात्रों की मौतें, 2020 में 4 की मौतें वहीं 2022 में 15 और इस साल यानी 2023 में अब तक 23 छात्र आत्महत्या कर चुके हैं,,
क्या कहते हैं NCRB के आंकड़े-
NCRB के आंकड़ों पर नज़र डालें तो हर साल देश में हजारों छात्र आत्महत्या करते हैं.. पिछले पांच साल के आंकड़ों पर नज़र डालें तो 2017 में जहां कुल 9 हजार 905 छात्रों ने आत्महत्या की थी, वहीं साल 2018 में 10 हजार 159 छात्रों ने आत्महत्या की थी… 2019 में ये आंकड़ा 10 हजार 335 था और 2020 में ये 12 हजार 526 तक पहुंच गया.. जबकि, 2021 में देश में कुल 13 हजार 89 छात्रों ने आत्महत्या की… आपको बता दें 2020 से 2021, जब सबसे ज्यादा छात्रों ने आत्महत्या की उस वक्त कोरोना काल चल रहा था और ज्यादातर छात्र अपने घरों से पढ़ाई कर रहे थे.. ये सोचने वाली बात है कि हॉस्टल में रहने की बजाय जब छात्रों को घर पर रह कर पढ़ाई करनी पड़ी तो उनमें आत्महत्या की दर ज्यादा थी। NCRB के आंकड़े में एक और बात सामने आई की आत्महत्या करने वाले छात्रों में लड़कों की संख्या लड़कियों की अपेक्षा ज्यादा थी।
ये राज्य आत्महत्या के मामले में सबसे ऊपर-
छात्रों के आत्महत्या के मामले में देश के जो पांच राज्य सबसे ऊपर हैं, उनमें महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक और ओडिशा हैं। एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार, साल 2021 में महाराष्ट्र के 1 हजार 834 छात्रों ने आत्महत्या की , वहीं मध्य प्रदेश के 1 हजार 308 छात्रों ने आत्महत्या की। जबकि, तमिलनाडु के 1 हजार 246 छात्रों ने आत्महत्या को चुना। वहीं कर्नाटक के 855 और ओडिशा के 834 छात्रों ने आत्महत्या कर ली… हालांकि, एनसीआरबी की रिपोर्ट में इस बात का जिक्र नहीं है कि छात्रों के आत्महत्या के पीछे की वजह क्या है, लेकिन ये जरूर बताया गया है कि साल 2021 में जिन 13 हजार 89 छात्रों ने आत्महत्या की थी, उनमें 10 हजार 732 की उम्र 18 साल से कम थी।
साल 2020 के मिड में आई नेशनल एजुकेशन पॉलिसी में कहा गया था कि कोचिंग कल्चर पर लगाम लगाने के लिए करिकुलम और एग्जाम सिस्टम में व्यापक सुधार किए जाएंगे, लेकिन कोटा के हाल से साफ है कि इस ओर कोई खास कदम नहीं उठाए गए. आंकड़े भी इसकी गवाही देते हैं. अगर इंजीनियरिंग और मेडिकल के करिकुलम और एक्जाम सिस्टम में बदलाव होते तो उसका असर कोटा की कोचिंग फैक्ट्रीज पर देखने को मिलता, लेकिन आंकड़े कुछ और ही कहते हैं.
इस साल सबसे ज्यादा आत्महत्या के मामले-
एक रिपोर्ट के मुताबिक कोटा में 4 हजार होस्टल्स और 40 हजार पेइंग गेस्ट हैं. इन ठिकानों में देशभर से आए 2 लाख से ज़्यादा बच्चे रहते हैं. ये बच्चे जॉइंट एंट्रेंस एग्जाम यानी JEE और NEET की रेस का हिस्सा होते हैं. पढ़ाई की रेस में लगे युवा उम्मीदवारों में से 23 ने इस साल अगस्त तक जान दे दी. छात्रों की आत्महत्या के मामले में ये पिछले 8 सालों का सबसे बड़ा आंकड़ा है. किसी कदम का कैसा असर होता है उसको समझने का सबसे लेटेस्ट एग्जांपल है CUET यानी कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट… मामला डीयू जैसी यूनिवर्सिटी का है. डीयू में पहले मेरिट बेसिस पर एडमिशन मिलता था. ऐसे एडमिशन के मामले में CBSE बोर्ड वाले आगे निकल जाते थे और स्टेट बोर्ड वाले मार खा जाता थे. माना यही जाता है कि CBSE की तुलना में स्टेट बोर्ड काफी कम नंबर देते हैं.
एग्जाम पर दो महीने की पाबंदी-
एक बच्चे का आधे से ज्यादा समय केवल स्कूल में निकल जाता है. इसके बाद वह ट्यूशन या कोचिंग में पिसता है. फिर स्कूल और ट्यूशन में मिली एक्टिवीटीज में लग जाता है. ऐसे में अगर कोई सी भी चीज थोड़ी भी इधर-उधर हो जाए तो न जाने उसके मेंटल हेल्थ पर क्या असर पड़ता होगा… वो भी उस दौर में जब अचीवमेंट्स को सोशल मीडिया पर सेलिब्रेट किया जाता है… लाइक्स और कमेंट्स वाले सेलिब्रेशन का भी बच्चों के दिमाग पर जो असर पड़ता है, शायद ही उसकी कोई मैपिंग हुई हो. हालांकि एक बात तय है कि मौजूदा कोचिंग सिस्टम का स्टूडेंट्स के दिमाग पर तगड़ा असर है. शायद इसी वजह से 23 बच्चों की मौतों की वजह से कोटा के कोचिंग सेंटर में होने वाले टेस्ट और एग्जाम पर दो महीने के लिए पाबंदी लगा दी गई है. ये पाबंदी DISTRICT ADMINISTRATION ने लगाई है… इस तरह का बैन जरूरी भी है. बच्चों को डॉक्टर इंजीनियर बनाने के प्रेशर में घर वाले 13 से 14 साल की उम्र में ही अपने से दूर करके कोटा की कोचिंग फैक्ट्री में मजदूरी करने भेज देते हैं,.. जबकि जेईई-नीट की परीक्षाएं 12वीं के बाद होती हैं,,, लेकिन स्कूलिंग छुड़वाकर, अटेंडेंस के मामले में तिकड़म लगाकर बच्चों को कोटा फैक्ट्री का मजदूर बना दिया जाता है. छोटी उम्र में परिवार से दूर एक नीरस से शहर में ये बच्चे जब कोचिंग सेंटर्स में एडमिशन लेते हैं तब इन्हें कंपार्टमेंट लाइज कर दिया जाता है.
2021 में 13 हजार से अधिक की मृत्यु आत्महत्या से-
कुछ हफ्ते पहले, राजस्थान के ‘कोचिंग हब’ कोटा में एक अनोखा ‘आत्महत्या-विरोधी’ उपाय लागू किया गया था. इस उपाय के तहत पंखे में स्प्रिंग लगाने की बात की गयी. ऐसे में अगर कोई छात्र लटककर आत्महत्या करने की कोशिश करता है, तो स्प्रिंग फैलेगा और छात्र की मौत नहीं होगी. कोचिंग हब ‘कोटा’ की स्थिति वास्तव में बेहद गंभीर है… लेकिन छात्रों में बड़े पैमाने पर हो रही आत्महत्या की घटना केवल कोटा तक ही सीमित नहीं है. NEET परीक्षा विवाद को लेकर तमिलनाडु में कम से कम 16 छात्रों ने आत्महत्या कर ली थी… कोलकाता के जादव पुर विश्वविद्यालय में, इसी महीने अगस्त की शुरुआत में कथित तौर पर रैगिंग और यौन उत्पीड़न के बाद एक 17 वर्षीय किशोर ने आत्महत्या कर ली. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के 2021 की रिपोर्ट के अनुसार 2021 में करीब 13 हजार से अधिक छात्रों की मृत्यु आत्महत्या करने से हुई थी.
युवा भारतीयों को परेशान करने वाले सभी मुद्दों के बीच, केवल आत्महत्या पर बात करना कोई समाधान नहीं है. इससे संबंधित अन्य कई कारक है जिन पर बात होनी चाहिए. कोटा माता-पिता के सपनों की फैक्ट्री के रूप में जाना जाता है. यहां मेडिकल और इंजीनियरिंग की तैयारी करने वाले स्टूडेंट्स भारी संख्या में कोचिंग करने आते हैं. उन स्टूडेंट्स पर अपने और माता-पिता के सपनों को पूरा करने की पूरी जिम्मेदारी होती है. इस दौरान छात्र अपनी इच्छाओं और क्षमता की परवाह किए बगैर अपना लक्ष्य पूरा करने की पूरी कोशिश करते हैं. और जब नतीजा सामने नहीं आता, तो वो आत्महत्या करना ही उचित समझते हैं…
किसी भी फैक्टर पर ध्यान नहीं दिया जाता-
यह सच है कि नेशनल सोसाइटी ऑफ प्रोफेशनल सर्वेयर्स (NSPS) के साथ-साथ अन्य रिपोर्ट्स में भी आत्महत्या के तरीकों तक पहुंच को कम करने की सिफारिश की गई है. लेकिन मूल कारणों पर बात किए बिना, आत्महत्या के तरीकों पर बात करना न केवल असंवेदनशील है, बल्कि अपने उद्देश्य में नाकाम होना भी है. दरअसल मेंटल हेल्थ को आजकल बायो साइको सोशल लेंस से देखा जा रहा है. जहां आत्महत्या की प्रवृत्ति बायोलॉजिकल, साइकोलॉजिकल और सोशल फैक्टर से प्रभावित होती है. लेकिन जब हम इन मामलों का आकलन करते हैं, तो बस बायोलॉजिकल और साइकोलॉजिकल फैक्टर पर ही ध्यान दिया जाता है. सोशल फैक्टर पर बात तक नहीं होती है. कई संस्थानों के मामले में तो इन दोनों फैक्टर पर भी ध्यान नहीं दिया जाता,,,यह सोचना गलत है कि विद्यार्थियों पर केवल सफल होने का दबाव होता है.
कई कारणों की वजह से होती है ये दिक्कतें-
आत्महत्या की प्रवृत्ति अक्सर कई कारणों की वजह से यानी मल्टी फैक्टोरियल होती है. कोचिंग संस्थानों में छात्र कभी अपना तो कभी अपने परिवार का सपना पूरा करने आते हैं. जब वो अपने परिवार से दूर नए-नए बाहर आते हैं तो बहुत कुछ ऐसा होता है, जिसके बारे में उन्होंने कभी नहीं सोचा होता. पारिवारिक समस्या, बेरोजगारी, मानसिक बीमारियों से लेकर भेदभाव और दुर्व्यवहार तक. ये कई कारक होते हैं, जो मिलकर आत्महत्या की प्रवृत्ति में योगदान करते हैं.यह ध्यान रखना चाहिए कि सभी स्टूडेंट्स सामाजिक और आर्थिक रूप से समान नहीं होते हैं.
वित्तीय रूप से कमजोर वर्ग से आने वाले छात्रों पर जल्दी से कुछ बनकर, अपने परिवार का भरण-पोषण करने की जिम्मेदारी अधिक होती है. नौकरी न मिलने, प्लेसमेंट न होने की संभावना हर संस्थान में ज्यादा होती है. लेकिन कोई भी संस्थान इस पर बात करना जरूरी नहीं समझता… न्यूमेरिकल questionऔर हाई स्कोरिंग इक्वेशन के शॉर्टकट याद करते-करते स्टूडेंट्स का मेंटल हेल्थ बुरी तरह से खत्म हो जाता है.. आंकड़ों की बात करें, तो NCRB डेटा केवल उन्हीं नंबरों की गिनती करता है, जिसके परिणामस्वरूप मृत्यु होती है. जो आत्महत्या करने में सफल हो गए होते हैं.. लेकिन उनका क्या, जो इस परिस्थिति से गुजरे तो सही लेकिन आत्महत्या करने में सफल नहीं हो पाएं…
कोई भी व्यक्ति इसका शिकार हो सकता है-
आत्महत्याओं के प्रति दृष्टिकोण बदलने की जरूरत है,,,एक ऐसा देश जहां एंग्जायटी जैसे मेंटल कंडीशन तक पर बात नहीं होती. इसे एक टैबू की तरह लिया जाता है और इससे पीड़ित लोगों को जज किया जाता है. वहां आत्महत्या के मुद्दे पर चर्चा करना बेहद मुश्किल है. ऐसा नहीं है कि जो लोग मानसिक तौर पर कमजोर होते हैं, केवल वो ही आत्महत्या करने का प्रयास करते हैं. कभी-कभी हमारे ईर्द-गिर्द की परिस्थितियां ऐसी होती हैं कि मजबूत से मजबूत हृदय वाला व्यक्ति भी इसका शिकार हो जाता है. व्यक्ति के चारों ओर ऐसी तनावपूर्ण स्थितियां होती हैं जो उसे इस ओर ले जाती हैं. उदाहरण के लिए जब एक छात्र किसी तरह के बदमाशी, यौन या शारीरिक शोषण, पढ़ाई में खराब प्रदर्शन से लेकर लिंग, धर्म या जाति के आधार पर शोषित होता है, तो वह ऐसा कर बैठता है.
अगर हम में से कोई भी एक बार इस परिस्थिति का डटकर सामना करने की कोशिश करें, तो शायद हम खुद को बचा सकें. केवल हमें एक बार साहस करके अपनी बात रखने की जरूरत है. लेकिन इसके लिए संस्थान के दृष्टिकोण में भी बदलाव की आवश्यकता है. स्कूल-कॉलेज, कोचिंग संस्थानों में आत्महत्या से संबंधित हिंसा को रोकने पर बात होनी चाहिए. हर शिक्षा संस्थान में भेदभाव पर चर्चा करनी चाहिए. टीचर्स व प्रोफेसर स्टूडेंट्स के आवश्यकता के अनुसार उनकी मदद करें ये सुनिश्चित करना चाहिए… इसके अलावा, सभी छात्रों के लिए संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य सहायता सहित स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए. फिलहाल फोकस सिर्फ आत्महत्या से होने वाली मौतों को कम करने पर है….
छात्रों के जीवन पर विचार करने की है आवश्यकता- अब ये भी सवाल उठता है कि संस्थाएं आत्महत्याओं को कैसे रोक सकती हैं ? इसके लिए हमें प्राथमिक स्तर पर इस स्थिति को रोकने के तरीकों पर विचार करने की जरूरत है. अगर हम स्टूडेंट्स के पर्सनल लेवल पर जाकर बात करें, तो सबसे पहले हमें उन्हें उस जगह से निकालना चाहिए,, जहां वो किसी कारण से परेशानी का सामना कर रहे हैं. या फिर किसी तरह की हिंसा का शिकार हो रहे हैं. न कि उनके कमरे से पंखा निकाल लेना चाहिए कि वो सुसाइड न करे. हमें यह सोचना चाहिए कि उक्त छात्र अपना जीवन समाप्त करने का प्रयास क्यों कर रहा है ? निश्चित तौर पर, सभी कारण टालने योग्य तो नहीं ही होंगे. यहां तक कि परिवारों को भी छात्रों के जीवन में उनकी भूमिका पर विचार करने की जरूरत है. सब लोग डॉक्टर और इंजीनियर बन जाएं, ये जरूरी नहीं. कई लोग तो ऐसी डिग्री लेने के बाद अपना रास्ता बदल देते हैं.
आत्महत्या की रोकथाम जरूरी-
क्या एक युवा किशोर से ये उम्मीद करना कि वो उस कंपटीशन में भाग ले और टॉप करे. वो भी ऐसे में जो उसने कभी खुद के लिए चुना ही नहीं. क्या ये उचित है? भारत में युवाओं की आबादी बहुत अधिक है और 15 से 29 वर्ष आयु वर्ग में मृत्यु का प्रमुख कारण आत्महत्या है. इनको रोकने के लिए कई प्रयास जरूरी हैं, जैसे मानसिक स्वास्थ्य देखभाल तक पहुंच में सुधार और इसमें गुणवत्तापूर्ण मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना, स्वास्थ्य के सामाजिक निर्धारकों को संबोधित करना, इसमें नौकरी के अवसर प्रदान करना, वित्तीय सहायता, भेदभाव और हिंसा को रोकना व इन विषयों पर चर्चा करना और सामाजिक समावेशन को बढ़ावा देना शामिल है…आत्महत्या की रोकथाम के बारे में जागरूकता बढ़ाना और इसमें लोगों को आत्महत्या के खतरनाक कारकों और सहायता कैसे प्राप्त करें इसके बारे में शिक्षित करना,आत्महत्या जैसी मानसिकता से जूझ रहे लोगों की मदद करना, इसमें भावनात्मक सहायता, व्यावहारिक मदद और संसाधनों के लिए तंत्र बनाना शामिल है…साथ ही सबसे महत्वपूर्ण सभी शैक्षणिक संस्थानों को आत्महत्या से निपटने के लिए अपने तंत्र पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है.
मोदी सरकार में 2024 से पहले बगावत के सुर उभरने लगे हैं,कई वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी खुल कर सामने आने लगी है,पहले नितिन गडकरी का एक मंच पर प्रधानमंत्री मोदी के नमस्कार का जवाब न देना और अब भाजपा की बड़ी और फायरब्रांड नेता उमा भारती का खुल कर सामने आना कहीं न कहीं ये साफ़ संकेत देता है कि मोदी की भाजपा में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा और कई दिग्गज नेताओं की पार्टी में अनदेखी के चलते शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ नाराजगी बढ़ रही है,जो कि एकजुट विपक्ष के साथ -साथ अपनों की नारजगी मोदी सरकार के लिए नई मुसीबत खड़ी कर सकती है।
उमा भारती को मनाना आसान नहीं-
उमा भारती,,, भाजपा का वो बड़ा चेहरा और वो नाम जो राम मंदिर आंदोलन के दौरान पुरे देश ने देखा,,और इसी आंदोलन ने उमा भारती को भाजपा और भारतीय राजनीती में उस मुकाम तक पहुंचाया जहां से आज उनकी अनदेखी भाजपा इतनी आसानी से नहीं कर सकती,,, उमा भारती 27 साल की उम्र में पहली बार चुनाव लड़ी. 6 बार सांसद, 2 बार विधायक बनी. 11 साल केंद्र में मंत्री रहीं और मध्य प्रदेश मुख्यमंत्री भी रहीं. जहां से बेहद नाटकीय ढंग से उनको हटाया गया,उस दौरान भी उमा भारती का अड़ियल रुख भाजपा हाईकमान से लेकर सबने देखा था,इससे ये तो साफ़ है अगर उमा भारती किसी चीज को लेकर अड़ गयी तो मोदी के लिए भी उनको मनाना आसान नहीं है।
उमा के तीखे तेवर,अनदेखी से नाराज-
एक बार फिर उमा भारती के कड़े तेवर दिखने शुरू हो गए हैं,,उमा भारती साफ़ कर चुकी हैं कि , मैंने 2019 में ही कहा था कि 2019 में चुनाव नहीं लड़ूंगी. मुझे 5 साल का ब्रेक दे दो, गंगा का काम करूंगी. यात्रा करूंगी. लेकिन मैं 2024 का चुनाव जरूर लड़ूंगी. मुझे कोई किनारे नहीं कर सकता’,,,, उमा भारती का ऐसा कहना यूँ अचानक नहीं हुआ,जिस तरह से पार्टी में कई पुराने नेता मार्गदर्शक मंडल में दाल दिए गए,कई और सीनियर नेता हाशिये पर डाल दिए गए उससे संकेत मिल रहे हैं कि कई नेताओं को 24 चुनाव में छुट्टी हो सकती है,लेकिन 24 के आम चुनाव से पहले जिस तरह उमा भारती को किनारे लगाया जा रहा है उससे उमा बेहद खपा हैं और वो भी उस राज्य से जहां की वो मुख़्यमंत्री रही हों सांसद रही हों।
क्यों नाराज है उमा भारती ?
मोदी सरकार में मंत्री रह चुकी उमा भारती ने मध्य प्रदेश में पार्टी द्वारा शुरू की गई जन आशीर्वाद यात्रा में शामिल होने के लिए निमंत्रण नहीं दिए जाने पर विधानसभा चुनाव से जुड़ी इस महत्वपूर्ण यात्रा का बहिष्कार करने की घोषणा कर दी है। उमा भारती पार्टी से इस हद तक नाराज हैं कि उन्होंने जन आशीर्वाद यात्रा के 25 सितंबर को होने वाले समापन समारोह में भी नहीं जाने की घोषणा कर दी है। समापन समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भी शामिल होने की संभावना है।आपको बता दें कि मध्य प्रदेश में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों के मद्देनजर भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने रविवार को राज्य के सतना जिले से पार्टी के राज्यव्यापी कार्यक्रम के तहत पहली जन आशीर्वाद यात्रा का शुभारंभ किया था। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह सोमवार को राज्य के नीमच से दूसरी जन आशीर्वाद यात्रा का शुभारंभ करने जा रहे हैं।लेकिन इन सभी कार्यक्रमों से भाजपा ने उमा भर्ती से दुरी बनाये रखी हुई है,जिससे उमा बेहद नाराज दिखाई दे रही हैं।
पार्टी द्वारा चुनावी रणनीति के लिहाज से शुरू की गई इन महत्वपूर्ण यात्राओं के लिए निमंत्रण नहीं मिलने पर नाराजगी जताते हुए उमा भारती ने कहा, ”आज बीजेपी की यात्राएं निकल रही। इनमें मुझे कहीं नहीं बुलाया। इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। उनको ये ध्यान तो रखना था। मुझे नहीं जाना था। वो घबराते है कि मैं पहुंच जाऊंगी तो सारा ध्यान मेरी तरफ चला जाएगा। मुझे नहीं जाना था। कम से कम निमंत्रण देने की औपचारिकता पूरी करनी चाहिए थी।
” उमा भारती ने सोमवार सुबह ट्वीट (एक्स) कर कहा, “मुझे जन आशीर्वाद यात्रा के शुभारंभ में निमंत्रण नहीं मिला, यह सच्चाई है कि ऐसा मैंने कहा है, लेकिन निमंत्रण मिलने या ना मिलने से मैं कम ज्यादा नहीं हो जाती। हां अब यदि मुझे निमंत्रण दिया गया तो मैं कहीं नहीं जाऊंगी। ना शुभारंभ में ना 25 सितंबर के समापन समारोह में।” हालांकि इसके बाद अपने अगले ट्वीट में उमा भारती ने यह भी कहा, “मेरे मन में शिवराज के प्रति सम्मान एवं उनके मन में मेरे प्रति स्नेह की डोर अटूट और मज़बूत है। शिवराज जब और जहां मुझे चुनाव प्रचार करने के लिए कहेंगे मैं उनका मान रखते हुए उनकी बात मानकर चुनाव प्रचार कर सकती हूं।” भाजपा नेताओं के फाइव स्टार होटलों में रुकने पर फिर से सवाल उठाते हुए उमा भारती ने अगले ट्वीट में कहा, “शादियों की फ़िज़ूल खर्ची और हमारे नेताओं का 5 स्टार होटलों में रुकना इसको मैं शुरू से ही ग़लत मानती हूं।
उमा की चेतावनी-
उन्होंने एक चैनल से बातचीत में कहा कि अगर आप यानी बीजेपी उन नेताओं के वजूद को पीछे धकेल देंगे, जिनके दम पर पार्टी का वजूद खड़ा है, तो आप एक दिन खुद खत्म हो जायेंगे,उमा भारती से पूछा गया कि वे बैठकों में नजर नहीं आ रही हैं, रणनीतियों से दूर रह रही हैं क्या उमा भारती को दरकिनार किया गया, या खुद दूरी बनाए हुए हैं? इस पर चेतावनी वाले लहजे में उमा भर्ती ने जवाब दिया कि मैं 2024 का चुनाव जरूर लड़ूंगी. इसलिए मैंने खुद को किनारे नहीं लगाया. और न कोई मुझे किनारे लगा सकता है।
गडकरी की नारजगी भी दिखाई दे रही-
ऐसा नहीं है कि सिर्फ उमा भारती ही नाराज हैं,गडकरी की नाराजगी भी अब खुल कर सामने दिखाई दे रही है,एक मंच पर प्रधानमंत्री मोदी जब सबको अभिवादन कर रहे थे और मंच पर खड़े सभी नेता भी प्रधानमंत्री का स्वागत कर रहे थे तो उसी मंच पर मौजूद गडकरी ने न तो पीएम मोदी को अभिवादन किया और न मोदी की तरफ देखा,इससे ये तो साफ़ है कि कहीं न कहीं पार्टी के भीतर ही विरोध बढ़ रहा है,,ऐसा नहीं है कि सिर्फ बड़े स्तर पर ही नाराजगी दिखाई दे रही है बल्कि छोटे स्तर पर भी नेता अब अपनी आवाज खुल कर उठाने लगे हैं।
कई अन्य नेता भी चल रहे नाराज-
भाजपा ने नाराज नेताओं को अलग-अलग समितियों में स्थान देकर खुश करने की कोशिश की गई है। कुछ तो मान गए हैं, लेकिन नाराज नेताओं की लिस्ट इतनी लंबी है कि उन्हें मनाने के लिए भाजपा को बकायदा रणनीति बनानी पड़ी है। उसी के मुताबिक रूठों को मनाने की तैयारी की जा रही है। चुनावी राज्य मध्य प्रदेश में बीजेपी के 60 से ज्यादा नेता नाराज बताये जा रहे हैं,,पूर्व विधानसभा अध्यक्ष के भाई और पूर्व विधायक गिरिजाशंकर शर्मा फिर कांग्रेस का दामन थाम सकते हैं। उन्होंने खुद इसके संकेत दिए हैं।
उन्होंने कहा कि वर्तमान में सरकार और संगठन की स्थिति खराब है। 7 -7 बार विधायक बन क्र जितने वाले नेता भी पार्टी की बेरुखी से नारज लग रहे हैं,कभी प्रदेश सरकार में प्रभावी मंत्री रहे डॉ. गौरीशंकर शेजवार अपने राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। चुनाव के लिए बनी समितियों में उन्हें जगह नहीं दी गई है। बीजेपी के संस्थापक और पार्टी के सबसे बड़े नेता रहे पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी के भांजे अनूप मिश्रा ने साफ शब्दों में इरादे एक साल पहले ही जाहिर कर दिए थे। उन्होंने एक बयान में कहा था कि मैं चुनाव लड़ूंगा यह तो तय है। अब पार्टी को सोचना है कि वह कहां से लड़ाना चाहती है। उनके यह तेवर अब पार्टी नेतृत्व के लिए उलझन बढ़ा सकते हैं, क्योंकि अनूप अभी तक ग्वालियर पूर्व विधानसभा से चुनाव लड़ते आए हैं।ऐसे कई नेता हैं जो अब खुलकर बोल रहे हैं जिससे बीजेपी मुश्किलें लगातार बढ़ रही है और इनका असर भी चुनावों पर पद सकता है।
भाजपा के लिए बनता सरदर्द-
चुनावी साल में वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी से भारतीय जनता पार्टी परेशान है. यही वजह है कि इंदौर में बीजेपी को नई गाइडलाइन जारी करना पड़ी. पार्टी ने यहां अब अपने हर कार्यक्रम में मंच पर पुराने नेताओं को बैठाने औऱ उन्हें पूरा सम्मान देने के निर्देश जारी किए हैं. पार्षदों से लेकर मंडल अध्यक्षों तक को वरिष्ठ नेताओं का विशेष ध्यान रखने के लिए कहा गया है.बीजेपी के वरिष्ठों की नाराजगी पर कांग्रेस चुटकी ले रही है. कांग्रेस प्रवक्ता नीलाभ शुक्ला का कहना है वरिष्ठ नेताओं के सम्मान की परंपरा तो बीजेपी में कभी की खत्म हो चुकी है. वरिष्ठ नेताओं को मार्ग दर्शक मंडल में बैठाकर उनके घरों का मार्ग ही भूल चुके हैं. कई वरिष्ठ नेता पार्टी को लेकर मुखर भी हो चुके हैं. खुद कैलाश विजयवर्गीय ने स्वीकार किया कि पार्टी के वरिष्ठ नेताओ में खासा असंतोष है. विधानसभा चुनाव में बीजेपी को लग रहा है कि वरिष्ठों की नाराजगी भारी पड़ सकती है. इसलिए उन्हें मंच पर बैठाकर सम्मान का लॉलीपाप दिया जा रहा है. कुल मिलाकर राजनैतिक ड्रामेबाजी की जा रही है. कहीं भी इनके मन के अंदर वरिष्ठों को लेकर सम्मान नहीं है।
कर्नाटक और हिमाचल चुनाव में करारी हार के बाद भाजपा कार्यकर्ताओं का मनोबल कम हुआ है. वहीं बीजेपी के पुराने नेता रही सही कसर पूरी कर रहे हैं. ऐसे में पार्टी पशोपेश में है. कई नेता है, जो अपनी उपेक्षा से नाराज है,ऐसे में ये देखना दिलचस्प होगा की बीजेपी इन्हें मनाने में किस हद तक कामयाब होती है।
क्या आप जानते हैं एक जगह ऐसी भी है, जहां इतना सोना है कि अगर वो सोना धरती पर आ जाय तो यहां सोने की वैल्यू ही खत्म हो जाएगी, ये इतना सोना है कि इस दुनिया में मौजूद हर शख्स करोड़पति बन सकता है,दो जगह ऐसी भी है जहां हीरों यानी डायमंड की बारिश होती है,ये सुनकर आप जरूर चौंक गए होंगे,लेकिन ये सौ प्रतिशत सच है।
क्या है 16 साइकी-
स्पेस यानी अंतरिक्ष जहां हमारे वैज्ञानिक लगातार खोज कर रहे हैं, यहां इतने रहस्य छिपे हैं जिनका इंसानों को पता नहीं है,इंसान की जिज्ञासा लगातार स्पेस में मौजूद चीजों को जानने की रही है. इसी सौरमंडल में एक लघु ग्रह है जो लगातार सूर्य के चक्कर लगाता है. वैज्ञानिकों को कई साल पहले ये ग्रह मिला इसका आकार प्रकार आलू की तरह है लेकिन इसकी खास बात ये है कि इसमें सोने की धातु प्रचुर मात्रा में भरी हुई है. इसका नाम 16साइके है. इसे लघु ग्रह भी कहा जा सकता है. वैज्ञानिकों ने पिछले कुछ वर्षों में कई क्षुद्र ग्रह खोजे हैं, ये उसी कतार में 16वां लघु ग्रह है।
इस लघुग्रह को 17 मार्च 1852 को इतालवी खगोलशास्त्री एनाबेल डी गैस्पारिस ने खोजा था. लेकिन इस पर इतना सोना भरा हुआ है. इसका पता बाद के बरसों में पता लगा, जब इस ग्रह आधुनिक अंतरिक्ष उपकरणों और मिशन के जरिए अध्ययन किया गया. 16 साइके नाम का ये लघुग्रह मंगल और बृहस्पति के बीच सूर्य की परिक्रमा करता है. इसका कोर निकल और लोहे से बना है. इसके अलावा इसमें बड़ी मात्रा में प्लैटिनम, सोना और अन्य धातुएं हैं.क्षुद्रग्रह 16 साइकी में मौजूद खनिजों की कीमत खरबों से भी कहीं अधिक बताई गई है. माना जाता है कि अगर इसका पूरा सोना धरती पर आ जाए तो वह हर शख्स $93 बिलियन यानी 763 अरब रुपए का धनवान बना देगा।
नासा ने 2013 में बनाई थी मिशन की योजना-
हालांकि इसका एक तर्क ये भी है कि अगर इस लघुग्रह का पूरा सोना धरती पर आ जाए तो सोने की कीमत बहुत गिर जाएगी और ये कीमती नहीं रह जाएगा. लेकिन ये सच्चाई है कि अब तक जितने ग्रहों या लघु ग्रहों का पता चला है, उसमें 16 साइके ऐसा लघुग्रह है जो सोने के अयस्क से लबालब है.ये वहां मध्यम आकार की बड़ी चट्टान के तौर पर घूम रहा है. डिस्कवरी के अनुसार , 16 साइकी में इतना सोना और अन्य कीमती धातुएं हैं कि धरती के हर शख्स को 100 अरब डॉलर मिल सकते हैं. नासा ने अक्टूबर 2013 में क्षुद्रग्रह पर एक मिशन भेजने की योजना बनाई थी, लेकिन ये अभियान टल गया. हालांकि इस मिशन का उद्देश्य लघुग्रह के खजाने को इकट्ठा करने की बजाए इसका अध्ययन करना था. यहां बहुत ही कीमती खजाना और हीरे, जवाहरात मिलने की संभावना जताई गई है।
यहां पर हैं सभी धातुएं मौजूद-
आपको बताते चले की इस जगह पर इतनी ज्यादा मात्रा में हीरे जवाहरात और कीमती रत्न मौजूद हैं, आलू के आकार में दिखाई दिखने वाला ये ग्रह सोने सहित कई और बहुमूल्य धातुओं जैसे प्लेटिनम, आयरन से बना हुआ है. नासा के मुताबिक इस क्षुद्रग्रह का व्यास लगभग सवा दो सौ किलोमीटर है. इस ग्रह पर सोने और लोहे की मात्रा बहुतायत है. अंतरिक्ष विशेषज्ञों के मुताबिक 16-साइकी पर लगभग 8000 क्वॉड्रिलियन पाउंड कीमत के बराबर लोहा मौजूद है. इस ग्रह की खोज के बाद वैज्ञानिक और खनन विशेषज्ञ स्कॉट मूर ने बताया कि यहां यहां पर इतना सोना हो सकता है कि अगर ये धरती पर आ जाए तो दुनियाभर की सोने की इंडस्ट्री के लिए खतरा बन जाएगा. धरती पर अचानक से इतनी अधिक मात्रा में आए सोने की वजह से सोने की कीमत गिर जाएगी और ये कौड़ियों के भाव आ जाएगा।
एलन मस्क करेगा मदद-
आपको बता दें अब नासा स्पेस एक्स के मालिक एलन मस्क की मदद से इस एस्टेरॉयड के बारे में और पता लगाने की कोशिश कर रहा है. स्पेस एक्स अपने अंतरिक्षयान से रोबोटिक मिशन इस एस्टेरॉयड पर भेजे सकता है। हालांकि इसे वहां जाने और स्टडी करके वापस आने में सात साल का समय लग जाएगा.उसकी वजह ये भी है कि अधिकांश क्षुद्रग्रह चट्टान, बर्फ या दोनों के संयोजन से बने होते हैं, लेकिन ये क्षुद्रग्रह धातु का एक विशाल टुकड़ा है जो बताता है कि यह एक प्रोटोप्लैनेट का खुला कोर हो सकता है. क्षुद्रग्रह पर कोई यान या मिशन भेजने पर खगोलविदों को ये देखने का मौका मिलेगा कि यहां पर वास्तव में क्या क्या है. ये संभव है कि इसी साल अक्टूबर में नासा का एक मिशन 16 साइकी के लिए रवाना किया जाए, जो 2030 तक इस क्षुद्रग्रह पर पहुंचेगा।
कई ग्रहों पर हो सकती है सोने की बड़ी मात्रा-
दशकों पहले किए गए अपोलो मिशनों के जरिए भी चंद्रमा पर सोना और चांदी होने का अनुमान लगाया गया था. वैसे तो कहा ये भी जाता है कि बुध ग्रह में हीरे भरे हुए हैं, जो पृथ्वी की तुलना में 17 गुना अधिक हीरे हो सकते हैं. वैज्ञानिकों का ये भी आकलन है कि मंगल और बृहस्पति जैसे ग्रहों पर जो स्थितियां हैं, उसमें वहां भी सोने की बड़ी मात्रा हो सकती है. वैसे वैज्ञानिक शोध ये भी बताती हैं कि अध्ययन यूरेनस और नेपच्यून जैसे ग्रहों पर हीरे की बारिश होती है. आप सोचेंगे ये कैसे सम्भव है,पर ये भी सच है और इसके पीछे विज्ञान का एक नियम काम करता है।
कैसे बनते हैं ये हीरे-
हमारे सौर मंडल में आठ ग्रह हैं। इन आठ ग्रहों में से हमारा ज्यादातर फोकस मंगल, बृहस्पति और शनि ग्रह पर होता है। सौरमंडल के बाहर तमाम तरह के अजीबोगरीब ग्रह हैं। कई ग्रह ऐसे हैं जहां रात में आग की बारिश होती है। हमारे सौरमंडल में ही दो ऐसे ग्रह हैं जिन पर हीरे की बारिश होती है। ये ग्रह यूरेनस और नेपच्यून हैं। सुनने में भले ही ये आपको किसी फिल्म की तरह लगे लेकिन ये सच है। NASA के ग्रेविटी एसिस्ट शोधकर्ता नाओमी रोवे-गर्ने बताती है कि इन ग्रहों पर हीरे की बारिश होती है। हीरे की बारिश सुन कर आप इसे पृथ्वी पर होने वाली बारिश जैसा मत समझ लीजिएगा. जिसमें जलवाष्प वायुमंडल में इकट्ठा होकर ठंडे होते हैं और फिर से पानी के रूप में बरसते हैं। ये हीरे पहले से किसी बादल में मौजूद नहीं होते हैं, बल्कि एक वैज्ञानिक प्रक्रिया के कारण बनते हैं।
क्या कहती हैं NASA की शोधकर्ता नाओमी-
नाओमी रोवे-गर्नी बताती हैं कि ‘मीथेन गैस के कारण ये दोनों ग्रह नीले दिखाई देते हैं। जैसा कि हम जानते हैं कि मीथेन में कार्बन होता है। लेकिन इन ग्रहों पर वायुमंडलीय दबाव बहुत ज्यादा है। इस कारण मीथेन से कार्बन कई बार अलग हो जाता है और भारी दबाव के कारण ये क्रिस्टल बनने लगते हैं जो एक हीरा होता है। ये हीरे लगातार जमा होते रहतें हैं और भारी होकर ये सतह पर गिरते हैं। अगर हम ग्रह पर मौजूद रहें तो ये देखने में हीरे की बारिश जैसा ही लगेगा।
नाओमी ने आगे बताती हैं कि ये एक ऐसी बारिश है जिसे हम देख नहीं सकते हैं, क्योंकि यहां के वायुमंडल में भारी दबाव है। इंसान यहां इसी कारण कभी नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि अगर ये हीरे हैं भी तो हम कभी इन्हें ला नहीं सकते हैं। बता दें कि मीथेन का रासायनिक नाम CH4 है। वातावरण के दबाव के चलते इससे कार्बन यानी C अलग हो जाता हे। अगर पृथ्वी के हिसाब से देखें तो जिस तरह वायुमंडलीय दबाव के कारण बारिश की बूंदें ओला बनती हैं वैसे ही इन हीरों का निर्माण होता है। पृथ्वी और नेपच्यून की दूरी 4.4 अरब किमी दूर है। वहीं यूरेनस की दूरी 3 अरब किमी है।
जब शोधकर्ताओं ने पहली बार देखी हीरे की बारिश-
2017 में शोधकर्ताओं ने पहली बार “हीरे की बारिश” देखी, क्योंकि यह उच्च दबाव की स्थिति में हुई थी, जैसा कि यूरेनस और नेपच्यून पर अनुभव किया गया था। यह अत्यंत उच्च दबाव है, जो इन ग्रहों के आंतरिक भाग में पाए जाने वाले हाइड्रोजन और कार्बन को निचोड़ कर ठोस हीरे बनाता है जो धीरे-धीरे आंतरिक भाग में डूब जाते हैं।शोधकर्ताओं ने इन ग्रहों की संरचना को अधिक सटीक रूप से पुन: पेश करने के लिए पीईटी प्लास्टिक का उपयोग किया, जिसका उपयोग नियमित रूप से खाद्य पैकेजिंग और प्लास्टिक की बोतलों में किया जाता है। उन्होंने एस.एल.एसी के लीनाक कोहेरेंट लाइट सोर्स में मैटर इन एक्सट्रीम कंडीशन उपकरण पर उच्च शक्ति वाले ऑप्टिकल लेजर की ओर रुख किया और प्लास्टिक में शॉकवेव्स बनाई. एक्स-रे पल्स का उपयोग करते हुए. उन्होंने शॉकवेव्स से प्लास्टिक में होने वाले परिवर्तनों का विश्लेषण किया और देखा कि सामग्री के परमाणु छोटे हीरे के क्षेत्रों में पुनर्व्यवस्थित हो गए।
टीम ने तब मापा कि वे क्षेत्र कितनी तेजी से और बड़े हुए और पाया कि ये हीरे के क्षेत्र कुछ नैनोमीटर चौड़े तक बढ़ गए। विश्लेषण से पता चला कि यह सामग्री में ऑक्सीजन की उपस्थिति थी. जिसने नैनोडायमंड को पहले की तुलना में कम दबाव और तापमान पर बढ़ने के लिए प्रेरित किया और अनुमान लगाया कि नेपच्यून और यूरेनस पर हीरे इन प्रयोगों में उत्पादित नैनोडायमंड की तुलना में बहुत बड़े हो जाएंगे।
चंद्रयान की सफलता से भारत की स्पेस एजेंसी इसरो की तारीफ विश्व के हर देश में हो रही है, भारत की इस कामयाबी के पीछे हमारे वैज्ञानिकों का अथक परिश्रम है, तभी जाकर भारत वो कारनामा करने में कामयाब हो पाया जो विश्व का कोई देश नहीं कर पाया, चंद्रयान-3 मिशन की सफलता के बाद ISRO ने अब सूरज के राज खोलने की भी तैयारी कर ली है. और इस मिशन का नाम होगा आदित्य L1 मिशन, सूरज में चल रही उथल-पुथल और स्पेस क्लाइमेट का अध्ययन करने के लिए भारत के आदित्य L1 मिशन 2 सितंबर को सुबह 11 बजकर 50 मिनट पर आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा में सतीश धवन स्पेस सेंटर से मिशन को लॉन्च किया जाएगा. पृथ्वी से सूरज की दूरी 15 करोड़ किलोमीटर है यानी चांद की तुलना में 4 गुना ज्यादा दूर है. पहले भी कई मिशन लॉन्च किए जा चुके हैं. सूरज पर इतनी ज्यादा गर्मी है. इससे ये तो साफ है कि मिशन सन मिशन मून की तुलना में ज्यादा मुश्किल भरा होने वाला है।
2 सितंबर को रवाना होगा आदित्य L1 मिशन-
विज्ञान के साथ ही हमारे और आपके जीवन के लिए भी ये अभियान बेहद महत्व रखता है। सूरज में चल रही उथल-पुथल और स्पेस क्लाइमेट का अध्ययन करने के लिए भारत का आदित्य L-1 मिशन 2 सितंबर को रवाना होगा। आदित्य-एल-1 अंतरिक्ष में एक स्पेस स्टेशन की तरह काम करेगा। भारत में अब तक वैज्ञानिक सूरज का अध्ययन ऑब्सर्वेटरी में लगी दूरबीनों के जरिए कर रहे हैं। इसकी कई सारी सीमाएं हैं। सूरज का आकार इतना बड़ा है कि लाखों पृथ्वी इसमें समा सकती हैं. स्पेस डॉट कॉम की रिपोर्ट के मुताबिक, सूर्य का व्यास पृथ्वी से करीब 109 गुना ज्यादा है. करीब 13 लाख पृथ्वी सूर्य में समा सकती है।
नासा ने सूर्य के अध्ययन के लिए किए कई शोध-
हमारा ब्रह्मांड असंख्य तारों से बना है. वैज्ञानिक ब्रह्मांड का भविष्य जानने में जुटे हैं. इसी क्रम में जिस सौर मंडल में हम रहते हैं उसे समझने के लिए सूर्य को जानना बेहद जरूरी है.. सूर्य से जितनी मात्रा में ऊर्जा और तापमान निकलता है उसका अध्ययन धरती पर नहीं किया जा सकता. लिहाजा दुनिया भर की अंतरिक्ष एजेंसियां जितना संभव है उतना सूर्य के पास जाकर अध्ययन करना चाहती हैं. नासा और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी ने सूर्य का अध्ययन करने के लिए कई शोध किए हैं. इसरो भी आदित्य एल-1 के जरिए सूर्य का विस्तृत अध्ययन करना चाहता है।
आदित्य एल-1 को पृथ्वी से सूर्य की ओर क़रीब 15 लाख किलोमीटर पर स्थित लैंग्रेंज-1 पॉइंट तक पहुंचना है. यह वो कक्षा में स्थापित हो जाएगा और वहीं से सूर्य पर नज़र बनाते हुए उसका चक्कर लगाएगा.
4 अरब साल पहले हुआ था सूर्य का जन्म-
सूर्य पर तापमान की बात करें तो यह 10 हजार फारेन हाइट यानी 5,500 डिग्री सेल्सियस के लगभग है. यहां पर हो रही न्यूक्लियर रिएक्शन की वजह से सूर्य के कोर का तापमान 7 मिलियन फारेनहाइट या 15 मिलियन सेल्सियस तक पहुंच जाता है. नासा के मुताबिक, 100 बिलियन टन डायनामाइट के विस्फोट से जितनी गर्मी पैदा होती है, ये तापमान उसके बराबर है. वैज्ञानिकों के मुताबिक, सूर्य का जन्म लगभग 4.6 अरब साल पहले हुआ था. उनका ऐसा मानना है कि सूर्य और सौर मंडल का बाकी हिस्सा गैस और धूल के एक विशाल गोले से बना है, जिसे सोलर नेब्यूला के तौर पर जाना जाता है. रिपोर्ट के मुताबिक, सूर्य के पास इतना न्यूक्लियर फ्युअल है कि वह इसी अवस्था में अगले 50 लाख सालों तक रह सकता है. इसके बाद वह एक लाल गोले में तब्दील हो जाएगा और आखिर में इसका बाहरी सतहें खत्म हो जाएंगी और इसका छोटा सा बस सफेद कोर रह जाएगा. धीरे-धीरे यह कोर फीका पड़ना शुरू होगा और अपने अंतिम चरण की तरफ बढ़ना शुरू होगा।
भारत के इस मिशन का सबको इंतजार-
ये तो थी सूर्य के बारे में कुछ जानकारियां जो विश्व के वैज्ञानिकों ने अब तक जुटाई है, अब बात भारत के उस मिशन की जिसका इन्तजार न केवल देश के लोगों बल्कि पूरे विश्व को है. चांद को तो भारत ने मुट्ठी में कर लिया है.. आदित्य L-1 के जरिये अब सूरज की बारी है. ये काफी मुश्किल टास्क है लेकिन जिस तरह भारत ने चंद्रयान मिशन को कामयाब बनाया इससे अब एक बार फिर पूरे विश्व को भारत से उम्मीद जग गई है और हमारे देश के वैज्ञानिकों का इरादा और दृढ़ संकल्प यही दर्शाता है।
आदित्य L1 को लॉन्च करने का मकसद आखिर है क्या?
आदित्य एल-1 भारत का पहला सूर्य मिशन है। इसे लॉन्च करके भारत सौर वायुमंडल यानी क्रोमोस्फेयर और कोरोना की गतिशीलता का अध्ययन करना चाहता है। इसके साथ ही, वह कोरोना से बड़े पैमाने पर निकलने वाली ऊर्जा के रहस्यों से भी पर्दा उठाना चाहता है। इसके अलावा, आदित्य एल-1 के जरिए इसरो आंशिक रूप से आयनित प्लाज्मा की भौतिकी और अंतरिक्ष के मौसम की गतिशीलता के बारे में जानकारी इकट्ठा करना चाहता है। इसके साथ ही, वह सौर वातावरण से प्लाज्मा और चुंबकीय क्षेत्रों के बड़े पैमाने पर विस्फोट का अध्ययन करना चाहता है।
क्या है मिशन का बजट?
आदित्य एल-1 करीब 15 लाख किलोमीटर दूर स्थित सूर्य के रहस्यों से पर्दा उठाएगा। इसे लैंग्रेज बिंदु यानी एल-1 तक पहुंचने में 4 महीने लगेंगे। आदित्य एल-1 को लैंग्रेज बिंदु की पास की कक्षा में स्थापित किया जाएगा। लैंग्रेज बिंदु का मतलब अंतरिक्ष में मौजूद उस प्वाइंट से होता है, जहां दो अंतरिक्ष निकायों जैसे सूर्य और पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण आकर्षण और प्रतिकर्षण का क्षेत्र उत्पन्न होता है। इतालवी-फ्रांसीसी गणितज्ञ जोसेफ-लुइस लैंग्रेंज के नाम पर इसका नामकरण किया गया है। आदित्य एल-1 सात पेलोड लेकर अपनी मंजिल तक पहुंचेगा। इन पेलोड के जरिए इसरो को फोटो स्फेयर यानी प्रकाश मंडल, और क्रोमोस्फेयर यानी सूर्य की दिखाई देने वाली सतह से ठीक ऊपर की सतह और कोरोना यानी सूर्य की सबसे बाहरी परत के अध्ययन में मदद मिलेगी। आदित्य एल-1 को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से PSLV-सी – 57 के जरिए लॉन्च किया जाएगा। इससे पहले चंद्रयान-3 को भी यहां से लॉन्च किया गया था। आदित्य एल-1 मिशन का बजट करीब 400 करोड़ रुपये हैं। आदित्य एल-1 को दिसंबर 2019 से बनाना शुरू किया गया था।
कहां से होगी मिशन सन की लैंडिंग-
चंद्रयान-3 को 14 जुलाई को दोपहर दो बजकर 35 मिनट पर श्रीहरिकोटा स्थित स्पेस सेंटर से LVM-3 के जरिए लॉन्च किया गया था। यह 23 अगस्त को शाम 6 बजकर चार मिनट पर चांद की सतह पर लैंड किया। साथ ही भारत चौथा देश बन गया, जिसने चांद पर सॉफ्ट लैंडिंग की हो। इसी के साथ भारत के नाम एक और बड़ी उपलब्धि दर्ज हुई। भारत चांद के दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला दुनिया का पहला देश बन गया है। चंद्रयान-3 जहां चांद के रहस्यों से पर्दा उठाएगा, वहीं आदित्य एल-1 सूर्य के राज को दुनिया के सामने खोलेगा। सूर्य के उन रहस्यों से पर्दा उठेगा, जिससे दुनिया अब तक अनजान है। इसरो के मुताबिक, इस मिशन को सूर्य की तरफ लगभग 15 लाख किलोमीटर तक भेजा जाएगा. जिस जगह पर आदित्य एल-1 अंतरिक्ष यान जाएगा उसे एल-1.. यानी लाग्रेंज प्वाइंट वन कहते हैं. ये दूरी पृथ्वी और सूर्य की दूरी का महज 1 प्रतिशत है।
इन वजह से सूर्य को देखा जा सकता है-
धरती और सूर्य के बीच की दूरी लगभग 15 करोड़ किलोमीटर है. इस दूरी के बीच में कई ऐसे बिंदु हैं जहां से सूर्य को स्पष्ट देखा जाता है. धरती और सूर्य के बीच लैग्रेंज प्वाइंट ही वो जगह है जहां से सूर्य को बिना किसी ग्रहण या अवरोध के देखा जा सकता है. धरती और सूर्य के बीच पांच लैग्रेंज प्वाइंट है. इस पर किसी अंतरिक्ष यान का गुरुत्वाकर्षण सेंट्रिपेटल फोर्स के बराबर हो जाता है. जिसकी वजह से यहां कोई भी यान लंबे समय तक रुक कर शोध कर सकता है. इस जगह को ‘अंतरिक्ष का पार्किंग’ भी कहा जाता है, क्योंकि बेहद कम ईंधन के साथ इस जगह पर अंतरिक्ष यान को स्थिर किया जा सकता है. एल 1, एल 2 और एल 3 प्वाइंट स्थिर नहीं है. इसकी स्थिति बदलती रहती है. जबकि एल 4 और एल 5 स्थिर है और अपनी स्थिति नहीं बदलते हैं।
आंध्र-प्रदेश के श्रीहरिकोटा से होगा लॉन्च-
आदित्य-एल-1 मिशन को इसरो के PSLV-XL रॉकेट में सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र श्रीहरिकोटा से लॉन्च किया जाएगा. शुरुआत में अंतरिक्ष यान को पृथ्वी की लोअर आर्बिट में रखा जाएगा इसके बाद इस कक्षा को कई राउंड में पृथ्वी की कक्षा से बाहर ले जाने के लायक बनाया जाएगा उसके बाद स्पेस क्राफ्ट में ऑनबोर्ड इग्निशन का उपयोग करके लैग्रेंज बिंदु (एल1) की ओर प्रक्षेपित कर दिया जाएगा।
ये है आदित्य L1 मिशन का लक्ष्य-
सूर्य और उसके अस्तित्व के बारे में मानव मन की जिज्ञासाओं को शांत करने में इसरो इस मिशन पर 400 करोड़ रुपये खर्च कर रहा है, वहीं अगर इस पर लगने वाले समय की बात करें तो आदित्य एल-1 को दिसंबर 2019 से बनाने पर काम चल रहा है. जो कि इसके प्रक्षेपण के बाद ही पूरा होगा. आदित्य-एल1 मिशन का लक्ष्य एल1 के पास की कक्षा से सूर्य का अध्ययन करना है.. यह मिशन सात पेलोड लेकर जाएगा, जो अलग-अलग वेव बैंड में फोटोस्फेयर, क्रोमोस्फेयर और सूर्य की सबसे बाहरी परत पर रिसर्च करने में मदद करेंगे।
इसरो के अनुसार, एल1 रिसर्च मिशन में आदित्य-1 यह पता लगाएगा कि सूर्य की बाहरी सतह का तापमान लगभग दस लाख डिग्री तक कैसे पहुंच सकता है, जबकि सूर्य की सतह का तापमान 6000 डिग्री सेंटीग्रेड से थोड़ा अधिक रहता है. आदित्य-एल1 यूवी पेलोड का उपयोग करके कोरोना और सौर क्रोमोस्फीयर पर एक्स-रे पेलोड का उपयोग करके लपटों का अवलोकन कर सकता है. कण संसूचक और मैग्नेटो मीटर पेलोड आवेशित कणों और एल1 के चारों ओर प्रभामंडल कक्षा तक पहुंचने वाले चुंबकीय क्षेत्र के बारे में जानकारी प्रदान कर सकते हैं।
क्या है इन प्वाइंट्स का काम-
L-3 प्वाइंट सूर्य के पीछे के हिस्से में है. जबकि एल 1 और एल 2 प्वाइंट सूर्य के सीध में सामने हैं. एल 2 प्वाइंट पृथ्वी के पीछे के हिस्से में हैं, मतलब एल 2 प्वाइंट के सामने पृथ्वी और सूर्य दोनों आते हैं. यह प्वाइंट भी रिसर्च के लिहाज से काफी मुफीद माना जाता है, क्योंकि यह पृथ्वी के नजदीक है और यहां से संचार में काफी आसानी होती है. दरअसल इसरो उन सौर गतिविधियों की स्टडी करना चाहता है जो उसकी सतह से बाहर निकल कर अंतरिक्ष में फैल जाते हैं और कई बार धरती की तरफ भी आ जाते हैं, जैसे कोरोनल मास इजेक्शन, सोलर फ्लेयर्स, सौर तूफान आदि. इसलिए लाग्रेंज प्वाइंट 1 इस लिहाज से खास जगह है, क्योंकि सूर्य से निकलने वाले कोरोनल मास इजेक्शन और सौर तूफान इसी रास्ते से होकर धरती की ओर जाते हैं।
अगर भारत इस मिशन में कामयाब हुआ तो-
सूर्य के वातावरण से निकलकर अंतरिक्ष में फैलने वाले कोरोनल मास इजेक्शन और सौर तूफानों में कई तरह के रेडियोएक्टिव तत्व होते हैं, जो पृथ्वी के लिहाज से नुकसानदेह होते हैं. सौर तूफान और कोरोनल मास इजेक्शन की वजह से पृथ्वी के बाहरी वायुमंडल में चक्कर काट रही सैटेलाइट में खराबी आ सकती है. इसके अलावा अगर कोरोनल मास इजेक्शन और सौर तूफान धरती के वातावरण में दाखिल हो जाए तब पृथ्वी पर शार्ट वेब कम्यूनिकेशन, मोबाइल सिग्नल, इलेक्ट्रिक पॉवर ग्रिड सिस्टम पूरी तरह से ठप पड़ जाएगा।
अगर भारत इस मिशन में सक्सेज होता है तो भारत की स्पेस एजेंसी का लोहा पूरा विश्व मानेगा,, जैसा की उम्मीद भी है कि इसरो इस मुश्किल काम में जीत हासिल करेगा,,, सूर्य से मिलने वाली जानकारी से न केवल इसरो और भारत बल्कि पुरे विश्व को काफी फायदा पहुंचेगा, फिलहाल इसरो के इस मिशन की कामयाबी को लेकर सारा देश प्रार्थना कर रहा है।